दिनेश अमिनमन्तु 

[यह भाषण "मीडिया में दलित प्रोफेशनल की सहभागिता", दिनेश अमिनमन्तु द्वारा कन्नड़ में दिया गया था। जो कर्नाटक SC/ST एडिटर एसोसिएशन द्वारा बाबासाहेब की १२५ जयंती के अवसर पे हुए 18th जुलाई 2016 के कार्यक्रम का हैं. ]

 

अगर मुझसे कोई भारतीय मीडिया में मेरे रोल मॉडल के बारे में पूछे तो मेरा जवाब डॉ बाबा साहेब आंबेडकर हैं। ऐसा मैं पहले भी कई दफा कह चुका हूं और आज भी यही कहूंगा। बाबा साहेब आंबेडकर को संविधान निर्माता, दलित नेता या और भी कई पहचान के साथ जोड़ कर जाना जाता है। लेकिन इन सबके साथ शायद हम यह भूल जाते हैं कि वे एक पत्रकार भी थे। 1920 में उन्होंने ‘मूकनायक ’ अख़बार की शुरुआत की। गणेश कदम अंग्रेजी से कन्नड़ में एक किताब का अनुवाद कर चुके हैं, जिसमें 'मूकनायक ' के संपादकीय को छापा गया है। यह किताब धनवाड़ में रिलीज की गई थी। 'मूकनायक ' संपादकीय में एक वक्तव्य है: ‘मुझमे कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। मैं बिना किसी हिचकिचाहट के बोलूंगा। जो व्यक्ति बोलता नहीं है, उसकी भावनाओं को कोई नहीं समझ सकता। अगर आप बोलने में हिचकिचाते हों तो आपकी प्रगति मुश्किल है।' 1873 में ज्योतिबा फुले ने सत्यसोधक समाज का निर्माण किया और 1877 में 'दीनबंधु' की शुरुआत की। मेरे खयाल से यह दलित पत्रकारिता के इतिहास की शुरुआत थी। उसके बाद शिवराम जनाब काम्बले ने ‘सोमवंश क्षत्रिय’ अख़बार शुरू किया।

बाबा साहेब आंबेडकर 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटे, तो उन्होंने 'मूकनायक ' अख़बार की शुरू किया। बाबा साहेब द्वारा चलाए गए अखबारों के नामों में दलित आन्दोलन के अलग-अलग चरण झलकती हैं। पहला, 'मूकनायक भारत', दूसरा 'बहिष्कृत भारत' और तीसरा 'जनता' जो बाद में 'प्रबुद्ध भारत' बना। एक पत्रकार के रूप में बाबा साहेब आंबेकर ने हजारों पन्ने और लेख लिखे। इस मोर्चे पर उन्हें गांधी के एक बड़े प्रतिद्वंदी के तौर पर देखा जा सकता है।। गांधी ने 'हरिजन' या 'यंग इंडिया' का संपादन किया था, यह लोग जानते हैं, लेकिन बाबा साहेब ने जो अखबार चलाए उन पर कोई बात या चर्चा नहीं होती है। जहां तक मैं जानता हूं, 'मूकनायक ' संपादकीय के गद्यांश हिंदी और मराठी में छापे गए हैं, लेकिन कन्नड़ में ज्यादा नहीं छपे हैं। सरकार द्वारा हाल ही में प्रकाशित पच्चीस खंडों में इन अखबारों का कोई उल्लेख मैंने नहीं देखा है। अगर हम 'मूकनायक ' के संपादकीय को पढ़ें तो हम उस समय के राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक माहौल और यथार्थ को देख पाने में कामयाब होते हैं।

1916 में जब डॉ आंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई पूरी होने के बाद अपने विदाई समारोह में खाना खा रहे थे तब उनके बैच के साथियों ने उनसे कहा कि 'आप बुकर टी वाशिंगटन की तरह बन सकते हैं, जिन्होंने काले लोगों की भलाई के लिए कड़ी मेहनत की थी।' हो सकता है कि डॉ आंबेडकर भी इस पर विचार कर रहे थे, लेकिन उस वक्त उन्होंने कहा कि फिलहाल मुझे नहीं पता। हालांकि उन्हें यह पहले से पता था कि अखबार या मीडिया सामाजिक बदलाव के लिए एक उपकरण थे। यही कारण है कि उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इतना महत्व दिया है।

