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भारत की नई धार्मिक क्रांति के जनक बाबा साहब अंबेडकर

sanjay Shraman Jothe

संजय श्रमण जोठे (Sanjay Shraman Jothe)

sanjay Shraman Jotheभगवान बुद्ध ने अपने आध्यात्मिक अनुशासन की रचना करते हुए जिस अष्टांग मार्ग को बुना है, उसमें सम्यक दृष्टि सबसे ऊपर आती है। उसके बाद जो सात चरण हैं वे इसी सम्यक दृष्टि पर ही आधारित हैं। इसी श्रमण परंपरा में निगंठनाथ सुत्त भगवान महावीर भी आते हैं जो कि श्रमण जैन परमपरा के अंतिम तीर्थंकर हैं। भगवान महावीर के साथ जैन परंपरा के तीर्थंकरों के आगमन की संभावना पर पूर्ण विराम लग जाता है। ठीक इसी समय गौतम बुद्ध श्रमण बौद्ध परंपरा के एक नए अध्याय का, एक नये धर्म का सूत्रपात करते हैं। भगवान महावीर ने जिनसूत्रों मे जिन त्रि-रत्नों की बात कही है उसमें भी समय दृष्टि सबसे ऊपर आती है। इस तरह अगर आप भारत की प्राचीन श्रमण परंपरा की ज्ञान दृष्टि पर विचार करें, और श्रमणों के अनुसार ज्ञान की उत्पत्ति और ज्ञान की सही समझ की बात करें तो श्रमण आचार्यों के अनुसार सम्यक दृष्टि सबसे पहला और अनिवार्य चरण है। सम्यक दृष्टि का अर्थ होता है किसी घटना या प्रेक्षण को उसके सही अर्थ मे, या उसकी वास्तविकता में देखना और समझना। गौतम बुद्ध सम्यक दृष्टि का अर्थ करते हुए बताते हैं किसी भी घटना या ऑबसर्वेशन को उसकी पूर्णता मे उसके उद्गम से लेकर उसके तार्किक विस्तार की यात्रा में देखना चाहिए। इसका यह मतलब है कि किसी घटना या वस्तु को देखते समझते हुए उस में अपनी पसंद या न पसंद और अपनी व्याख्यान को मिलाकर नहीं देखना चाहिए। 

यह विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जो आपको ना सिर्फ भगवान बुद्ध और भगवान महावीर में बल्कि बाबासाहेब आंबेडकर में भी नजर आता है। जिन लोगों ने बाबासाहेब आंबेडकर की अनुसंधान प्रणाली पर शोध किया है वे बताते हैं कि बाबासाहेब अंबेडकर किसी भी बात, घटना या सिद्धांत को तब तक स्वीकार नहीं करते थे जब तक कि वे उसके ओरिजिन या उद्गम में जाकर नहीं देख लेते थे। बाबासाहेब मूल रूप से एक अर्थशास्त्री थे जो कि बाद में मानव शास्त्री कानूनविद और धर्म शास्त्र के ज्ञाता भी बन जाते हैं। और इस सबसे आगे बढ़ते हुए अंत में वे एक नए धर्म के पिता भी बन जाते हैं। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के गरीबों मजदूरों के लिए उनके द्वारा दिया गया नवयान बौद्ध धर्म एक ऐसी रचना है जो कि श्रमण संस्कृति की वैज्ञानिक ज्ञान परंपराओं पर आधारित है।

बाबासाहेब आंबेडकर स्वयं ही श्रमण संस्कृति में ब्राह्मणों द्वारा की गई मिलावट को काटकर अलग कर देते हैं और एक नए धर्म की स्थापना करते हैं। बाबासाहेब आंबेडकर के लेखन और उनके द्वारा किए गए शोध को जो लोग जानते हैं उन्हें मालूम है कि बाबासाहेब आंबेडकर किसी भी बात को समझने के लिए उसके आरंभ के पहले बिंदु की अर्थात उत्पत्ति की खोज करना महत्वपूर्ण समझते थे। इसीलिए उनके पहले अकादमिक शोध प्रबंध से लेकर ‘बुद्ध एंड हिज धम्मा’ की रचना करने तक एक खास शैली का प्रयोग करते थे। अपनी अकादमिक शोध की यात्रा आरंभ करते हुए जाति की उत्पत्ति को ढूंढने का प्रयास करते हैं। उनका अगला महत्वपूर्ण शोध प्रबंध भारतीय अर्थव्यवस्था में रुपए की समस्या की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है, यहां भी वह रुपया की समस्या को टटोलने का प्रयास करते है। बाद में वे शूद्रों की उत्पत्ति कैसे हुई इस बात को समझने का प्रयास करते हैं। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने भारत में हिंदू महिलाओं की बदहाली के और पतन के कारणों की उत्पत्ति भी खोज की।

