Posted on: November 24, 2017 Posted by: फ़ैयाज़ अहमद फैज़ी Comments: 0
Faiyaz Ahmad Fyzie

 

फ़ैयाज़ अहमद फैज़ी (Faiyaz Ahmad Fyzie) 

Faiyaz Ahmad Fyzieपंजाब के इलाके में बसने वाले पसमांदा स्वच्छकार, जो पंजाबी समाज में सबसे निचले स्तर के माने जाते हैं मुसल्ली कहलाते हैं. मुसल्ली अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ सला (ईश्वर की उपासना का एक विशेष इस्लामी विधि जिसे नमाज़ भी कहतें है) स्थापित करने वाला होता है. चूहड़, चूड़ा, चन्गड़, भंगी (यह सब नाम सबल लोगों के रखे हुए हैं) जैसी द्रविड़ जातियाँ जिनके पूर्वज कालांतर में बौद्ध धर्म, सनातन धर्म और उस समय के प्रचलित अन्य धर्मों से इस्लाम में आये थे, सामूहिक रूप से मुसल्ली कहे जातें हैं.

“नूर व नूर तजल्ला सी
या चूड़ा सी या अल्ला सी”  

मुसल्लियों की कई एक उपजातियाँ भी हैं जैसे धोलका, लौथ, तीजा, सहुतरा (सहुतरा अरबी भाषा के सह्वु शब्द से बना है जिसका अर्थ भूल, चूक, गलती होता है) और भट्टी आदि, इन्हें कमी या कमुके भी कहा जाता है, जो कम (थोड़ा, नीच) शब्द से बना है. सहुतरा के बारे में कहा जाता है कि यह लोग सांदल बौद्ध के वंशज हैं जिसका वर्णन आईने अकबरी में मिलता है. मुसल्ली पहले जंगलों में रहते थे. बरसात में किसी अन्य स्थान पर चले जाते थे. उस क्षेत्र में मशरूम खूब ऊगा करते थे, जिसे सभी खाते थे. भूमि पर किसी का भी स्वामित्व नहीं हुआ करता था जो जहाँ बैठ गया वह उसकी ज़मीन समझी जाती थी, जब तक कि वो वहाँ बैठा रहता था. इनका मुख्य कार्य साफ सफाई, झाड़ू देना और खेतों में मजदूरी करना था. अंग्रेजों ने जंगल काट कर चक बनाये फिर चक में बसने के लिए सब को मजबूर किया, लेकिन मुसल्लियों को ज़बरदस्ती बांध कर लाया जाता था.

अंग्रेज़ मुसल्लियों से उनकी मर्जी के खिलाफ ज़बरदस्ती काम लिया करते थे, उनसे मज़दूरी करवाना, ईंट भट्ठे पर ले जाकर ईंट बनवाना आम बात थी. दूसरे, अंग्रेज़ जंगलों को काट कर बस्ती बनाते थे जिससे मुसल्लियों में रोष था. इस कारण प्रायः मुसल्लियों और अंग्रेज़ो में झड़पें हुआ करती थी, इस रंजिश के कारण कई एक अंग्रेज़ों को जान से भी हाथ धोना पड़ा. अगरा सहुतरा के दादा मसन खान से हेली नाम के एक अंग्रेज़ को मार डाला था.

अब चर्चा करते हैं इसी समाज के उस वीर सपूत का जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी ना सिर्फ मुसल्लियों के लिए बल्कि अन्य पसमांदा दलित जातियों जैसे नाई, मोची, लोहार, भठ्ठा मजदूर आदि के लिए जीवन पर्यंत सँघर्ष किया. नाम अगरा था, मुसल्ली की उपजाति सहुतरा से थे. इसी बिना पर “अगरा सहुतरा” कहलाये. आगे चल कर कम्युनिस्ट अशराफों ने आप का नाम “आग़ा खान सहुतरा” रख दिया इसके बाद आप इसी नाम से प्रसिद्ध हुए. 