जब 'प्रजावाणी' अखबार का एक दलित संस्करण लाया गया तो वहां इससे न केवल राज्य में, बल्कि देश भर में उत्साह का माहौल था। मुझे गर्व है कि मैं भी उस खुशी में शामिल था और उस प्रेरणादायी कोशिशों के बीच एक जिज्ञासु की तरह साथ था। रॉबिन जेफरी की पुस्तक 'भारत की समाचार पत्र क्रांति: पूंजीवाद, प्रौद्योगिकी और भारतीय भाषा प्रेस, 1977-1999' सन 2000 में प्रकाशित हुई थी। इस किताब के मुताबिक भारतीय मीडिया में दलित समुदाय की नुमाइंदगी लगभग नहीं के बराबर थी। 1996 में एक वॉशिंगटन पोस्ट संवाददाता केनेथ जे कूपर ने भारतीय मीडिया में कुछ दलित संवाददाताओं को खोजने की कोशिश की और इस मसले पर एक शोध किया था। 'प्रजावाणी' के संपादक ने दिल्ली में रॉबिन जेफरी का भाषण सुना था और एक दलित संपादक के साथ कम से कम एक दिन के लिए एक दलित संस्करण लाने का फैसला किया था।

उस समय कुछ और सर्वेक्षण भी किए गए थे। इन सर्वेक्षणों के मुताबिक भारतीय मुख्यधारा के मीडिया में दलित समुदाय से एक भी संपादक नहीं था और न ही निर्णय लेने वाले लोगों में दलित प्रतिनिधित्व था। जब दलितों को मीडिया में अवसर देने की बात का उल्लेख किया गया तो मेरे सामने यह प्रतिक्रिया कि - 'ओह।।। दलितों को मीडिया में भी आरक्षण चाहिए!' जरूरत आत्मनिरीक्षण करने की थी और रॉबिन जेफरी, केनेथ कूपर और अन्य लोगों ने ऐसा किया। आज जिस तरह से मीडिया सिद्धारमैया सरकार की प्रति व्यवहार कर रहा है, उसी तरह से मीडिया ने उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार से व्यवहार किया है।

आज भी कन्नड़ मीडिया में दलितों का जरूरी प्रतिनिधित्व नहीं है। हमने अब तक केवल  दो वरिष्ठ पत्रकार देखे हैं- शिवाजी गणेशन और डी उमापथय। शिवाजी गणेशन एक सहायक संपादक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। हम सभी चाहते हैं कि जब उमापथय सेवानिवृत्त होगें, तो वे एक संपादक रूप में रिटायर हों। हमें नहीं पता कि यह कभी होगा या नहीं, लेकिन यह क्यों नहीं हो रहा है? अगर आप भारत में 100 महत्त्वपूर्ण कवियों की सूची बनाएं तो उनमें से अधिकतर दलित होंगे। आप 100 महत्वपूर्ण कन्नड़ कवियों की सूची लें, तो भी बहुमत दलितों का होगा। लेकिन आप 100 प्रमुख पत्रकारों की सूची लें, वहां आपको दलित पत्रकार नहीं के बराबर मिलेंगे। पत्रकार को मुख्य रूप से लेखन कौशल की आवश्यकता होती है। यह रॉकेट विज्ञान नहीं है। तो फिर क्यों कोई दलित पत्रकार अगर कहीं दिखते भी हैं तो वे केवल छोटे समाचार पत्रों में? हमारे रविकुमार (एन रविकुमार, संपादक, शिमोगा टेलेक्स अखबार) किसी भी मुख्यधारा के मीडिया के आउटलेट में काम करने के योग्य है। वे मेरे दोस्त हैं और मुझे उनकी शैली पता है। लेकिन उन्हें मुख्यधारा के मीडिया के लिए लिखने का अवसर नहीं मिला है। मैं दलित समुदाय से 50 अन्य पत्रकारों को जानता हूं। ऐसा क्यों है कि वे मुख्यधारा के अखबारों में लिखने या नौकरियां खोजने में नाकाम रहे हैं?

