सत्ताधारियों का विमर्श ढोते हाशिये के लोग

ratnesh katulkar

डॉ रत्नेश कातुलकर (Dr. Ratnesh Katulkar) दुनिया के मज़दूर एक हो! कार्ल मार्क्स का यह कितना अच्छा संदेश है. यदि वास्तव में ऐसा हो पाता तब किसी एक देश-विशेष तो क्या दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी व्यक्ति मानव अधिकार से वंचित नहीं रह पाता. लेकिन मज़दूरया वंचित भला एक कैसे हो सकते हैं! […]

पूना पैक्ट और एक दलित-मुख्यमंत्री

डॉ. जस सिमरन कहल  (Dr. Jas Simran Kehal) साहित्य के माध्यम से पूना-पैक्ट पर फिर से विचार करते हुए, मैं सोच रहा था कि इस संधि पर हस्ताक्षर करने से पहले डॉ अम्बेडकर का दिमाग कैसे काम कर रहा होगा। दलित वर्गों के हितों की रक्षा करते हुए उस तरह की कठिन सौदेबाजी को अकेले […]

सारपट्टा परंबराई- सवर्ण परंपरा पर एक मुक्का

जेएस विनय (JS Vinay) “अत्त दीपो भव:– अपना दीपक खुद बनो” ~ बुद्ध “आपको अपनी गुलामी खुद ही खत्म करनी होगी. इसके उन्मूलन के लिए भगवान या सुपरमैन पर निर्भर न रहें। याद रखें कि यह पर्याप्त नहीं है कि लोग संख्यात्मक रूप से बहुमत में हैं. सफलता प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए उन्हें […]

एक बौद्ध पीढ़ी को तैयार करना

चंचल कुमार (Chanchal Kumar) जब हम बड़े हो रहे थे इस दौरान हमारे माता-पिता ने जाति पर किसी भी स्पष्ट चर्चा से हमें बचा लिया, शायद यह मानते हुए कि अगर इस दानव के बारे में बात ही न की जाए तो इसका अस्तित्व खुद ही समाप्त हो जाएगा. इसे देखने का एक और तरीका […]

जाति, और भारतीय कानूनी व्यवस्था की विफलता

रचना गौतम (Rachna Gautam) प्रत्येक सभ्य समाज में समाज के समुचित शासन के लिए कानून की अनिवार्य आवश्यकता होती है. मनुष्य होने के कारण लोग तर्कसंगत होते हैं और उस दिशा में आगे बढ़ते हैं जो उनके हित को सर्वोत्तम रूप से पूरा कर सके, और विभिन्न रुचियों वाले कई लोगों की एक साथ उपस्थिति […]

अर्ध सत्य और समानांतर सिनेमा के आधे-अधूरे सत्य

राहुल गायकवाड (Rahul Gaikwad) तो उस दिन, मैं बस यही सोच रहा था कि इस समाज में भ्रष्टाचार विरोधी भाषणबाजी कैसे और कब से चलन में आई। मुख्यधारा के मीडिया द्वारा समर्थित अन्ना हजारे और केजरीवाल की जोड़ी के नेतृत्व में ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान’ के दौरान हमने इसे बदसूरती के पूर्ण चरम पर देखा। […]

फेडरल सिस्टम वेंटीलेटर पर है

निखिल कुमार (Nikhil Kumar) तकनीकी रूप से भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है जिसे अंग्रेजों से आज़ाद करवाने के लिए लाखों लोगों ने बलिदान दिया है. वे लोग अलग अलग क्षेत्रों से और विविध पृष्ठभूमियों से थे. विरोध की कई अलग अलग धाराएं बह रही थीं. सभी धाराओं में भले ही गोरों के […]

इसके या उसके ही नहीं, ‘कबीर’ सबके हैं

शैली किरण (Shelly Kiran) सुकरात ने एक बार कड़े स्वर में पूछा था- आप किस तरह मुझसे इस नगर के लिए उपचार की उम्मीद रखते हैं? क्या मुझे एंथेन वासियों से तब तक लड़ना चाहिए जब तक वे सुधर न जायें जैसे कि किसी चिकत्सक ने उन्हें सुधारा हो या फिर मैं उनका सेवक बन […]

हाथरसः तोड़नी होगी अन्याय की असली ज़मीन

बी. शारदा (B. Sharda) अन्याय के प्रतिकार के लिए शायद ‘अन्याय’ ही रास्ता है, तभी एक न्याय व्यवस्था उभर कर आएगी। अन्याय क्या है, यह कौन बताएगा? अन्याय की समझ सबके भीतर अपने जीवन के कटु अनुभवों से आती है। खासतौर पर तब जब व्यक्ति उस बात की सजा पाता है जो अपराध उसने किया […]

टीना डाबी के दफ्तर-प्रवेश का ब्राह्मणी कर्मकांड बनाम वैज्ञानिक चेतना की कसौटी

अरविंद शेष (Arvind Shesh) बेशक इसरो के चीफ वैज्ञानिक माधवन नायर या वैज्ञानिक राधाकृष्णन या वैज्ञानिक के. शिवन के मुकाबले आइएएस टीना डाबी की जिम्मेदारी ज्यादा है अंधविश्वासों के खिलाफ वैज्ञानिक चेतना को निबाहने की, उसे मजबूत करने की! इसरो के वैज्ञानिक माधवन नायर या राधाकृष्णन अगर किसी भी अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण के पहले […]