vm_2
0 0
Read Time:12 Minute, 10 Second

Neel Kranti Media

प्रो. मुंगेकरकमेटी रिपोर्ट को लागू करवाने तथा वर्धमानमहावीर मेडिकल कॉलेज केदलित-आदिवासी छात्रो के हितो के लिए 19 अक्टूबर को जंतर मंतर, नयी दिल्लीमें एक प्रदर्शन का आयोजन किया गया. इस प्रदर्शन में जेएनयू, दिल्ली यूनिवर्सिटी, जामियायूनिवर्सिटी, एम्सऔर मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज केछात्रो ने वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज के संघर्षरत दलित-आदिवासी छात्रोके साथ मिलकर उच्च शिक्षण संस्थानों में हो रहे  जातिवाद के खिलाफ अपनीआवाज बुलंद की. प्रस्तुत है इस प्रदर्शन एवं भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में व्याप्त जातिवाद का खुलासा करती नील क्रांति मीडिया की विडियो रिपोर्ट

हर वक़्त मेरिट की दुहाई देने वाले, “सवर्ण” समाज के शिक्षित लोग किस कदर जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त  है, इसका अंदाजा आप हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित और आदिवासी छात्रों के साथ लगातार हो रहे उत्पीडन से लगा सकते हैं.

तथाकथित ऊँची जाति के प्राध्यापको द्वारा हमारे छात्रो को परीक्षा में कम अंक देना, उन्हें लगातार फेल करते रहना, क्लास के अन्दर व बाहर जातिवादी टिप्पणियों द्वारा अपमानित करना, दलित और आदिवासी छात्र जीवन की यह कुछ ऐसी कटु सच्चाईंया है, जिसका सामना उच्च शिक्षा की आकांक्षा रखने वाले प्रत्येक दलित और आदिवासी छात्र-छात्राओ को करना पड़ता है.

शिक्षा एवं ज्ञान को कुछेक  वर्गों तक सीमित रखना ही हमारे देश में हजारो सालो से चली आ रही है जाति-व्यवस्था का मूल आधार रहा है. और इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान ने, अपने विशेष प्रावधानों के द्वारा, दलित और आदिवासी वर्ग के लिए हजारो सालो से बंद शिक्षा के दरवाजे खोल कर,  एक लोकतान्त्रिक एवं समानता पर आधारित भारतीय समाज के निर्माण की कल्पना की थी.

किन्तु हमारे शिक्षण संस्थानों में कब्ज़ा कर बैठे हुए जातिवादी लोगो ने भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाने में कोई कोताही न बरतते हुए, सदैव ही हमारे छात्रों के हितों का हनन किया है, जिसके फलस्वरूप हजारो दलित आदिवासी छात्र या तो शिक्षा से ही वंचित रह गए या अनेक बार असफल रहने पर निराशा और अवसाद में डूब कर आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने पर मजबूर हुए.

vm_2

पिछले कुछ वर्षो से दलित और आदिवासी छात्रो ने शिक्षण संस्थानों में व्याप्त जातीय उत्पीडन के खिलाफ एक जुट होकर एक कड़े संघर्ष की शुरुवात की है. जिसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसस (एम्स ), नयी दिल्ली के हमारे छात्रो ने, सन २००६  में किये, अपने सशक्त आन्दोलन के रूप में, हमारे सामने प्रस्तुत किया.

इस आन्दोलन की सफलता इसी बात से आंकी जा सकती है की स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार शिक्षण संस्थानों में व्याप्त जातीय-उत्पीडन की जांच करने के लिए भारत सरकार को, मजबूर होकर, सितम्बर २००६  में, तत्कालीन UGC के अध्यक्ष प्रो सुखदेव थोरात के नेतृत्व में, एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन करना पड़ा.

प्रो थोरात कमेटी ने लगभग ८ महीने चली अपनी जांच के बाद भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट सौपते हुए  एम्समें दलित और आदिवासी छात्रो पर हो रहे जातीय उत्पीडन की भयावह स्थिति का खुलासा किया |

अपनी जांच में कमेटी ने पाया की जंहा एम्स के प्राध्यापक दलित और आदिवासी छात्रो को हीन द्रष्टि से देखते हुए, विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित करते है वंही तथाकथित ऊँची जाति के उनके सहपाठी भी हमारे छात्रो का उत्पीडन करने में कोई कसर नहीं छोड़ते – चाहे वो खेलकूद का मैदान हो या हॉस्टल की मेस.

जांच के दौरान कई दलित और आदिवासी छात्रो ने थोरात कमेटी को बताया की किस प्रकार उच्च जाति के उनके सहपाठी, मारपीट करके उनको अपने होस्टलो से बे-दखल कर, एक विशेष हॉस्टल में रहने के लिए मजबूर करते रहे थे. जिसकी पूरी जानकारी एम्स के प्रशासन को होते हुए भी, कभी कोई कारवाही नहीं की गयी.

एम्सजैसे प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान में इस कदर व्याप्त जातिवादी जहर को देखते हुए थोरात कमेटी ने इसके प्रशासन को पूरी तरह से इसका जिम्मेदार ठराया, एवं इस बुराई को जड़ से मिटाने के लिए अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार के सामने कई सारी अनुशंसाएं भी रखी.