आप पता लगाने के लिए चाहते हैं 'क्यों?' अगर हां, तो आपको अमेरिका की 1970 के दशक की स्थिति को देखने की जरूरत है। 1978 में समाचार संपादकों की अमेरिकन सोसायटी ने मीडिया में अश्वेत और जातीय अल्पसंख्यकों (बीएमई) के प्रतिनिधित्व की जांच करने के लिए एक जनगणना की थी। हालांकि अश्वेत और जातीय अल्पसंख्यक कुल आबादी का 36 प्रतिशत थे, जबकि मीडिया में उनका प्रतिनिधित्व सिर्फ चार प्रतिशत था। कम प्रतिनिधित्व के कारणों का विश्लेषण करने के बाद उन्होंने इसका कारण पता करने और उसका हल निकालने के लिए एक परियोजना शुरू की। उन्होंने सन 2000 तक काले और जातीय अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व बीस प्रतिशत तक करने का फैसला किया। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अश्वेत और जातीय अल्पसंख्यकों के छात्रों के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित की गईं, भेदभाव की अघोषित नीति की पहचान करने के लिए कदम उठाए गए और विशेष भर्तियां की गईं।

और 2010 में इसी तरह की जनगणना के बाद बीएमई का प्रतिनिधित्व चौदह प्रतिशत तक पहुंचा पाया गया। अब उनके पास 2020 तक का लक्ष्य है।

यह दलितों का भारतीय मीडिया में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक सही मॉडल है। दलितों के प्रतिनिधित्व को जानने के लिए मीडिया के भीतर एक जनगणना करने की आवश्यकता है। यह सर्वेक्षण कर्नाटक में भी किए जाने की जरूरत है।  (इलेक्ट्रॉनिक, रेडियो और प्रिंट) मीडिया में किस प्रकार के पद दलितों के पास है? अगर नहीं हैं, तो क्यों? इसका उपाय क्या है? एक आकलन और जनगणना इन सवालों पर की जानी चाहिए।

मैं प्रतिनिधित्व के लिए दलितों के लिए नौकरियां सुरक्षित करने के लिए नहीं कह रहा हूं। हमें स्पष्ट रूप से यह समझने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि दलितों में कुछ नौकरियां सुरक्षित होगी एक बार प्रतिनिधित्व होने के बाद। यह देखा गया है एक मीडिया आउटलेट पूरा करने के लिए हर समुदाय के अनुभव को व्यक्त करने की जरूरत होती है। अन्यथा मीडिया का आउटलेट पूरा नहीं होगा। मीडिया दुनिया भर के विविध समुदायों के संगत अनुभवों और कहानियों को प्रकाशित-प्रसारित करने का मंच है। इसलिए इसमें सभी वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व की जरूरत है। अगर यह नहीं हो पाता है तो वंचित वर्गों को हावी तबकों की बातों की न कोई उपयोगिता होगी, न उन्हें वे बातें समझ में आएंगी।

इस देश में हर 16 मिनट में दलितों पर अत्याचार की एक घटना होती है। हर दिन चार दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है, हर सप्ताह 16 दलितों को बेरहमी से मारा जा रहा है। अगर आप राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों पर एक नज़र डालें तो जिस साल निर्भया बलात्कार कांड हुआ, उसी साल 1,270 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। उसी सप्ताह हरियाणा में दो दलित महिलाओं के साथ भी बलात्कार हुआ था। उनके बारे में कहां खबरें आईं? जब इतनी बड़ी तादाद में गंभीरत अत्याचार हो रहा था तो वे खबरें दुनिया के सामने क्यों नहीं आईं? खासतौर पर इसलिए दलितों, अल्पसंख्यकों और निचली जातियों को मीडिया में प्रवेश करना चाहिए, क्योंकि उन्हें इस दुनिया का अनुभव है। उदाहरण के लिए कम्बलपली की घटना एक साधारण रिपोर्टर के लिए महज एक कहानी बन कर रह जाती है। पत्रकार जगह का दौरा करेंगे, इस घटना की रिपोर्ट करते हुए इसे एक 'रक्त-स्नान' कहेगे, दुनिया के बताएंगे कि सिर काट रहे थे, लोग बहुत बुरी तरह रो रहे थे...! इसी तरह के तमाम विवरण।

