Dhamma

धम्म दर्शन निगम (Dhamma Darshan Nigam) 

Dhammaभारत एक प्रजातांत्रिक देश है. हर 5 साल बाद यहां के लोग अपने लिये नये प्रतिनिधि चुनते हैं कि, नयी सरकार उनके स्वास्थय, शिक्षा, रोज़गार, और अधिकारों की रक्षा करेगी. देश की तरक्की के लिये तो शहरों को सड़कें, रेल की पटरियां, और मैट्रो से जोड़ दिया जाता है. देश हित के नाम पर मंगलयान और चंद्रयान भेजे जाते हैं, अग्नि मिसाइल तैयार किये जाते हैं. लेकिन, दलित और दूसरी शोषित जातियों से किये वादे, वादे ही रह जाते है. 

हर बार नयी सरकार दलितों से किये वादे पूरा करने में फेल हो जाती है. ऐसा ही कुछ ये सरकारें करती आईं हैं, दलित समाज के सफ़ाई कर्मचारी समुदाय के साथ. सफाई कर्मचारी समुदाय का एक बहुत बड़ा तबका आज भी मानव मल साफ़ करके अपनी रोजी-रोटी कमाने को मजबूर है. पीढ़ी दर पीढ़ी सफाई कर्मचारी समुदाय, भीषण पीड़ा के साथ, बिना किसी बुनियादी सुविधा के और बिना किसी शिकायत के, इस घिनौने काम से अपनी जीविका चला रहा है. इनका शिक्षा, स्वास्थय, नौकरी, और रहन-सहन घर का स्तर पूरे देश में सबसे निम्न स्तर पर है.

सत्ताधारी नेतागण दावे करते आ रहे हैं कि भारत विकासशील से विकसित होने को है, लेकिन इसके नेताओं को महिलाओं को मानव मल साफ़ करता देख शोभा देता है! भारत तकनीक की अधिकतम सीमा पर है, लेकिन गटर और सेप्टिक टैंक की सफ़ाई के लिए मशीनें नहीं बनाई जातीं. अगर मशीनें हैं, तो उन्हें इस्तेमाल नहीं किया जाता. और नतीजतन जवान दलित लड़के गटर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए उनकी जान गंवा बैठते हैं. 

क्या जनता के प्रतिनिधियों के लिए इसकी जनता की जान की कोई कीमत नहीं है? या फिर सिर्फ सफाई कर्मचारियों की जान की ही कोई कीमत नहीं है? क्या इन सरकारों के लिए एक जिंदगी, एक परिवार, एक समुदाय से ज्यादा जरूरी उसका खजाना और मशीनें है? क्या इन प्रतिनिधियों को यह नहीं दिखता कि यह एक दूषित, स्वास्थय के लिए हानिकारक, खतरनाक और जानलेवा काम है? राजनीतिक पार्टियां सफाई कर्मचारियों से वोट के लिए लुभावने वादे तो कर देती है, कहती है… कॉलोनी को अधिकृत करायेंगे, कॉलोनी में रियायत पर पानी, बिजली व अन्य रोजमर्रा की बुनियादी सुविधायें उपलब्ध करायेंगे, सीवर में काम करने के लिए सुरक्षा के सारे उपकरण मुहैया करायेंगे और सफाई के काम में ठेकेदारी प्रथा खत्म करायेंगे. पर चुनाव जीतने के बाद वही ढाक के तीन पात! 

विभिन्न सरकारों के सफाई कर्मचारी समुदाय के साथ इस रवैये से यही कहा जा सकता है कि इन सरकारों की समता, समानता और सफाई कर्मचारियों के लिये समान अधिकारों की विचारधारा ही नहीं है. या ये सरकारें जातिवादी और यथास्थितिवादी है, कि ना सफाई कर्मचारियों की स्थिति बदलने की कोशिश करना चाहती हैं, और ना ही अपने विशेषाधिकार छोड़ना चाहती हैं. शुष्क शौचालयों से मैला साफ़ करना और सीवर-सेप्टिक टैंक में उतर कर उन्हें साफ़ करना रोजी-रोटी कमाने का काम नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक चरित्र पर एक हिंसात्मक छाप और उसका निरादर है. किसी इंसान की जान इतनी सस्ती भी नहीं होती कि वह उसे दूसरों का मल साफ़ करते हुए सीवर-सेप्टिक टैंक में गवां दे!

Manual Scavenging

मैला साफ़ करना जिसे मैला प्रथा कहा जाता है, को ख़त्म करने लिये अभी तक 2 कानून और एक सुप्रीमकोर्ट की जजमेंट आ चुकी है. पहला 1993 का – मैला ढोने वालों का नियोजन और शुष्क शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम – 1993. इस कानून के  अंतर्गत शुष्क शौचालय से मैला साफ़ करना सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था. दूसरा 2013 का – हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम – 2013. इस कानून के अन्तर्गत शुष्क शौचालय के अलावा सीवर साफ़ करना, सेप्टिक टैंक साफ़ करना, मल बहने वाले नाले साफ़ करना, रेलवे ट्रेक साफ़ करना मैला प्रथा के दायरे में आता है. सुप्रीमकोर्ट की जजमेंट 27 मार्च 2014 को आई, जिसके अनुसार यदि किसी व्यक्ति की सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए मौत हो जाती है तो सरकार उसके परिवार को दस लाख रूपये क्षतिपूर्ति के रूप में देगी. और 1993 के बाद अब तक हुई इस प्रकार की सभी मौतों पर उनके परिवार वालों को दस लाख रुपया दिया जायेगा. 

