satvendra madara

चुनाव विशेष 

सतविंदर मदारा (Satvendar Madara)

 

satvendra madaraजब 1993 के ऐतिहासिक उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में साहब कांशी राम ने “मिले मुलायम कांशी राम, हवा हो गए जय श्री राम” का नारा दिया तो शायद ही उन्हें इस बात का अहसास होगा कि 25 साल बाद, यह नारा दुबारा ज़िंदा होकर फिर से देश की राजनीतिक दिशा बदलेगा. तब तो इसने बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मुद्दे के सहारे राजनीति पर हावी हुई RSS-BJP को पछाड़ा था, लेकिन इस बार दो बहुत ही महत्वपूर्ण लोक सभा सीटों के उपचुनाव में इसने BJP को चारों खाने चित्त कर दिया है. गोरखपुर लोक सभा सीट, जो की उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ और फूलपुर, जो की उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के खाली करने से दुबारा चुनावों में गई थी, पर BJP को करारी शिकस्त मिली. खुद योगी आदित्यनाथ को भी मानना पड़ा कि उन्होंने सपा-बसपा गठबंधन की ताक़त को कम करके आँका और BJP को उसका ओवर कॉन्फिडेंस ले डूबा. 

 

पिछड़े-दलित-मुसलमान बनाम ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर

इस सारे घटनाक्रम ने देश की राजनीति को फिर उसी मोड़ पर ला खड़ा किया, जहाँ वो 1993 में थी. एक तरफ RSS-BJP के खेमे में ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर और दुबारा से जुड़ी कुछ पिछड़ी जातियां है तो दूसरी तरफ पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों का बड़ा ध्रुवीकरण. अगर यह गठजोड़ इसी तरह 2019 में होने वाले अगले लोक सभा चुनावों में भी रहता है तो RSS के हाथों से देश की सत्ता जाने वाली है. लेकिन अगर यह टूटता है, तो वो दुबारा से न सिर्फ सत्ता में पहुंचेंगे बल्कि फूले-शाहू-अम्बेडकर की विचारधारा पर बना हमारा संविधान भी खतरे में होगा. BJP के एक ब्राह्मण केंद्रीय मंत्री, अनंत कुमार हेगड़े ने खुले मंच से ऐलान किया है कि RSS-BJP का इरादा देश के संविधान को बदलना है और वो उसे पूरा करके ही छोड़ेंगे. बाबासाहब ने बड़ी मेहनत से इसमें पिछड़ी जातियों, अनसूचित जाति-जनजातियों एवं धार्मिक अल्पसंखयकों को उनके अधिकार दिलाये हैं, लेकिन इस देश की ब्राह्मणवादी जातियां यह नहीं चाहती कि सबको उनकी आबादी के हिसाब से उनकी बनती भागीदारी मिले. इसके अलावा वो भारत को एक धर्म निरपेक्ष देश की बजाए, हिन्दू (ब्राह्मण) राष्ट्र बनाना चाहते हैं ताकि और सभी धर्मों; इस्लाम, ईसाई, सिख, लिंगायत, बौद्ध, जैन आदि को या तो कोई अधिकार न मिले या उतने ही मिलें जिससे कि हिन्दू धर्म के ज़रिये ब्राह्मणों का वर्चस्व कायम रहे और उसे कोई चुनौती पेश न आये. 

यह बात तो 2014 के लोक सभा चुनावों में साफ थी कि BJP को सिर्फ 30 प्रतिशत वोट ही मिले थे और देश की 70 फीसद आबादी ने उसके खिलाफ वोट डाला था. लेकिन क्योंकि यह वोट कई खेमों में बंटा था तो उसका फ़ायदा लेते हुए RSS-BJP सत्ता में पहुँच गई. उसमें भी सबसे बड़ी जीत उसे उत्तर प्रदेश से मिली और वो 73 सीटें जितने में सफल रही, जिसका सीधा कारण सपा-बसपा में पिछड़ों-दलितों और मुसलमानों के वोटों का बंटना था. इन दोनों दलों को 20-20 प्रतिशत वोट मिले थे और BJP को 40 प्रतिशत. जब 2017 में उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव हुए, तो फिर से यही नतीजा आया और पहले देश की सत्ता ब्राह्मणवादी ताक़तों के हाथों में जाने के बाद, प्रदेश की सत्ता भी उनके हाथों में चली गई. इसी के बाद से पुरे बहुजन समाज (OBC,SC, ST और Minority) के सभी वर्गों में यह बेचैनी थी कि आखिर 2014 में वोटों के बटवारे के कारण हार का मुंह देखने के बाद भी 2017 में इन दोनों दलों के नेताओं ने आखिर कोई सबक क्यों नहीं लिया? यहीं से 1993 में साहब कांशी राम का दिया गया ऐतिहासिक नारा, “मिले मुलायम कांशी राम, हवा हो गए जय श्री राम” फिर से जीवित हो उठा. सबको इस मुसीबत से निकलने का रास्ता इसी नारे में दिखने लगा और इसने इतिहास को फिर से दोहराने के लिए पुरे बहुजन समाज को प्रेरित किया.