इसके बाद भारत से बौद्ध धर्म के लुप्त होने के कारणों की खोज की। अंतिम रूप से उन्होंने इस बात की खोज की कि भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के करोड़ों लोग किस तरह सुदृति सूत्र और अछूत बना दिए गए। भगवान महावीर भगवान बुद्ध और बाबासाहेब अंबेडकर को श्रमण धर्म के प्रस्तावक के रूप में ठीक से देखिए। यह तीनों अपने-अपने समय में अपनी-अपनी विशिष्ट ज्ञान मीमांसाओं की प्रणालियों के आधार पर व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में दुख से मुक्ति और सह-अस्तित्व की शिक्षा दे रहे हैं। भगवान बुद्ध बड़े-बड़े संघों का निर्माण करके ज्ञान की नई प्रणालियों का सृजन कर रहे हैं। वे आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक एवं मिथ्या दृष्टिओं से अपने लोगों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। ठीक इसी समय भगवान महावीर भी एक सृष्टि रचयिता ईश्वर को नकारते हुए उससे जुड़े कर्मकांड और पशुबलि, नरबली और हिंसा का विरोध करते हुए अहिंसा का महासिद्धांत दे रहे हैं। गौतम बुद्ध आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म तीनों को नकार रहे हैं, और भगवान महावीर परमात्मा या सृष्टिकर्ता ईश्वर को नकार रहे हैं। दोनों अपने अलग-अलग तरीकों से ब्राह्मणवाद के जहरीले सिद्धांतों का विरोध कर रहे हैं।

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इसी परंपरा में आधुनिक समय में बाबासाहेब आंबेडकर आते हैं। उन्हें इस परंपरा के एक और नए श्रमण आचार्य की तरह देखना और दिखाना अभी तक संभव नहीं हुआ है। इसके कुछ गंभीर और एतिहासिक कारण है जिन्हे समझने के लिए लिए कुछ जरूरी बातों को समझना होगा। इतिहास मे जिस तरह का दुर्व्यवहार रैदास और कबीर के साथ हुआ है, ठीक वही दुर्व्यवहार बाबासाहेब आंबेडकर के साथ आजकल हो रहा है। कबीर और रैदास को कभी भी धर्मगुरु की तरह नहीं देखा जाता, उन्हें किसी काल्पनिक भक्तिकाल के भक्तिसंत की तरह देखा और दिखाया जाता है। उन्हें भक्ति संत सिद्ध करते हुए यह भी कहा जाता है कि ये लोग वैष्णव अवतारों की भक्ति किया करते थे। दोनों को विष्णु के अवतार राम से जोड़कर देखा और दिखाया जाता है। हालांकि हिन्दी साहित्य मे बहुत चालबाजी से यह भी कह दिया जाता है कि तुलसी के राम और कबीर के राम अलग हैं, लेकिन विष्णु और राम से उन्हें कहीं ना कहीं जोड़ ही दिया जाता है। साथ ही इनके ऊपर एक काल्पनिक गुरु रामानंद को भी बैठा दिया जाता है जो कि स्वयं मे वेदांती ब्राह्मण हैं। इस भयानक षड्यन्त्र को ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग आसानी से नहीं समझ पाते। कबीर जो कि एक ओबीसी जुलाहा जाति से आते हैं और रैदास जोकि अनुसूचित जनजाति से आते हैं, ठीक इसी तरह अनुसूचित जनजाति के धर्मगुरु भगवान बिरसा मुंडा हैं जिन्हे उनके अपने ही लोग ना तो जानते हैं ना पहचानते हैं।

