टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टीआईएसएस) मुंबई में, 22 दिसंबर 2014 को हुए अम्बेडकरवादी छात्र संघ द्वारा आयोजित वार्ता पर उनका भाषण है , इस भाषण को  वल्लिंमल करुणाकरण द्वारा लिप्यंतरित किया गया है.

मेरा नाम अनूप है और मैं भारतीय कैम्पसों में दलित विद्यार्थियों के मुद्दों पर लगभग 20 सालों से काम कर रहा हूँ, पहले एक विद्यार्थी के रूप में और फिर अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद एक संगठनकर्ता के रूप में. मै अन्य गतिविधियों में भी संलग्न रहा हूं पर मुख्यतः विद्यार्थियों पर केंद्रित रहा. भारतीय कैम्पसों और जाति – इस विषय के बारे में, मैं इन कैम्पसों के साथ एक बहुत प्यार-नफ़रत का रिश्ता साझा करता हूं. ये कैम्पस, जिन्हें मैं वास्तव  में नष्ट कर देना चाहता हूँ क्योंकि मै मानता हूँ कि ये हमारे स्थान नहीं हैं. लेकिन दूसरी ओर, मैं हमारे विद्यार्थियों को इन स्थानों में प्रवेश के लिए मदद भी करता हूँ.

मैं पिछले दो सालों से वर्धा में विद्यार्थियों को पढ़ाता हूं. मैं विद्यार्थियों को विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं में प्रवेश के लिए पढ़ाता रहा हूं. मै चाहता हूं कि वे इन जगहों में प्रवेश पाए पर किन्हीं वजहों से मुझे यह विश्वास नहीं है कि ये शैक्षिक संस्थान  हमारे विद्यार्थियों को न्याय उपलब्ध कराएंगी क्योंकि इन जगहों की पूरी निर्मिति (डिजाइन) बहुत ब्राह्मणवादी है. और मेरा यह अनुभव मेरे शुरूआती इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों से लेकर जे.एन.यू. और उसके बाद तक रहा है. इन जगहों में कुछ ऐसा अन्तर्निहित है जो असल में हमारे विद्यार्थियों के आत्म-सम्मान को छीन लेता है और उन्हें बहुत अकेला और अवांछनीय महसूस कराता है. मैं TISS के उदाहरण के साथ शुरू करूंगा, TISS की प्रवेश प्रक्रिया, जिसके द्वारा मैं यह समझाने की कोशिश करूंगा कि मेरा क्या मतलब है जब मैं कहता हूं कि मैं इन कैंपसों से नफरत करता हूं और विश्वास करता हूं कि ये स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणवादी जगहें हैं. यह हमारे लिए बहुत बड़ी लड़ाई है, यह एक द्वन्द्व है कि मैं चाहता हूँ ये जगहें कमजोर पड़ें और कम ब्राह्मणवादी बनें या एक वैकल्पिक जगह की दृष्टि पैदा करने की कोशिश किया जाए.

 

मैं महाराष्ट्र के छोटे से कस्बे में छात्रों को पढ़ा रहा हूं. तो पिछले साल [2013] में, मेरे 24 छात्र TISS प्रवेश परीक्षा के लिए बैठे और उनमें से सभी बहुत निम्न पृष्ठभूमि से थे- एससी, ओबीसी और एनटी/ डीएनटी, किसी ने भी अंग्रेजी माध्यम से पढाई नहीं किया था. मैंने उनको परीक्षा में बैठने के लिए पूछा क्योंकि हमारे छात्रों के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं था. इस पर भी मुझे उनको फॉर्म भरने के लिए प्रेरित करना पड़ा. उनमें से किसी को TISS के बारे में नहीं पता था. जैसे ही उनको मालूम चला कि प्रवेश परीक्षा अंग्रेजी में होगी, उनकी प्रतिक्रिया थी “नहीं नहीं, हम परीक्षा में नहीं बैठ सकते, हम इसमें प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते”. इसलिए मुझे उनको प्रेरित करना पड़ा. उनमें से मेरे कुछ छात्र अभी यहां बैठे हुए हैं. मुझे उनको आवेदन के लिए बाध्य करना पड़ा क्योंकि मुझे मालूम था कि वे प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, यह नहीं कि वे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते. इसलिए वे परीक्षा में बैठे और 3 महीने की मेहनत के बाद, उनमें से 12 प्रारंभिक लिखित परीक्षा को पास करने में सक्षम हुए. अंत में 12 में से 5 छात्र TISS में जाने में सफल हुए.

वह पहली बार था जब मैंने परीक्षा पैटर्न को देखना शुरू किया. मैंने खुद भी कई प्रवेश परीक्षाएं दी हैं लेकिन मैं अंग्रेजी माध्यम का छात्र था इसलिए तब मैं पैटर्न नहीं समझ सका. लेकिन अब जब मैंने पूछे गये प्रश्नों को देखा [इन परीक्षाओं में], सब कुछ अंग्रेजी में, सब कुछ ऑनलाइन. मेरे अधिकांश छात्रों ने कभी कंप्यूटर छूआ भी नहीं था. इसलिए परीक्षा के आखिरी दो-तीन दिन पहले [TISS ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा], मुझे उनको अपने घर लाना पड़ा, और वे मेरे साथ रुके. मुझे उनको लैपटॉप चलाना और ऑनलाइन परीक्षा के लिए कैसे बैठें, सिखाना पड़ा.

जब छात्र परीक्षा देकर वापिस आये, मैंने उनसे प्रश्न पत्र के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि लगभग 30 प्रतिशत प्रश्न अंग्रेजी ज्ञान, 30 प्रतिशत सामयिकी, और कुछ गणित और तर्क-संबंधी प्रश्न थे. मैं नहीं समझ पाया कि जब प्रश्न पत्र पहले से ही अंग्रेजी में था, तो उन्हें फिर से अंग्रेजी परीक्षण के लिए 30-40 प्रश्नों की और क्या ज़रुरत थी. असल में यहीं से भेदभाव शुरू होता है. यहीं से मुझे समझ आया कि वास्तव में आप हमारे बच्चों को TISS में आने ही नहीं देना चाहते. आप केवल अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं – अंग्रेजी बोलने वाले बच्चों को – सामाजिक कार्यकर्त्ता बनने के लिए, मनरेगा के बारे में बात करने के लिए, गरीब के बारे में बात करने के लिए. आप उन बच्चों को कैंपस में आने और पढने नहीं देना चाहते जिन्होंने वास्तव में मनरेगा के बारे में प्रत्यक्ष रूप से सीखा है. इसलिए मुख्य रूप से आप चाहते हैं आपके अपने बच्चे आयें और सामाजिक कार्यकर्त्ता बनें और उन लोगों के मुद्दे पर काम करें जो आपके कैम्पसों में कभी भी दाखिला नहीं लेने जा रहे. जिस तरह के प्रश्न आप पूछते हैं ! सामयिकी में यूरोपियन फूटबाल के बारे में ! मेरे किसी छात्र ने उसके बारे में कभी सुना ही नहीं है.

मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूं– आप किस तरह के ज्ञान का परीक्षण कर रहे हैं? आपके ज्ञान का मानदंड क्या है? आपके ज्ञान की परिभाषा क्या है? जिस तरह के ज्ञान का परीक्षण आप कर रहे हैं, इस देश में बहुसंख्यक छात्रों के दैनिक जीवन से उसका कोई वास्ता ही नहीं है. और यह केवल एक घटना है जिसके बारे में मैं बता रहा हूं, ऐसे हजारों और हज़ारों छात्र हैं जो आपकी परीक्षाओं में मात्र बैठ ही नहीं सकते- इसलिए नहीं कि वे आपसे कम बुद्धिमान हैं- बल्कि परीक्षा की रूप-रेखा इस तरह से बनायीं गयी है कि यह इन लोगों को बाहर रखती है. फिर मैंने अन्य सभी परीक्षाओं के पैटर्न को देखना शुरू किया – हर जगह वही बात.

फिर अगला पल आता है जब ऐसा छात्र कैंपस में पहुंचता है, अगर वह किसी तरह पहुंच जाता है. अगर मैं अंग्रेजी माध्यम छात्र नहीं हूं, अगर मैं एक बहुत निम्न परिवेश से हूं, मैं पक्के तौर पर आरक्षण के जरिये आने वाला हूं  क्योंकि मैं आपके साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं हूं. यह इतनी सीधी सी बात है. इसका मेरी या आपकी योग्यता (मेरिट) से कुछ लेना-देना नहीं है. यह मात्र संयोग है कि आप एक अंग्रेजी माध्यम छात्र हैं और मेरे कोई भी छात्र नहीं हैं. इसका आपकी या उनकी बुद्धिमत्ता से कोई मतलब नहीं है. पूरी व्यवस्था इस तरह निर्मित्त की गयी है कि स्वयं ज्ञान की अवधारणा – ज्ञान क्या है? क्या ज्ञान बनाता है? – इस तरह से परिभाषित है कि आपके अपने बच्चे इन परीक्षाओं में सफल हो सकते हैं.

फिर दूसरी अवधारणा आती है- योग्यता (मेरिट). किसी तरह हमारे छात्र आरक्षण के द्वारा सफल होते हैं, और फिर उनके खिलाफ यह पूरी बात-चीत शुरू हो जाती है – “ देखो हमने प्रवेश परीक्षा में 70 प्रतिशत अंक प्राप्त किया लेकिन तुम केवल 45 प्रतिशत पर सफल हो गये. इसलिए तुम अयोग्य हो.” यह एक धांधली वाली परीक्षा है. यह एक एकतरफ़ा परीक्षा है. जिस पल हमारे छात्र किसी तरह आरक्षण के जरिये पहुंचते हैं, वे फिर से अयोग्य छात्रों के रूप में चिन्हित कर दिए जाते हैं, वे जो वहां होने के लायक नहीं हैं. पूरी तरह से अवांछनीय ! वे यहां तक कि पहले दिन से ही TISS में पहुंच पाने में सक्षम होने की ख़ुशी भी नहीं मना सकते. मैं TISS को बेहतर संस्थानों में से एक मानता हूं लेकिन आप केवल कल्पना करिए आईआईटी का, चिकित्सा विश्वविद्यालयों का ! एक छात्र किस यंत्रणा से गुजरता है जब उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता/जाती है! यह खुला मामला है. कुछ भी छुपा नहीं रहता. शिक्षक इसके बारे में जानता है,छात्र और सहपाठी इसके बारे में जानते हैं. फिर क्या होता है, मैं यहां तक कि अपनी सफलता की ख़ुशी मनाने में भी सक्षम नहीं हूं क्योंकि मेरी प्रतिभा प्रवेश परीक्षा में अंकों तक सीमित कर दी गयी है.

मैं उन सभी छात्रों की कहानियां बता सकता हूं जिनको मैंने पढ़ाया है. 24 छात्रों में से 22 लडकियां थीं. सभी छात्रों में से जो अंततः TISS में सफल हो पायीं, लड़कियां हैं,सभी वर्धा जिले के विभिन्न भागों से हैं. सभी गांवों से हैं और वे सभी सामाजिक कार्य स्नातक(BSW) छात्राएं थीं और यहां से एम.ए करना चाहती थीं. मैं आपको उनकी जिंदगियों में एक झलक देने की कोशिश करूंगा. मैं उनकी जिंदगियों को रूमानियत के रंग में रंगने की कोशिश नहीं कर रहा हूं ; मैं केवल बताने की कोशिश कर रहा हूं कि वास्तव में योग्यता क्या है. ये सभी लड़कियां 5-5.30 पर उठती हैं, खाना बनाती हैं, वे उनके भाईयों या बहनों को स्कूल भेजती हैं, फिर वे 7 बजे की बस लेती हैं, वर्धा आती हैं, जो कि कुछ 30-40 किलोमीटर दूर है, 9 बजे उनकी कक्षाएं शुरू होती हैं और 12 बजे तक रहती हैं, फिर उन्हें वापिस जाकर खाना, सफाई इत्यादि करना होता है और इन सबके बीच उन्हें पढाई के लिए भी समय निकालना होता है. इसलिए मैं महसूस करता हूं – उनकी योग्यता के बारे में क्या? अगर वे 35 प्रतिशत अंकों, 45 प्रतिशत अंकों पर TISS में सफलता पा रही हैं- क्या यह सराहनीय नहीं है? ये लड़कियां, जो इतना मेहनत करती हैं, खाना बनाती हैं, भाईयों/ बहनों को स्कूल भेजती हैं, बस, ट्रेन पकडती हैं, कक्षाओं में जाती हैं, वापिस जाती हैं, खाना बनाती हैं, और बर्तन साफ़ करती हैं.. यह केवल वर्धा नहीं है, यह हर जगह है. तो उन छात्रों के बारे में क्या? प्रत्येक अभिजातीय और राज्य संस्थान ऐसे छात्रों को प्रवेश परीक्षा के पहले कदम से ही बाहर कर देने के लिए डिज़ाइन किया गया है.

