अरविंद शेष

(Arvind Shesh)


बिहार की सड़कों के बारे में कुछ फैशनेबुल जुमले जब दिमाग में बैठे हों और आप किसी दूसरे राज्य की सड़कों से गुजर रहे हों तो यह बात एक 'उम्मीद' की तरह आसपास मंडराती रहती है कि कम से कम देहाती इलाकों में बिहार जैसी सड़कें जरूर देखने को मिल जाएंगी। लेकिन नौ मई की सुबह छह बजे दिल्ली विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन से राकेश जी ने गाड़ी की कमान थामी तो दिल्ली की हवाई पट्टी जैसी सड़कों ने हरियाणा में भी हमारा साथ नहीं छोड़ा।

अगर अस्सी-नब्बे या सौ किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार गाड़ियों के लिए एक सामान्य गति हो तो आपको वैसे ही सड़कों की स्थिति का अंदाजा लगा लेना चाहिए। हिसार की ओर हर अगले किलोमीटर का फासला तय करते हुए मेरी वे 'बिहारी उम्मीदें' मायूस हो रही थीं। राकेश जी गाड़ी चला रहे थे, लेकिन सड़कें कुछ ऐसी थीं कि लग रहा था कि हमारी गाड़ी उड़ रही है। सड़क के दोनों ओर कतार में यूकलिप्टस के पेड़...। अंदाजा लगाइए, कि बहुत अच्छी और दूर-दूर तक सीधी जाती सड़क कितनी खूबसूरत दिख रही होगी...।

आधे घंटे के बाद हम दिल्ली से हरियाणा में प्रवेश कर चुके थे और अब हरियाणा में चलते हुए भी लगभग एक घंटे हो चले थे। किसी भी इलाके में बहुत अच्छी सड़कें इस बात का एहसास देती हैं कि यहां 'सरकार ने विकास के बहुत काम किए हैं।' चूंकि हमारे सामने मंजिल सिर्फ मिर्चपुर था और रास्ता चाहे कोई भी हो जो मिर्चपुर ले जाए, इसलिए सड़क का नक्शा देखना हमने जरूरी नहीं समझा। यही वजह थी कि एक छोटे रास्ते के बजाय अनजाने में हमने लंबा रास्ता पकड़ लिया और एक तरह से यह भी अच्छा ही हुआ।

हिसार अट्ठानबे किलोमीटर... हिसार नब्बे किलोमीटर... हिसार बयासी किलोमीटर...! जिंदल हाउस... जिंदल निवास... जिंदल हाउस...! शृंखला...! बहुत अच्छी सड़क... जिंदल हाउस... जिंदल निवास... जिंदल हाउस...! बहुत अच्छी सड़कें...!

तकरीबन एक-डेढ़ घंटे तक यही...। लगातार। दोनों तरफ की कुछ दुकानों के ऊपर लगे बोर्ड में दुकान के नामों के साथ जगह के नाम के रूप में हिसार भी लिखा था। यानी हम हिसार में आ चुके थे।

चंद्रा जी ने खिड़की का शीशा नीचे करके फलों का रस बेच रहे दुकानदार से पूछा- 'भइया, एडीएम ऑफिस किधर पड़ेगा...?'

'आगे दूसरे चौराहे से बाईं तरफ...।'

हम आगे बढ़े। एक बड़े मकान के आगे कपड़ों के कारण पुलिस जैसे दिखने वाले तीन लोग खड़े थे। राकेश जी ने गाड़ी किनारे की और चंद्रा जी ने फिर पूछा- 'एडीएम ऑफिस किधर है?'

'ये रहा जी...।' सामने ऊंगली बताते हुए एक ने कहा। वह एचडीएफसी बैंक का एटीएम था।

खैर, पूछते हुए हम हिसार कलेक्टेरियट पहुंचे। इतवार का दिन था, इसलिए सूना होना स्वाभाविक था। हमें खबर थी कि मिर्चपुर के पीड़ित हिसार एडीएम ऑफिस के सामने धरने पर बैठे हैं। लेकिन वहां कोई नहीं था। एडीएम के ऑफिस के सामने पांच-छह महिला पुलिसकर्मी आराम और बातचीत की मुद्रा में मौजूद थीं। एक वहां खड़ी मोटरसाइकिल पर बैठी थी।