बाबा साहेब आंबेडकर को 'मूकनायक ' अख़बार शुरू करना पड़ा, क्योंकि दूसरे तमाम अखबारों में दलितों की आवाज नहीं मिलती थी। जब सब स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे, डॉ आंबेडकर ने अपने विद्रोही विचारों को देश और दुनिया के सामने पेश किया और आश्वस्त स्वर में कहा कि सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से पहले लाने की जरूरत है। किसी ने नहीं सुना और अब परिणामों का हम सब सामना कर रहे हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता अब एक तमाशा बन गया है। एक दूरदर्शी के रूप में डॉ आंबेडकर ने उतने साल पहले ही आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थिति के बारे में चेतावनी दी थी। उस समय किसी ने वह आवाज नहीं सुनी। यहां तक कि 'एक वोट एक मूल्य' भी किसी के द्वारा समझा नहीं गया था। लेकिन अब हम समझ रहे हैं। अडानी और अंबानी के वोट की तुलना गरीब बोर्गोवड़ा से नहीं की जा सकती है। आज इस मुद्दे को और अधिक गंभीर रूप से दिखाया जा रहा है, क्योंकि कॉरपोरेट्स ने मीडिया में प्रवेश किया है। इस देश में 82,000 समाचार पत्र, लगभग 120 टेलीविजन समाचार चैनल और 1,200 रेडियो स्टेशन हैं। लेकिन इस सबका मालिकाना केवल एक सौ लोगों तक सीमित है।

आज मीडिया पाठकों, दर्शकों या श्रोताओं को नहीं चाहता। इसे चलाने वाले संभावित खरीदार चाहते हैं। वे अपने अखबारों या चैनलों में जिस टीवी, फ्रिज, कपड़े और अन्य उत्पादों के विज्ञापन चला रहे हैं, उसके लिए सुरक्षा की जरूरत है। इसका मतलब यह है कि वे संभावित खरीदारों की तलाश में हैं और आम दर्शक या पाठक के लिए कोई चिंता नहीं है। वजह यह है कि मीडिया बिना आउटलेट विज्ञापन के नहीं चलाया जा सकता। प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू एक सीधे बोलने वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा था- 'अगर ऐश्वर्या राय शादी करती है, उसका अपने पति के साथ विवाद है, ससुराल वालों को छोड़ देती है तो यह एक मुख्य पृष्ठ पर खबर बनती है। टीवी चैनलों पर तो यह एक ब्रेकिंग न्यूज़ होगी। लेकिन अगर एक गरीब मां से पैदा बच्चा कुपोषण से मर जाता है तो यह खबर अंदर के पन्नों पर क्यों होती है? ऐसा क्यों है?

वे दरअसल पत्रकार नहीं, बल्कि जज हैं। वे निर्णय देना जानते हैं। मैं एक पत्रकार हूं और इस सवाल का जवाब दे सकता हूं। वे अगर ऐश्वर्या राय के रोने, हंसने, विवाद या संबंधित समाचार की रिपोर्टिंग कर रहे हैं तो इससे उन 25-30 उत्पादों की बिक्री में वे मदद कर रहे हैं, जिनके लिए ऐश्वर्या राय मॉडलिंग या ब्रांड एंबेसडर के रूप में काम करती हैं। इसी तरह, सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली और महेंद्र सिंह धोनी मीडिया पर खुद को दिखाने के लिए ही आते हैं। वे जानते हैं कि दर्शकों-पाठकों के भीतर उनके द्वारा प्रचारित उत्पादों की याद ठहर जाएगी। यही खेल है। कुपोषण की वजह से एक गरीब मां के एक बच्चे की मौत के खबर पहले पन्ने पर दी, तो लोग क्या सोचेंगे? हमें इसे सुबह-सुबह पढ़ने की क्या जरूरत है? दरअसल, हम इतने संवेदनहीन हो गए हैं। यही वास्तविकता है। मैं यह बहुत साफ शब्दों में कह रहा हूं कि मालिकों के खिलाफ कहीं कोई शिकायत नहीं होगी। अखबारों के मालिकों को इस जाल में अनजाने में फंसा दिया गया है।

