नवयान दर्शन : बुद्ध की शिक्षाओं का आधुनिक विवेचन (पुस्तक समीक्षा)
भिक्खुनी विजया मैत्रीय (Bhikkhuni Vijaya Maitriya) किताब का शीर्षक: नवयान दर्शन : बुद्ध की शिक्षाओं का आधुनिक विवेचन लेखक: डॉ. रत्नेश कातुलकर पृष्ठ संख्या: 264 […]
भिक्खुनी विजया मैत्रीय (Bhikkhuni Vijaya Maitriya) किताब का शीर्षक: नवयान दर्शन : बुद्ध की शिक्षाओं का आधुनिक विवेचन लेखक: डॉ. रत्नेश कातुलकर पृष्ठ संख्या: 264 […]
महात्मा ज्योतिराव फुले आधुनिक युग में शोषित बहुजन समाज के सशक्तिकरण के पहले क्रांतिकारी विचारक थे। उन्होंने ब्राह्मणवादी सत्ता संरचना के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक-सांस्कृतिक वर्चस्व को सीधे चुनौती दी। ‘गुलामगिरी’, ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ जैसी उनकी किताबों ने शोषण की व्यवस्था की जड़ें उजागर कीं। “सत्यशोधक समाज” की स्थापना कर उन्होंने एकेश्वरवादी सार्वजनिक सत्यधर्म की नींव रखी, जिसने हिंदू ब्राह्मणी धर्म की सत्तासंरचना को जोरदार झटका दिया। छत्रपती शिवाजी महाराज की समाधि की खोज और “शिवाजी जयंती मनाने की शुरुआत” जैसे कार्यों से उन्होंने बहुजन समाज को ऐतिहासिक प्रेरणा देने का प्रयास किया। सावित्रीबाई फुले के साथ उन्होंने स्त्री शिक्षा और दलित-बहुजन उत्थान के लिए अथक संघर्ष किया। लेकिन ‘फुले’ फिल्म इस क्रांतिकारी विरासत को धुंधला करती है और फुले की एक अलग ही छवि प्रगट करती है।
आजकल दलित-बहुजन लोगों में ‘फुले’ मूवी को देखने की बड़ी होड़ है। सवर्णों और अंधभक्तों की तरह इनको भी लगने लगा है कि अब किताबों […]
इस वर्गीकरण के फैसले के पक्ष में जहाँ अधिकतर वाल्मीकि जाति के लोग समर्थन में दिखे, वहीं अधिकतर चमार जाति के लोगों ने इसका विरोध किया। इस फैंसले के आने के बाद भारत बंद भी किया गया और दोनों जातियों की तरफ से हिंसा की जाने की भी बातें करी जाने लगीं। सोशल मीडिया के माध्यम से दोनों जातियाँ एक दूसरे को नीचा दिखाने लगीं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के पक्ष या विपक्ष में होना एक अलग विषय है जिसपर बहस हो सकती है, लेकिन यह इस लेख का उद्देश्य नहीं है। यहाँ उद्देश्य वाल्मीकि समाज के उन दावों को जाँचना है जो कहते हैं कि कांशीराम जी ने वाल्मीकि समाज के साथ सौतेला व्यवहार किया। इस विषय पर लिखना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जो दलित-आदिवासी-पिछड़ा आंदोलन या बहुजन आंदोलन भारत देश में असमानता पर आधारित मनुवादी विचारधारा के ख़िलाफ़ खड़ा है इस तरह के वाद-प्रतिवाद से अपरिपक्व मालूम पड़ता है। लोग अपने असली मकसद से भटके प्रतीत होते हैं और लड़ाई की धार भी कुंद होती है। समता-समानता के लिये लड़ने वाले महापुरुषों का आंदोलन आगे बढ़ने की जगह पीछे जाता हुआ नज़र आता है।
