हिन्दी साहित्य-जगत के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ रामविलास शर्मा अपनी प्रग्तीशीलता और मार्कस्वाद के प्रति अपनी निष्ठा के लिए जाने जाते हैं। इन्होने कमजोर तबको के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने की भरपूर कोशिश भी की है किन्तु इनकी लेखनी पर नज़र डालने पर हमे शर्मा जी की असलियत पता चलती है। इन्होने मार्क्स्वाद को चोला ओढ़कर बड़े शातिर तरीके से दक्षिणपंथी विचारो को आगे बढ़ाया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इतिहास पुनर्लेखन का खाखा भी डॉ शर्मा ने ही तैयार किया था और अपनी इस कोशिश मे इन्होने भारत की प्रथम सभ्यता सिंधु घाटी ‘का नामकरण ‘सरस्वती सभ्यता  करने की कुत्सित चेष्टा की। फिर भला उनके विचार डॉ आंबेडकर और दलित आंदोलन के प्रति कैसे सही हो सकते थे। प्रस्तुत आलेख मे रामविलास शर्मा द्वारा डॉ आंबेडकर पर व्यक्त विचारो का विश्लेषण किया गया है।

 

रामविलास शर्मा हिंदी साहित्य में न सिर्फ एक आल्हा दर्जे के साहित्यकार की हैसियत रखते हैं बल्कि उन्हें एक प्रगतिशील चिन्तक के रूप में भी याद किया जाता है. हिंदी साहित्य के विविध आयामों में उन्होंने इतिहास और दर्शन पर भी खासा लिखा है. आम प्रगतिशील साहित्यकारों के विपरीत डॉ शर्मा ने अपनी लेखनी को महज मार्क्सवाद, गांधीवाद और समाजवाद तक सीमित नहीं किया बल्कि उन्होंने इसमें डॉ आंबेडकर को भी शामिल किया है. हालाँकि डॉ आम्बेडकर को लेकर उनका लेखन बहुत बाद में सन् २०००[i] में आया जो स्पटष्तः ९० के दशक के विमर्श [ii]में डॉ आंबेडकर की मज़बूत उपस्थिति की मजबूरी के चलते ही हुआ.

अपनी ७८१ पृष्ठों की किताब ‘गाँधी, आम्बेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं’ में उन्होंने डॉ आंबेडकर को १५४ पन्नें देकर इनके विवेचन करने का प्रयास किया है. हालाँकि अपने इस प्रयास में डॉ. उन्होंने ने गाँधी को ४५६ पृष्ठ समर्पित किये और लोहिया को १२४ पन्ने. इन तीनों विचारकों के लिए अलग-अलग संख्या में पृष्ठ को मोटे तौर पर इनके लिखे मूल ग्रंथों के आधार पर निर्धारित माना जा सकता है. पर डॉ आंबेडकर के विचार-दर्शन के सन्दर्भ में इस किताब को देखे तो पाते हैं कि रामविलास शर्मा अपने इस प्रयास में डॉ आंबेडकर के साथ न्याय नहीं कर पाए. क्योंकि इस किताब में उन्होंने विश्लेषण के लिए डॉ आंबेडकर द्वारा लिखे प्राचीन भारत के इतिहास, अंग्रेजी राज और बौद्ध धर्म पर लेखन के कुछ भागों को ही शामिल किया है पर उन्होंने डॉ आंबेडकर के  द्वारा की गई जाति प्रथा और हिंदू धर्म की मीमांसा और आलोचनाओं से अछूता रख मुख्यधारा के विमर्श से दूर रखा. इन्हें शामिल नहीं किये जाने में सबसे बड़ा कारण क्या है? इसका उत्तर खोजना हालाँकि प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य नहीं है परन्तु आगे के पृष्ठों में किसी न किसी रूप में इस बात का उत्तर मिल सकता है.

