Sanjay Jothe1

 

संजय जोठे (Sanjay Jothe)

Sanjay Jothe1“…. यहाँ जिन लोगों को ब्रह्मपुरुष के मस्तिष्क ने जन्म दिया उनका मस्तिष्क कोइ काम नहीं करता, भुजाओं से जन्मे लोगों की भुजाओं में लकवा लगा है, उन्होंने हजारों साल की गुलामी भोगी है, पेट से जन्मे वणिकों ने अपना पेट भरते भरते पूरे भारत के पेट पे ही लात मार दी और गरीबी का विश्वरिकार्ड बना डाला, पैरों से जन्मे शूद्रों के पैर एकदम पत्थर से बाँध दिए गए वे अपनी जगह से हिल भी नहीं सकते. ये भारतीय संस्कृति का ‘शीर्षासन माडल’ है….”

आज विश्व शौचालय दिवस है. संयुक्त राष्ट्र संघ ने आधुनिक समय की नैतिकता को मूल्य देते हुए विश्व में सभी इंसानों को साफ़ स्वच्छ और ‘फंक्शनल’ शौचालय देने की बात को महत्व दिया है. एक आकलन के अनुसार विश्व की ढाई अरब से अधिक आबादी को शौच और स्वच्छता संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. इस वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा पुण्यभूमि भारत की आबादी का है. जिस भूमि पर शौचालय न हों वह पुण्यभूमि होने का गर्व कर सकती है, ये भारत की नैतिकता का एक छोटा सा उदाहरण है.

शौचालय दिवस के बहाने भारत के सभ्यता बोध और नैतिकता बोध को ठीक से टटोला जा सकता है. शौचालयों का न होना, होने पर भी इस्तेमाल न होना और शौचालय बनाने वालों से लेकर शौचालय की सफाई करने वालों को अमानवीय यातनाएं और तिरुस्कृत जीवन के लिए बाध्य करना – ये बिंदु भारतीय समाज और सभ्यता मूल के चरित्र को दर्शाते हैं. हालाँकि दुनिया के अन्य देशों में भी सफाई कर्मियों को अस्वच्छ और असभ्य माना गया है लेकिन उन्हें एक खांचे या वर्ग या जाति के एयर टाईट कम्पार्टमेंट में बाधे रखकर अभिशप्त नहीं किया गया है. 

मेगसेसे पुरस्कार प्राप्त महान समाजसुधारक बेजवाडा विल्सन ने एक बढ़िया बात कही है, भारत में जो लोग गन्दगी मिटाते हैं वे नीच माने जाते हैं और जो लोग गन्दगी फैलाते हैं वे महान माने जाते हैं . असल में ये वक्तव्य भारत की नैतिकता को एकदम से उसके नग्नतम रूप में उजागर करता है. भारत की नैतिकता और सभ्यता असल में सर के बल खड़ी है. भारतीय लोग किसी तरह का योगासन करते हों या न करते हों इतना तय है कि भारत की सभ्यता और नैतिकता हमेशा से शीर्षासन में खड़ी है. यहाँ जिन लोगों को ब्रह्मपुरुष के मस्तिष्क ने जन्म दिया उनका मस्तिष्क कोइ काम नहीं करता, भुजाओं से जन्मे लोगों की भुजाओं में लकवा लगा है, उन्होंने हजारों साल की गुलामी भोगी, पेट से जन्मे वणिकों ने अपना पेट भरते भरते पूरे भारत के पेट पे लात मार दी और गरीबी का विश्वरिकार्ड बना डाला, पैरों से जन्मे शूद्रों के पैर एकदम पत्थर से बाँध दिए गए वे अपनी जगह से हिल भी नहीं सकते. ये भारतीय संस्कृति का ‘शीर्षासन माडल’ है.

भारतीय संस्कृति के इस ‘शीर्षासन माडल’ को ठीक से समझिये. जाति व्यवस्था का दंश सीधे सीधे समझना मुश्किल है इसे स्वच्छता के मुद्दे से या ग्रामीण या शहरी जीवन की आवश्यकताओं के नजरिये से आसानी से समझा जा सकता है. असल में जाति या वर्ण कोई मूलभूत समस्याएं नहीं हैं ये किन्ही दुसरी समस्या का परिणाम है इसीलिए जाति या वर्ण को सीधे सीधे नहीं मिटाया जा सकता.

भारत में विभिन्न जातियों को श्रमिक समूहों के रूप में देखिये. आजकल नजर आने वाली हर जाति का एक विशेष काम रहा है. उस काम विशेष से वह ग्राम या नगर की गतिशील अर्थव्यवस्था में अपना विशिष्ठ योगदान देती आई है. कुम्हार मिटटी के बर्तन बनाता है और समाज को जीवन जीने की सुविधा बनाता है, चमार चमड़े के सामान बनाकर जीवन को अलग ढंग से सुविधा देता है, सुतार या कारपेंटर लकड़ी के सामान बनाकर एक अन्य दिशा से जीवन को समृद्ध कर रहा है, जुलाहा सबके लिए कपडे बना रहा है, एक चंडाल या डोम सफाई करके इन सबको और पूरे नगर या गाँव को बिमारियों और प्रदुषण से बचा रहा है. किसान सबके लिए अन्न उपजा रहा है, ग्वाला या अहीर पशुधन को सहेजकर सबके लिए दूध घी बना रहा है. अब ऐसी सैकड़ों जातियां हैं जो श्रम का विशिष्ठ प्रकार अपनाए हुए गाँव की अर्थव्यवस्था और जमीन पर वास्तविक जिंदगी को सहारा दे रहे हैं.

ये इन जातियों या श्रम आधारित समूहों का रचनात्मक योगदान है जिससे जीवन और सभ्यता आगे बढती है.  

लेकिन मजेदार बात ये कि इतना महत्वपूर्ण काम करने वालों को एकदम अछूत और दीन हीन बनाकर रखा गया है. और जो जातियां कोई सार्थक योगदान नहीं करतीं वे स्वयं को सबसे ऊपर बनाये रखती आयी हैं. एक ब्राह्मण का या पुरोहित का समाज और सभ्यता की जमीनी यात्रा में क्या योगदान है? वो क्या पैदा करता है? एक क्षत्रिय समाज को क्या दे रहा है ? वो क्या पैदा करता है? एक वैश्य कम से कम जीवन उपयोगी उत्पादों को ट्रांसपोर्ट करके कुछ हद तक उत्पादन की प्रक्रिया को आगे बधा रहा है, इसीलिये उसे भी बहुत अर्थों में नीच ही माना गया है.

आप कल्पना कीजिये ये कैसी संस्कृति और सभ्यता है. जीवन और समाज के लिए उत्पादन की प्रक्रिया में सबसे ज्यादा रचनात्मक योगदान देने वाले लोग नीच हैं और किसी तरह का सार्थक उत्पादन न करने वाले लोग महान हैं. वे सिर्फ दूसरों का उत्पादन खा खाकर गन्दगी फैलाते हैं. उस गन्दगी को साफ़ करके उन्हें दुबारा जीवन देने वाले श्रमिकों को ये ही तथाकथित महान लोग फिर से दुत्कारते हैं और उन्हें अंतिम दर्जे का अछूत बना डालते हैं. ये कैसी नैतिकता है? ये कैसा न्याय है?

श्रमशील जातियों या समूहों के श्रम और उत्पादन पर ही ये समाज टिका हुआ है. उनमे आपस में कोई रचनात्मक सहयोग और एकीकरण न होने लगे इसलिए अलग अलग जातियों के खांचों का निर्माण करके उन्हें अंतरजातीय विवाह के लिए मजबूर किया गया ताकि उनकी एकता हर पीढ़ी में टूटकर बिखरती रहे. ये न केवल समाज को विभाजित बनाये रखने का षड्यंत्र है बल्कि श्रम के विभिन्न रूपों और उत्पादन के तरीकों में आपसी संश्लेषण और सुधार की प्रक्रिया को भी रोक देने का षड्यंत्र है. इसीलिये भारत के श्रमिक बेहतर तकनीक और विज्ञान पैदा नहीं कर सके.

बेहतर तकनीक और विज्ञान तब जन्म लेता है जब श्रम और कार्य के विभिन्न रूपों का संश्लेषण या मिलन होता है. एक चमार अपना चमड़ा पकाने के लिए मौसम, तापमान, नमी, लवण, क्षार, समय, बल, दबाव, नाप, तौल आदि का वैज्ञानिक हिसाब रखता है. एक कुम्हार या किसान भी मौसम नमी धूप आर्द्रता, समय आदि का वैज्ञानिक हिसाब रखता है. अगर इन दोनों तीनों में रचनात्मक सहयोग होने लगे तो ये अपने अपने ज्ञान के मिलन से निश्चित ही कोई युनिवर्सल ज्ञान बनाने का प्रयास करेंगे, कुछ नियम और सिद्धांत खोज निकालेंगे.

यही ढंग विज्ञान को जन्म देता है. यूरोप में यही किया गया है. यूरोप के सभ्य समाज में अलग अलग विशेषज्ञता के लोग साथ में मिलकर काम कर सकते थे वे एकदूसरे से सीखते सिखाते हुए कम समय में बेहतर नतीजे लाते हुए समाज में सम्मान और धन हासिल करने के लिए तेजी से तकनीक और विज्ञान की खोज में जुट गए और तीन सौ सालों में उन्होंने वो विज्ञान पैदा कर दिया जिसकी कल्पना भारत जैसे असभ्य अनैतिक समाज हजारों साल से भी नहीं कर पा रहे हैं.

एक ब्राह्मण या क्षत्रिय के श्रम या उत्पादन को देखिये. वे क्या उत्पादन कर रहे हैं? समाज जिन उपादानों से या तरीकों से विक्सित होता है या सभ्य होता है उनमे इनका क्या योगदान है? ब्राह्मणों को पठन पाठन का अधिकार या जिम्मेदारी जो दी गयी है उसके लिए इन्होने क्या किया है? नब्बे से लेकर पंचानबे प्रतिशत आबादी को और अपनी ही औरतों को शिक्षा से वंचित कर दिया. इन्होने खुद जिस जिम्मेदारी को उठाने का दावा किया उसी काम को या शिक्षा को ही इन्होने योजनापूर्वक बर्बाद कर डाला.

क्षत्रियों ने समाज की रक्षा की जिम्मेदारी ली और सामंत और शोषक बनकर इस देश की उत्पादक जातियों की रक्षा नहीं बल्कि उन्ही का क़त्ल करना शुरू किया और जिनसे रक्षा करनी थी या जिनसे युद्ध करना था उनसे हारते रहे. वणिक जातियां एकदम बीच में हैं वे उत्पादन न करते हुए भी उत्पादन की प्रक्रिया से जुडी रहीं, वितरण और विपणन के माध्यम से उन्होंने बहुत कुछ योगदान किया है लेकिन उन्हें उनके सार्थक योगदान के कारण ही नीच घोषित किया गया है. भारत के कई राज्यों में वणिक, कायस्थ इत्यादि वर्ण संकर माने गए हैं वर्ण संकर एक तरह की गाली है जो वर्ण-व्यभिचार से उत्पन्न संतानों को दी जाती है.

एक गाँव की गतिशील अर्थव्यवस्था में जिन लोगों का जितना सार्थक योगदान है उतना ही वे नीच हैं. ये भारत का संस्कृति बोध है. इसे ठीक से देखा जाये तो ऐसा लगता है किसी ने भारत के भाग्य के साथ कोई बेहूदा मजाक किया है.

विश्व शौचालय दिवस पर ये बात गौर करने योग्य है. भारत में सफाई और स्वच्छता एक व्यक्तिगत शुचिता का मूल्य या विषय नहीं है. ये जातिगत और वर्णगत शुचिता का और आन बान शान का मुद्दा है. अगर कोई व्यक्ति अपना ही पखाना साफ़ कर रहा हो तो उसे अड़ोस पड़ोस के ‘सभ्य सवर्ण हिन्दू’ टेढ़ी नजर से देखकर उसका मजाक उड़ाते हैं. अगर कोई समझदार आदमी अपने आसपास नाली साफ़ करने लगे तो लोग उसका मजाक उड़ाते हैं. लेकिन ये ही सज्जन अगर सड़क पे खड़े होकर मूत्र विसर्जन करने लगें तो किसी को विशेष आपत्ति नहीं होती. पोलीथिन के घर का कचरा बांधकर गली मोहल्ले में फेंकते रहना भारत में सामान्य और स्वीकृत व्यवहार है. लेकिन कोई पढ़ा लिखा आदमी या औरत अगर उस कचरे को इकट्ठा करके उसका निस्तारण करने की कोशिश करे तो उसका मजाक उड़ाया जायेगा. ये भारत के आम माध्यम वर्ग की नैतिकता है.

ये नैतिकता कहाँ से आयी है? निश्चित रूप से ये धर्मग्रंथों से आई है. भारत के धर्मशास्त्रों में देखिये. स्मृति ग्रंथों (धार्मिक कानूनों) में देखिये. मनु महाराज ने साफ़ लिखा है कि मनुष्य (असल में ब्राह्मण) इंसानी बस्ती से दूर खुले में जाकर शौच करे और तीन बार (कुछ ग्रंथों में अधिक भी है) सुखी भूमि से प्रक्षालन करे फिर जल से करे. उसके बाद किन्ही उपायों या मन्त्रों या पवित्र धागे से जुडी कुछ क्रियाओं से उस ‘पाप’ से मुक्त हो. एक ही स्थान पर एक से अधिक लोग शौच नहीं कर सकते. एक ही स्थान पर निकट संबंधी स्नान या पखाना विसर्जन नहीं कर सकते.