बुद्ध के जीवन में ऐसी अवस्था उनके बुद्धत्व की प्राप्ति के कुछ दिनों बाद ही हुई. इसका कारण था कि उन्हें जिस ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, उससे सारा मानव समाज अनजान था. यह इतना अनोखा अनुभव था, इसे किसे बताया जाये, कि वह इसे पूरी तरह समझ सके? बुद्ध की यह चिंता थी. उन्हें ऐसा भी लग रहा था कि इस ज्ञान को साधारण इंसान के द्वारा समझ पाना एक टेढ़ी खीर है. क्योंकि एक आम व्यक्ति से लेकर बुद्धिजीवी जिन मिथकों में अपना जीवन बिता देते हैं जो ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, कर्मकांड, पुरोहितगिरी, तप, व्रत-उपवास और कर्मकाण्ड से भरा होता है, वे इन्हें ही सत्य और शाश्वत मानते हैं. लेकिन धम्म में इन मान्यताओं का रत्ति भर भी स्थान नहीं है. और तो और जो किसी भी मुसीबत या चुनौती के पीछे हमेशा दोष किसी बाहरी ताकत पर ही मढ़ने की इन्सानी फितरत है, उसकी धम्म में कोई जगह नहीं. बुद्ध ने जिस सत्य को खोजा उसमें अधिकांश परेशानियों और गलतियों के पीछे कोई बाहरी ताकत नहीं बल्कि खुद इनको झेलने वाला व्यक्ति ही जिम्मेदार है. उनकी यह खोज थी कि किसी सहारे को मत ढूँढो बल्कि अपना द्वीप खुद बनाओ या अपना दीपक खुद बनों.
अगर हम कोइतूर शब्द को और गहरे अर्थ में समझें तो आज की अनुसूचित जनजातियों (Schedule Tribes), अनुसूचित जातियों (Schedule caste), पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes) और धार्मिक अल्पसंख्यकों (Religious Minorities) को मिलकर जो समूह बनता है वह भी कभी इसी कोइतूर (Indigenous) समाज का हिस्सा था लेकिन कालांतर में बाहर से आने वाले लोगों की संस्कृतियों के प्रभाव और संपर्क में आकर अपनी मूल संस्कृति, रहन-सहन, भाषा बोली, तीज त्योहार, खान पान, पूजा पाठ, जीवन संस्कार इत्यादि को त्याग दिया और अपने कोइतूर होने के अधिकार को खो दिए। भारत की मात्र कुछ जनजातियाँ जैसे गोंड, प्रधान, कोया, इत्यादि ही अपने उस प्राचीन मूल कोयापुनेमी सभ्यता और संस्कृति को बचाए रहने में सफल रहे हैं और आज भी कोइतूर होने का अधिकार रखते हैं।
आप हिंदी की कोई भी गाली उठाएँ, वो या तो जाति आधारित है या लिंग आधारित। दरअसल ये वर्चस्व की संस्कृति की दरिद्रता है जो स्त्रियों और पराजित या शोषित समुदायों के नाम को गाली की तरह इस्तेमाल करती है। कोई सामान्य शब्द किस तरह अपनी सामाजिक लोकेशन (location) के कारण गाली बन जाता है या ऐसे इस्तेमाल होता है, उसके लिए ‘औरत’ शब्द पर गौर करें। औरत एक बिलकुल सामान्य शब्द है लेकिन हिंदी समाज और इसीलिए हिंदी साहित्य में ये सामान्य शब्द तब गाली बन जाता है जब किसी पुरुष को ‘औरत’ कह दिया जाए। ये शायद हिंदी-पट्टी के पुरुष के लिए सबसे बड़ी गाली होगी। इसका कॉन्टेक्स्ट मर्दवाद की वर्चस्वशाली सामाजिक संरचना से तैयार होता है।
इसीलिए ‘नाज़ी’ कविता कहती है-
‘नाज़ी मर्द होते हैं’
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