मनीषा मशाल

दलित महिलाओं की आवाज को किसी भी कीमत पर उठाने के लिए कटिबद्ध हूँ. क्योंकि यदि हम इन स्वरों को बाहर नहीं आने देंगे, तो हम इस दुःख को समाप्त करने के उपाय नहीं खोज सकते.

क्या यह बहुत कठिन होगा? हाँ. मुझें अनेकों चुनौतियों, जोखिमों और धमकियों का सामना भी करना होगा. परन्तु मुझे किसी का भी भय नहीं है. मैं एक भयपूर्ण और दुर्बल जीवन जीना नहीं चाहती और अपनी मुक्ति के लिए मैं अपने उत्पीड़कों पर निर्भर नहीं होना चाहती, मैं आत्मनिर्भर होना चाहती हूँ और मुझे एक आन्दोलन की आवश्यकता है किसी वार्षिक रिपोर्ट की  नहीं।

अब चाहे कुछ भी हो, हमे परिवर्तन लाना ही होगा। हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. मैं अब जाति-आधारित यौन-हिंसा का अंत चाहती हूँ और यह सुनिश्चित करना चाहती हूँ की किसी और दलित बहन के जीवन को इस अंधकार में न झोंका जाये. क्योंकि केवल इस प्रकार के अपराध ही हमें पीड़ित नहीं बनाते अपितु समाज का ढांचा हमारी छवि को इस प्रकार से गढ़ता है कि दलित महिलाओं को किसी भी क्षेत्र में अपने भाग्य निर्माण के लिए संघर्ष करने के लिए स्वयं अग्रणी रूप में खड़ा होना ही पड़ता है.

हमारे परिवर्तन के दृष्टिकोण को जातिवाद सीमित कर देता. यह हमे उस समय मूक बना देता है, जब हम आवाज उठा सकते हैं. क्योंकि यह हमें तब अपने उस सामर्थ्य के प्रति संशकित कर देता है जो हमें यथास्तिथि बनाये रखने के विपरीत परिवर्तन करा सकता है. क्योंकि समाज उस दलित महिला को मान्यता नहीं देगा जो न्याय के लिए संघर्ष करती है. हम बहुत अधिक भयंकर हैं.

इसी लिए मैं प्रश्न करती हूँ की एक दलित महिला का समाज में क्या स्थान है? समाज ने हमारे पंख क्यों काटे हैं? दलित महिलाओं के संघर्ष और दलित स्वाभिमान यात्रा के एक संस्थापक और अग्रिणी होने के कारण मैं अपनी मुक्ति केही एक अंग के रूप मैं इन प्रश्नों को उठाती हूँ.

एक वाल्मीकि महिला के रूप में जब मैं अपने जीवन पर दृष्टिपात करती हूँ, तो उसमे कुछ स्थानों पर मैं अपने आप को पाती हूँ. भले ही मैंने शिक्षा प्राप्त की है, यात्रायें की है, और नेतृत्व की स्तिथि में हूँ, फिर भी मेरे प्रति भेदभाव किया जाता है, मेरे महत्व को कम आँका जाता है और मुझे स्वर्ण जाति के लोगों और उन अन्य दलित लोगों द्वारा एक और ठेल दिया जाता है जो अपने से नीची जाति के सदस्यों की अंग्रेजी और जातिवादी सुविधाओं की ओर ध्यान नहीं देते हैं. यदि मैं इस प्रकार से संघर्ष करती हूँ तो आप कल्पना कीजिये कि अन्य ग्रामीण दलित महिलाएं किस संघर्ष से गुजरती हैं?

हमारी व्यवस्था और वर्तमान प्रवाह उत्तरजीवी लोगों को कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता है. मैं एक ऐसे केंद्र का स्वप्न देखती हूँ जिस में हिंसा का कोई स्थान न हो, जो सुरक्षा प्रदान करता हो, जो हमारी महिलाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता हो…मेरा स्वप्न अपनी बहनों को एक नवीन संसार प्रदान करने का है जो सुरक्षा से भरपूर हो.

भले ही हमारी बालिकाएं सशक्त हैं परन्तु उनके पास सुरक्षित स्थान नहीं है. मैं यह जानना चाहती हूँ कि क्या बचे हुए लोगों के लिए सरकार की कोई ऐसी योजनायें या नीतियाँ हैं? यदि हाँ, तो वे कौन से लोग हैं? उन तक इन योजनाओं को कौन पहुंचाता है? क्या यह कोई गैर सरकारी संस्था (NGO) है? या कोई सरकारी एजेंसी है?

मैं इन सभी उत्तरजीवी लोगों को नेतृत्व की स्तिथि में देखना चाहती हूँ.

मेरा विश्वास है, जो लोग इन अत्याचारों के विरुद्ध खड़े हुए हैं…वही वास्तिवक नेता हैं.

हमारे  आन्दोलन के सफल न होने का कारण है कि मूल स्तर पर कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं का अनुभव इस आन्दोलन को सही रूप में नहीं चला पा रहा है. जब कभी मूल स्तर पर दलित  महिलाओं के नेतृत्व की आवाज उठती है, एक पूरी व्यवस्था उसे दबाने पर लग जाती है. क्योंकि हम उपयुक्त रूप से शिक्षित नहीं हैं, हम अंग्रेजी नहीं बोल सकते, हम दिल्ली में नहीं रहते हैं. इसके स्थान पर राष्ट्रीय स्तर पर उठने वाली आवाजें उन लोगों की हैं जो सरकार के हित में कार्य करते हैं या गैर सरकारी संस्थाओं के अंग्रेजी भाषाई नेता हैं. ये वे आवाजें हैं, जिन्हें राजनेता प्रधानता देते हैं और उन्हें वरीयता देने के चक्कर में हम अस्तित्वहीन जातियों को सशक्त करने के स्थान पर सुविधावन लोगों के हाथों में शक्ति दे देते हैं.

ऐसी गैर-सरकारी संस्थाओं के केन्द्रीय कार्यालयों में कार्यरत लोगों के रवैये से तंग आ चुकी हूँ. यद्यपि हम ही वे लोग हैं जो मूल स्तर पर कार्य करने का जोखिम उठाते हैं, परन्तु कुछ अन्य लोग जो धन प्रदान करने वालों को और उच्च जाती के सरकारी अफसरों को अधिक स्वीकार्य हैं, वे सशक्त बन जाते हैं.

मूल स्तर पर कार्य करने वाली दलित महिलाएं तो इस समस्या से जूझती ही हैं, बहन मायावती, जो एक बड़ी नेता हैं और राजनेता भी हैं, उसे भी जातिवादी लोगों का दंश झेलना पड़ता है. लोगों ने उसे भी संसद में अपमानित और नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. जिस प्रकार से उसे सार्वजनिक रूप से उसकी वैश्या से तुलना कर के उसे अपमानित किया गया था, क्या उसी प्रकार से वे किसी दबंग समुदाय के बारे में कर सकते हैं?

हमारा संघर्ष केवल किसी गांव या किसी नगर, किसी जिले या किसी राज्य तक सीमित नहीं है…अपितु यह सम्पूर्ण देश की दलित महिलाओं का संघर्ष है. हमे दासता की बेड़ियों को तोडना ही होगा और उसके लिए हमे राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व में चलाये जाने वाले एक सशक्त आन्दोलन की आवश्यकता है.

वर्तमान परिस्तिथियों में मुझे ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है.

मूल स्तर पर दलित महिलाओं के नेतृत्व के बिना हमारा आन्दोलन निर्बल है क्योंकि हम उन कथाओं को और उस नेतृत्व को खोते जा रहे हैं जो इस बदलाव के शीर्ष पर हो सकते हैं. एक चिकित्सक किसी रोग का उपचार कैसे कर सकता है, यदि उसे इसके उपचार की औषधि का पता ही नहीं है. केवल वही लोग जिन्होंने समस्या को स्वयं जिया है, वही लोग इसका नेतृत्व कर सकते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ भी केवल खानापूर्ति है और समस्या ज्यों की त्यों रहेगी.

इसके परिणाम स्वरूप मूल स्तर पर हमारे पास दलित महिलाओं का नेतृत्व है ही नहीं.

इसके पीछे कई कारण हैं. जब महिलाएं अपने इन दुःख और दर्द से भरे अनुभवों से, कष्टप्रद स्तिथियों से बच निकलती हैं और इन आंदोलनों में अपनी भागीदारी के लिए आगे आती हैं, तो उन्हें उसके लिए उपयुक्त स्थान और भूमिका नहीं मिलती है. केवल उनके साक्ष्यों का उपयोग किया जाता है और वे महिलाएं और उनका परिवार उस कष्ट झेलता ही रहता है. हमें यह भी भलीभांति विदित है कि हम सरकार से कोई अपेक्षा नहीं कर सकते.

मैं यहाँ यह कहना चाहती हूँ, दलित महिला के दुःख के स्तर और जो व्यापक संघर्ष वह कर रही है, उसे कोई गैर-सरकारी संस्था या निजी संस्था आगे नहीं ले जा सकती. इस संघर्ष को अब एक व्यापक राजनैतिक स्तर पर ले जाना होगा.

क्या हम ऐसी सरकार से कोई आशा रख सकते हैं जो मेरे जैसी एक दलित महिला को सदैव एक पीड़ित, अशिक्षित और बलात्कार पीडिता के रूप में ही देखते हैं.

भारतीय आँखों में, मेरे लिए केवल एक ही विकल्प है: मर जाना. एक दलित महिला इसी प्रकार की एक प्रयोज्य है.

इस प्रकार की सुलभता उन स्थानों पर भी देखी जा सकती है, जहाँ मेरे जैसे लोग परिवर्तन लाने की और प्रत्येक के लिए एक नया संसार निर्मित करने की आशा में बैठे हैं.

दलित महिलाओं और दलित परिवारों को एक सशक्त और प्रत्यक्ष आन्दोलन की आवश्यकता है. इसीलिए मैं हरियाणा कार्यालय छोड़ रही हूँ और दलित महिला के अधिकारों का एक ऐसा आन्दोलन प्रारम्भ कर रही हूँ, जो गैर-सरकारी संस्थाओं के प्रतिमान से आगे जाता है. अपने संघर्ष को आगे ले जाने के लिए हमें नई रणनीतियों की आवश्यकता है. यदि हम केवल सरकार से वार्ता कर रहे हैं या सौदेबाजी कर रहे हैं तो न्याय की लड़ाई नहीं लड़ सकते और जाति आधारित यौन हिंसा का कोई अंत नहीं होगा.

दलित महिलाओं की आवाज को किसी भी कीमत पर उठाने के लिए कटिबद्ध हूँ. क्योंकि यदि हम इन स्वरों को बाहर नहीं आने देंगे, तो हम इस दुःख को समाप्त करने के उपाय नहीं खोज सकते.

क्या यह बहुत कठिन होगा? हाँ. मुझें अनेकों चुनौतियों, जोखिमों और धमकियों का सामना भी करना होगा. परन्तु मुझे किसी का भी भय नहीं है. मैं एक भयपूर्ण और दुर्बल जीवन जीना नहीं चाहती और अपनी मुक्ति के लिए मैं अपने उत्पीड़कों पर निर्भर नहीं होना चाहती, मैं आत्मनिर्भर होना चाहती हूँ और मुझे एक आन्दोलन की आवश्यकता है किसी वार्षिक रिपोर्ट की  नहीं।

दलित महिलाओं को अब पहले से कहीं अधिक लड़ना पड़ेगा और वह लड़ेगी. और इस कटिबद्धता में मैं यह जोडती हूँ कि किसी भी कीमत पर:

मैं एक पीडिता की मौत नहीं मरना चाहती, मैं एक नेता के रूप में जीना चाहती हूँ और आप सब को आवाहन करती हूँ कि मेरा साथ आयें।

जय भीम – और दलित महिला संघर्ष.

 

मनीषा मशाल  एक तेज-तर्रार महिला संगठक ,चिंतक वक्ता और आंदोलन गायक हैं । वह इस समय हरयाणा में  स्वाभीमान  समाज  की संस्थापक हैं । उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से महिला अध्ययन में मास्टर डिग्री की है ।

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