हरीश परिहार

हरीश परिहारइंसाफ की उम्मीद पर एक अमानवीय धब्बा है मनु की मूर्ति

क्या ऐसी अदालत से इंसाफ की उम्मीद की जा सकती है जिसके परिसर में इंसाफ की आस में जाने वालों को अन्याय का एक प्रतीक हर वक्त मुंह चिढ़ा रहा हो?

राष्ट्र-निर्माता डॉ बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने 25 दिसम्बर 1927 के दिन महाराष्ट्र के महाड़ में मनुस्मृति नाम के तथाकथित धार्मिक ग्रन्थ को सार्वजनिक रूप से जलाया था।

यह घिनौनी किताब मनुस्मृति दलितों और महिलाओं के मानवाधिकारों के खिलाफ लिखी गयी थी। जाहिर तौर पर इस किताब में पाखंड और अमानवीयता के सिवा कुछ और नहीं हो सकता था। आज अगर हर जगह जाति के आधार पर छुआछूत, ऊंच-नीच, गैरबराबरी जड़ें जमाए दिखती है तो उसकी वजह मनुस्मृति और उससे उपजा सामाजिक माइंडसेट है। सदियों से चला सामाजिक हीनताबोध अगर आज भी बना हुआ है तो उसका मुख्य कारण मनुस्मृति है।

 

मानव समाज में जाति के आधार पर भेदभाव को मनुस्मृति ने एक ठोस बुनियाद दिया था। चार वर्णों की व्यवस्था का भी उद्गम मनुस्मृति से होता है। वर्ण-व्यवस्था ने इंसानी समाज में ऊंच-नीच को जन्म दिया। हिन्दू समाज में दलितों के मानव अधिकार मनुस्मृति की वजह से छीन लिए गये। इससे संबंधित तमाम प्रकार की बातें मनुस्मृति में लिखी दर्ज हैं जो सामाजिक जीवन के सामान्य व्यवहार में आम हैं।

आज आधुनिक युग की घोषणा के बावजूद हम तमाम प्रकार की ख़बरों से रूबरू होते हैं, जिसमे यह पढ़ने या देखने को मिलता है कि फलां जगह दलितों के घर जला दिए गये… फलां जगह दलित लड़कियों के साथ उच्च जाति के किसी अपराधी ने बलात्कार किया या फलां जगह दलित महिला को नंगा कर घुमाया गया आदि। मसलन, फरीदाबाद में दो बच्चों को जिंदा जलाने या जोधपुर और बीकानेर में ऊंची कही जाने वाली जाति के मास्टरों द्वारा दलित बच्चों की बुरी तरह पिटाई जैसी घटनाएं ऐसे हजारों मामलों के बीच के महज चंद उदाहरण हैं। ऐसी तमाम दुखद ख़बरें हर रोज अख़बार, टीवी या फिर सोशल मीडिया पर पढ़ने-देखने को मिल जाती है। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि मनुस्मृति मानव समाज के लिए खतरा है, मानवीय मूल्यों के खिलाफ है।

मनुस्मृति को दरअसल मनु नाम के एक काल्पनिक व्यक्ति ने लिखा था। काल्पनिक इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि मनु को किसी ने देखा नहीं था और न ही इतिहास में मनु की शक्ल के बारे में कोई जानकारी मिलती है। मनुस्मृति की वजह से महिलाओं और दलितों के साथ अन्याय होता आ रहा है। भारत में महिलाओं के विरोध में कई प्रकार की रुढ़िवादी परम्पराएं चलती आ रही हैं। मिसाल के लिए दहेज़ प्रथा हो या घूंघट प्रथा। कन्याभ्रूण हत्या हो या बाल विवाह या फिर कन्या-दान जैसा शब्द।