डॉ आंबेडकर की जीवन की शुरुआत करते हुए रामविलास शर्मा ने अपने पाठकों खासकर नई पीढ़ी जो भारत के जातिवाद से काफी हद तक अनभिज्ञ है को यह जताने की चेष्टा की कि आंबेडकर काल में जातिवाद को अकारण ही बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है, जबकि उस काल में एक सामान्य प्रथा थी. अपनी इस बात को आधार देने के लिए शर्मा कहते हैं:

‘सुना है कि महाराष्ट्र के ब्राह्मण गायकवाडों को शूद्र वर्ण गिनते हैं. बडौदा के गायकवाडों का पुराना सामंती घराना है. यदि वे शूद्र वर्ण में थे तो इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि अंग्रेज़ी राज कायम होने से पहले भारत में शूद्र वर्ण के लोग शासक हो सकते थे. यदि वे शूद्र वर्ण में नहीं हैं तो दूसरा निष्कर्ष  यह निकलता है कि उच्च वर्ण में जन्मे एक प्रगतिशील सामंत ने शूद्र वर्ण में जन्म लेने वाले नवयुवक की शिक्षा के लिए धन व्यय किया. दोनों ही स्थितियों में जाति प्रथा के बंधन उतने कठोर प्रतीत न् होंगे जितने वे प्रचारित किये जाते हैं.’(शर्मा 2010 : 485)

इस कथन को पढ़कर भारत की ज़मीनी संस्कृति से कटा कोई भी सामान्य व्यक्ति यह आकलन कर सकता है कि उसे किन्ही किताबों में जो वर्ण व्यवस्था और छुआछूत की बाते पढ़ने मिलती हैं, वह यथार्थ नहीं बल्कि हकीकत को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. जबकि अपने इस कथन में डॉ शर्मा द्वारा बड़ौदा के शासक गायकवाड़ और एक अछूत जाति में जन्मे डॉ आंबेडकर को एक ही वर्ग ‘शूद्र’ में रखना सामाजिक सच्चाई का मजाक बनाने के अलावा और क्या है!

क्या शर्मा यह नहीं जानते थे कि शूद्र वर्ण में आज का अन्य पिछडा वर्ग आता है वह बड़ौदा ही नहीं देश के बहुत से भागों में शासन किया करता था.[iii] जबकि दलित वर्ण व्यवस्था में कहीं भी शामिल नहीं हैं और वे शूद्र नहीं बल्कि अवर्ण कहलाते हैं. इस पर भी शर्मा दूसरी बात कहते हैं कि यदि बड़ौदा नरेश शूद्र नहीं सामंत थे तब वे एक शूद्र (दलित) नवयुवक के लिए शिक्षा में किये धन व्यय करना यह सिद्ध करता है कि उस काल में जाति बंधन ढीले थे. इस दूसरे बयान के बदले यदि डॉ शर्मा यह कहते कि उस काल में कठोर जातिवाद के बावज़ूद भी बड़ौदा नरेश का दलित युवक को मदद करना उनकी प्रगतिशीलता का परिचय देता है, तो यह कथन कितना सही होता. पर ऐसा न कहकर इस उदाहरण को जातिवाद में ढील मनवाने की शर्मा की जिद उनके मंतव्य को साफ़ स्पष्ट करती है.

यहाँ एक प्रश्न उठता है कि आखिर ऐसा क्या कारण था कि अपनी किताब में इतिहास का विवेचन करने वाले शर्मा, डॉ आंबेडकर की आत्मकथा ‘वेटिंग फॉर वीसा’ को दरकिनार कर गए जबकि इसमें विदेश से शिक्षा प्राप्त करने के बाद बड़ौदा नरेश के कार्यालय और शहर में डॉ आंबेडकर से हुए अमानवीय व्यवहार का पूरा उल्लेख मौज़ूद है? लेकिन बड़ौदा में हुआ डॉ आम्बेडकर का अपमान रामविलास शर्मा की दृष्टि में शायद एक बेहद साधारण बात थी जिसे डॉ आंबेडकर ने बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया!!

शर्मा अगले भाग में प्राचीन भारत में आर्य-द्रविड़ समस्या पर आते हैं, यहाँ वह डॉ आंबेडकर की १९४८ में प्रकाशित पुस्तक ‘द अनटचेबल्स’ को बिना किसी शक के स्वीकार करते हुए नस्लीय सिद्धांत को ख़ारिज करते हैं पर बात यहीं नहीं रुकती वे आगे के पूरे १२ पृष्ठों में वह एक बार फिर इसी बात को ‘हू वर द शूद्र’ का का उल्लेख करते हुए विस्तार से प्रस्तुत करते हैं. एक आलोचक की हैसियत से शंकाओं और आलोचनाओं को दरकिनार करते शर्मा का डॉ आंबेडकर को शब्दशः मानना ज्यादा अचरज भरा नहीं हैं क्योंकि खुद डॉ शर्मा नस्लीय सिद्धांत के विरोधी हैं.[iv] जाहिर है अपनी मान्यता को इतने तार्किक ढंग से स्पष्ट हुआ देख शर्मा की बांछे खिलना तो स्वाभाविक था.