चंद्रा जी उनके पास गईं। उन्हें उन महिला पुलिसकर्मियों ने बताया कि उनका धरना खत्म हो गया और वे लोग तो कल ही चले गए। यह भी कि मिर्चपुर में तो आज सर्वखाप पंचायत भी है। हमें मिर्चपुर जाना था। उन्होंने रास्ता बता दिया। पहले बरवाला, फिर वहां से मिर्चपुर...। कम से कम एक घंटे तो लगेंगे ही।

निरपेक्ष-सी उनकी रूखी आवाज़ों से भी छिपी मिठास ने हमें डरने नहीं दिया। क्या इसलिए कि पुलिस की वर्दी के बावजूद वे पांच-छह औरतें थीं?

बरवाला तीस किलोमीटर...। बोर्ड पर लिखा था और साथ में तीर का निशान दाहिनी ओर...। हम मुड़ गए।

फिर बहुत अच्छी सड़क...! यह बहुत अच्छी सड़क हमारा साथ नहीं छोड़ रही थी। हमें मिर्चपुर जाना था...।

तेज धूप से और गर्म होती गाड़ी में हम सबका गला सूख रहा था। सड़क किनारे एक पीपल के पेड़ के नीचे छह-सात बड़े घड़े रखे थे। राकेश जी ने गाड़ी रोकी। कम से कम मेरी प्यास अब तक फ्रिज़ के बजाय घड़े के पानी से ज्यादा बुझती रही है। लेकिन हमें मिर्चपुर जाना था और इन घड़ों के पानी की ठंडक, उसका स्वाद और गले का तर होना महसूस करना किसी अपराध से कम नहीं था।

मिर्चपुर दो किलोमीटर...। सड़क किनारे मील के पत्थर पर लिखा था। मिर्चपुर नजदीक था। जीप, ट्रैक्टरों पर लद कर और मोटरसाइकिलों पर ये लोग किधर जा रहे हैं...! शायद सर्वखाप पंचायत में। सड़क के दाहिनी ओर एक जगह पचासों पुलिस वाले खड़े थे। यानी तनाव अब भी है...। यानी सुरक्षा की जरूरत अब भी है...।

हम आगे बढ़े। फिर पुलिस वालों का एक जत्था सामने था। आगे एक और जत्था मिला। हमने एक व्यक्ति से पूछा- 'मिर्चपुर गांव...?'

'ये ही है जी...।'

'ये लोग किधर जा रहे हैं?'

'सर्वखाप पंचायत है जी...।'

एक बड़ा तालाब जैसा था। लेकिन मैंने अब तक जैसे तालाब देखे हैं, वैसा नहीं था। उसी के दक्षिणी ओर ऊपर सफेद शामियाने का एक बड़ा पंडाल दूर से भी दिख रहा था।

वहां जाने के लिए बने रास्ते पर निगाह गई। बिहार की सड़क...!

नौ मई, चिलचिलाती-जलाती धूप और सफेद शामियाने की झीनी छांव में बैठे हुए लगभग आठ-दस हजार लोग, झक सफेद कपड़ों में ही ढंके हुए। राकेश जी ने एक पेड़ की छांव में गाड़ी खड़ी की।

हुक्के के धुंए की महक...।

एक व्यक्ति से हमने पूछा- 'यहां कौन लोग आए हैं?'

'ये सर्वखाप पंचायत है जी...। हम राजपूत खाप से आए हैं। यहां जाटों के और दूसरी जातों के खाप भी आए हैं।'

'कोई खास मकसद...?'

'कुछ नहीं जी...। यहां जो कांड हुआ है, उसी के समझौते और भाईचारे के वास्ते आए हैं सब...।'

हम एक किनारे खड़े होकर बैठे हुए लगभग दस हजार लोगों के सामने बने मंच पर बोलते खाप प्रतिनिधियों को सुनने लगे।

बैठे हुए लोगों के बीच कई जगह हुक्के दिखे। हुक्के के धुंए की महक...।

'आज हमें इस बात पर गर्व है कि हमारी तीन हजार साल की महान परंपरा का मान रखते हुए आप लोग इतनी दूर से पधारे हैं...।'