सहुतरा साहब का जन्म एक मई 1905 ई० को पंजाब के ज़िला शाहपुर के एक छोटे से गाँव सजुका में हुआ था. उस समय प्राइमरी (प्राथमिक) स्कूल कक्षा 4 तक ही हुआAgra Sahutra करता था. जो 1948 के बाद कक्षा 5 तक होने लगें. आप सिर्फ कक्षा 3 तक ही पढ़ाई कर सके. हुआ यह कि एक दिन आप से कहा कि तुम अपना नाम झाड़ू देने वालों में लिखवा लो. आप ने इनकार कर दिया. फिर आप से पूरे स्कूल में झाड़ू लगाने के लिए कहा गया. आप ने इससे भी इंकार कर दिया. फिर क्या था, इस बात पर गाँव के नंबरदार ने इतना मारा कि आप बेहोश हो गए. फिर आप को कुँवे में लटका दिया गया. इसके बाद(1917 ई०) से आपने स्कूल जाना ही छोड़ दिया. स्कूल में फ़ारसी और उर्दू की पढ़ाई होती थी. लेकिन सारे टीचर पंजाबी में बात करते थे. स्कूल छोड़ने के बाद गुरुमुखी लिखना सीखा. स्कूल में आप का टीचर एक ब्राह्मण था. एक अल्लाह बक्श थे, राम दना खत्री जो हेडमास्टर थे और अली मुहम्मद कम्भारा(कुम्हार), जो सेकंड हेडमास्टर थे, दोनों में अक्सर लड़ाई होती रहती थी.

उस इलाके में एक खालसा हाई-स्कूल भी था और एक खत्रियों का प्राइमरी स्कूल भी था, लेकिन वहाँ जमींदारों के बच्चे बढ़ते थे. मगर कम्मियों(पसमांदा दलित) के बच्चों के लिए जगह नही थी. वहाँ के जमींदार कहते थे कि अगर ये कमी (पसमांदा दलित) पढ़ लिख गए तो हमारी बात नही सुनेंगें.

आप को पढ़ने लिखने का बहुत शौक था, विशेष तौर पर इतिहास पढ़ने का. जिस कारण आपने खूब पढ़ाई की. आप ने द्रविड़ों के इतिहास पर एक पुस्तक भी लिखी है.

अगरा सहुतरा ने 18 फरवरी 1946 ई० में मुसल्ली देहाती मज़दूरों का एक संगठन बनाया जिसका नाम “अंजुमन दीन दाराँ” (दीन दार= धर्म परायण मुस्लिमों को कहतें हैं) रखा गया. पाकिस्तान बनने के बाद इसका नाम “अंजुमन मुस्लिम शेखाँ”हो गया. इसी नाम (अंजुमन मुस्लिम शेखाँ) से एक पत्रिका मुल्तान से निकालना प्रारम्भ किया जिसका 22 जनवरी 1948 ई० को रजिस्ट्रेशन (रजिस्ट्रेशन नंबर  PP 201)करवाया गया. 1951 ई० के चुनाव में संगठन ने भी चुनाव में भाग लिया. चुनाव के बाद चारों तरफ से संगठन को बंद करने का दबाव पड़ने लगा. पार्टी ने भी महसूस किया कि चुनावी राजनीति से कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला है और यह ज़मींदारों(सामन्तो) का खेल है. चुनावी राजनीति में भाग लेना केवल समय की बर्बादी के अतरिक्त कुछ नहीं है, और हम जैसे निचले स्तर के लोगों को इस से कुछ मिलने वाला नहीं है.

शुरू में आप मौलवी टाइप, कट्टर धार्मिक हुआ करते थे और धार्मिक संगठन अहरार के समर्थन में रहें. उन्हीं के समर्थन में 1953 में अहमदिया (इस्लाम का एक सम्प्रदाय जिसे क़ादियानी भी कहते है) के विरोध के कारण दो महीने जेल में भी बिताने पड़े.