इसे गौर से देखिये. असल में ये नगरीकरण के खिलाफ जाने वाली बाते हैं. नगर में नगरीय जीवन जीने के लिए स्नानागार और शौचालय जरुरी हैं. एक हे स्नानागार या शौचालय में पिता-पुत्री और माँ-बेटे को जाना होगा. अगर और बड़ी सामूहिकता की कल्पना करें जैसे कि कोई कार्यालय या होटल या सिनेमाघर हो तो उसमे तो अपरिचितों के साथ भी वाही शौचालय साझा करना पड़ेगा. तब आप क्या करेंगे? ऐसे में यदि आपकी खोपड़ी में मनु महाराज घुसे हुए हैं तो आप नगरीय जीवन का स्वागत कैसे करेंगे? आप नगर का प्रबंधन कैसे करेंगे? और एक और मजेदार बात देखिये, भारत के शासन प्रशासन सहित न्यायपालिका से लेकर नगर पालिका तक सवर्ण द्विज ब्राह्मण या क्षत्रिय ही सारे निर्णय ले रहे हैं.

जिनकी मानसिकता और संस्कार असल में उत्पादन, वितरण और नगरीय जीवन के खिलाफ हैं वे गाँव, खेती, नगर पालिका, व्यापर, शासन प्रशासन, शिक्षा आदि का प्रबंधन कर रहे हैं.

इसी कारण वे भारतीय विभागों कार्यालयों में कोई नया इनोवेशन नहीं कर पाते. शासन प्रशासन तकनीक विज्ञान शिक्षा कानून कपड़ा लत्ता यहाँ तक कि फिल्म और मनोरंजन भी सब यूरोप से कापी पेट्स हो रहा है. कारण क्या है? कारण ये है कि जिनका मूल संस्कार और पारिवारिक वातावरण उत्पादन, सभ्यता और इंसानी नैतिकता के खिलाफ है वे ही सारा प्रबंधन कर रहे हैं. जिस आदमी को श्रम से नफरत करने का वातावरण मिला हो वो क्या श्रमिकों के प्रति संवेदनशील और जिज्ञासु होगा?

ब्रिटेन का उदाहरण लीजिये, विलियम स्मिथ एक कारीगर का बेटा है उसने कारीगरी और उत्पादन सहित वितरण और व्यापार को गौर से देखा समझा. यूरोप के सभ्य समाज में उसने अलग अलग श्रम समूहों की अंतर्क्रियाओं और परस्पर निर्भरताओं सहित सामाजिक गतिशीलता का गहरा अध्ययन करते हुए पूंजीवाद का मोडल दिया. बाद में इस व्यवस्था में शोषण पैदा हुआ तो दुसरे विचारकों और दार्शनिकों ने इन्ही श्रमजीवी समूहों की हित चिन्तना करते हुए समाजवाद, लोकतंत्र और साम्यवाद इत्यादि के सिद्धांत दिए. ज्यादातर बेहतरीन दार्शनिक और विचारक और वैज्ञानिक यूरोप में श्रमजीवी समूहों से आ रहे हैं. अज की भाषा में कहें तो मध्यम वर्ग से आ रहे हैं. ये वो तबका है जो उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया में बचपन से किसी न किसी रूप में शामिल होता है और समाज और सभ्यता की जमीनी प्रक्रिया में हिस्सा लेकर पहले खुद सभ्य बनता है और बाद में सभ्यता को विक्सित करने में योगदान देता है.

इसके विपरीत भारत में क्या हो रहा है? हजारों साल से जो लोग जन्म के आधार पर दूसरों को नीच और अछूत समझते हैं वे इस समाज के लिए दर्शन, धर्म और नीति के ग्रन्थ लिख रहे हैं. वे लोग जिनमे इतनी भी न्यूनतम इंसानी नैतिकता नहीं है कि एक किसान या कुम्हार या वाल्मीकि या चमार या अपनी खुद की स्त्री को इंसान समझकर उसके श्रम का सम्मान कर सके वे लोग समाज के संचालन के सूत्र अपने हाथ में रख रहे हैं. ऐसा समाज अगर औंधे मुंह न गिर जाए तो अस्चर्या कैसा? ऐसा समाज गुलाम गरीब अन्धविश्वासी और बीमार न हो जाए तो आश्चर्य कैसा?

तो दोस्तों, स्वच्छता का मुद्दा एक खिड़की या एक की-होल की तरह है. उसके जरिये भीतर झांकर देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि भारत स्वच्छ न होने को ही अपनी संस्कृति समझता है. अनुत्पादक, बंजर, बाँझ, कूढ़-मगज और अन्धविश्वासी बने रहना यहाँ महानता की निशानी है. उत्पादन करना श्रम करना सृजन करना (यहाँ तक कि रजस्वला होना या बच्चा पैदा करना भी) यहाँ अशुद्धि और नीचता की निशानी है. ये भारत के मन के सोचने का ढंग है इसे ठीक से पहचान लीजिये. अब अगर भारत को सभ्य और समर्थ बनाना है तो उत्पादक और श्रमिक जातियों समूहों को उनके श्रम और योगदान के अनुरूप सम्मान और अवसर देना जरुरी है.

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संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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