हमारे हाथों में नोटबुक और कलम देख कर शायद कुछ लोगों का ध्यान हमारी ओर गया- 'आपलोग आगे चलो जी...। पत्रकारों के लिए आगे कुर्सियां रखी हैं।'

'नहीं, हम यहीं ठीक हैं...।'

'अरे नहीं, आगे आपके लिए जगह हैं जी...।'

हम आगे गए। हमारे लिए कुर्सियां खाली कराई गईं। हम बैठ कर सुनने लगे।

'अब चौधरी ... एक मिन्ट में अपनी बात कहेंगे...।'

'भाइयों एवं बहनों...। हमें आज बड़ा अच्छा लग रहा है आप लोगों के सामने अपनी बात रखते हुए। हमें यह भी अच्छा लगा कि वाल्मीकि भाई खुद आगे आए और एक मामूली-सी घटना से पैदा हुई दूरी को पाट कर रख दिया...। सब कुछ ऐसा ही रहा तो कल को पता भी नहीं चलेगा कि यहां कुछ हुआ भी था...।'

चौधरी आत्मा सिंह गिल के बाद मंच पर बैठे डेढ़ सौ से ज्यादा चौधरी जी को अपनी बात रखनी थी।

मंच पर भी हुक्के दिख रहे थे।

'खापों को बदनाम किया जाता है। हमें तालिबानी कहा जाता है। लेकिन आज की सभा में बाल्मीकि भाइयों ने भाईचारे की जो मिसाल रखी है, हम उसका मान रखेंगे। हम पहले की तरह सबका खयाल रखेंगे। बराबर समझेंगे। कोई छोटा-बड़ा नहीं होगा...।'

'हमारे बीच कोई दूरी नहीं हैं। हमारे बीच झगड़ा लगाने का काम राजनीतिज्ञ, प्रशासन और मीडिया वाले करते हैं। आप ही बताइए कि एक छोटी-सी घटना के बाद प्रशासन ने लोगों के खिलाफ मुकदमा कर दिया और हमारे लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। क्या यह समाज में अशांति पैदा करने वाला काम नहीं है? हमारे बाल्मीकी भाई कहते हैं कि जो हो गया सो हो गया और प्रशासन है कि लोंगों को तंग करने पर तुला है...'

'नेता दोनों के ओर के लोगों को उकसाते हैं। अलग-अलग जातियों के लोगों को भड़काते हैं। वे यह भी कहते हैं कि मारो-मारो...! और यह भी कहते हैं कि बचाओ-बचाओ...!'

'यहां सब नेह से रहते हैं। कोई जात-पांत नहीं है। सब एक दूसरे का आदर करते हैं। सब एक दूसरे को ताऊ-काका कहके बुलाते हैं...।'

मेरे ठीक बगल वाली कुर्सी पर बैठा युवक बार-बार दांत पीस कर भुनभुना रहा था- 'भैनचो...। लड़कों को छुड़ाने की बात तो कर नहीं रहे। खाली भाषण दिए जा रहे हैं...।' एक व्यक्ति ने यही बात शायद जोर से कह दी कि चार-पांच लोग उसे प्यार से खींचते हुए पंडाल से बाहर ले गए।

'एक छोटी-सी घटना से खाप पंचायतों पर उंगली उठाई जा रही है। आज हमने भाईचारे का वह उदाहरण पेश किया है जो दुनिया देख रही है। एक ओर बाल्मीकि भाई कह रहे हैं कि हमें किसी से शिकायत नहीं है और मरने वाले भी हमारे हैं और मारने वाले भी हमारे। दूसरी ओर नेता और मीडिया हमारे बीच दुश्मनी पैदा करने में लगे हैं।'

हमें किसी से शिकायत नहीं...! मरने वाले भी हमारे हैं और मारने वाले भी हमारे...! हमें किसी से शिकायत नहीं...! क्या सचमुच रामकुमार सिंह यानी पीड़ित बाल्मीकियों में से एक ने ऐसा कहा होगा...!