दरअसल, समस्या वर्तमान मीडिया के बिजनेस मॉडल में है। 100 करोड़ रुपए निवेश करने के बाद एक समाचार चैनल विज्ञापन के बिना नहीं चलाया जा सकता। आप उन लोगों या संस्थानों की खबर कैसे लिख सकते हैं, अगर आप उनके विज्ञापन पर निर्भर कर रहे हैं? कैसे एक आवाज दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीबों के लिए उठाया जा सकता है? मुझे इसका हल पता नहीं है। रिलायंस के अनिल अंबानी समूह ने अपने चैनलों में पांच से दस हजार करोड़ रुपये का निवेश किया है। अब उन्होंने ईटीवी, सीएनएन, आईबीएन, 50 अन्य चैनलों और विभिन्न प्रकाशनों को खरीदा है। बिड़ला समूह ने इंडिया टुडे को खरीद लिया है। ग्रीन टेक ने एनडीटीवी में निवेश किया है और कंपनियों की मीडिया बोर्डों पर स्थिति है। एक ऐसी ही स्थिति बड़े अखबारों के सभी के साथ मौजूद है। यह अभी तो 'हिंदू' में है, लेकिन अखबार में हुआ है। कैसे जल्दी से चीजें बदल रही हैं - बहुत समय पहले, प्रजावाणी राज्यसभा में पत्रकार कुलदीप नैयर को एक बोर्ड का सदस्य बना दिया गया है।

मीडिया के आउटलेट का कारपोरेटीकरण यानी निगमीकरण इस हद तक पहुंच चुका है कि कंपनियों के शेयरों के बजाय विज्ञापन और पैसे के लिए पैसे इन्वेस्ट किए जा रहे हैं, शेयरों की बिक्री का जा रही है। इस क्रॉस स्वामित्व के बारे में चर्चाएं हो रही हैं, अन्य उद्योग मालिकों, मीडिया और मीडिया में लोगों को अन्य व्यावसायिक हितों का मालिक बनाया जा रहा है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने इस पर एक लंबी रिपोर्ट पेश कर दी है। इसकी केंद्र सरकार द्वारा समीक्षा की जा रही है। भारत जैसे समाज में बहुलता और विविधता रखने के लिए बस व्यावसायिक हितों पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। TRAI की रिपोर्ट में कहा गया है कि मीडिया की निहित इच्छा का उल्लंघन किया गया है।

लेकिन आज स्थिति अलग है। कॉरपोरेट पहले से ही मीडिया में घुसपैठ कर चुके हैं।  यही वजह है कि पत्रकारिता आज एक व्यापर बन चुका है। मीडिया मालिक इस तरह के एक जाल में फंस चुके हैं। भले ही वे जानबूझ कर अपने समर्थकों का समर्थन करें। आज एक व्यक्ति 25-30 करोड़ रुपए निवेश करके एक अच्छी मंशा के साथ एक चैनल शुरू करता है। कुछ महीने के भीतर मालिक एक ज्योतिषी को चैनल में बुलाता है घाटे को कवर करने के लिए। यह आज की स्थिति है। जिन मीडिया आउटलेट को कम निवेश की आवश्यकता है, वे इसका समाधान कर सकते हैं। आज कई लोग लंकेश को याद करते हैं। हालांकि वर्तमान समय में शायद ऐसा सम्भव नहीं हो पाता। जब लंकेश पत्रिका को एक रुपए में बेचा जा रहा था तो प्रजावाणी 1.5 रुपए में बेची जाती थी।

'लंकेश' पत्रिका की मौजूदा कीमत 1.5 रुपए और 'प्रजावाणी' की 4.50 रुपए है। लंकेश घाटे को गौरी अन्य प्रकाशन से मिले राजस्व से पूरा कर रही है। हालांकि लंकेश पेपर अब भी घाटे में चल रहा है। विज्ञापन के बिना एक अखबार को चलाना असंभव है। ये सभी छोटे समाचार पत्रों की दुर्दशा है। इस देश में एक उत्पाद है, जिसका बिक्री मूल्य उत्पादन लागत से भी कम है। अपने घाटे विज्ञापन के जरिए कवर किया जाना है। जब यह स्थिति है तो वफादारी विज्ञापनदाताओं के लिए होगी या दलितों के हितों के लिए लड़ने वालों के लिए? ऐसे में अपने आपको बचाए रखना बहुत मुश्किल काम है।