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के अन्य प्रिय विषय बौद्ध धर्म का भी शर्मा ने विवेचन किया है, पर इसके लिए उन्होंने केवल ‘बुद्धा एंड हिस् धम्मा’ और ‘बुद्धा और मार्क्स’ को ही चुना जबकि डॉ आंबेडकर ने बुद्ध के धम्म पर इनके अलावा भी बहुत कुछ लिखा है, खासतौर पर धर्मान्तरण के पूर्व और पश्चात विभिन्न अवसरों पर दिए गए उनके भाषण जिन पर शर्मा ने बिलकुल ध्यान नहीं दिया और अपने इन अधूरे आंकड़ों के माध्यम से उन्होंने डॉ आंबेडकर के धार्मिक विचारों का जो विश्लेषण किया है, उसमें उन्होंने ब्राह्मणी साज़िश पर चुप्पी साधते हुए बौद्ध धर्म के ह्रास के लिए मुसलमानों के आक्रमण और बौद्ध भिक्षुओं का दक्ष नहीं होना भर प्रस्तुत किया. साथ ही वे अपनी तरफ से लिखते हैं:

‘बौद्ध विहारों में संपत्ति का केंद्रीकरण हुआ. राज्याश्रय प्राप्त होने पर विहारों के पास काफी संपत्ति एकत्र हो गयी थी…ब्राह्मणों और बौद्धों के संघर्ष के पीछे ये संपत्ति के लिए छिपे संघर्ष भी थे.’ (शर्मा 2010: 532)

गौरतलब है कि भारत के इतिहास में यहाँ के राष्ट्रिय धर्म ‘बौद्ध धर्म’ का देश से लुप्त होना एक बहुत महत्वपूर्ण और अनोखी बात है,  मुख्यधारा इतिहासकारों ने इस विषय पर अपने ढंग से लिखते हुए इसके नष्ट होने के पीछे सबसे अधिक दोष स्वयं बौद्ध धर्म पर ही मढ़ा है[v]. जबकि डॉ आंबेडकर ने ‘रिवोलुशन एंड काउंटर रिवोलुशन’ में बौद्ध धर्म के पतन के पीछे ब्राह्मण राजनीति और साज़िश को ही मुख्य रूप से जिम्मेदार सिद्ध किया है. खासतौर पर उन्होंने सम्राट अशोक के अंतिम वंशज वृहद्रथ की उसके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा खुलेआम दिनदहाड़े हत्या को बौद्ध धर्म के अंत का अहम कारण सिद्ध किया है.

पर शर्मा डॉ आंबेडकर द्वारा उपदिष्ट इन तथ्यों को नज़रंदाज़ करते हुए राहुल सांकृत्यायन (जिनकी वे कटु आलोचना किया करते थे)[vi], के विनय पिटक के आधार पर यह कहते हैं कि ‘बुद्ध, दास को भिक्खु बनाये जाने के विरोधी थे.’  बुद्ध की आलोचना को जारी रखते हुए वे आगे  बिना किसी बिना कोई सन्दर्भ दिए और बिना किसी आधार के एक मनगढ़ंत बात कहते हैं :

‘ईसा मसीह से पहले गौतम बुद्ध ने इस सिद्धांत का प्रचार किया था कि अन्याय का प्रतिरोध नहीं करना चाहिए.’ (शर्मा 2010: 543)

जबकि उन्हें गौर करना चाहिए था की इस विषय पर डॉ आम्बेडकर ने अपनी किताब  ‘बुद्ध या मार्क्स’ में बुद्ध और सिंह सेनापति की बातचीत को उद्धृत कर यह साफ़ कर चुके हैं कि बुद्ध अन्याय को सहन करते रहने और दोषियों को दंड दिए जाने के विरोधी कतई नहीं थे. बल्कि न्याय की स्थापना के दोषियों को दण्डित किये जाने के समर्थक थे. स्वय बुद्ध के संघ में किसी भिक्षु द्वारा अपराध किये जाने पर उसके प्रकार के अनुसार दंड का प्रावधान है. हालांकि यह सत्य है कि बुद्ध हिंसा और रक्तपात के खिलाफ थे. जिसे हिंदू धर्म ने खासी मान्यता दी है. आश्चर्य नहीं कि स्वयं शर्मा भी बुद्ध की अहिंसा का विरोध करते हुए भी गीता की वकालत ज़रूर करते नज़र आते हैं:

‘गीता में  कृष्ण का सारा उपदेश इसलिए है कि मनुष्य को कर्म करना चाहिए और युद्ध की विशेष परिस्थिति में अर्जुन को शस्त्र डालने के बदले आगे बढ़कर युद्ध करना चाहिए.’ (शर्मा 2010: 543)

शर्मा जहां  बुद्ध को खारिज करने का प्रयास कर रहे हैं वहीँ वे  ब्राह्मणवादी ग्रंथों और मार्क्स तथा एंगल्स की लेखनी में साम्यता पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ते लेकिन मामला यहीं नहीं रुकता वे जहां कहीं भी बुद्ध के दर्शन में  वैज्ञानिक मान्यता पाते हैं वे इसकी जड़े ऋग्वेद और उपनिषदों में खोजने लगते हैं :

‘बुद्ध ने यूँ तो कुछ वैज्ञानिक कहा ही नहीं और जो कुछ भी विज्ञान सम्मत कहा उसका कारण यह था कि भारत में बुद्ध के पूर्व ही भौतिकवादी दर्शन का विकास हो चुका था, स्वयं बुद्ध ने अनेक ने अनेक भौतिकवादी दार्शनिकों का उल्लेख किया है. धर्मों के लिए आवश्यक था कि वे दर्शनों को हटाकर उनकी जगह प्रतिष्ठित हों. इस प्रक्रिया में उन्हें बहुत सी तर्क की बातें कहनी होती थीं. जो लोग विवेकसम्मत, तर्कसम्मत दर्शन के अभ्यासी थे, वे आसानी से धर्म की बातें मानने वाले नहीं थे. इसलिए भारत के प्रत्येक प्राचीन धर्म में दर्शन का एक अंग है. वह कहीं यथार्थवादी दर्शन है और कहीं यथार्थ विरोधी दर्शन है.’ (शर्मा 2000 :629)

बुद्ध विरोध के इस प्रयास में एक जगह शर्मा कहते है कि बुद्ध के वैज्ञानिक सिद्धांत अनित्यवाद का उल्लेख करते हुए कहते है कि ‘यदि सब कुछ अनित्य है तो ऊर्जा भी स्थायी नहीं हो सकती’ (शर्मा 2000 : 631) पर यहाँ शर्मा यह समझना भूल जाते हैं कि उर्जा वास्तव में स्थायी नहीं होती वह गतिशील और अनित्य ही होती है. पर यह सब गलत साबित कर शर्मा बुद्ध को अवैज्ञानिक कहकर ब्राह्मण धर्म के परमाणु सिद्धांत को विज्ञान सम्मत बताने की चेष्टा करते हैं.

फिर कुछ प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में व्याप्त अंधविश्वास पूर्ण और आडम्बर भरी बातों को लिखकर शर्मा ने इस बात को मुहर लगाने का प्रयास किया  जबकि इस वक़्त चूँकि वे डॉ आंबेडकर की लेखनी का विश्लेषन कर रहे थे इसलिए उन्होंने यहाँ पर  इन अन्धविश्वास और अतिरंजित बातों के पीछे डॉ आंबेडकर  द्वारा प्रस्तुत  [vii] व्याख्या ‘बुद्ध के धम्म में समय के साथ भिक्षुओं द्वारा बहुत सी बाते जोड़ दी गयी …तथा स्वयं बुद्ध के जीवनकाल में ही उनके कथनों की गलत रिपोर्टिंग का उल्लेख किया था.’ डॉ आंबेडकर ने ‘बुद्ध एंड हिस् धम्म’ की प्रस्तावना में ही इन मिलावटों को गंभीर चुनौती मानते हुए बुद्ध के धम्म के अध्ययन के लिए दो छलनी का प्रयोग किया था, पहला कि जो बात तर्क सम्मत न हो वह बुद्ध वचन नहीं, दूसरा कि जो मानवहित में या कल्याणकारी न हो वह बुद्ध वचन नहीं’. ऐसा भी नहीं कि ये पड़ताल डॉ आंबेडकर के दिमाग की ही उपज थी बल्कि बुद्ध द्वारा उपदिष्ट  कालाम सुत्त भी ठीक इन्ही बातों की पुष्टि करता है. पर तमाम वैज्ञानिक और तार्किकता को नकारते हुए डॉ शर्मा का बुद्ध को ख़ारिज करने का कारण क्या रहा होगा इसे समझना कतई कठिन नहीं. यह आश्चर्य की बात है कि एक महान साहित्यकार होने के बावजूद भी बौद्ध ग्रन्थ महापरिन्ब्बाण सुत्त में लिखी बात ‘बुद्ध के महापरिनिर्वाण के समय भूचाल हुआ..’ (शर्मा 2000: 630) जैसी अलंकारिक भाषा का वास्तविक अर्थ भी वह नहीं समझ सके.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  आगे शोषण की समस्या पर  वे कहते है:

‘आंबेडकर ने अंग्रेज़ी राज में जमींदारों की भूमिका के बारे लगभग कुछ नहीं लिखा है. गांवों में ज़मींदार, महाजन, पुरोहित यही मालिक थे. अंग्रेज़ी राज की कानूनी छत्रछाया में यही गरीब किसानों और खेत मजदूरों का शोषण करते थे. सारा ध्यान धर्म पर केंद्रित करने से जनता के ये वास्तविक शत्रु बच जाते हैं.’ (शर्मा 2000: 632)

पर यहाँ भी शर्मा भूल करते हैं कि भारत में शोषण का सबसे बड़ा आधार जाति रहा है जो श्रम का विभाजन का मूर्तरूप था और जाति का एकमात्र आधार ब्राह्मणवाद यानि हिंदू धर्म ही रहा है. फिर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि डॉ आम्बेडकर द्वारा चवदार तालाब सत्याग्रह, गोलमेज सम्मेलनों सहित तमाम राजनीतिक हकों का संघर्ष क्या कोई धर्म केंदित लड़ाई थी?

ऐसा भी नहीं शर्मा जब यह सब कह रहे थे तो वह खुद वास्तव में धर्म विरोधी थे, बल्कि सच्चाई तो यह है कि इनका विरोध सिर्फ बौद्ध धर्म से भर था और उन्होंने हिंदू धर्म की महानता बखान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. अपने इस प्रयास को स्थापित करने के लिए वह मार्क्स के कथन ‘धर्म जनता की अफीम है …का पूरा विवरण देते हुए समाज में धर्म का महत्व स्थापित करते है. इसके माध्यम से वह समाज में ब्राह्मण धर्म का महिमामंडन करने का ही प्रयास कर रहे थे. यह अकारण भी नहीं था क्योंकि खुद को नास्तिक घोषित करने वाले शर्मा वास्तविकता में घोर ब्राह्मण धर्म प्रेमी थे इसलिए वह बौद्ध धर्म का विरोध कर रहे थे वहीँ हिंदू धर्म का महिमा मंडन करने में कोई कसर नहीं छोडते थे. उनकी एक अन्य किताब  ‘मेरे साक्षात्कार’ [viii]में उन्होंने  जहाँ उन्होंने रामायण, महाभारत और अन्य पृष्ठों में ऋग्वेद का गुणगान किया है.

वैसे जब शर्मा ने यह देखा कि उनके लिए हिंदू धर्म की आलोचनाओं का जवाब देना संभव नहीं था तो उन्होंने बौद्ध धर्म को निशाना बेहतर समझा यह अकारण नहीं है कि अपने इस विवेचन में उन्होंने डॉ आंबेडकर द्वारा लिखी गयी हिंदू धर्म की आलोचनात्मक समीक्षा ‘रिडल्स इन हिन्दुइस्म’ या वोल्यूम ३ में उपलब्ध ‘कृष्ण एंड हिस् गीता’ जैसे ग्रंथों को हाथ तक नहीं लगाने की जहमत नहीं उठायी.