'मीडिया और राजनीति ने सारा खेल खराब किया। शांति और भाईचारे को तोड़ने की कोशिश की, जिसे इस सर्वखाप पंचायत ने विफल कर दिया। आज इस पंचायत के भाईचारे को देख कर उन्हें होश आ गया होगा। हमारे बीच की सारी दूरियां खत्म हो गई हैं। अब तो बस एक ही बात रह गई है जी! सारे केस वापस हो जाएं।'

हवा धीमी थी, लेकिन धूप की गर्मी को साथ ला रही थी। हुक्के के धुंए की गंध को भी...।

क्या सचमुच दूरियां खत्म हो गईं? क्या सचमुच भाईचारा कायम हो गया? क्या सचमुच सारे केस वापस हो जाएंगे...? सिर्फ बीस दिन में यह बदलाव...! सदियों की दूरियां सिर्फ बीस दिन में पट गईं...!

शायद हम पांचों के दिमाग में यही बातें आ-जा रही होंगी। हम वहां मौजूद भीड़ में कुछ खास तलाशने की कोशिश कर रहे थे। दिलीप जी बहुत गौर से सब कुछ देख रहे थे। चंद्रा जी, राकेश जी और विनीत जी भी। इन्होंने ने कैमरे में काफी कुछ सहेज लिया था।

मुझे इस उजले रंग से ढंके पंडाल में सब कुछ उजला दिख रहा था।

जहां आग में बहुत कुछ खाक हो गया होता है, वहां क्या सब कुछ ऐसे ही उजला दिखाई देता है...?

एक बज चुके थे। मैंने राकेश जी से कहा- 'राकेश जी, लगता है यहां एक तरह की ही बातें अंत तक होंगी। क्या हम बस्ती की ओर चलें?'

पांच मिनट के भीतर हम पंडाल से बाहर निकले। गाड़ी की ओर बढ़ रहे थे कि दाहिनी ओर खड़े कुछ लोगों ने आवाज दी- 'ऐ छोरों...। इधर सुन।'

हम उन लोगों के पास गए। लोगों ने चारों ओर से हमें घेर लिया था।

'हम तुम्हें तालिबानी दिक्खें हैं...!'

'हमें तालिबानी लिखते हो तुमलोग...!'

'हम तुम्हें तालिबानी दिखते हैं...। हमें तालिबानी लिखते हो तुमलोग...!'

सिर्फ यही दो-तीन लाइनें हमें सुनाई पड़ रही थीं। राकेश जी ने कुछ कहना चाहा, लेकिन सिर्फ वही दो-तीन लाइनें गूंजने लगीं।

अचानक मुझे लगा कि यहां की हजारों की भीड़ के लिए हमें निपटाना कितना मुश्किल होगा...! अगर कोई एक हाथ चल जाए तो...! सर्वखाप पंचायत...। यहां सब तरह की 'समस्याओं' को निपटाना बहुत आसान होता है शायद...!

'भाई साब...। ऐसा नहीं है। हम वे नहीं जो आप समझ रहे हैं...।' मैंने राकेश जी का हाथ पकड़ा और उन्हें इशारे जैसा कुछ किया। इस बीच मेरी बातों की कलाकारी जारी थी।

हमारे कानों में अब कुछ गालियों के साथ वही दो-तीन लाइनें गूंज रही थीं- '...हम तुम्हें तालिबानी दिखते हैं...। हमें तालिबानी लिखते हो तुमलोग...।'

हम गाड़ी तक पहुंचे। हमें बहुत जल्दी हो गई थी। अगर कोई एक हाथ भी चल जाता तो...! वहां मौजूद लोगों में से किसका हाथ रुकता...। फिर कुछ नहीं रुकता...।

हमारा वहां कुछ पल भी रुकना ठीक नहीं था। राकेश जी ने उतनी ही जल्दी में गाड़ी बैक की और हम निकल चले। राहत...! क्या बच जाने की...?

हुक्के के धुंए की गंध हवा में घुल-मिल रही थी...।

लेकिन हमें बाल्मीकि बस्ती तो जाना है...। मैंने कहा- 'क्या हम ऐसा कर सकते हैं कि आगे से कुछ भी पूछना हो तो किसी महिला से पूछें या फिर किसी कमजोर और मैले-कुचैले दिखने वाले आदमी से...?'

(मैं दीवारों से टकरा के अपना सिर फोड़ लेना चाहता हूं। लेकिन करूं तो क्या करूं...)

आगे इस बात का ध्यान रखा हमने।

खौफ किन-किन रूपों में सिर पर हावी हो जाता है...! लेकिन उसके कारण होते हैं न...!

(पता नहीं क्यों, मुझे गुलाबी-गोरे-चिट्टे लंबे-चौड़े शरीर वाले, पुष्ट कंधे और छातियों वाले और मजबूत और कसे हुए जबड़े वाले लोग हमेशा डराते रहे हैं।)

हम गांव में घुसे। बाईं ओर एक घर के बरामदे पर चार-पांच महिलाएं बैठी थीं।

'बाल्मीकी बस्ती किधर है?'

'इसी रास्ते में आगे चले जाओ जी...।' एक महिला ने बताया।

दाहिनी ओर एक, दो, तीन...। जले हुए घर थे। सामने जगह-जगह पुलिस वाले।

राकेश जी ने गाड़ी एक जगह खड़ी की। चंद्रा जी ने एक पुलिस वाले से पूछा- 'हिसार जाने का रास्ता कौन-सा होगा।' पुलिस वाले ने बता दिया। 'असल में हमें दिल्ली जाना है।' 'तो फिर उल्टा ही चले जाना...।'

पुलिस वालों से चंद्रा जी की इतनी बातचीत दरअसल हमारे सहज होने की प्रक्रिया थी।

हम बस्ती में घुसे।

एक वृद्ध महिला जले घर की टूटी दीवारों के बीच झांकी और कुछ कहा। दिलीप जी और विनीत जी उनसे बात करने लगे। फिर बाईं ओर से उस घर के भीतर चले गए।

मैं, चंद्रा जी और राकेश जी बाईं ओर के जले हुए घर की ओर देख रहे थे। एक वृद्ध और उनकी पत्नी ने हमें इशारे से बुलाया। घर के भीतर ले गए। आंगन में जले हुए कपड़े बिखरे पड़े थे।

'ये कपड़े हमने बेटी की शादी के लिए खरीदे थे। सब जला दिया।'

एक ओर टूटा हुआ टीवी। 'इसे पटक-पटक कर तोड़ा...।'

सामने का कमरा पूरी तरह खाक हो चुका था। बरामदे में रखा चौकी, घर के भीतर पलंग, गोदरेज की आलमारी जलने के बाद भी खड़े थे।

'ये देखो...। बेटे ने मोबाईल खरीदा था। इसे ले भी नहीं गए। जमीन पर पटक कर तोड़ा। फिर ईंट से चूर किया।'

'हम बचने के लिए भाग कर ऊपर के कमरे में गए जी। भीतर से बंद कर लिया। वे आए और कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। दरवाजे-खिड़की पर पेट्रोल डाल दिया। आग लगा दी और चले गए। आधी जली खिड़की भीतर से तोड़ते नहीं तो बारह जने चले जाते जी।'

मैं एक तटस्थ दर्शक नहीं रह सकता था। बार-बार मेरा दिमाग झन्ना रहा था। मेरे जबड़े बार-बार कस रहे थे। दांतों के बीच पता नहीं मैं क्या पीस डालना चाहता था।

'घर के बाकी लोग कहां हैं?'

'सब जवान औरतों और लड़कियों को बाहर रिश्तेदारों के यहां भेज दिया जी। यहां कोई ठीक नहीं कि कब क्या हो।'

'वहां जो खापों की पंचायत चल रही है, उसमें तो लोग कह रहे हैं कि गांव के बाल्मीकियों ने समझौता कर लिया है और भाईचारा कायम हो गया है!'

'कोई समझौता नहीं जी। हममें से कोई वहां नहीं गया है। कोई समझौता नहीं...।'

पति-पत्नी दोनों बेहद थकी हुई आवाज में बता रहे थे।

'उस बच्ची का घर किधर है जिसे जला दिया गया?'

'हां, सुमन। उसके घर जरूर जाओ जी। यहां से सीधे आगे बाएं हाथ को दूसरी गली में...।'

दर्जनों पुलिस वाले पहरे पर थे। लगभग दो दर्जन घरों को उसी घर की तरह जलाया गया, जिसमें से हम अभी-अभी निकले थे।

हम सुमन के घर के सामने खड़े थे। पेड़ के नीचे दो खाट बिछी थी। तीन महिलाएं बैठी थीं।
'क्या यह वही घर है जिसमें एक बच्ची जल गई थी।'