कबीर और रैदास ने जिस तरह की नई आध्यात्मिकता और धार्मिकता की प्रस्तावना दी थी उसे भक्ति और समर्पण शरणागति इत्यादि की बकवास में छुपा कर खत्म कर दिया गया है। इस बात पर बहुत रिसर्च हो चुकी है कि किस तरह कबीर और रैदास असल में गौतम बुद्ध और गोरखनाथ के बाद श्रमण परंपरा और बौद्ध परंपरा के ही सिद्धांतों को अलग-अलग ढंग से पेश कर रहे थे। भारत की ब्राह्मणवादी परंपराओं के सिद्धांतकारों को इस एटिहासिक संघर्ष की सारी जानकारी रही है। ब्राह्मणों के पुराणों मे जो संघर्ष और युद्ध बताए गए हैं वे असल मे श्रमण और ब्राह्मण परंपराओं के ही संघर्ष हैं। इसीलिए ब्राह्मणवादी साहित्यकार इतिहासकार और विद्वान लोग कभी भी कबीर, रैदास बिरसा मुंडा और बाबा साहब अंबेडकर को एक धर्मगुरु की तरह नहीं चित्रित करते बल्कि वे उन्हे भक्त, कवि, क्रांतिकारी, समाज सुधारक आदि की तरह पेश करते हैं। भारत के समाज में भक्त, कवि या समाज सुधारक होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं मानी जाती है। गाँव शहर के गली चौराहों पर भक्तों या कवियों के बारे में जिस तरह की बात होती है उसमें देखकर सुनकर आपको पता चलेगा कि वह उसे कोई बड़ी घटना नहीं मानते हैं। लेकिन अगर इन्हे गलियों चौराहों मे किसी व्यक्ति को धर्मगुरु कह दिया जाए तो उस व्यक्ति का प्रभाव और उसकी महिमा अचानक लाखों गुना बढ़ जाती है।

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कबीर जी एंव रविदास जी

इस बात को भारत के ब्राह्मणवादी लोग ना सिर्फ जानते आए हैं बल्कि इस खेल का बहुत गहराई से इस्तेमाल भी करते आए हैं। ये ब्राह्मणवादी लोग तुलसीदास या वेदव्यास या मनु को सिर्फ कवि नहीं मानते वे उन्हें एक कवि से आगे बढ़कर नए धर्म और नए धार्मिक कानून के पिता की तरह भी देखते हैं। ब्राह्मण जाति से आने वाले जितने भी कवि और सिद्धांतकार हैं, उन्हें बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ा कर एक धर्मगुरु की तरह पेश किया जाता है। इसके विपरीत ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति से आने वाले धर्मगुरुओं को भी भक्त या कवि या समाज सुधारक बताकर छोटी सी पहचान में समेट दिया जाता है। भारत के इतिहास मे यह खेल बहुत पुराना है। यह खेल आप गौतम बुद्ध के साथ भी देख सकते हैं। इतिहास की रिसर्च ने यह सिद्ध कर दिया है कि हिंदुओं के परम देव विष्णु को गौतम बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद गौतम बुद्ध की ही शक्ल में रचा गया है। शेषनाग पर सो रहे विष्णु की प्रतिमा असल मे गौतम बुध की नकल करते हुए बनाई गई है।

गौतम बुद्ध जब अंतिम सांसे ले रहे थे तब वे दाई करवट लेट कर अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए उनसे विदा ले रहे थे। भारत ही नहीं बल्कि चीन, कोरिया, इंडोनेशिया, कंबोडिया, जापान इत्यादि कई देशों में भी दाई करवट लेटे हुए गौतम बुद्ध की हजारों प्रतिमाएं है मिलती है। भारत में इन्हें प्रतिमाओं को विष्णु की प्रतिमाओं में बदल दिया गया है। वह आर्य ब्राह्मणों के ये विष्णु गौतम बुद्ध के बहुत बाद आते हैं। पुराणों का षड्यन्त्र देखिए कि गौतम बुद्ध को उन्हीं विष्णु का अंतिम अवतार बता दिया जाता है। यह बहुत ही चालबाजी और षड्यंत्र से भरी बात है। आप अगर वेदों में देखेंगे तो वेदों का सबसे बड़ा देवता इंद्र है वहां विष्णु का एक सृष्टि के रचयिता एवं सर्वाधिक प्रमुख देवता की तरह कोई उल्लेख नहीं है।

इस तरह अगर आप ध्यान से देखेंगे तो भारत में श्रमण और ब्राह्मण धर्मों के संघर्ष में ब्राह्मण परंपरा के द्वारा चली गई चालबाजी एवं षड्यंत्र को आप आसानी से पकड़ पाएंगे। यह ब्राह्मणी परंपरा ना केवल गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार सिद्ध कर देती है बल्कि कबीर और रैदास को भी विष्णु के अवतारों का भक्त सिद्ध कर देती है। इतिहास की रिसर्च यह भी बताती है कि ऐसे बहुत सारे भक्ति संत और कवि भी हुए हैं जिन्हें इस षड्यंत्र का भी सही अनुमान नहीं था और वे स्वयं भी भक्ति आंदोलन नामक बड़े षड्यंत्र का शिकार हुए। भारत में तुर्कों एवं मुगलों के आने के बाद भक्ति आंदोलन की रचना क्यों और किस तरह की गई यह एक गंभीर शोध का विषय है। कई लोग इशारा करते हैं कि यह वर्णाश्रम धर्म को इस्लाम की चुनौती से बचाए रखने के लिए रचा गया आंदोलन था। इस भक्ति आंदोलन में ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को बहुत सीमित अर्थों में शास्त्र पढ़ने साधना करने और भक्ति इत्यादि करने का अधिकार दिया गया था। ठीक उसी तरह जिस तरह दयानंद सरस्वती ने इस्लाम में धर्मांतरित होने वाली ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति की बड़ी जनसंख्या को रोकने के लिए आर्य समाज का निर्माण किया था। ब्राह्मण परंपरा अपने धर्म की रक्षा करने के लिए इस तरह के “आपद धर्मों” का निर्माण एवं पालन करती आई है।

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गौतम बुद्ध

आजकल भी इस आपद धर्म को आप काम करते हुए देख सकते हैं। भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को सम्मान और अधिकार ना देते हुए भी उन्हें अपने ही धर्म की खोल में रोके रखने का हर तरह का प्रयास किया जा रहा है। इस तरह के खेल कोई भारत में पहली बार नहीं हो रहे हैं, भारत में कई सामाजिक सुधार आंदोलनों की उत्पत्ति असल में वर्णाश्रम धर्म के आपद धर्म के सिद्धांत को समझकर आसानी से समझी जा सकती है। जब जब वर्णाश्रम धर्म कमजोर होता है तब तब ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को कुछ शर्तों पर अपने अंदर शामिल करते हुए अपनी ढाल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, आपद धर्म मे थोड़ी समानता, समावेश, समरसता इत्यादि की ढील दे दी जाती है। एसा करते हुए जब विदेशी शक्तियों कि चुनौती खत्म हो जाती है तब आपद अधर्म भी समाप्त हो जाता है। तब वर्णाश्रम धर्म के सिद्धांतकार फिर से जाति और वर्ण के अनुकूल विशिष्ट धर्मों के पालन की तरफ निकल पड़ते हैं।

जिस तरह हिंदू मुसलमान के दंगों में ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग अचानक हिंदू बना दिए जाते हैं, और दंगा समाप्त होने के बाद वे सभी फिर से शूद्र और अछूत बन जाते हैं, ठीक उसी तरह वर्णाश्रम धर्म को अन्य धर्मों की चुनौती मिलने पर ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग अचानक से ब्राह्मण धर्म के अंदर शामिल कर लिए जाते हैं, और चुनौती समाप्त होते ही उन्हें फिर से शूद्र और अछूत बना दिया जाता है। यह खेल भारत में हजारों साल से चल रहा है, इस खेल को बाबासाहेब आंबेडकर ने बहुत अच्छे से समझा था इसीलिए उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में इस खेल को पूरी तरह खत्म करने के लिए एक बहुत ही शक्तिशाली रचना का निर्माण किया था। वह रचना है नवयान बौद्ध धर्म।

बाबा साहब की अपनी रिसर्च में यह सिद्ध होता है कि भारत के ओबीसी और अनुसूचित जाति के लोग प्राचीन समय के बौद्ध थे। इसीलिए उन्होंने भारत के ओबीसी और अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक मुक्ति के सबसे शक्तिशाली उपकरण का निर्माण करते हुए बौद्ध धर्म को चुना। बाबा साहब की ज्ञान की खोज की यात्रा को अगर आप ठीक से देखें तो, आप देख पाएंगे कि बाबासाहेब आंबेडकर सारे राजनीतिक सामाजिक और  कानून संविधान इत्यादि के प्रयोग करते हुए  अंत में बौद्ध धर्म के निर्माण की तरफ आगे बढ़ते हैं। इस बात का एक खास महत्व है जिसका भारत के सवर्ण विद्वानों ने ठीक से विश्लेषण नहीं किया है। ऐसा विश्लेषण और प्रचार करने के बहुत सारे कारण हैं। अधिकांश सवर्ण विद्वान जो कि स्वयं ब्राह्मणवादी पृष्ठभूमि से आते हैं वे बाबासाहेब अंबेडकर को ज्यादा से ज्यादा संविधान निर्माता या समाजसेवी या समाज सुधारक बताते हैं।

भारत में बहुत सारे प्रगतिशील सवर्ण सिद्धांतकार भी बाबासाहेब आंबेडकर को संविधान निर्माता सामाजिक क्रांति का पिता बताते हुए कहीं ना कहीं बाबा साहब को इन छोटी पहचानो में सीमित कर लेते हैं। लेकिन कोई भी सवर्ण सिद्धांतकार बाबा साहब को एक नए धर्म का पिता या धम्मा चक्र प्रवर्तन करने वाले धर्मगुरु की तरह देखना और दिखाना पसंद नहीं करते। इस बात के पीछे छिपे गहरे कारण को समझने की कोशिश कीजिए। यह वही षड्यंत्र है जो कबीर और रैदास को एक भक्त और कवि बताना पसंद करता है लेकिन धर्मगुरु बताना पसंद नहीं करता। यह वही षड्यंत्र है जो गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार बताना पसंद करता है लेकिन गौतम बुद्ध को एक नए धर्म का प्रस्तावक बताना पसंद नहीं करता। यह वही षड्यंत्र है जो भगवान महावीर और उनकी विराट परंपरा को हिंदू धर्म का एक छोटा सा संप्रदाय बनाकर दिखाना पसंद करता है लेकिन जैन धर्म को श्रमण परंपरा का स्वतंत्र धर्म मानने से इनकार करता है।

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महावीर जी 

इस ऐतिहासिक खेल को बार-बार देखिए और समझने की कोशिश कीजिए। ब्राह्मण और श्रमण परंपरा में जो संघर्ष हो रहा है उस संघर्ष को देखने की सम्यक दृष्टि यही है। इसीलिए मैंने इस लेख का आरंभ सम्यक दृष्टि कि चर्चा से किया था। अगर आप भारत के वर्तमान सामाजिक धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष को ठीक से समझना चाहते हैं तो आपको सम्यक दृष्टि चाहिए, इन बड़े-बड़े एवं ऐतिहासिक मुद्दों को समझने के लिए आपको ब्राह्मणवाद की मितीहा दृष्टि नहीं बल्कि बुद्ध महावीर और अंबेडकर की सम्यक दृष्टि चाहिए। सम्यक दृष्टि का अर्थ है भारत की श्रमण एवं ब्राह्मण परंपराओं के संघर्ष के मूल बिंदु को और उसकी उत्पत्ति को समझना। बाबासाहेब आंबेडकर भी सम्यक दृष्टि का इस्तेमाल करते हुए किसी भी मुद्दे को उसके ओरिजिन या उत्पत्ति से पकड़ने की कोशिश किया करते थे। इसीलिए वे किसी भी विषय पर रिसर्च करते हुए उसके ओरिजिन या उत्पत्ति पर जरूर जाया करते थे।

सम्यक दृष्टि का इस्तेमाल करने वाले बाबा साहब को आप इस तरह से समझने का प्रयास कीजिए। उनके लिए सबसे बड़ी समस्या भारत में ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति और महिलाओं के शोषण की समस्या थी। क्या आपको लगता है कि भारत की अर्थव्यवस्था में रुपए की समस्या की खोज करते हुए अर्थशास्त्र के सबसे गहरे सिद्धांतों का विश्लेषण करने वाले डॉक्टर अंबेडकर भारत की धार्मिक समस्या की उत्पत्ति की खोज नहीं कर पाए होंगे? क्या आपको लगता है कि उनकी नजर में जो समस्या सबसे बड़ी समस्या थी उसके मूल बिंदु को वह नहीं समझ पाए होंगे? अगर कोई व्यक्ति ऐसा समझता है तो वह निश्चित ही बाबासाहेब अंबेडकर को नहीं समझता। मैं दावे से और जोर देकर कहना चाहता हूं कि संविधान का निर्माण करने के बाद बाबा साहब ने नए धर्म का निर्माण करने का जो निर्णय लिया उसी में उन्होंने पूरे भारत की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक मुक्ति का सबसे बड़ा उपाय हमें दे दिया है। वह उपाय धर्म है।

संविधान का निर्माण करते हुए, संविधान सभा में चर्चा करते हुए उस समय के सबसे विद्वान एवं सक्षम लोगों की टीम से बहस एवं विचार विमर्श करते हुए उनकी यह धारणा पक्की हो चली थी भारत में जब तक धार्मिक क्रांति नहीं होगी तब तक संविधान कानून प्रजातंत्र इत्यादि का कोई भविष्य नहीं है। बाबासाहेब आंबेडकर एक कुशल मानव शास्त्री भी रहे हैं, उस समय इंडोलॉजी एवं भाषा विज्ञान सहित मानव शास्त्र की जितनी भी रिसर्च हुई थी उससे साफ जाहिर हो रहा था कि विज्ञान, तकनीक, औद्योगिक क्रांति और आधुनिकता के आने के बाद भी धर्म की शक्ति कम नहीं होगी बल्कि बढ़ती जाएगी। इस बात को बाबा साहब अपने आसपास के लोगों के व्यवहार में बहुत आसानी से देख पा रहे थे। उन्होंने जीवन भर धर्म और जाति के आधार पर जितना भी शोषण और तिरस्कार सहा, उसे उन्होंने समाजशास्त्र मानव शास्त्र और मनोविज्ञान के नए सिद्धांतों के साथ जोड़कर विश्लेषण किया। इस विश्लेषण से बाबा साहब आसानी से समझ पाए कि जिन लोगों के पास जिन समुदायों के पास अपना धर्म अपने धर्म शास्त्र और अपने नेरेटिव और ग्रेंड नेरेटिव नहीं होते वे कानून और संविधान इत्यादि के आने के बाद भी कमजोर ही रहेंगे।

इसीलिए बाबा साहब ने संविधान निर्माण करने के बाद, अंतिम रूप से भारत के ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को उनका अपना ग्रैंड नेरेटिव अर्थात बौद्ध धर्म दिया। जब बाबा साहब ने बौद्ध धर्म दिया तो हमें यह देखना चाहिए कि उन्होंने असल में धर्म दिया। कोई जरूरी नहीं है कि भारत के ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति के सभी लोग बौद्ध धर्म को ही चुन लें, लेकिन एक बात पक्की है कि उन्हें धर्म की शक्ति का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, उन्हें धर्म की शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए। बाबा साहब के अनुसार धर्म मनुष्य के द्वारा पैदा की गई सबसे बड़ी सामाजिक और राजनीतिक संस्था है। मनुष्य के क्रम विकास में धर्म ने जितनी बड़ी भूमिका निभाई है उतनी बड़ी भूमिका किसी भी सिद्धांत या संस्था ने नहीं निभाई है।

इसीलिए जिन लोगों के पास एक संगठित धर्म और अपना ग्रैंड नेरेटिव नहीं होता वे लोग हमेशा ही उन लोगों के गुलाम होते हैं जिनके पास अपना संगठित धर्म होता है। आज भी आप इस सिद्धांत को काम करता हुआ देख सकते हैं। भारत में सड़कों के किनारे जो लोग मजदूरी कर रहे हैं गड्ढा खोद रहे हैं उन लोगों को ध्यान से देखिए, ये वही लोग हैं जिनके पास ना अपना धर्म है ना अपना ईश्वर है ना अपना सिद्धांत और अपने कर्मकांड हैं। दूसरी तरफ जो लोग इनसे मजदूरी करवा रहे हैं उन्हें ध्यान से देखिए। ये वो लोग हैं जिनके पास अपना इतिहास अपनी संस्कृति अपना धर्म अपना ईश्वर अपना शास्त्र है। ना सिर्फ इन लोगों के पास अपना शास्त्र और धर्म है बल्कि उस धर्म और शास्त्र को एक से दूसरी पीढ़ी को तक पहुंचाने के लिए बहुत सारे कर्मकांड वृत, उत्सव त्योहार इत्यादि भी हैं। भारत के गरीब ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के पास अपने पूर्वजों का सम्मान मरने वाले उनकी महानता की चर्चा करने वाला धर्म और शास्त्र नहीं हैं। यही उनकी कमजोरी का सबसे गहरा कारण है।

बाबासाहेब आंबेडकर धर्म शास्त्र एवं मानव शास्त्र के विद्वान थे, वे जानते थे कि शास्त्र, परंपरा, संस्कृति का ज्ञान, एवं कर्मकांड की शक्ति क्या होती है। इसीलिए उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा लेते हुए बहुत बड़े आयोजन एवं कर्मकांड का प्रदर्शन किया। लाखों लोगों को अपने साथ बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। नए कर्मकांड की रचना करते हुए दीक्षा मे बाईस प्रतिज्ञाओं और पंचशीलों की स्थापना की। इसके बाद दो साल के भीतर पूरे भारत को बौद्धमय बनाने का प्रण लिया था। दुर्भाग्य से उनका कमजोर होता हुआ शरीर दो साल तक हमारे बीच नहीं रह सका वरना आज पूरा भारत गौतम बुद्ध से ओतप्रोत हो चुका होता। यह एक ऐसी अपूरणीय क्षति है जिसका की वर्णन नहीं किया जा सकता। बाबा साहब ने अपने परिनिर्वाण से पहले पूरे भारत में हर राज्य के हर जिले तक बौद्ध धर्म के प्रचार एवं दीक्षा का एक पूरा कार्यक्रम बनाकर अपने लोगों को दिया था। दुर्भाग्य से ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के नाम पर राजनीति करने वाली संस्थाओं ने भारत को बुद्धमय का बनाने का बाबा साहब का प्रपोजल ठीक से नहीं समझा और उसका पालन नहीं किया। इसी कारण भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग धर्म की विराट शक्ति से वंचित रह गए और अभी तक ब्राह्मणवाद के षड्यंत्र में फंसे हुए हैं।

इन बातों को पढ़ते हुए भारत के सवर्ण और तथाकथित प्रगतिशील ब्राह्मणवादी लोग सहमत नहीं होंगे। वे कतई नहीं चाहेंगे की बाबासाहेब आंबेडकर को धम्मचक्र प्रवर्तन करने वाले नए बौद्ध धर्मगुरु की तरह देखा या दिखाया जाए। वे नहीं चाहेंगे कि भारत में ब्राह्मण परंपरा द्वारा की गई प्रतिक्रांति के खिलाफ  श्रमणों की क्रांति का दुबारा शंखनाद करने वाले एक नए युग पुरुष की तरह बाबा साहब की विराट छवि निर्मित हो। इसीलिए वे लोग बाबा साहब को संविधान कानून और जाति की अस्मिता की लड़ाई से जोड़कर देखना और दिखाना चाहते हैं। इसीलिए वे कभी भी बाबासाहेब आंबेडकर के धार्मिक प्रस्तावनाओं को ना तो प्रकाशित होने देते हैं ना चर्चा का विषय बनने देते हैं। बाबा साहब के परिनिर्वाण के बाद कई दशकों तक उनके साहित्य को और धर्म और संस्कृति पर उनके विचारों को दबाकर छुपाकर रखा गया। वहीं दूसरी तरफ गांधी और विवेकानंद के विचारों को बहुत ही सस्ती पुस्तिकाओं में छपवा कर पूरे देश में बांटा गया। ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणवादी धर्म की प्रशंसा करने वाले गुरु और आचार्यों को पूरी सुविधा देकर पूरे देश में फैलाया गया। लेकिन बौद्ध धर्म के नए युग का सूत्रपात करने वाले बाबासाहेब आंबेडकर के साहित्य को और विशेष रूप से धर्म एवं संस्कृति के उनके विश्लेषण को पूरी ताकत से छुपा कर रखा गया। इस बात का क्या अर्थ है? इसे भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को बहुत ध्यान से समझना चाहिए।

आज बाबा साहब अंबेडकर के जन्म दिवस के अवसर पर, हमें उसी समय दृष्टि का इस्तेमाल करना चाहिए जिसका इस्तेमाल स्वयं बाबासाहेब आंबेडकर ने किया और जिसकी खोज गौतम बुद्ध और भगवान महावीर ने की है। भारत के प्राचीन इतिहास में श्रमण एवं ब्राह्मण धर्मों के संघर्ष को ध्यान से समझना चाहिए। इस ऐतिहासिक संघर्ष को हमें भी सम्यक दृष्टि से देखकर समझ कर अपने वर्तमान का विश्लेषण करना चाहिए और भविष्य का निर्माण करना चाहिए। अंतिम रूप से हमें गौतम बुद्ध और बाबा साहब की सलाह पर जरूर ध्यान देना चाहिए कि धर्म ही सबसे बड़ी शक्ति है। धर्म ने ही मनुष्य के क्रम विकास में मनुष्य को मनुष्य बनाया है। इसमें समय के साथ कुछ खराबी आ एवं कमजोरियां आती है लेकिन उन्हें दूर करके नए समय के अनुकूल नए धर्म का पालन करना जरूरी होता है।

जिन समुदायों के पास अपना धर्म अपने धर्म शास्त्र और अपने बच्चों को सिखाने के लिए अपने कर्मकांड नहीं होते हैं, वे लोग हमेशा दूसरों के गुलाम और मजदूर बनते जाते हैं। भारत के ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को सोचना चाहिए कि क्या वे अपने बच्चों को गुलाम और मजदूर बनाना चाहते हैं या उन्हें भी इस देश में सम्मान और सामर्थ्य के साथ जीना सिखाना चाहते हैं। इस बात पर विचार करते हुए आपको भगवान महावीर भगवान बुद्ध और बाबा साहब अंबेडकर के ऐतिहासिक संघर्ष को सम्यक दृष्टि से देखना और समझना चाहिए। आज अगर हम यह संकल्प लेते हैं, तो यह बाबासाहेब के प्रति हमारी सबसे बड़ी और सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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संजय श्रमण जोठे एक स्वतन्त्र लेखक एवं शोधकर्ता हैं। मूलतः ये मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं। इंग्लैंड की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन मे स्नातकोत्तर करने के बाद ये भारत के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे हैं। बीते 15 वर्षों मे विभिन्न शासकीय, गैर शासकीय संस्थाओं, विश्वविद्यालयों एवं कंसल्टेंसी एजेंसियों के माध्यम से सामाजिक विकास के मुद्दों पर कार्य करते रहे हैं। इसी के साथ भारत मे ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातियों के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक अधिकार के मुद्दों पर रिसर्च आधारित लेखन मे सक्रिय हैं। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब वर्ष 2015 मे प्रकाशित हुई है और आजकल विभिन्न पत्र पत्रिकाओं मे नवयान बौद्ध धर्म सहित बहुजन समाज की मुक्ति से जुड़े अन्य मुद्दों पर निरंतर लिख रहे हैं।    

One thought on “भारत की नई धार्मिक क्रांति के जनक बाबा साहब अंबेडकर”

  1. मै इसी लेख की तलाश कर रहा था. रैदास और कबीर को धर्मगुरू के रूप में न दिखाया जाना और बाबासाहब आंबेडकर को केवल संविधान के निर्माता एवं सिर्फ समाज सुधारक के रूप में पेश किया जाना असल में ब्राह्मणी षडयंत्र का ही एक हिस्सा है। ब्राह्मणवादी अच्छी तरह जानते है की धर्म और धर्मान्तर की शक्ति क्या होती है और नास्तिकता की हकीकत क्या है। भारत मैं नास्तिकता सिर्फ एक मजाक है, ऊपर-ऊपर से प्रगतशील दिखने वाले लोग अपने घर के अंदर पाखंड के सामने घुटने टेक देते हैं।
    साल 1956 में नागपुर में बाबासाहब ने नवयान बौद्ध धर्म के स्वीकार की पुकार की तब महार जाती के लोगोंने उनकी पूरी तरह सहायता की। आज 2021 में महाराष्ट्र के बौद्ध समाज से आने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि नवयान बौद्ध धर्म ने उनकी किस तरह से मदद की है जो की किसी भी राजनीतिक सत्ता से संभव नही थी। राजनीति महत्वपूर्ण जरूर है लेकिन सबकुछ नही होती, दिमाग से मानसिक गुलामगिरी का गायब हो जाना भी एक बड़ी बात है।

    लेखक संजय श्रमण सर का बहोत शुक्रिया।

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