Agra Library1951 से 1972 तक पार्टी की सेवा करते रहें. 1972 में अंजुमन मुस्लिम शेखाँ का नाम बदल कर “देहाती मज़दूर तंज़ीम” रख गया. उसी साल आप को संगठन का अध्यक्ष बनाया गया. संगठन को मज़बूती देने के लिए जगह जगह सम्मेलन आयोजित किया. मेजर इस्हाक़ के साथ पूरे पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान समेत लगभग पूरे देश का भ्रमण किया. पैदल एक गाँव से दूसरे गाँव जाना होता था. मज़दूर किसान पार्टी से वैचारिक समानता के आधार पर संयुक्त सम्मेलन कर मज़दूर और किसानों की आवाज़ उठाई. उसी समय हश्त नगर किसान आंदोलन में जी-जान से हिस्सा लिया. जो आपसी मतभेद और कुछ साथियों के पैसे पर बिक जाने के कारण सफल ना हो सका. उस समय पाकिस्तान में ये बात मशहूर हो चुकी थी कि भारत में जो दलितों में नई लहर उठी है वो सहुतरा जी और उनके आंदोलन से प्रभावित है. देहाती मज़दूर तंज़ीम के विरोध में शौकत बलोच ने “देहाती मेहनतकश महाज़” बनाया था. 

1972 ई० में ही कॉमरेड मेजर इस्हाक़ ने मुसल्ली नामक एक नाटक लिखा. जिसने मुसल्लियों के इतिहासिक, राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक हालात को बहुत स्पष्ठ रूप में प्रस्तुत किया और पहली बार राष्ट्रीय परिदृश्य पर मुसल्लियों का विमर्श सामने आया. इस नाटक ने मुसल्लियों में भी एक जबरदस्त चेतना का संचार किया और पहली बार पंजाब के मूल निवासी भी खुद को सम्मानित महसूस करने लगे. उन्हें ये पता चला कि अब तक पंजाब की जितनी भी बड़ी-बड़ी लड़ाईयाँ हुईं हैं उनमें मुसल्लियों की एक बड़ी भूमिका रही है भले ही पारंपरिक इतिहास में इसकी चर्चा नहीं है.

फौजी शासक जियायुलहक़ के शासन में मुसल्ली ड्रामा पर पाबंदी लगा दिया गया था. लेकिन सहुतरा जी ने अपने घर में इसको आयोजित करवाया, जिसपर सरकार ने 50 हज़ार का जुर्माना और 5 वर्ष की सज़ा सुनाई. इस दौरान रोज़ी रोटी के लिए आप रेडियो में प्रोग्राम किया करते थे लेकिन वहाँ रेडियो वाले झूठी तारीफें करने को कहते थे जो आप ने कभी नहीं किया, और जो सच था उसे बड़ी निडरता से कह देते थे. रेडियो का साथ भी बहुत दिनों तक नही चला.

मुसल्ली नाटक के लिए मेजर इस्हाक़ को धन्यवाद स्वरूप आपने एक कविता पंजाबी में “जंग नामा” नाम से लिखे जो इस प्रकार है-

 

जंग नामा
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गल सुन मेरी ओ रूतिया
मैं शहर लाहोर च पढ़दा 
 
जेहड़ा मैं मज़मून पंजाब पढ़िया
ओ मैं दलीलाँ करदा
 
मैं सुन के गल्ल हैराँ हुँदा
सब जदो मुसल्ली हाँ पढ़दा
 
गल खोल के रतियाँ मैं करदां
फिर रोता आहिन्दा अए
 
गप्पाँ न लाओ शाह जी
एह कदु सी देश मुसल्लियाँ दा
 
कित्थे शोहदा मुसल्ली पंजाब कित्थे
केहड़ा हाल अये बुरा मुसल्लियाँ दा
 
भख दुःख ते इहना दा नाँ लिखियाँ
झल्ला मुला दी नहीं मुसल्लियाँ दा
 
लोकाँ लए बना महल पक्के
अपना ढ़ारा वी नहीं मुसल्लियाँ दा
 
नारा खड़ के जाल बना दित्ता
वोट बैंक वी नहीं मुसल्लियाँ दा
 
इसका जवाब रुत्ता को ये मिलता है
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तेरा हाल रूतिया मैं जान ना
तेरे नाल जो ज़ालिमाँ कित्ता
 