आगे और ब्योरे के लिए मेरे पास और अधिक अनुभव हैं। रघुराम शेट्टी ने बदलाव के मकसद से ‘मुंगारु’ अखबार शुरू किया था। हम नारे के साथ सड़क पर उतरे और लोगों के पास गए- 'चलो, लोगों की शक्ति को सोच की बरसात से बदला जाए।' उन दिनों यह एक उदार इरादे से शुरू किया गया था। बाद में क्या हुआ? कुछ महीने के भीतर परिसंचरण की कमी हुई। एक बीमार प्रतिस्पर्धा को रोका नहीं जा सका। वह कन्नड़ की पहली पब्लिक लिमिटेड कंपनी थी। उसे इस कल्पना के साथ या शुरू किया गया था कि पाठक भी इसमें शेयरधारक हों। अगर वह सफल रहा होता तो आज दक्षिण कन्नड़ हिंदुत्व की प्रयोगशाला के लिए एक स्कूल नहीं बन पाता। 'मुंगारु' को बचाया नहीं जा सका।

'मुंगारु' जैसा अखबार शुरू करना असंभव तो नहीं है, लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया है। आज दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों के पास पैसा है। समाजशास्त्री सामाजिक पूंजी के बारे में बात करते हैं और ऐसा किया जा सकता है। केएन गुरुस्वामी शराब के ठेकेदार थे। अगर वे उसी उद्योग में काम करते तो बहुत सारा पैसा कमा सकते थे। उन दिनों शूद्रों का एक भी अखबार नहीं था और उन्होंने 'प्रजावाणी' शुरू किया। लेकिन इसने दस साल तक घाटा उठाया। ऐसा नहीं है कि आज वहां पैसे वाले लोग नहीं है। Ahinda (दलित, बहुजन और अल्पसंख्यक) समुदाय के लोग हैं, जिनके पास सौ से पांच करोड़ रुपए हैं और देश की एक हजार एकड़ जमीन है। लेकिन क्या मीडिया में निवेश करने में कोई रुचि है? एक विडंबना यह भी है कि अगर वे ऐसा करते भी हैं तो प्रभारी व्यक्ति Ahinda समुदाय से नहीं होगा। अगर आप पूछें, तो जवाब होगा कि बहुत ज्यादा संख्या में अखबार चलाने की जरूरत है।

मीडिया के रवैए को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया। ऐसा करते ही वे मीडिया के लिए दुश्मन बन गए। Ahinda समुदाय के समर्थन में बोलने के लिए उसी समुदाय से होने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर कोई ऐसा करता हैं तो उनकी आवाज को मुंह बंद करने का काम शुरू होता है। हरित क्रांति के अग्रदूत बाबू जगजीवन राम को आज याद नहीं किया जाता। वे पहले भारत-पाक युद्ध के दौरान रक्षा मंत्री थे। कोई भी उन्हें याद नहीं कर रहा है।

यही सारी वजहें हैं कि अब दलित स्वामित्व वाले टीवी चैनलों को शुरू किए जाने की जरूरत है। आज छोटे अखबार और मासिक पत्रिकाएं मौजूद हैं। लेकिन डॉ आंबेडकर की इच्छाओं को मूर्त रूप देने के लिए एक मुख्यधारा का अखबार शुरू किया जा सकता है।

अमेरिका में, 'आबनूस', 'शिकागो डिफेंडर' और इसी तरह के अखबार अश्वेतों द्वारा चलाए जा रहे हैं। भारत के दलितों और अमेरिका के अश्वेतों के बीच अंतर इतना है कि काले समुदाय के भीतर कोई आंतरिक विभाजन या फूट नहीं है और अमेरिका की केवल एक ही भाषा है। अश्वेतों की तरह हम दलितों के बीच भी लोगों ने प्रगति की है और क्रय शक्ति है। आज इस समुदाय में बड़ी तादाद में ऐसे उपभोक्ता हैं, जिनमें वस्तुओं की खरीदने की क्षमता है। दलितों को भी टूथ पेस्ट का उपयोग करना पड़ता है। कल अगर दलितों का एक पेपर शुरू होता है तो टूथपेस्ट निर्माताओं को विज्ञापन देना पड़ेगा।