मैं पहला व्यक्ति नहीं हूं जो यह कह रहा है; डॉ आंबेडकर ने इसे 1926 में मुंबई विधानसभा के अपने भाषण में कहा था. मुंबई विश्वविद्यालय विधेयक के बारे में एक बहस पर, उन्होंने बहुत सशक्त रूप से कहा था: “ यह गलत है! प्रवेश का स्तर ऊपर उठाकर, इसे इतना कठिन बनाकर, वास्तव में आप इस देश में बहुसंख्यक लोगों को छोड़  रहे हैं जिनके पास शिक्षा की कोई परंपरा नहीं है. यह पहली बार है ये लोग शिक्षा में आ रहे हैं और इन स्तरों को ऊपर उठाकर आप उन्हें बाहर कर रहे हैं”. उन्होंने योग्यता शब्द के बारे में बात नहीं किया क्योंकि शायद उस समय तक योग्यता की धारणा प्रचलन में नहीं थी लेकिन वह छात्रों के लिए इसे इतना मुश्किल बनाये जाने के बारे में बात कर रहे थे.  

तो अगर मैं इन स्थानों को ब्राह्मणवादी बोलता हूं, मैं कुछ प्रोफेसरों या कुछ छात्रों को ब्राह्मणवादी नहीं बोल रहा- बेशक वहां ऐसे बहुत हैं जो हैं – लेकिन कुछ प्रोफेसरों को दोष देने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं कह रहा हूं कि ये शैक्षिक स्थान पहले दिन से भेदभाव करने के लिए जान-बूझकर इस तरह से डिज़ाइन किये गये हैं. आई आई टी का ही मामला ले लीजिये. चार साल पहले, हममें से कुछ लोग आई आई टी के पैटर्न का अध्ययन करने के लिए साथ आये. काम करते समय हमें ऐसे कई मामले मिले जिनमें दलित और आदिवासी छात्रों ने आत्म-हत्या कर लिया था. एक यह आई आई टी कानपुर है. हम वहां गये और मालूम चला कि पिछले कुछ सालों में वहां 11 आत्म-हत्याएं हुई हैं. 11 में से 8 दलित और आदिवासी छात्र थे जो आत्म-हत्या कर चुके हैं.  

देखिये, आत्म-हत्या ऐसी चीज है जो असामान्य नहीं हैं. भारत में उच्च शिक्षा में यह बहुत आम है. सभी जगह, USA में, UK में भी छात्र आत्म-हत्या करते हैं. यह कुछ नया नहीं है. यह नहीं कि इसका केवल जाति के साथ या भारत से लेना-देना है. लेकिन इस बात ने हमें और अधिक गहराई से देखने पर मजबूर किया कि 11 में से 8 छात्र जिन्होंने आत्म-हत्या किया, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति पृष्ठभूमि से थे. और अगर आप आई आई टी कानपुर में देखते हैं, वहां मुश्किल से 10-12 प्रतिशत अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति छात्र हैं. अनुपात देखिये. यह बताने का बहुत असभ्य तरीका है लेकिन फिर भी मुझे आपसे कहने दीजिये कि अगर 11 आत्महत्याओं में से 80 प्रतिशत एक निश्चित पृष्ठभूमि से हैं, तब निश्चित तौर पर वहां एक समस्या है. कल्पना करिए अगर 11 छात्र आत्म-हत्या करें और उनमें से 8 स्त्रियां हैं, निश्चय ही वहां समस्या है.

हमने बहस करने की कोशिश की लेकिन आप जानते हैं उन्होंने हमें बाहर फेंक दिया. उन्होंने कहा, ‘ओह आप लोग यहां एक जाति मुद्दा पैदा कर रहे हैं’. उनका मानक उत्तर था, ‘आप देखिये हमारी जगहें बहुत प्रतिस्पर्धी हैं और ये छात्र कमजोर छात्र थे, वे प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं थे. वे इसे लेने को तैयार नहीं थे और वे अत्यधिक निराश हो गए और आत्म-हत्या कर ली. हमारे पास योग कक्षाएं हैं. वे योग कक्षाओं में क्यों नहीं आते? इस प्रकार के उत्तर हमें आई आई टी प्रशासन से मिले. और जैसे ही हम और जानने की कोशिश करने लगे, उन्होंने यह कहते हुए हमें सचमुच बाहर फेंक दिया, ‘तुम लोग समस्याएं पैदा कर रहे हो’. आई आई टी ऐसे मेधावी संस्थान माने जाते हैं.

यह एक आई.आई.टी. कानपुर की ही बात नहीं है. हमें पता चला कि देश भर में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या बहुत अधिक है जिन्होंने आत्महत्या की और इनमें से बहुतायत इन्हीं दो वर्गों – अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति – से संबंध रखते हैं. कुछ तो जरूर है! और तब हमने कुछ डाटा प्राप्त करने की कोशिश की और हमनें  22 मामलों को निकाला. हमनें विशेष रूप से केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों पर ध्यान केंद्रित किया. कोई राज्य विश्वविद्यालयों की चिंता नहीं करता. यदि मैं कहता हूं कि लखनऊ विश्वविद्यालय में 3 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की तो किसी को चिंता नहीं होती. पर यदि मैं कहता हूं कि आई.आई.टी. दिल्ली में 3 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की तो सभी का ध्यान जाता है. तो यह हमारी एक प्रकार की रणनीति भी थी. हमें कहीं ध्यान केंद्रित करना था और हमनें केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आई.आई.टी और चिकित्सा कॉलेजों पर ध्यान केंद्रित किया. हमारे पास आत्महत्या के कई मामले थे पर हमने पिछले 3 सालों तक की घटनाओं पर ध्यान केंद्रित किया ताकि हम जाकर परिवार से बात कर सकें, कुछ दोस्त हो सकते है जो हमारी मदद कर सकें. तो हम गए और हमने 22 मामलों पर दस्तावेज़ तैयार किया और हमनें इससे 3 तीन डाक्यूमेंट्रीज़ ‘द डेथ ऑफ़ मेरिट’ के नाम से बनायी. हमनें इन वृत्तचित्रों (डाक्यूमेंट्रीज़) को यू-ट्यूब पर डाला और इस पर काफी हल्ला-गुल्ला हुआ. केन्द्रीय सरकार ने कहा कि वे कुछ करेंगे पर हुआ  कुछ भी नहीं..

इन डॉक्यूमेंट्री को बनाते समय जो बात सबसे स्पष्ट तौर पर निकल कर आई वह थी कि इन 22 विद्यार्थियों में से कोई भी आपका तथाकथित ‘कमजोर छात्र’ नहीं था. दलितों को ‘कमजोर छात्र’ और ‘गैर- मेधावी’ छात्रों के समतुल्य मानने की यहां पूरी प्रवृत्ति है. यदि आप यह मामला लें जिसे हमने AIIMS, नई दिल्ली से डॉक्यूमेंट किया, विद्यार्थी जिसने आत्महत्या की– बालमुकुन्द भारती- बुंदेलखंड से था. वह अपने स्कूल से टॉपर था. वह स्वर्ण पदक विजेता (गोल्ड मेडलिस्ट) था. वह भारत के राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया गया था. और पहले दिन जब वह AIIMS में आता है रैगिंग होती है और जातीय आधारों पर वह बहुत बुरी तरह से पीटा जाता है. उसे छात्रावास में कमरा मिलता है जहां केवल उच्च जातीय विद्यार्थी रहते हैं.

मै 2006 के AIIMS की बात कर रहा हूं जब वहां यह पूरा ओ.बी.सी. आरक्षण विरोधी आन्दोलन चल रहा था. तो पहले से ही हमारे विद्यार्थी बहुत असुरक्षित महसूस कर रहे थे. उसी साल, मेरे इस मित्र ने प्रवेश लिया और इन सब में फंस गया. उसे बहुत बुरी तरह पीटा गया. उसे गालियां दी गयीं. हमारे विद्यार्थियों के दरवाजों पर उच्च जाति विद्यार्थियों ने लिखा था “तुम निर्दयी एससी/ एसटी इस विंग से बाहर निकल जाओ”. और जब उन्होंने इस संबंध में प्रोफेसरों से शिकायत की, कुछ नहीं हुआ. एससी/ एसटी विद्यार्थियों को छात्रावास की उस विंग से निकलना पड़ा. बालमुकुन्द को भी निकलना पड़ा, इस तरह उसका पहला साल शुरू हुआ. पांचवें साल तक, वह शैक्षणिक रूप से बहुत अच्छा नहीं कर रहा था पर पास हो रहा था. वहां यह एक पाठ्यक्रम – सोशल मेडिसिन – था जो कि बहुत सरल पाठ्यक्रम माना जाता है. तो वह सभी पाठ्यक्रमों में पास हो गया पर इस पाठ्यक्रम में वह  एक ही प्रोफेसर के द्वारा दो बार फेल कर दिया गया. जब उसने प्रोफेसर के पास जाकर उससे बात की, प्रोफेसर ने कहा – “तुम यहां आरक्षण से आते हो, तुम्हारे पास डॉक्टर बनने का दिमाग नहीं है”. ध्यान दीजिए ये बालमुकुन्द का पांचवा साल है. यह उसका अंतिम साल था. प्रोफेसर ने उससे कहा – तुम एक डॉक्टर बनने के योग्य नहीं और मै तुम्हें फेल करूंगा, जो भी तुम करते हो मुझे परवाह नहीं. यह उसके एक दम टूट जाने का बिन्दु था. बालमुकुन्द स्पष्ट रूप से संघर्ष कर रहा था. वह अपने पूरे 5 साल तक संघर्ष करता रहा था जैसाकि उसके दोस्तों और परिवार वालों ने हमें बताया. और एक दिन, उसके डिग्री पूरा होने के 2 महीने पहले, उसने आत्महत्या कर लिया. यह एक ऐसा मामला था जिसमें आत्महत्या के बाद अभिभावक बहुत खुले रूप से बाहर आए.

आत्महत्याएं हो रही थीं. आत्महत्याएं हो रही थीं जहां दलित और आदिवासी विद्यार्थी मर रहे थे पर यह पहला मामला था जहां अभिभावक बहुत खुले रूप से कहते हुए बाहर आए कि यह एक जातिगत मुद्दा है. और वे मीडिया तक गए. ये अभिभावक बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि, मध्य प्रदेश के बुन्देलखंड क्षेत्र के एक गांव से थे. यदि आप डॉक्यूमेंट्री देखें तो अभिभावक इसमें कहते हैं कि उनका बेटा उस क्षेत्र से डॉक्टर बनने वाला पहला व्यक्ति था. यह पहला लड़का था जो दिल्ली गया. यह पहला लड़का था जो पूरे आस-पास के क्षेत्र से निकलने वाला पहला डॉक्टर बन सकता था. उसके पिता राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग गए; वे अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग गए. इस प्रकार हम इस मामले के बारे में जान पाए और सोचा की हमें कुछ करना है. हम उसके गाँव गए और उसके अभिभावकों और दूसरे परिवारजनों से बात की और तब हमने डॉक्यूमेंट्री बनाई.

मेरा खुद का इंजीनियरिंग कॉलेज का अनुभव वैसा ही था. मैं भी अपनी इंजीनियरिंग पूरी नहीं कर सका. इसलिए कैम्पसों में जातीय भेदभाव के बारे में मुझे पता था. लेकिन ऐसे पिता से बात करना जिसने अपना बेटा खोया हो, हमारे लिए बहुत दिल दहलाने वाला अनुभव था और हम सच में कुछ करना चाहते थे, हमने एक टीम बनाया और और अधिक वृत्तचित्रों (डाक्यूमेंट्रीज) को बनाया. और पहली बार, उच्च शिक्षा में जाति थोड़ा सा सार्वजनिक मुद्दा बनी . इन डॉक्यूमेंट्री से पहले कोई हमारा विश्वास करने को तैयार नहीं था कि वहां कैम्पसों में जाति है.

यह धारणा थी और मेरा अपना परिवार भी इस धारणा में विश्वास रखता था कि शिक्षा के साथ जाति खत्म हो जाती है. जाति वहां मेरे गांव, मेरे घर में है लेकिन आप जानते हैं मेरे अपने पिता और मेरी मां यह माना करते थे कि एक बार आप दिल्ली चले गए, शहर चले गए, वहां जाति नहीं है, जाति स्थानीय समस्या है. इस तरह हम यह मानते हुए बड़े हुए कि जाति केवल वहां अशिक्षित लोगों के बीच है, शिक्षा के साथ जाति खत्म हो जाती है. अब जब मैं पीछे मुड़ के देखता हूं – पहले यह मुझे बहुत गुस्से से भर देता था कि मेरे माता-पिता झूठ क्यों बोलते थे. मेरे पिता वकील थे, वह कोई अशिक्षित व्यक्ति नहीं थे जो नहीं जानते थे. वह एक वकील थे, क्यों उन्होंने मुझे जाति के विरुद्ध अपनी सुरक्षा के लिए कभी तैयार नहीं किया. क्यों मेरे घर में जाति पर कोई बात नहीं हुआ करती थी. वहां क्यों यह इंकार था. एक लम्बे समय तक यह मुझे बहुत गुस्सा दिलाया करता था.

लेकिन अब जब मैं पीछे देखता हूं तो अपने पिता को कहीं बेहतर समझ पाता हूं. और मैं सराहना करता हूं, क्योंकि यह अपने बच्चे को बड़ा करने का एकमात्र तरीका था. यह एक मात्र सकारात्मक चीज है, क्योंकि वह जानते थे कि दुनिया कैसी है. यह इंकार है, निश्चित रूप से यह एक इंकार है. पर यहां अपने बच्चों को बचाने की प्रवृत्ति है. ठीक? जिस सीमा तक यह संभव है. और यह प्रवृत्ति मैंने अपने सभी दलित मित्रों के बीच में देखा है. हमारे अभिभावक जाति के बारे में बात नहीं करना चाहते. पर क्या होता है कि जब आप घर पर जाति की बात नहीं करते हैं यह मुझे पूरी तरह से रक्षाहीन कर देता है जब मै इन जगहों में प्रवेश करता हूं. मुझे कुछ भी नहीं पता होता है कि कैसे एक जातिवादी से निपटा जाए और कैसे जाति से निपटा जाए. और यह विश्वास बहुत मजबूत है कि शिक्षा सभी सामाजिक बुराईओं का सर्वरोगहारी इलाज़ है और शिक्षा के साथ सभी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. मेरे अपने माता-पिता ने यह मानने से इंकार किया कि मेरे साथ इंजीनियरिंग कॉलेज में जो हुआ, उसका जाति के मुद्दे से कोई संबंध था. तो इस प्रकार के वातावरण से होकर हम आते हैं और यह वह है जिससे मैंने हमेशा लड़ने की कोशिश की है. यह केवल इन शैक्षिक जगहों के विरुद्ध संघर्ष के बारे में नहीं है जो स्पष्ट तौर पर  ब्राह्मणवादी हैं, सिरे से ब्राह्मणवादी जगहें हैं लेकिन हमारे रक्षाहीनता के बारे में भी है, जो हमनें खुद पैदा किया है.  

एक और मुद्दा है – यह पूरा आख्यान जो कि स्वतंत्रता के बाद निर्मित किया गया है कि उच्च जातियां जाति-विहीन हैं. यदि आप इतिहास देखें तो आप देखेंगे कि स्वतंत्रता के पहले तक यह नहीं था. मैं आपको एक उदाहरण देता हूं. पिछले 2 सालों से, यह NCERT कार्टून विवाद चल रहा है. उस बहस के दौरान स्वंत्रतापूर्व समय के कई कार्टून प्रकाश में आए. मैं यह देखकर अचंभित था कि इनमें से कई जाति-व्यवस्था को निशाना बना रहे थे. उस समय के कई कार्टूनिस्ट जाति-व्यवस्था की आलोचना करने वाले कार्टून बना रहे थे; यहां तक कि वे ब्राह्मण छवियों को किसी चोटीधारी और ब्राह्मणवाद के प्रतीक के रूप में खींच रहे थे. यह दिखाता है कि 1947 के पहले कुछ जगह उपलब्ध थी, जहां जाति पर बात होती थी. निश्चित रूप से जाति तब विमर्श में थी. लेकिन स्वतंत्रता के बाद क्या हुआ? मैंने अपने बचपन और बड़े होने की कालावधि में कभी कोई एक कार्टून भी ऐसा नहीं देखा जो जाति पर बात करता हो, जबकि सभी समाचार-पत्रों में एक कार्टून अनुभाग होता है. उस विमर्श को आखिर हुआ क्या? यह वही देश है जहां यह विमर्श तब था और स्वतंत्रता के तुरंत बाद यह विमर्श खत्म हो जाता है. एकमात्र जाति-विरोधी विमर्श जो आप जानते हैं, इन अभागे दलित कार्यकर्त्ताओं, आंबेडकरवादियों के साथ बचा हुआ है.

हुआ यह है कि यह जातिविहीनता का पूरा आख्यान पूरी तरह से प्रचारित है, कि कोई जाति नहीं है, कि जाति अतीत की बात है. जैसे ही मैं बोलता हूं कि मैं दलित हूं तो उच्च जाति अप्रसन्न हो जाता है, क्योंकि वह मानता है कि मैं उसे किसी चीज़ का दोषी ठहरा रहा हूं. वह वास्तव में मानता है कि जाति नामक कुछ नहीं है और जाति केवल एक राजनीतिक जोड़-तोड़ है. तो क्या होता है कि यह मेरे अभिव्यक्ति को अपराधिकृत करता है. मैं एक अपराधी बन जाता हूं. मै एक अपराधी बन जाता हूं क्योंकि मै एक ऐसा मुद्दा उठा रहा हूं जो बहुत पहले समाप्त हो चुका है, जो है ही नहीं, जो अब प्रासंगिक नहीं है और मै यह मुद्दा उठा रहा हूं क्योंकि मुझे कोई राजनीति करना है. आप जानते हैं जैसे ‘मुझे मायावती ने भेजा है’. मैं मजाक नहीं कर रहा; ये बयान हैं जो JNU में बोले जा रहे थे.

मैं 2001 में JNU से जुड़ा और पहले ही सत्र में भारतीय राजनीतिक प्रणाली पर एक पेपर है जो बहुत ही नामी मार्क्सवादी द्वारा पढ़ाया जाता है. तो वह यह पाठ्यक्रम पढ़ा रहे थे और फिर वहां कक्षा में आरक्षण पर यह पूरी बहस होने लगी. जिस पल आरक्षण पर बहस आती है, आप जानते हैं, हमारा ऐन्टेना भी खड़ा हो जाता है. यह पहला सत्र था और हम 70 छात्रों की कक्षा में कुछ 8-9 अनुसूचित जाति और जनजाति छात्र थे. जिस पल आरक्षण की बहस आती है “प्रगतिशीलता’ का पूरा आवरण उड़ जाता है. अगर विस्थापन या परमाणु हथियार या समाज में वर्ग विभाजन के मुद्दे पर बहस है, पूरी कक्षा एक बहुत प्रगतिशील स्टैंड लेती है लेकिन जैसे ही आरक्षण का मुद्दा आता है वहां तुरंत एक विभाजन होता है और उच्च जाति का बहुत सारा गुस्सा खुलकर बाहर आता है लेकिन आप जानते हैं हम अपना मुंह बंद रखते हैं. उनके प्रश्न कुछ इस तरह के होते थे- सर, उन्हें आरक्षण की क्या ज़रुरत? वे अब कुलीन स्कूलों में पढ़ते हैं. कक्षा में 8 दलित छात्रों में, शायद मैं केवल अकेला था जो अंग्रेजी माध्यम पृष्ठभूमि से था. बाकी झारखण्ड, बिहार, तमिलनाडु इत्यादि के अंदरूनी हिस्सों से आये हुए बहुत निम्न पृष्ठभूमि से थे और उनमें से कोई भी अंग्रेजी में कुशल नहीं था और अचानक वे सभी एक बहुत ‘अभिजन पृष्ठभूमि’ से बन गये! और उसके लिए मेरे प्रोफेसर ने उत्तर दिया – नहीं, दलित मलिन बस्तियों में रहते हैं. वे बहुत गरीब लोग हैं.

मुझे पता था नहीं, मैं मलिन बस्तियों में नहीं रहता. और मुझे नहीं लगता कि यहां अधिकांश दलित छात्र मलिन  बस्तियों में अब भी रहते हैं. मैंने सोचा अगर आरक्षण पर यह प्रोफेसर मुझे समझाने में सक्षम नहीं हैं तो वह उच्च जाति छात्रों को आरक्षण पर समझाने में कैसे सक्षम होंगे. वह जाति को केवल गरीबी से जोड़ रहे थे. वह भेदभाव के बारे में बात नहीं कर रहे थे. वह संरचनात्मक समस्याओं के बारे में बात नहीं कर रहे थे. लेकिन वह एक अच्छे  कामरेड थे , इसलिए वह ‘ब्राह्मणवाद विरोधी भी’ थे ! और इसलिए उन्होंने बहुत छात्रों को नाराज़ कर दिया क्योंकि उन्होंने एक बार कक्षा में ब्राह्मणवाद के बारे में बात किया. लेकिन मैं बहुत खुश था कि एक प्रोफेसर इसके बारे में बात कर रहा था. मैं सही में बहुत खुश था. उस कक्षा के बाद, एक समूह अध्ययन था और हम सब साथ बैठे थे, और फिर वहां एक छात्र है जो खड़ा होता है और प्रोफेसर को गाली देना शुरू कर देता है, उसकी हिम्मत कैसे हुई ब्राह्मणवाद के बारे में बात करने की, ब्राह्मण ऐसे होते हैं, ब्राह्मण वैसे होते हैं और ब्राह्मण प्रतिभावान होते हैं और वह केवल ब्राहमण की आलोचना कर रहा है. मैं हैरान था कि छात्र इतना आक्रामक था और वहां उपस्थित सभी लोग सहमत थे कि जाति अब और नहीं है और कहीं कोई जाति नहीं है.

मैं वह था जो एक इंजीनियरिंग कॉलेज से एक विशेष अनुभव के साथ एक बहुत ही विशेष पृष्ठभूमि से आया हुआ था, जहां मैंने देखा था कि जाति कैसे काम करती है. फिर भी मैं नहीं बोल सका. मैं चुप रहा. मुझे नहीं पता मुझे कैसे प्रतिक्रिया करना था. क्योंकि मैंने सोचा ये सभी अच्छे छात्र हैं. ये सभी JNU वाले थे, बहुत प्रगतिशील माने जाते हैं. मैं वास्तव में बहुत अचंभित था. मैं बहुत परेशान हुआ क्योंकि कक्षा के भीतर ये छात्र बहुत ‘प्रगतिशील’ बर्ताव करते थे. उन्हें यह भी एहसास नहीं हुआ कि मैं वहां था. मुझे लगता है किसी तरह से मैं अदृश्य था, क्योंकि मैं वहां था, ठीक वहीँ और उन्होंने लंबी बात किया, 15-20 मिनट और उन्होंने प्रोफेसर को अंधाधुंध गालियां दीं, आप जानते हैं, केवल इसलिए कि उसने ब्राह्मणवाद के बारे थोड़ी सा बात किया था. इसने मुझे बहुत परेशान किया. अगले ही दिन, सुबह में, मैं प्रोफेसर के पास गया और कहा शायद आपके छात्र जाति के बारे में नहीं जानते थे, मैं अपना अनुभव साझा करना चाहता हूं, क्या आप मुझे साझा करने के लिए अनुमति देंगे? क्योंकि मेरा विश्वास है ये JNU छात्र हैं, वे मीडिया घरानों में जायेंगे, वे आईएस अधिकारी बनेंगे, वे इन सभी बड़ी जगहों पर जायेंगे और वे जाति के बारे में अवगत नहीं हैं. वे जाति के बारे में नहीं जानते. लेकिन प्रोफेसर ने कहा तुम जानते हो मैंने उन्हें बताया है. मैंने कहा, हां, लेकिन आपने उन्हें ठीक से नहीं बताया क्योंकि आपने इसे गरीबी के साथ जोड़ा. इसका इस तरह गरीबी से कुछ लेना-देना नहीं है. तब प्रोफेसर राजी हुए.