'जल नहीं गई जी। जला दिया जाट्टों ने। सब कुछ जला दिया। ये भीतर वाले कमरे में। पहले उसके शरीर पर पेट्रोल डाल दिया। कमरे को बाहर से बंद कर दिया। फिर आग लगा दी। उसका बाप भाग रहा था। लेकिन बेटी को बचाने के चक्कर में वह भी जाट्टों के हाथ पड़ गया। उस पर पेट्रोल डाल दिया जी। वह भी खत्म हो गया जी...।' एक वृद्ध महिला की आवाज जैसे डूब रही थी...।

mirchpur

बाहर से भी दिख सकता था। सब कुछ खाक हो चुका था। मैं भीतर घुसा। जल कर काली पड़ चुकी दीवारें जैसे गिरने को थीं। पहला कमरा। बाईं ओर रसोई गैस का एक सिलेंडर और दाहिनी ओर एक सिलाई मशीन पड़ी थी। आग में जल जाने के बाद लोहे से बने ये सामान कैसे दिख रहे हो सकते हैं?
सामने नीचे कुछ अधजली किताबें बिखरी पड़ी थीं। अधजले कपड़ों के बीच। शायद दीवार में बनी आलमारी के सबसे निचले खाने में रखे होने के कारण आधी ही जल पाई थीं।

कई बार कागज के जले हुए पन्ने भी अपनी पूरी कहानी कह जाते हैं। बस रंग जरा धुंधला पड़ जाता है।
लोक प्रशासन- बारहवीं कक्षा के लिए...।
मैं सिर थाम कर बैठ गया था। लेकिन कितनी देर...! अधजली किताबों के कुछ पन्ने मैंने उठा लिए।

बाएं कोने में सामने भीतर वाले कमरे का दरवाजा था। दरवाजे-चौखट, सब महज जली हुई लकड़ी...। उन पर टिकी हुई दीवारें, जैसे अब ढह जाएंगी।
दरवाजे के भीतर। कमरे में कुछ भी पूरा खाक होने से जरा भी नहीं बचा था। छत...। लकड़ी की शहतीरों पर पहले ईंट की परत। उसके ऊपर मिट्टी की मोटी परत। इससे सबसे ज्यादा गर्मी और बहुत तेज धूप में भी कमरा ठंडा रहता है।

इसी घर में अपने लाचार पैरों के साथ सुमन किसी तरह जीती रही होगी। सबसे ज्यादा गर्मी और बहुत तेज गर्मी में भी ठंडा रहने वाले इसी कमरे में बैठ कर पढ़ती हुई सुमन बारहवीं तक पहुंच गई होगी।

सब कुछ खाक...।

यह घर इतना जला होगा, इतना जला होगा कि लकड़ी की शहतीरों पर टिकी आधी छत भहरा कर गिर गई होगी। बाकी जल चुकी, लेकिन टिकी हुई शहतीरों पर अब भी लटकी हुई थी। किसी भी वक्त ढह जाने के लिए...।

इसी कमरे में उन्होंने सुमन को पकड़ लिया होगा न...। पेट्रोल डाल दिया होगा...। कमरे को बाहर से बंद कर दिया होगा...। आग लगा दिया होगा...। सुमन चिल्लाने लगी होगी...। जान बचा कर भागते पिता बेटी की आवाज सुन कर वापस भागे होगें...। पकड़ लिए गए होंगे...। उनके ऊपर भी पेट्रोल डाल दिया गया होगा...। और वे भी...।

खाट पर अब बैठ गई उसी वृद्ध महिला ने फिर कहा- 'जब तक सब जल नहीं गया, घर के बाहर सभी जमे रहे।'
क्या मैं अब भी एक तटस्थ दर्शक और अध्येता रहूं...?
घर के बाहर सुमन की बहन सुदेश थीं- 'वह पढ़ने में बहुत मन लगाती थी जी...। बारहवीं में चली गई थी...।'

मैं खुद को रोक नहीं सकता था। मैं फफक पड़ा था। मैं खूब रोना चाहता था। मैं झटके से दूसरी ओर घूम गया था। मैं आंखें पोंछते हुए जल्दी सहज होने की कोशिश में था। लेकिन सुदेश समझ रही होंगी। वे सामने वाले घर से पानी लेकर आईं। मैंने दो ग्लास पानी पिया।
पेड़ के नीचे की छांव में कुछ और लोग आ गए थे।

'सब पुलिस वालों की देखरेख में हुआ जी...। बाईस घरों को खाक कर दिया। अगर पुलिस वाले ना आते तो हमारे लड़के इतना ना होने देते...। हमारे लड़कों में बहुत दम है जी...।' सूरजमल खुद दिखने में कमजोर लग रहे थे, लेकिन चेहरे का भरोसा बोल रहा था।

'वे पहली बार आए तो हमारे लड़कों ने सामना किया। उन्हें जाना पड़ा। लेकिन पुलिस वालों ने झगड़ा खत्म करने के बहाने बस्ती के सभी मर्दों को पंचायत में बुला लिया। और इधर जाट्टों को खुला छोड़ दिया। पुलिस वाले ना होते तो हम इतना ना होने देते जी...।'
'हमारे घर जल रहे थे। जहां से हाथ लगा, हम पानी लाकर अपने जलते घरों के बचाने की कोशिश कर रहे थे और जाटों के लड़के अपने कपड़े उतार कर नंगा होके नाचने लगे। वे हमारी औरतों को दिखा रहे थे।'

'वे बराबर ऐसा करते हैं। ज्यादा दिन ना हुआ। चमारन की बस्ती से मां-बेटी को उठा के ले गए। रात भर रखा। सुबह नंगा करके अपनी बस्ती में घुमाया। कहीं खबर भी ना आई...। चमार दो सौ से ज्यादा घर हैं जी। लेकिन उनके साथ भी वही....। हमारे साथ इतना हुआ। वे हमारे साथ नहीं आ सकते। सिर्फ डर...। इसीलिए हमने अपनी जवान लड़कियों-औरतों को अपने रिश्तेदारों के यहां भेज दिया है जी। जाट्टन कब क्या करेंगे, किसी को नहीं पता...।
'घटना के बाद सरकार की ओर क्या भरोसा है?

'भरोसा क्या रहेगा जी! सब कह के गए। कुछ को पकड़ा है। लेकिन जो आग लगाने वालों में सबसे आगे थे, आज भी खुल्ला घूम रहे हैं। हममे से जो दिखता है, उसे धमकी देते हैं कि आगे और बुरा होगा...।'
'सुना है राहुल गांधी भी आए थे!'
'हां, आए तो थे। उन्होंने देखा सब। कह के गए हैं कि मैं जाके मम्मी को बताऊंगा...।'

(इस देश के भावी राजा देश के भीतर देस-देस घूमते हैं और हर जगह कहते हैं कि मैं जाके मम्मी को बताऊंगा...)
सुमन की मां कमला आईं- 'अब कोई समझौता ना जी...। कोई मुआवजा ना...। हमारी बेटी, हमारा मरद ना लौटेगा...। अब तो उनकी जान लेने वालों को फांसी दो। अगर उन्हें फांसी ना दे सको, तो हमें फांसी पर चढ़ा दो। अब कोई समझौता ना...।'

सुमन की मां के आंसू सूख चुके थे। बची हुई एक आंख में सिर्फ आग थी।
उस आग को उन्होंने अपनी आंख में उतार लिया था जिसमें उनके सारे सपने जल गए थे। अपने सपनों के साथ सुमन जला दी गई थी...।
सूनी आंखों के साथ सुदेश बैठी थीं। मैंने पूछा- 'आपके बच्चे...?'
'एक बेटा ये रहा।' चार-पांच साल का एक छोटा बच्चा सामने था।
'इसे खूब पढ़ाइएगा...। आप सबके साथ जो हुआ, उसका यही सबसे बड़ा जवाब होगा।'
मैं एक तटस्थ दर्शक नहीं रह सकता था। तटस्थ रहना भी नहीं चाहता था।

तभी बस्ती में गहमा-गहमी शुरू हो गई। सर्वखाप पंचायत के कुछ लोग अपने नेताओं के साथ बस्ती का दौरा करने आए थे।
मुझे गुलाबी-गोरे-चिट्टे लंबे-चौड़े शरीर वाले, पुष्ट कंधे और छातियों वाले और मजबूत और कसे हुए जबड़े वाले लोग हमेशा डराते रहे हैं।
अब वहां से हमारा निकल जाना शायद ठीक था। सबके लिए...।

बस्ती में घुसते वक्त टूटी दीवारों के बीच से झांकती वृद्ध महिला और उनके साथ बैठे लोगों से हमने कहा था कि लौटते वक्त आपके साथ चाय पिएंगे। लेकिन चाय पीने के लिए रुकना शायद ठीक नहीं था। सबके लिए...।

हम सब लगभग जल्दी-जल्दी में गाड़ी में बैठे। सामने का रास्ता चाहे जिधर जाए, राकेश जी ने गाड़ी बढ़ा दी।
हम मिर्चपुर में हैं...। मिर्चपुर हमारे साथ है...। हम मिर्चपुर से निकल रहे हैं...। मिर्चपुर हमारे साथ हो गया है...। मुख्य सड़क पर आते ही गाड़ी फिर बहुत अच्छी सड़क पर फिसलने लगी। मिर्चपुर हमारे साथ है...।

मिर्चपुर हमारे साथ हो गया है। सिर्फ इसलिए कि बाल्मीकि बस्ती से होकर अपनी मोटरसाइकिल पर गुजरते दो जाट लड़कों पर उस बस्ती के कुत्ते ने जरा भौंक दिया! इसलिए कि उन दोनों लड़कों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि बाल्मीकि बस्ती का कोई कुत्ता उन पर भौंक दे! इसलिए कि उस बस्ती के एक-दो युवकों को देखा नहीं गया कि उनके दरवाजे पर बैठने वाले कुत्ते को कोई इस तरह पत्थरों से मारे और उन्होंने उन जाट लड़कों को जरा-सा मना कर दिया और यह उस गांव के जाटों का अपमान था। और इसके बाद बाल्मीकी बस्ती के एक बुजुर्ग को पीटा गया। इसके बाद पुलिस आई। और इसके बाद सब कुछ पुलिस की मौजूदगी में हुआ...।
पुलिस की टुकड़ियां अब भी मुस्तैद थीं...! पहले की तरह!
पुलिस की एक पेट्रोल कार देख कर राकेश जी ने गाड़ी किनारे की। 'हमें दिल्ली जाना है...।'
'ये ही सीधा जाओ जी...। गोहान्ना होते हुए...।'

गाड़ी के आगे खिसकने के बाद मैंने गौर किया। सड़क किनारे एक पेड़ की छांव में पुलिस की वह गश्ती कार, शायद मारूति जिप्सी, खड़ी थी। छांव का दायरा इतना था कि वहां दो खाट बिछी थी। एक पर झक सफेद धोती-कुर्ता पहने और सिर पर बड़ी पगड़ी बांधे शायद एक स्थानीय व्यक्ति के साथ एक वर्दी पहने पुलिस वाला बैठा था। दूसरे पर अपनी वर्दी का निचला हिस्से पहने और कमर के ऊपर केवल बनियान पहने दूसरा पुलिस वाला लेटा हुआ था। आराम की मुद्रा में।
मुझे गुलाबी-गोरे-चिट्टे लंबे-चौड़े शरीर वाले, पुष्ट कंधे और छातियों वाले और मजबूत और कसे हुए जबड़े वाले लोग हमेशा डराते रहे हैं।

दोनों खाटों और तीनों लोगों के बीच एक बड़ा-सा हुक्का रखा था।
उस बड़े-से हुक्के की लंबी पाइप का सिरा लेटे हुए पुलिस वाले के मुंह में था।
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राकेश जी ने अब भी गाड़ी का कमान संभाला हुआ था। दिल्ली का रुख कर चुकी गाड़ी हरियाणा की बहुत अच्छी सड़क पर हवा से बातें कर रही थी। पता नहीं, चंद्रा जी ने क्यों, लेकिन कहा- 'बिहार के लोग सड़क से पैदल हैं और इधर की सड़क अच्छी है, लेकिन यहां के लोग शायद अकल से पैदल हैं...।'
हमारी गाड़ी बहुत अच्छी सड़क पर हवा से बातें कर रही थी। सुना है, हमारे बिहार में भी सरकार बहुत अच्छी सड़कें बनवाने में लगी है...!!!

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अरविन्द शेष ,बिहार के सीतामढ़ी से हैं और दिल्ली में जनसत्ता (दैनिक हिंदी अखबार ) में सहायक सम्पादक  हैं
कार्टून  : श्याम उन्मति