किन्तु आज 6 साल बाद भी एम्स के जातिवादी प्रशासन और छात्रो के खिलाफ कभी कोई कारवाही नहीं हुई, इस  दौरान अगर एम्स में कुछ हुआ तो वो थी – २ मौते.

पहले ३ मार्च २०१० में एक दलित छात्र बालमुकुन्द भारती ने जातिगत उत्पीडन से तंग आकर अपने MBBS के अंतिम वर्ष में पंखे से लटक कर अपनी जान दे दी और २ वर्ष बाद, ठीक उसी दिन, ३ मार्च २०१२ को एक आदिवासी छात्र अनिल कुमार मीना ने भी पंखे से लटकर अपनी जान की आहुति दी.

एम्स से सटे हुए दिल्ली के एक दूसरे अत्यंत प्रतिष्ठित वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज की तस्वीर भी उतनी ही भयावह है  जंहा पर पिछले तीन सालो से दलित और आदिवासी छात्र-छात्राए अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ लगातार कॉलेज प्रशासन, भारत सरकार, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और यंहा तक की न्यायालयों के  चक्कर लगा रहें हैं.

उनका आरोप है की पिछले कई सालों से दलित आदिवासी छात्रो को  सिर्फ एक विषय फिजियोलॉजी में मात्र एक या दो अंको से फेल कर उन्हें आगे बढ़ने से रोका जा रहा है. जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन छात्रों की पीड़ा को संज्ञान में लेते हुए अपनी निगरानी में परीक्षा करवाई तब सभी छात्र पास हो गए. इससे यह साफ़ पता चलता है की इस कॉलेज का प्रशासन किस कदर जातिवादी होकर हमारे छात्रो को जानबूझ के फेल कर उनकी जिंदगियो से खेलता रहा है.  

माननीय उच्च नायालय के हस्तक्षेप के बावजूद कॉलेज प्रशासन का रवैया जस का तस बना रहा और यह ही नहीं उसने कोर्ट के पास न्याय की गुहार लगाने वाले छात्रों को क्लास में दुसरे छात्रो के सामने खड़ा कर अपमानित भी करता रहा.

आखिरकार राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग  ने  भी  दलित  छात्रो  के  साथ  इस  मेडिकल कॉलेज में हो रहे अमानवीय व्यवहार पर अपनी चुप्पी तोड़ते  हुए  पिछले  साल  जुलाई  में  राज्यसभा मेम्बर और मुंबई    यूनिवर्सिटी के भूतपूर्व कुलपति प्रो. भालचंद्र  मुंगेकर  के  नेतृत्व  में एक  जांच  कमेटी  का गठन किया.

vm_1

प्रो मुंगेकर कमेटी ने अभी लगभग दो माह पूर्व ६ सितम्बर २०१२ को एक साल से ऊपर चली अपनी जांच की  रिपोर्ट  आयोग को सौपते हुए, वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज में दलित छात्रो के साथ हो रहे भेदभाव को पूरी तरह से बेनकाब किया.

१२० पेज की अपनी रिपोर्ट में कमेटी ने दलित और आदिवासी छात्रो के सभी आरोपों को सही मानते हुए  उनके साथ हो रहे जातिवादी उत्पीडन की  न केवल कड़ी आलोचना की बल्कि इस मेडिकल कॉलेज के ४ प्रोफेसरों को इसका दोषी मानते हुए, उनके खिलाफ कड़ी कानूनी करवाई करने की मांग राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से की.

अपनी रिपोर्ट में प्रो. मुंगेकर लिखते है की  “आयोग (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग) को पूर्व प्राचार्य डॉ वी के शर्मा; फिजियोलॉजी की विभागाध्यक्ष डॉ शोभादास; वर्तमान प्राचार्य डॉ जयश्री भट्टाचार्यजी और फिजियोलॉजी के प्रोफ़ेसर और लाइज़न अधिकारी डॉ राज कपूर को अपने पद का दुरुपयोग करने एवं छात्रो के साथ जातिगत उत्पीडन करने के कारण अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार अधिनियम, १९८९ के तहत कानूनी कार्रवाई करना चाहिए जिसमें इनका नौकरी से निलंबन भी शामिल है”.

लेकिन इस रिपोर्ट को सार्वजनिक हुए दो महीने से ऊपर होने को आये किन्तु अभी तक न तो राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने और ना ही भारत सरकार ने दलित-आदिवासी छात्रो को न्याय देने की किसी भी प्रकार की कोई पहल की है. इन छात्रो का उत्पीडन इस मेडिकल कॉलेज में बदस्तूर जारी है. लगता है प्रो. मुंगेकर कमेटी रिपोर्ट का हस्र ६ साल पुरानी प्रो.थोरात कमेटी की तरह होना ही निश्चित है.

इन तथाकथित  प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों  में हो रहे जातिवाद के नंगे सच का पर्दाफाश होने के बाद भी लगता है हमारे छात्र फेल होने और आत्महत्या करने के लिए अभी बहुत से सालो तक अभिशप्त रहेंगे.

~~~

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *