तेजस हरड

एक समय ऐसा था जब मैं आरक्षण का बहुत मुखर तौर पर प्रतिवाद करता था। मैं आरक्षण नीतियों के समर्थन में फेसबुक पर लिंक और स्टेटस अपडेट पोस्ट करता था और जो चर्चा शुरू होती थी उसमें बहुत उत्साह से भाग लेता था। जो मेरी पोस्ट और मेरे आरक्षण समर्थक रुख की निंदा करते थे, बेशक सवर्ण होते थे। और वे उम्मीद के मुताबिक वही सुने-सुनाये तर्क देते थे। “IAS दलित का बेटा” का अलंकार, “गरीब ब्राह्मण” का अलंकार, और कैसे “प्रतिभावान” उच्च जाति छात्र “कोटा” छात्रों के कारण विफल हो जाते हैं इसके बावजूद कि वो उनसे कहीं अधिक अंक प्राप्त करते हैं।(महितोश मंडल ने ऐसे अलंकारों और अन्य आरक्षण विरोधी तर्कों को बहुत अच्छी तरह से राउंड टेबल इंडिया के अपने एक लेख (1) में खारिज किया है।

 

ब्राह्मण ज्ञान के पहरेदार थे/ हैं। वे इस तथ्य पर अभिमान करते हैं कि वे सर्वाधिक महत्त्व ‘शिक्षा’ को देते हैं। लेकिन ज्ञान और शिक्षा की इन सभी बातों के परे, जब आरक्षण की बात आती है वे ऐसे एकांगी तर्क बनाते हैं।

 

“अगर आप कक्षा में सर्वाधिक बुद्धिमान व्यक्ति हैं, आप सबसे अधिक अंक प्राप्त करेंगे।“

“अगर आप कक्षा में सर्वाधिक मेहनती छात्र हैं, आप सर्वाधिक अंक प्राप्त करेंगे।“ वे नहीं सोचते कि कुछ और अन्य कारक हो सकते हैं जो कि प्रभावित कर सकते हैं कि कोई छात्र कितना अंक प्राप्त करता है। आपकी जाति पूंजी और सामाजिक /आर्थिक /सांस्कृतिक पूंजी जो इसके साथ आती है, यह इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है कि अकादमिक रूप से आप कैसा प्रदर्शन करते हैं। लेकिन अधिकांश सवर्ण यह तथ्य समझने के लिए अत्यधिक मूर्ख हैं।

 

कभी-कभी मेरी फेसबुक वॉल पर बहुत ही उत्तेजित बहस हो जाया करती थी। आरक्षण के मेरे उत्साही प्रतिवाद के चलते मैंने कम से कम एक दोस्त खोया और अन्य बहुत से लोगों की शत्रुता को आकर्षित किया। विडंबना यह थी कि मेरे कुछ दोस्त जो मेरे आरक्षण रुख का समर्थन करते थे वे भी सवर्ण ही हुआ करते थे। अधिकांश दलित बहुजन को अभी तक अंग्रेजी में प्रवाह प्राप्त करना है और उस सांस्कृतिक पूंजी के साथ लैस होना है जो उनके लिए ऐसी चर्चाओं में भाग लेने की संभावना बनाती है। अंततः मैं हताश हो गया और आरक्षण के बारे में बात करना बंद कर दिया। एक अन्य बहुत महत्वपूर्ण कारण था जिस कारण मैं रुका : यह तथ्य कि आरक्षण दलित बहुजन का मुद्दा नहीं है।

अनूप कुमार इसे बहुत अच्छे से कहते हैं।

“..यही होता है जब आप जाति शब्द बोलते हैं; उच्च जातियों की पहली प्रतिक्रिया होती है ‘आरक्षण के बारे में क्या?’ और वे आपको नहीं सुनेंगे| वे उस मुद्दे पर नहीं सुनेंगे जो आप कह रहे और वे सारी बहस को केवल आरक्षण तक सीमित कर देना चाहते हैं। क्योंकि ये उनका मुद्दा है; यह है जो उनको तकलीफ़ पहुंचाता है। आरक्षण मुझे बिलकुल तकलीफ़ नहीं देता इसलिए यह मेरा मुद्दा नहीं है। मेरे लिए आरक्षण बहस तय हो चुकी थी जब संविधान लिखा गया था। मैं आरक्षण पर बहस नहीं कर रहा| चाहे यह अच्छा है या बुरा, वह आपकी बहस है क्योंकि यह आपको तकलीफ़ देता है।” (2)

 

आरक्षण के बारे में बात करने में बहुत ऊर्जा जाती है क्योंकि बहुत सारे सवर्ण होते हैं जो केवल आपको चुप कराने की कोशिश कर रहे होते हैं। मैं बल्कि वह ऊर्जा कहीं और लगाना पसंद करूंगा। मैं बल्कि शिक्षा जगत में ब्राह्मणों के एकाधिकार पर बात करूंगा। मैं बल्कि दलित और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर बात करूंगा। मैं बल्कि बात करूंगा कि दलित, बहुजन, आदिवासी कैसे यथास्थिति को चुनौती दे रहे हैं और हमारी दमनात्मक जातीय संरचना पर चोट बना रहे हैं। मैं आरक्षण के बारे में बात नहीं करूंगा; मैं इसके बारे में बात नहीं करुँगा जब तक कि इस नीति के अस्तित्व को कोई गंभीर संकट ना हो।

 

हाल ही में एक मित्र ने आरक्षण पर विलाप करते हुए अनुशीर्षक के साथ निम्न चित्र को साझा किया था:

 

 

अन्य मित्र, एक ब्राह्मण मित्र ने मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए टिप्पणियों में मुझे उल्लेखित किया। मैंने यहां तक भी क्रॉस –चेक नहीं किया कि अंक पत्र वास्तविक थे। मैंने पोस्ट को केवल अनदेखा कर दिया।

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टिप्पणियां

1. कुमार,अनूप (2015) : “दी कलेक्टिव डाईलेमा ऑफ़ द लेफ्ट, राईट एंड सेंटर: व्हाट टू डू विद अम्बेडकर?” राउंड टेबल इंडिया,

 http://roundtableindia.co.in/index.php?option=com_content&view=article&id=8199:how-can-they-say-they-are-above-caste&catid=119:feature&Itemid=132

2. मंडल,महितोश (2015): “दी क्वेश्चन ऑफ़ रिजर्वेशन एंड द फ्यूचर ऑफ़ द दलित-बहुजन्स इन इंडिया” राउंड टेबल इंडिया,

http://roundtableindia.co.in/index.php?option=com_content&view=article&id=8408:the-question-of-reservation-and-the-future-of-the-dalit-bahujanas-in-india&catid=119:feature&Itemid=132

तेजस हरड इकोनॉमिक और पोलिटिकल वीकली के प्रतिलिपि संपादन विभाग में काम करते हैं। उनकी रूचि अम्बेडकरवाद, स्त्रीवाद और सैद्धांतिक मार्क्सवाद के इंटरसेक्शन के अध्ययन में है।

हिन्दी अनुवादक : पुष्पा यादव

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