हालांकि उन्होंने एक जगह स्थापित हिंदू मूल्यों से अलग (पृ ६३५) हिंदुओं द्वारा गाय में मांस को खाने की बात हलके ढंग से स्वीकारी. पर वह यहाँ वह अपनी मनगढ़ंत टिप्पणी करने से नहीं चुके कि गाय के मांस का भक्षण केवल कुछेक  पुरोहितों द्वारा ही होता था और सामान्यतः लोग इसे नापसंद करते थे. फिर डॉ आंबेडकर के तर्क कि ब्राह्मणों ने बौद्धों से मुकाबला करने के लिए शाकाहार अपनाया को इस आधार पर खारिज किया कि जब बौद्ध स्वयं मांसाहारी थे तब ब्राह्मणों ने शाकाहार क्यों अपनाया. पर अपने इस अधूरे विवेचन में शर्मा यह भूल गए कि बौद्ध मांसाहारी ज़रूर थे पर ब्राह्मणों द्वारा बड़े संख्या में गाय-बैलों की बलि से कृषि कार्य प्रभावित होता देख बुद्ध ने गाय के लिए ‘अन्नदा, वन्नदा, सुखदा’[ix] कहा था. और जैसा डॉ आंबेडकर[x] कहते है कि ब्राह्मणों ने वर्चस्व दिखाने के लिए बौद्धों से एक कदम आगे बढ़ न सिर्फ गाय मांस खाना ही बंद किया बल्कि इस पशु को माता कहकर पूर्ण शाकाहार अपना लिया.

शर्मा रविदास और कबीर का उल्लेख करते हुए इन्हें वेदांत से प्रेरित बताते हैं जबकि सच्चाई यह है कि कबीर के बहुत से क्रांतिकारी दोहे बुद्ध के उपदेशों का सरल रूपांतरण हैं. पर शर्मा ने अपने इस कथन को आगे बढ़ाकर बताना चाहिए था कि आखिर वेदांत भला किससे प्रभावित था? पर क्या यह सच्च्चाई नहीं कि समूचा वेदान्त और उपनिषद बुद्ध से ही प्रेरित हैं.

बौद्ध धर्म को अर्थहीन समझते हुए, हुए डॉ आम्बेडकर द्वारा हिंदू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाने कि पीछे के वास्तविक कारणों को दरकिनार करते हुए शर्मा ऐतिहासिक तथ्यों को आगे-पीछे सोच कर बड़ा अजीबोगरीब तर्क देते हुए कहते है:

‘डॉ आम्बेडकर का धर्म-सम्बन्धी विवेचन उनकी राजनीति से जुड़ा था. मुसलमानों की तरह अछूतों को भी अल्पसंख्यक मानकर अंग्रेजों को उन्हें विशेष सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये, यह लक्ष्य था. मुसलमानों की तरह अछूतों को भी अल्पसंख्यक मान कर अंग्रेजों को उन्हें विशेष सुरक्षा प्रदान करनी चाहिये, यह लक्ष्य था. मुसलमान हिंदुओं से अलग थे. इसी तरह अछूतों को भी को भी अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में मान्यता दिलाने के लिए उन्हें हिंदुओं से अलग करना आवश्यक था. निरक्षर जनता को एक विशेष समुदाय के रूप में बांध रखने के लिए धर्म आवश्यक था, इसके लिए उन्होंने बौद्ध धर्म को चुना.’ (शर्मा 2000 :६२१)

पर अपने इस निष्कर्ष में शर्मा एक हास्यास्पद भूल यह कर बैठे है कि उन्होंने यह ध्यान नहीं रखा कि डॉ आम्बेडकर ने अछूतों को अल्पसंख्यक बनाने के लिए अपना धर्मांतरण ब्रिटिश राज में नहीं किया था बल्कि वह वर्ष १९५६[xi] में किया. जिससे पहले  देश ना सिर्फ आज़ाद हो गया था बल्कि उसके संविधान में दलित-आदिवासी वर्ग की सुरक्षा और आरक्षण के प्रावधान भी निर्धारित हो चुके थे. शर्मा जब आधुनिक शासन व्यवस्था में लगातार बौद्ध धर्म को अर्थहीन बता रहे थे क्या तब उन्हें डॉ आंबेडकर की भारत के लोकतंत्र की स्थापना पर उद्बोधन को याद नहीं रखना चाहिये था[†]:

‘26 जनवरी 1950  को हम ऐसे विरोधाभास में प्रवेश कर रहे हैं. राजनीति में हम समता मिलेगी पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमें विषमता मिलेगी. राजनीति में हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को अपनाएंगे लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता पायेंगे क्योंकि वहाँ हमारी सामाजिक संरचना के अनुरूप हम एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को खारिज करते हैं.’ (आंबेडकर १९९०: 1213-1218)

जाहिर है कि सामाजिक लोकतंत्र में सबसे बड़ी बाधा हिंदू धर्म ही है जिसने जात-पांत, उंच-नीच, छुआछूत जैसी मान्यताओं को प्रचारित और स्थापित किया है. इसलिए डॉ आंबेडकर का अपने अनुयायियों और समस्त भारतीयों से परम्परावादी धर्म को छोड़ कर नए धर्म को स्वीकारने की अपील लोकतंत्र को सामाजिक रूप से  स्थापित करने का जरिया थी. पर आश्चर्य कि शर्मा इस साधारण किन्तु अतिमहत्वपूर्ण बात को यूँ ही नज़रंदाज़ कर गए.