अगले दिन जब कक्षा थी, मैंने प्रोफेसर से अनुमति लिया और मैंने लगभग 20 मिनट तक बोला और मैंने उन्हें इंजीनियरिंग कॉलेज में अपना अनुभव, मेरे पिता के अनुभवों और जाति कैसे काम करती है, के बारे में बताया. वहां सन्नाटा था. लेकिन उसके बाद पूरी कक्षा इतनी शत्रुतापूर्ण बन गयी, अगले दो सालों, मेरे पूरे एम.ए. कार्यक्रम तक किसी ने मुझसे बात नहीं की. यह फिर से बहुत चौंकाने वाला था. मैंने सोचा था कि मैं अपना अनुभव साझा करूंगा और इस पर खुली बहस होगी. और अपना अनुभव साझा करना अपने आप में हमेशा एक अच्छा अनुभव नहीं होता. आप सबके सामने लगभग नग्न हैं. आप असुरक्षित हैं, क्योंकि आपकी सभी भावनाएं वहां सबके सामने हैं. और वहां ऐसे लोग थे जो हैरान दिखे लेकिन उनके चेहरों पर पूरे अविश्वास के भाव भी थे. वे आपका विश्वास नहीं करना चाहते हैं. कुछ छात्रों ने यह सिद्ध करने के लिए कि मैंने जो भी कहा झूठ था, पड़ताल की कोशिश की. कि मैंने एक मोटा झूठ बोला और कि मेरे कुछ गलत इरादे हैं, मैं एक नेता बनाना चाहता हूं इत्यादि. अगले दो सालों के लिए, मेरा विश्वास कीजिए, मैं थोड़ा सा भी बढ़ाकर नहीं बोल रहा हूं, मेरी कक्षा में किसी ने मुझसे बात नहीं की. मैं भी उत्तेजित था; मैं एक ठेठ पीड़ित व्यक्ति नहीं था जो वहां रो रहा था. मैंने कहा मैं आप लोगों की सहानुभूति नहीं चाहता हूं, मैं आपको बता रहा हूं क्योंकि मैं आपको बताना चाहता हूं कि जाति क्या है. इसलिए शायद उन्हें मेरा लहजा या कुछ भी पसंद नहीं आया, लेकिन संदेश पूरी तरह से खो चुका था. सबसे आश्चर्य की बात थी कि प्रोफेसर ने भी उसके बाद मुझसे बात नहीं किया. वह मेरे लिए और अधिक चौंकाने वाला था ! मुझे कोई अनुमान नहीं था क्यों.

अगले दो सालों के लिए, मैं पूरी तरह से अनभिज्ञ था कि इतनी शत्रुता और उदासीनता के साथ कैसे निपटा जाए. वे मुझसे थोड़ा डर भी गये थे. उन्होंने सोचा कि मैं किसी तरह का राक्षस हूं. मैंने सोचा यह कैंपस बहुत प्रगतिशील था, क्योंकि इसी तरह मैंने JNU के बारे में जाना था. मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज के अनुभव के बाद, मैं किसी कैंपस में नहीं पढ़ना चाहता था. मैं कैम्पसों से इतना डरा हुआ था.

वास्तविकता में, मेरे वरिष्ठ सहपाठियों में से एक ने मुझे 2001 में JNU प्रवेश परीक्षा देने के लिए बाध्य किया. जब मैंने JNU में दाखिला लिया मुझे कक्षा में जाने के लिए एक हफ़्ता लगा. मेरे पिछले अनुभव की वजह से मैं कक्षा में एक हफ़्ते तक नहीं जा पाया. मैं हर रोज़ इमारत जाता, और वहीं सीढियों पर बैठकर सारा समय छात्रों को गुजरते हुए देखकर बिताया करता था. मैंने यह कई दिनों तक किया. फिर भी लगा, ठीक है, यह बिलकुल अलग परिसर है और सबसे अच्छे परिसरों में माना जाता है, और यहां सभी प्रगतिशील हैं. लेकिन मैंने JNU में कोई अंतर नहीं पाया. हो सकता है उन्होंने मुझे पीटा नहीं जैसे वो इंजीनियरिंग कॉलेज में दलित छात्रों को पीटा करते थे, लेकिन यहां भी पूरी शत्रुता थी. तो अगर यह प्रगतिशीलता है … अगर यह आपकी प्रगतिशीलता का विचार है- ठीक है, आज मैं एक दलित को नहीं पीटूंगा- तब आप प्रगतिशील हैं. लेकिन सवाल है – क्या आप जाति के सवाल के साथ जुड़ने को तैयार हैं? क्या आप खुले या साफ़दिल हैं? क्या आप सुनने तक को भी तैयार हैं ? क्या आप मुझे आपके सामने बोलने पर एक अपराधी की तरह महसूस नहीं कराने के लिए तैयार हैं? उन्होंने मुझे एक अपराधी की तरह महसूस कराया जैसे कि मैं झूठ बोल रहा हूं जब मैं अपने पिता के अनुभवों, मेरे अनुभव इत्यादि के बारे में बता रहा था. इस प्रकार का माहौल था जिसने मुझे इस पर काम करने के लिए वास्तव में तैयार किया और फिर तब से मैं इस पर काम कर रहा हूं.

यह एक समस्या, आप जानते हैं. मुझे वापिस जाने दीजिये जहां से मैंने शुरू किया था. यह पूरी भावना कि जाति एक झूठ है. कि मैं झूठ बोल रहा हूं. कोई दलित जो जातिगत भेदभाव के बारे में बोलता है, एक झूठा है या राजनीति से प्रेरित है. हालांकि जितना भी आप इंकार करने की कोशिश करें मैं आपका विश्वास नहीं करने जा रहा क्योंकि यह विस्तृत श्रेणी में सभी जगह होता है. यह ऐसा कुछ नहीं है जो केवल JNU में होता है. मुझे इस पर काम करते हुए अब तक करीब 20 साल हो गए. यह धारणा हर जगह है कैसे इससे लड़ें? जाति के इस विलोपन से कैसे लड़ें? एक जातिवादी प्रोफेसर, जो आपको गाली देता है, के खिलाफ़ लड़ना एक बात है. वह मैं लड़ सकता हूं, किसी तरह मैं करने में सक्षम हो जाऊँगा लेकिन उच्च जातियों द्वारा किए गए इस पूरे जाति के विलोपन के खिलाफ़ कैसे लड़ा जाए? कि ‘मैं जातिविहीन हूं’. कि जाति अस्तित्व में है ही नहीं .आपको कैसे विश्वास दिलाया जाए कि यह एक गलत धारणा है? और यह एक बहुत पैदा की हुई धारणा है. इस पर बहुत सारा निवेश किया गया है. इस देश की संपूर्ण भारतीय शिक्षा, भारतीय मीडिया और राजनीतिक वर्ग ने पिछले 60 सालों में इस आख्यान में निवेश किया है – कि जाति नहीं है. यह एक बहुत सोच-समझकर निर्मित आख्यान है. इससे कैसे लड़ा जाए?