Mulayam Kashiram

1993 में मुलायम सिंह यादव के साथ सरकार बनाने के बाद 14 अप्रैल 1994 को बाबासाहब के जन्मदिन पर नागपुर, महाराष्ट्र में साहब कांशी राम ने एक ऐतिहासिक सभा के अपने एक ज़ोरदार भाषण में कहा था कि-

“अगर हम लोगों ने उत्तर प्रदेश में राज-पाट हासिल किया है, तो कोई चोरी-छुपे से नहीं किया है, किसी से भीख मांगकर नहीं किया है. जब उत्तर प्रदेश में दादागिरी चली, जय श्री राम का नारा लगा, तो नारे का जवाब बहुजन समाज पार्टी ने नारे से दिया कि ‘मिले मुलायम कांशी राम, हवा हो गए जय श्री राम’ (ज़ोरदार तालियां बजीं). इस नारे के आधार पर हम लोगों ने उत्तर प्रदेश में राज-पाट हासिल किया है. हमने कोई हेरा-फेरी करके, चोरी-छुपे से राज हासिल नहीं किया है. दादागिरी का मुक़ाबला शक्ति (एकता) के साथ, हम लोगों ने उनका मुक़ाबला किया है. बहुजन समाज (OBC,SC, ST और Minority) की शक्ति पैदा करके, तब हम लोगों ने उधर राज-पाट हासिल किया है. जब वो उत्तर प्रदेश के मैदान-ए-जंग में जय श्री राम के नारे से हमारे समाज को नहीं दबा पाए, हमारे समाज ने उनको दबाया, खास कर अयोध्या में और काशी में. अयोध्या और काशी की वो बात करते हैं, अयोध्या के चारों तरफ जो 9 असेंबली (विधान सभा) की सीटें हैं, वो नौ की नौ SP-BSP ने जीती हैं (तालियां). अयोध्या के चारों तरफ तो SP-BSP का बोलबाला है. काशी के चारों तरफ; काशी की शहर की तीन सीटें BJP ने जीती है, जय श्री राम ने जीती है और उसके चारों तरफ की बीस सीटें BSP ने जीती हैं (ज़ोरदार तालियां). तो इस तरह से साथियों, हम लोगों ने बहुजन समाज को तैयार करके, उसकी शक्ति बनाकर राज-पाट हासिल किया है.”

स्रोत: वो ऐतिहासिक नारा जिसने 1993 में RSS-BJP को मिट्टी में मिला दिया था। Saheb Kanshi Ram, YouTube Channel

 

अकबर पुर, अम्बेडकर नगर और लोहिया भवन 

कई बहुजन बुद्धिजीवियों ने साहब कांशी राम के इस नारे से सबक लेकर, अपने विचार अलग-अलग माध्यमों से रखे. साहब कांशी राम के ऊपर दिए गए भाषण का ऑडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रो.रतन लाल, जो कि पिछले कुछ समय से पुरे बहुजन समाज के मसलों पर बेबाकी से अपनी राय रख रहे हैं, ने हाल ही में हुए एक कार्यक्रम में इन सारे हालातों पर एक अनूठा बयान दिया. जिस कार्यक्रम में वो शामिल हुए थे, वो उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर के अकबर पुर में लोहिया भवन पर हो रहा था. उन्होंने इस सयोंग को वर्तमान राजनीति में सफल होने की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अकबर पुर, आंबेडकर नगर और लोहिया भवन (उनका इशारा मुसलमान, दलित और पिछड़ो पर था); अगर एक हो जाये तो उनकी जीत निश्चित है. लोगों ने तालियों के साथ इस बात का स्वागत किया. यह दर्शाता है कि बहुजन समाज के बुद्धिजीवियों और आम लोगों में इस बात को लेकर सहमति थी कि साहब कांशी राम के इस ऐतिहासिक नारे को दुबारा से जीवित करने का वक़्त आ चूका है. अगर रूकावट थी तो बस इस समाज के दोनों राजनीतिक दलों; सपा-बसपा के नेताओं के एक साथ आकर इस पर मुहर लगाने की. जिसे बहन मायावती और अखिलेश यादव ने आखिरकार पूरा कर ही दिया. 