उसी मनुस्मृति को जब बाबा साहेब ने सार्वजनिक रूप जलाया था तो उसका मकसद समाज के सबसे निचले पायदान पर धकेल दी गई जातियों और महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार एवं अन्याय को खत्म करके समानता वाले समाज की स्थापना करना था। यानी कि छुआछूत, जाति आधारित भेदभाव, ऊंच-नीच के साथ-साथ चार वर्णों की व्यवस्था को भी ख़त्म करना इसका उद्देश्य था। जाहिर है, इसका मकसद वास्तव में ब्राह्मणवाद को ख़त्म करके समाजवाद, आम्बेडकरवाद स्थापित करना था। यही वजह है कि ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलितों के संघर्ष के लिए मनुस्मृति दहन-दिवस मील का पत्थर साबित हुआ। बाबा साहेब ने उस दिन शाम को दिए भाषण में कहा था कि मनुस्मृति-दहन 1789 की “फ्रेंच-रेवोलुशन” के बराबर है। जाहिर है, बाबा साहेब हिन्दू समाज में जात-पात के खिलाफ थे और यही संघर्ष उनके लिए क्रांति था। सारा आम्बेडकरी साहित्य इस बात की पुष्टि करता है। दूसरी ओर, मनुस्मृति मानवता के विरुद्ध है और उसका रचियता मनु अन्याय का प्रतीक है।

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28 जून, 1989 को राजस्थान हाईकोर्ट के नए परिसर में मनु की मूर्ति की स्थापना की गई थी। माना जाता है कि मनु की मूर्ति की मांग लोकप्रिय नहीं थी और जाहिर है कि कुछ सामंती और पाखंडी लोग ही इस तरह के अन्याय और ऐसी अमानवीयता का समर्थन कर सकते हैं। चूंकि शुरुआत से लेकर काम पूरा होने तक इस काम को गोपनीय रूप से अंजाम दिया गया, इसलिए काम जारी रहने के बीच इसका विरोध भी सामने नहीं आ पाया। इस बारे में सिर्फ उन्हें ही जानकारी थी, जो लोग मूर्ति लगवा रहे थे। साफ है कि अन्याय का प्रतीक होने के बावजूद कुछ पाखंडी और रुढ़िवादी लोगों की इच्छा और मांग के मुताबिक मनु की मूर्ति या पुतला बना कर न्यायालय परिसर में लगाया जाना अन्याय के पक्ष में फैसला देने के बराबर है। ध्यान रहे कि संवैधानिक रूप से न्यायालय एक ऐसा संस्थान है, जहां सामाजिक और आर्थिक न्याय की उम्मीद की जाती है। मूर्ति लगने के बाद कई दलित संगठनों और महिला संगठनों ने इसके विरोध में धरना-प्रदर्शन किया। इसी के मद्देनजर 27 जुलाई, 1989 को राजस्थान हाईकोर्ट की एक पीठ ने 48 घंटे के भीतर मूर्ति को हटाने का निर्देश दिया। लेकिन इसके बाद विश्व हिन्दू परिषद के आचार्य धर्मेन्द्र ने न्यायमूर्ति महेंद्र भूषण के न्यायालय में एक रिट याचिका दाखिल कर दी और न्यायलय ने स्थगनादेश देकर मूर्ति हटाने से मना कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मनु की मूर्ति

आज भी राजस्थान हाईकोर्ट में मौजूद है।

मेरा सवाल है कि ऐसा न्यायालय न्याय देता होगा या केवल निर्णय?

राष्ट्र-निर्माता डॉ बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर और संविधान निर्माण समिति के द्वारा मनुस्मृति के संबध में अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रावधान लाया गया, जिसके अंतर्गत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में प्रावधान है कि अगर संविधान के लागू के बाद, यानी 26 जनवरी 1950 के बाद अगर कोई पुरानी परम्परा या विधान जो मौलिक अधिकारों का हनन करे,  जो किसी प्रकार की रूढ़ि भी हो सकती है, तो इस प्रकार की परंपरा को  अनुच्छेद 13 का उल्लंघन माना जायेगा। इसलिए मेरा मानना है कि मनु की मूर्ति का हाईकोर्ट में लगा होना एक प्रकार से “कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट”  यानी संविधान की अवमानना है।

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हरीश परिहार, स्वतन्त्र लेखक व टिप्पणीकार ।

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