2013 के कानून के विभिन्न अनुच्छेदों के अनुसार कोई भी सरकारी अधिकारी या प्राइवेट ठेकेदार सफाई कर्मचारियों से किसी भी रूप में मैला साफ़ नहीं करवा सकता और अगर वो ऐसा करता है तो उसे सफाई कर्मचारी को उस काम से तुरंत रिहा करना होगा और ऐसा करने के लिए वह अधिकारी या ठेकेदार सजा का पात्र होगा. ऐसे सफाई कर्मचारियों को सरकार चालीस हजार रुपये तुरन्त राहत राशि भी देगी. और उनका पुनर्वास करेगी. पुनर्वास की विभिन्न योजनायें नेशनल सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कारपोरेशन द्वारा दी जाती हैं. पुनर्वास में किसी भी प्रकार की रुकावट न होने का इंतजाम और पुनर्वास में किसी मुश्किल पर क़ानूनी सहायता का प्रावधान भी है. 

सरकार या सुप्रीमकोर्ट कानून या जजमेंट बना कर नहीं समझ सकतीं कि उनका काम पूरा हो गया. इस जातिवादी देश में किसी भी कुप्रथा के ख़िलाफ़ कानून बना देना सिर्फ़ पहला कदम होता है. बाक़ी का सारा काम उस कानून को लागू करना होता है. मैला प्रथा के खिलाफ़ भी 1993 से कानून है. लेकिन, आज भी दलित महिलायें मैला साफ़ करती देखी जा सकती हैं. सुप्रीमकोर्ट भी जजमेंट भर देने से उसका काम पूरा नहीं समझ सकता. सीवर और सेप्टिक टैंक में लगातार दलितों की मौत हो रही है. और इनकी जान की कीमत कुछ या ज़्यादा रूपये बिलकुल नहीं हो सकती!! 2013 का कानून भी कहता है कि “हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों द्वारा सहन किये गये ऐतिहासिक अन्याय और तिरस्कार  को रोकना तथा गरिमापूर्ण जीवन के लिये उनका पुनर्वास करना आवश्यक है”. लेकिन, सफाई कर्मचारियों को सफाई के अलावा किसी दूसरे काम में पुनर्वास करने से ही यह ऐतिहासिक अन्याय और तिरस्कार ख़त्म होगा. ना कि, सफाई का काम दोबारा उनसें ही “सुरक्षा” से कराने से या सीवर-सेप्टिक टैंक की सफ़ाई मशीन से कराने से. इस ऐतिहासिक अन्याय और तिरस्कार को ख़त्म करने के लिये दलित सफाई कर्मचारियों को सफाई का काम पूरी तरह से छोड़ना होगा.

बाबा साहेब ने कहा था कि “मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाये, ख़राब निकले तो निश्चित रूप से संविधान ख़राब सिद्ध होगा. दूसरी ओर, संविधान चाहे कितना भी ख़राब क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाये, अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा”. अतः मात्र कानून बन जाने से मैला प्रथा खत्म नहीं होगी. विभिन्न सरकारों को इन कानूनों को ईमानदारी से लागू भी करना होगा.     

बाबा साहेब ने कहा था: भंगी, झाड़ू छोड़ो!!

बाबा साहेब के बाद हमारी तीन से चार पीढ़ीयां बीत चुकी हैं, लेकिन हम आज भी झाड़ू मार कर अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं. बेशक पढ़-लिख जाने के बावजूद हम से छुआछूत किया जाता है, और हमारी योग्यता अनुसार हमें नौकरी नहीं मिलती. और अंततः हमें साफ़-सफाई का काम ही करना पड़ता है. लेकिन इस जातिवादी समाज के चलते हम कब तक मजबूरी का नाम लेकर साफ़-सफाई का काम करते रहेंगे? हमें अपने ख़ुद के काम-धंधे शुरू करने होंगे. हमें हमारी योग्यता और बढ़ानी होगी. हमें और ज्यादा, ज्यादा से ज्यादा पढ़ना होगा. बाबासाहेब ने कहा भी था कि, “शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पियेगा, वो दहाड़ेगा”. 

जो नहीं पढ़ते, उनमें पढ़ने का शौक पैदा करो

जो पढ़ते हैं, उन्हें और ज्यादा पढ़ने के लिए प्रेरित करो,

और जो पहले से ज्यादा पढ़ते हैं, उन्हें और ज्यादा पढ़ने के लिए बढ़ावा दें. // डॉ. भीम राव अंबेडकर 

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धम्म दर्शन निगम ‘सफाई कर्मचारी आन्दोलन’ के नेशनल कोऑर्डिनेटर हैं, लेखक हैं व् The Ambedkar Library के फाउंडर हैं. उनसे ddnigam@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

चित्र- इन्टरनेट दुनिया से साभार

2 thoughts on “बाबासाहेब ने कहा था- भंगी, झाड़ू छोड़ो!”

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