जब उप चुनाव के नतीजे आये, तो RSS-BJP के पैरों तले से 1993 की ही तरह, फिर से ज़मीन खिसक गई. दोनों महत्वपूर्ण सीटें एक खुद आदित्य योगी नाथ की और दूसरी उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या की उनके हाथ से निकल गई और सपा के उम्मीदवारों ने बसपा के सहयोग से दोनों जगह धमाकेदार जीत दर्ज की. 15 मार्च को साहब कांशी राम के जन्मदिन, जिसे बहुजन समाज दिवस के रूप में मनाया जाता है पर इस जीत ने एक श्रद्धांजलि का काम किया और यह दर्शाया कि वो चाहे आज हमारे बीच न हों, पर उनका मार्गदर्शन सदैव बहुजन समाज के साथ रहेगा. जहाँ 2014 और 2017 के चुनावों में हार के बाद सपा-बसपा आत्मचिंतन कर रहे थे, वहीं अब RSS-BJP चिंता में डूबी है और 2019 में उसे पुरे देश में बुरी हार और केंद्र की सत्ता हाथ से खिसकने का डर सता रहा है. इस चुनाव की शानदार जीत ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पुरे देश में 70 प्रतिशत वोट वाले विपक्ष को एकजुट होने के लिए भी मज़बूती दी है. गुजरात में भी काफी हद तक विपक्ष ने एकजुट होकर RSS-BJP को उसके ही गढ़ में 100 सीटों से नीचे ला दिया था, वहीं अब इस जीत से विपक्ष की गोलबंदी और मज़बूत होने वाली है. अगर यह सिलसिला बना रहा तो जुमलेबाजों की सरकार का जाना तय है और देश के गरीब और वंचितों की सत्ता में वापसी होगी.

akhilesh yadav mayawati poster

 

हाशिये पर खड़ी राजनीति 

इसके साथ ही पिछले कुछ समय से हाशिये पर खड़ी बहुजन (OBC, SC, ST और Minority) राजनीति ने मुख्यधारा में वापसी कर ब्राह्मणवादियों को अपनी ताक़त का अहसास करवा दिया है. इसने यह भी साबित कर दिया कि सिर्फ ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर के आधार पर खड़ी RSS-BJP चाहे कुछ पिछड़ी जातियों को अपने झांसे में लेने को कामयाब हो गई हो, लेकिन इस देश के बहुसंख्यक पिछड़े, अनुसूचित जाती-जनजाति और अल्पसंख्यक उसके चक्कर में नहीं पड़ने वाले हैं. अगर किसी बात की कमी थी तो वो इन सबमें आपसी एकता की थी, जिसे इस महत्वपूर्ण चुनावों में सपा-बसपा ने अमली जामा पहना दिया है. 

 

मीडिया की बोलती बंद 

2014 में लोक सभा चुनावों में BJP की हुई जीत के बाद से बेशर्मी की सारी हदें पार कर, जिस तरह से मीडिया ने दिन-रात मोदी भजन करना शुरू कर दिया था, अब इस शर्मनाक हार से उसकी भी बोलती बंद है. जैसे ही इन उपचुनावों के नतीजे आये पूरी तरह बिक चुके भारतीय मीडिया के बारे में बहुजन समाज के युवाओं ने कहना शरू किया कि अब इन नतीजों पर चर्चा की बजाय, इस पर पर्दा डालने के लिए सास-बहु और श्रीदेवी पर ही बातचीत होने वाली है. हो सकता है पाकिस्तान के हमले का खतरा भी दुबारा भारत पर मंडराने लगे.

शरद यादव के साँझा विरासत और लालू यादव की पटना महारैली में लगभग पूरा विपक्ष एकजुट हो चुका था, बस बसपा की ही कमी थी जो अब पूरी हुई है. दूसरी तरफ चंद्रशेखर रावण, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार अल्पेश ठाकोर जैसे युवा तो पहले से ही BJP की बैंड बजाने को लेकर तैयार बैठे हैं. काफी हद तक हार्दिक-जिग्नेश-अल्पेश की तिकड़ी ने गुजरात में इसे कर भी दिखाया और वो लोक सभा चुनावों का इंतज़ार ही कर रहे हैं ताकि RSS-BJP की गुंडागर्दी का हिसाब अब पुरे देश में भी चुकता किया जा सके. अब लड़ाई सीधी और साफ हो चुकी है और 2019 का ऐतिहासिक लोक सभा चुनाव भारत के लोकतंत्र को पटरी से उतारने को कोशिश करने वालों की करारी हार और लोक तंत्र को वापस स्थापित करने वालों की जीत लेकर आएगा. 

ख़ुशी की बात है कि आज के हमारे नेताओं ने साहब कांशी राम के विचारों से सबक लेते हुए फिर से इतिहास को दोहरा डाला और मनुवाद के पैर उखाड़ने की दिशा में पहला कदम उठाया. उम्मीद है वो इसे जारी रखते हुए 2019 के लोक सभा चुनावों में “मिले मुलायम कांशी राम, हवा हो गए जय श्री राम” के नारे से पुरे देश की राजनीति को एक बार फिर सही दिशा देंगे. यही साहब कांशी राम के जन्मदिन, “बहुजन समाज दिवस” पर उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी. 

जय भीम, जय कांशी राम, जय भारत.

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सतविंदर मदारा पेशे से एक हॉस्पिटैलिटी प्रोफेशनल हैं। वह साहेब कांशी राम के भाषणों को ऑनलाइन एक जगह संग्रहित करने का ज़रूरी काम कर रहे हैं एवं बहुजन आंदोलन में विशेष रुचि रखते हैं।

चित्र साभार: इन्टरनेट दुनिया 

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