कवि कृष्णचंद्र रोहणा की रचनाओं में सामाजिक न्याय एवं जाति विमर्श

Deepak Mevati

डॉ. दीपक मेवाती (Dr. Deepak Mewati) सामाजिक न्याय सभी मनुष्यों को समान मानने पर आधारित है। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक आधार पर किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। मानव के विकास में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं की जानी चाहिए। सामाजिक न्याय की अवधारणा का अर्थ भारतीय समाज […]

मध्यकालीन अशराफ़ इतिहास और पसमांदा सवाल

लेखक : अब्दुल्लाह मंसूर (Abdullah Mansoor) हम यह जानते हैं कि पसमांदा मुसलमानों का न कोई राज्य रहा है और न कोई राजा। क़ौम के बनाए ढाँचे में पसमांदा मुसलमान तब तक फिट नहीं हुए जब तक लोकतंत्र में प्रत्येक वोट का महत्व नहीं बढ़ा। विदेशी नस्ल के मुस्लिम सुल्तानों और बादशाहों ने भारतीय पसमांदा समाज को कभी अपने बराबर […]

आंबेडकरवाद क्यों जरूरी है?

संजय श्रमण (Sanjay Shraman) डॉक्टर अंबेडकर ने कहा है कि भारत का इतिहास असल में श्रमण और ब्राह्मण संस्कृति के संघर्ष का इतिहास है। इस बात को धार्मिक-दार्शनिक विकास सहित परंपराओं, कर्मकांडों, देवी-देवताओं के विकास के स्तर पर भी बहुत दूर तक समझा जा सकता है। ना केवल भौतिक संसाधनों की लूट एवं अधिकार के लिए संघर्ष के संदर्भ में […]

पानी की लड़की और नीला रंग (कविताएँ)

उमा सैनी (Uma Saini) पानी की लड़की और नीला रंग माँ !तुम्हारे आँसुओं के समन्दर से बनीमैं पानी की लड़कीजो हर छोटे दुख पर भीग जाया करती हूँ।वर्षों तक तुमने जो विष पियाउसके नीले थक्के जब तुम्हारी देह पर देखे मैंनेतब जाना की क्यों नीला होता है समन्दर !तुम्हारी देह के नीले थक्के मुझे अपनी देह परक्यों महसूस होते हैं?क्या […]

पीऍफ़आई (PFI) पर लगे प्रतिबन्ध पर पसमांदा प्रतिक्रिया

इस सवाल का जवाब तो देना होगा न कि मुसलमानों का 85% पसमांदा समाज आज अगर गलाज़त में जी रहा है तो कसूरवार कौन है? सरकार को तो हम जी भर के गालियां देते ही हैं पर अब हमें अशराफ मुस्लिम रहनुमाओं से सवाल करने होंगे। हमारे मुसलिम समाज के धार्मिक और राजनीतिक रहनुमाओं ने कौन-सी रणनीति बनाई है जिस पर चल कर यह समाज अपनी गलाज़त से निकल सके? शिक्षा और रोज़गार क्या हमारी मुस्लिम राजनीति का हिस्सा है भी? ये समस्याएँ आखिर कभी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा क्यों नहीं बन पाती हैं? तलाक के मुद्दे पर तो सड़कें भर देने वाले हमारे धार्मिक रहनुमा क्या इन मुद्दों पर कभी सड़कों पर निकले हैं? हिंदुत्व (फासिस्ट ताकतों) को मुसलमानों का सबसे बड़ा खतरा बताने वाले हमारे रहनुमाओं ने उससे लड़ने के लिए कौन-सी लोकतांत्रिक रणनीति समाज को दी है? कैसे हम इस खतरे का मुकाबला करें? क्या कोई तरीका है मुसलिम समाज के पास?

दलित स्त्रियाँ कहाँ प्यार करती हैं ?

रचना गौतम (Rachna Gautam) 1. ओ री सखी ! ओ री सखी !जब ढूँढते-ढूँढते पा जाओ शोरिले से अक्षरों में मगरूर वो चार पन्ने और पढ़कर समझ आ जाएगणित तुम्हें इस दुनिया का तो हैरान न होना बेताब न होना धीरज धरना शुन्यता के खगोल में कहीं मूक न हो जाएँतुम्हारी मास्पेशियों का बल जीवन-चालस्वप्न तुम्हारे बौद्ध तुम्हारा ! बौरा […]

बाबा साहेब के अपमान पर राजकमल प्रकाशन को खुला पत्र

हिंदी भाषा की वरिष्ठ लेखिका व् दलित लेखक संघ की पूर्व अध्यक्ष अनीता भारती ने राजकमल प्रकाशन को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने राजकमल द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक ‘उसने गाँधी को क्यूँ मारा’ (लेखक अशोक कुमार पांडे) को ऐसी पुस्तक छापने जिसमें डॉ. आंबेडकर की छवि को बिगाड़ने की कोशिश की गई है, स्पष्टीकरण माँगा है. 13 नवम्बर को […]

राजनीतिक आरक्षण के अंत से सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों का अभ्युदय

डॉ. जस सिमरन कहल (Dr. Jas Simran Kehal) ऐसा कहा जाता है कि यदि हम अपनी गलतियों से सीखें और शोषणकर्ताओं को अपना धैर्य और आशा न छीनने दें तो ही हम प्रगति की राह पर चल सकते है। यह बाबा साहब डॉक्टर आंबेडकर की निर्भीकता थी कि उन्होंने पूना पैक्ट त्रासदी के बाद भी वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए […]

जहाँ कभी एक गाँव हुआ करता था…

वहीदा परवेज़ (Wahida Parveez) (1)इक ख्वाब के नक़्शे-कदम मैंने अपना पेट फुला हुआ महसूस किया ! दरअसलमैं हर चीज़ महसूस कर पा रही थी ! मैं अपने बचपन में थी नानी के गाँव वाले टूटे-फूटे रास्ते से चलते-कूदते मैंने पानी का टपकना महसूस कियामैं रोते-रोते घर पहुँचीमैंने सबसे कहा- वह बस आने वाला है !मैंने अपनी नाभि के नीचे उसे […]

भारतीय सिनेमा के पसमांदा सवाल

अब्दुल्लाह मंसूर (Abdullah Mansoor) एक लंबे दौर तक भारतीय सिनेमा जाति और जातिगत समस्याओं की न केवल अनदेखी करता रहा है बल्कि भीषण जातिगत वास्तविकताओं को अमीर बनाम गरीब (कम्युनिस्ट नज़रिये) की परत चढ़ा कर परोसता रहा है। दलित सिनेमा की कोशिशों से ये परत साल दर साल धूमिल पड़ती जा रही है और इस प्रयास में 2021 दलित सिनेमा […]