दूसरी ओर, सरकार को हस्तक्षेप करना चहिए, ताकि मीडिया पूरी तरह कॉर्पोरेट सेक्टर के हाथ में न जा पाए। (हालांकि ऐसा लगभग हो चुका है! -सं.) लेकिन इस देश में निजी क्षेत्र को विकसित करने के लिए सरकारों ने सब्सिडी और समर्थन दे दिया है। गुजरात सरकार नैनो कार कारखाने के लिए 0.1 प्रतिशत ब्याज पर ऋण दिया है। पंजाब सरकार ने एक रिफाइनरी शुरू करने के लिए 0.1 प्रतिशत की दर पर लक्ष्मी मित्तल को 1,250 करोड़ दिए। वहां इस तरह एक लंबी सूची है। इस बारे में अगर हम पी साईनाथ से पूछें तो वे हमें एक बड़ी सूची दे सकते हैं। हमें लगता है कि 2.5 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी किसानों को देना बहुत बड़ी बात है। कॉरपोरेट सेक्टर 36 लाख करोड़ कर-लाभ प्राप्त करता है। रिलायंस का वार्षिक राजस्व 2.5 लाख करोड़ है, जबकि कर्नाटक सरकार का एक लाख बीस हजार करोड़ रुपए ही है। जो विजय माल्या ने किया है, उसके बारे में हम सभी जानते हैं। लेकिन उसी बैंक क्षेत्र से पांच या दस हजार रुपए उधार लेने वाले आत्महत्या कर रहे हैं। माल्या देश की हजारों करोड़ रुपए डुबाने के बाद विदेश में मजे ले रहा है। यह भारत की हकीकत है।

जाहिर है, अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सही अर्थ को बचाना है, मीडिया समाज के लिए एक आवश्यकता है। सभी समुदायों के अनुभवों को बिना किसी बाधा के जाहिर किए जाने की आवश्यकता है, तो कम ब्याज वाले ऋण मीडिया के क्षेत्र में लोगों को दिए जाने चाहिए। मीडिया तुलना अगर अन्य क्षेत्रों के साथ की जाएगी तो यह प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा। नैनो कार कारखाने 0.1 प्रतिशत की ब्याज दर पर ऋण दिया जा सकता है, तो क्यों नहीं इसी हिसाब के फार्मूले पर एक अखबार शुरु किया जाए?

विचार के लिए एक जरूरी पहलू यह भी है कि उद्योगपतियों का सीधे मीडिया का नियंत्रण अपने हाथ में लेना बहुत खतरनाक है। नोम चोमस्की इसे 'विनिर्माण सहमति' कहते हैं। आज चैनल बताते हैं कि अट्ठानबे प्रतिशत लोग सरकार के खिलाफ हैं और महज दो प्रतिशत समर्थन में है। अगर यह सच है तो दलित उद्यमियों को अपना मीडिया शुरू करने की दिशा में सोचना चाहिए। खासतौर पर जब बाबासाहेब आंबेडकर की 125वीं जयंती मनाई जा रही हो तो इस ओर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। अगर संभव हो तो डॉ आंबेडकर के अखबार के संपादकीय को कन्नड़ (और दूसरी भारतीय भाषाओं में भी -सं.) में अनुवाद किया जाए।

यह भाषण Round Table India, kannad में 28 July 2016 को प्रकाशित हुआ था : "http://roundtableindia.co.in/index.php?option=com_content&view=article&id=8704:2016-07-27-22-21-56&catid=119&Itemid=132"

और अंग्रेजी में 3 अगस्त 2016 को प्रकाशित हुआ : "http://roundtableindia.co.in/ index.php?option=com_content&view=article&id=8708%3Awhere-are-the-professional-dalits-in-the-the-media&catid=119%3Afeature&Itemid=132" 

हिंदी अनुवाद : हरीश परिहार, स्वतन्त्र लेखक व टिप्पणीकार ।