गल सच दी मेजर इस्हाक़ कित्ति 
मैं पढ़ के तीनों एलाय कित्ति
 
जो तू बोलियाँ वोह नहीं
वोह दसीं जो तेरे नाल कित्ति
 
तिनो मुड़ क़दीम दा हाल दसियाँ
कोई अज दी गल नहीं कित्ति
 
बाहरू आके जालीमाँ सर तेरे
पंडाँ भारियाँ तेरे ते पा दित्तियां 
 
कर दित्ता हड़प्पा तबाह तेरा
कमा दसाड़ के बहियाँ जला दित्तियां 
 
हुन वेला ई यार कुंजा कुंजा
गल्लाँ तीनो में कभें/ सभें लिखा दितियाँ 
 
तू देश पंजाब नूँ पुतर मिलियाँ
साडे देश नूँ तू सवारियां है

सहुतरा जी ने न सिर्फ मुसल्लियों के लिए बल्कि समाज के हर दबे कुचले लोगों की आवाज़ उठाई. भट्ठा मज़दूरों से लेकर किसानों तक की लड़ाई लड़ी. आप ने लगभग 80 के आस पास स्कूल खुलवाए. आप ने संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं के जन्मदिन और उनका संक्षिप्त जीवन परिचय अपनी डायरी में लिख कर रखा है. खुद को कम्युनिस्ट मानते थें, कहते थे कम्युनिस्ट वो है जो हाथ से काम करता है. आखिरी समय में आप के पास आप की देख भाल के लिए ना तो वो लोग थे जिनके लिए आपने अपनी पूरी ज़िंदगी को लड़ाई में झोंक दिया और ना ही आपकी औलादें जो इस लड़ाई से सब से ज़्यादा त्रस्त रहे. आप का एक बेटा कभी कभार आ जाता था, लेकिन वो भी मेहनत मजदूरी करके अपना गुज़ारा करता था. आप 101 साल की आयु में इस दुनिया से 9 मार्च 2006 ई० को कूच कर गए. मरते समय आप के पास एक कच्चा घर, एक चारपाई, कुछ टूटी कुर्सियाँ और एक लोहे की अलमारी के सिवा कुछ नहीं था.

चूहड़, चन्गड़, चमार, भंगी, मुसल्ली जो समाज के सब से निचले स्तर पर हैं, आग़ा खान सहुतरा, एक लंबे समय तक उनके निर्विरोध नेता बने रहें. आप ने अंजुमन दीनदाराँ और अहरार से होते हुए देहाती मज़दूर तंज़ीम और मज़दूर किसान पार्टी तक एक लंबी यात्रा किया, और इस दौरान हर दम वंचितों के हक़ अधिकार के संघर्ष को ही वरीयता दिया.आप एक अच्छे साहित्यकार भी थे. आप का एक प्रसिद्ध कथन है- “इंसानों के रंग रूप तो वैसे ही रहते हैं बदलने वाली चीज तो सोच है.”

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आभार: 

मैं गुलाम हुसैन साहब, रिसर्च स्कॉलर,बीलफील्ड यूनिवर्सिटी जर्मनी का आभरी हूँ जिन्होंने सहुतरा जी से सम्बंधित सामग्री मुझे उपलब्ध करवाया. प्रोफेसर मसूद आलम फलाही साहब, विभागाध्यक्ष अरबी, उर्दू, फ़ारसी यूनिवर्सिटी लखनऊ, का भी आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मुसल्ली जाति से सम्बंधित सामग्री उपलब्ध करवाने के साथ साथ इस विषय पर लंबी वार्तालाप किया, जिससे मुझे मुसल्लियों के इतिहास को समझने में बड़ी मदद मिली. अरफान चौधरी साहब, जन-संसाधन अभियंता एवं नेशनल स्टूडेंट फेडरेशन पाकिस्तान के अध्यक्ष का भी आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने लेख के दौरान कई एक बिंदुओं और पंजाबी के मुश्किल शब्दो को समझने में मदद किया.

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फ़ैयाज़ अहमद फ़ैज़ी लेखक हैं एवं AYUSH मंत्रालय में रिसर्च एसोसिएट के पद पर कार्यरत हैं.

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