वहीँ जातिप्रथा के बारे में बात करते हुए शर्मा कहते हैं:

‘जाति प्रथा भारत में पहले भी थी और अंग्रेजी राज कायम होने पर भी थी. उसके बंधन जितने कठोर अंग्रेजी राज में थे, उतने पहले कभी नहीं थे. अंग्रेजी राज का सामजिक आधार सामंतवाद था. जातिप्रथा सामंतवाद की देन थी. जैसे अंग्रेजों ने पुराने ज़मींदारों के साथ के साथ नए ज़मींदार बनाए, किसानों के शोषण के नए-नए तरीके अपनाए, वैसे ही उन्होंने जाति-बिरादरी के भेदभाव को बढ़ावा दिया. हिंदू और मुसलमान के भेद की तरह उन्होंने द्विज और शूद्र के भेद से भी राजनीतिक लाभ उठाने के प्रयास किये. सामंतवाद के ह्रास के काल में जातिप्रथा के बंधन पहले से अधिक कठोर हुए. परन्तु अंग्रेजी राज में कठोरता के वे सारे प्रतिमान पीछे छोड़ दिए गए.’  (शर्मा 2000: 544)

लेकिन अपने इस तर्क के द्वारा भारत की तमाम सामाजिक बुराइयों की जड़े अंग्रेजी राज में ढूढना सच कहा जाए तो, कहीं न कहीं हिंदू संस्कृति को बेदाग़ बताना ही है. जातिप्रथा को अंग्रेजी राज में कठोर होता बताने वाले डॉ शर्मा को इस बात पर ज़रूर गौर करना चाहिये कि अंग्रेजों के आगमन से बहुत पहले ही जाति को स्थापित करने और इसका विरोध करने वालों को दण्डित करने का प्रावधान ऋग्वेद का पुरुषसूक्त, मनुस्मृति, गीता, गौतम स्मृति, रामचरित मानस सहित तमाम हिंदू धर्म ग्रन्थ में हो चुका था. जबकि अंग्रेजी राज में तो न्याय के लिए आधुनिक क़ानून और कोर्ट का प्रचलन शुरू हुआ. साथ ही यह भी एकदम स्पष्ट है कि अंग्रेजी राज में ही स्त्रियों, दलितों और श्रमिकों के हित में प्रावधान बनना शुरू हुए जो इससे पहले के हिंदू राज में कभी अस्तित्व में ही नहीं थे.लेकिन सच्चाई से आँखे मूंदे शर्मा आगे कहते हैं:

‘अंग्रेजों ने अपनी फ़ौज और पुलिस के दरवाजे अछूतों के लिये बंद कर दिए थे. वे महाराष्ट्र में सामूहिक दासता की प्रथा वतनदारी, विरोध के बावजूद बनाये हुए थे. अछूतों को मैला ढोना होगा, मरे ढोरों की खाले निकालनी होंगी, ऐसे क़ानून उन्होंने बने. इस सबके बाद जैसे ही देश में स्वराज की मांग बढ़ी अंग्रेज अछूतों के खास संरक्षक के रूप में अपने को पेश करने लगे.’ (शर्मा 2000: ५५२)

यहाँ शर्मा ने यह नहीं बताया की भारत में अंग्रेजी राज के पहले क्या अछूत मैला ढोने, खाल उतारने जैसे काम के लिए विवश नहीं थे, और क्या उस समय उनके लिए सेना और पुलिस के दरवाजे खुले थे? सच्चाई यह है कि अंग्रेजो ने अछूतों के लिए फ़ौज के द्वार खोले थे पर जब उनका हिंदुवादियों से रिश्ता बढ़ा तब उन्होंने इनके दबाव में ही अछूतों का फ़ौज और पुलिस में प्रवेश बंद किया. शर्मा जब वतन्दारी और सामूहिक दासता प्रथा के विरोध की बात कर रहे थे तब उन्हें यह बताना चाहिये था कि वास्तव में इन सबका विरोध कौन कर रहा था? लेकिन इस सामान्य सवाल को टालते हुए शर्मा कहते है:

हिंदू समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो जातिप्रथा से ऊबे हुए थे, जो शूद्रों की दशा में परिवर्तन करना चाहते थे. गांधी समेत ऐसे लोग कांग्रेस में भी थे. उनके सहयोग से आम्बेडकर कुछ कर सकते थे.’ (शर्मा 2000: 555)

पर यहाँ शर्मा इस बात को भूल गए कि डॉ आम्बेडकर के आंदोलनों में उन्होंने कभी भी सवर्ण हिंदू जाति में पैदा हुए प्रगतिवादियों के साथ को ठुकराया नहीं, महाड सत्याग्रह के समय जब शुद्रो के नेता जावडेकर और जेथे ने डॉ आंबेडकर इस उनके आंदोलन से ब्राह्मणों को दूर रखने के बदले में अपनी मदद की पेशकश की तब डॉ आंबेडकर ने इस पेशकश तो ठुकराते हुए एकदम साफ़ शब्दों में कहा था कि ‘मेरी लड़ाई ब्राह्मणवाद से है ब्राह्मण से नहीं’ उनके आंदोलनों यहाँ तक कि धर्मांतरण में भी ब्राह्मण तथा अन्य जाति के व्यक्ति शामिल थे. रही बात कांग्रेस और गांधी की मदद लेने की तो इस बारे में डॉ आंबेडकर अपनी किताब ‘वाट कांग्रेस एंड गांधी हेड डन टू अनटचेबल्स’ में स्पष्ट कर ही चुके हैं. शर्मा का पूरा प्रयास रहा है कि वह भारत में व्याप्त जातिवाद को नकारते हुए इसे अन्य देशो में व्याप्त वर्ग शोषण से जोड़ कर प्रस्तुत करे. पर शर्मा जब प्रगतिवाद, मजदूर क्रान्ति और साम्यवाद की बाते करते हैं तब वे   डॉ आंबेडकर के राज्य समाजवाद पर आँख मूँद लेते है. जाने वह क्या कारण है कि उन्हें सामुहिक कृषि[xii] जैसी क्रांतिकारी योजनाये भी नहीं दिखाई दी!

अतः निष्कर्ष के रूप में देखा जाए तो डॉ रामविलास शर्मा अपनी लेखनी में, डॉ आंबेडकर के विवेचन को सही रूप में प्रस्तुत करने में असफल रहे  हैं।

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रत्नेश कातुलकर , दिल्ली के इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट (ISI ) के दलित स्टडीज विभाग में कार्यरत हैं


 

[†] आम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस वोल 13, पृ.1213-1218

 

[i]रामविलास शर्मा ने अपनी सन २००० में प्रकाशित ‘गाँधी, आम्बेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास  की समस्याएँ’ में पहली बार डॉ आंबेडकर की लेखनी का वर्णन और विश्लेषण किया।

[ii] ९० के दशक के पूर्व मुख्यधारा में डॉ आंबेडकर को कोई स्थान नहीं मिला करता था।

[iii] प्राचीन काल से लेकर अंग्रेजो के आगमन तक भारत में बहुत जगह अन्य पिछड़े वर्ग राज सत्ता में रहा है उदाहरण के लिए यादव मध्यकाल तक कुछ दक्षिणी प्रान्तों में तक राज करते थे तथा ब्रिटिश काल तक उत्तर भारत के बहुत से इलाकों में जाट सत्ता थी.

[iv] देखे ‘इतिहास दर्शन’, डॉ रामविलास शर्मा २००७, वाणी प्रकाशन

[v]  उदाहरण के लिए देखे आर एस शर्मा की प्राचीन भारत

[vi] इतिहास दर्शन, डॉ रामविलास शर्मा २००७, वाणी प्रकाशन

[vii] देखे डॉ आंबेडकर द्वारा लिखी बुद्धा एंड हिज धम्म

[viii]   पृ ३०२-३०८, साथ ही इतिहास दर्शन

[ix] देखे सुत्तनिपात

[x] राइटिंग्स  एंड स्पीचेस ऑफ़ डॉ आंबेडकर वोल ७ ‘ द अनटचेबल्स’

[xi] 6 दिसंबर 1956 को डॉ. आम्बेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्मग्रहण किया था

[xii] देखे डॉ आम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस वोल.1

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