उदाहरण के लिए, मैं एक बहुत ही प्रसिद्ध भारतीय समाजशास्त्री आंद्रे बेटले को लूंगा. वह भारतीय उच्च शिक्षा पर एक मोटी किताब लिखते हैं. यह जाति या किसी बारे में कोई खास बात नहीं करती. लेकिन वह एक जगह लिखते हैं कि राज्य विश्वविद्यालय बहुत बुरा प्रदर्शन कर रहे हैं और कारणों में से एक उन्होंने आरक्षण की नीति को बताया. तो इस तरह से आप जाति का परिचय कराते हैं! जाति के मेरे अनुभव का क्या? ठीक है, मैं मानता हूं, शायद आरक्षण बहुत गलत हैं और वे आपकी क्षमता और योग्यता को कम कर रहे हैं. ठीक है, मैं मानता हूं. हम इस पर आगे बहस करेंगे. लेकिन इन संस्थानों में हमारे अनुभवों के बारे में क्या ? अगर मैं लखनऊ विश्वविद्यालय के बारे में बात करना शुरू करता हूं, 80 और 90 के दशकों में यह कैसा था जब मेरे बड़े भाई वहां पढ़ रहे थे, आप आज मेरा विश्वास तक नहीं करेंगे. आप कहेंगे मैं फिर झूठ बोल रहा हूं. दलित छात्रों में से कोई भी विश्वविद्यालय छात्रावासों में प्रवेश नहीं कर सकता था. उनके नाम छात्रावास सूची में होते थे, उन्हें आवंटित किया जाता था लेकिन उच्च जाति छात्रों ने उन्हें कभी रहने की अनुमति नहीं दी. मेरे भाइयों ने स्नातकोत्तर के लिए विश्वविद्यालय में अध्ययन किया. छात्रावास सूची में उनके नाम थे, लेकिन वे कभी छात्रावासों में प्रवेश नहीं कर सके क्योंकि पूरा छात्रावास उच्च जाति छात्रों के कब्ज़े में था, और तब राज्य विश्वविद्यालय में, विश्वविद्यालय परिसर में सभी तरह के अपराधी रहते पाए जाते थे. मैं उत्तर भारत विशेषकर उत्तरप्रदेश और बिहार के बारे में बात कर रहा हूं. एक समय ऐसा था जब हर दूसरा दिन विश्वविद्यालय परिसरों में हिंसा का कृत्य था. साल भर पुलिस परिसर में रहा करती थी. इस प्रकार के वातावरण के बारे में मैं बात कर रहा हूं. लेकिन क्या हुआ, 90 के दशक में जैसे ही मंडल आयोग आता है, अधिक पिछड़े और अनुसूचित जाति छात्र इन जगहों में प्रवेश करते हैं, ये जगहें अधिक शांतिपूर्ण बन गयीं, अब आप ऐसे अपराध के बारे में नहीं सुनते हैं. तो मैं कहने की कोशिश कर रहा हूं कि वे केवल उच्च जाति जगहें नहीं थीं, वे अधिक आपराधिक जगहें भी थीं और दलित एवं दूसरी छोटी जाति छात्रों को इन जगहों में प्रवेश करने देने से रोकने के लिए हिंसा का प्रयोग किया जाता था.

जरा सोचिये, मेरा गृहनगर लखनऊ से 150 कि.मी. है और मेरा भाई लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लेता है. उसे छात्रावास नहीं मिलता. छात्रावास उसके नाम से आवंटित होता है क्योंकि आपके पास आरक्षण है, इसलिए आपको प्रदर्शित करना है कि 22% या 15% सीटें दलित विद्यार्थियों के लिए आरक्षित हैं. पर आपको वहां एक भी दलित विद्यार्थी नहीं मिलेगा क्योंकि वे आपको इसे लेने नहीं देंगे. और हर कोई इस बारे में जानता है. यह कुछ ऐसा नहीं है जो बहुत छिपा हो. यह सबके सामने है. मै तब बच्चा था; मै अपने भाई के अनुभव की बात कर रहा हूं. वहां कुछ 13-14 छात्रावास थे. एक छात्रावास ठाकुर विद्यार्थियों के लिए था. एक छात्रावास ब्राह्मण विद्यार्थियों के लिए, एक छात्रावास पूर्वी उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों के लिए और एक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों के लिए. तो ये नाम हैं जिनसे छात्रावास जाने जाते थे. अपने नाम से नहीं बल्कि विद्यार्थियों के उस जाति समूह के नाम से जिसने उन्हें भरा था. इस तरह वे किसी अन्य विद्यार्थी को उसमें प्रवेश की अनुमति नहीं देते हैं और ध्यान दीजिए ये विश्वविद्यालय के छात्रावास हैं, कोई निजी छात्रावास नहीं. इसलिए हर कोई यह जानता था. मान लीजिए आपके पास एक पूर्वी उत्तर प्रदेश का ठाकुर विद्यार्थी है, वह सीधे पूर्वी उत्तर प्रदेश के ठाकुर छात्रावास में जाएगा. वह जानता है कि उसे एक कमरा मिल जाएगा यदि उसे छात्रावास आवंटित नहीं है तब भी. उसे वहां रख लिया जाएगा. आंद्रे बेटले ने कभी इस बारे में नहीं लिखा. वह इन अनुभवों की बात नहीं कर रहे हैं. मै केवल एक राज्य विश्वविद्यालय की बात कर रहा हूं. दूसरों की भी कल्पना कीजिए. और आप प्रोफेसर बेटले, आप इन विश्वविद्यालयों की कार्यक्षमता को गिराने का आरोप हम पर लगाते हैं.
 

यही चीज रामचन्द्र गुहा करते हैं, 2008 में मेरे ख्याल से जब वे मैसूर विश्वविद्यालय के ‘पतन’ की बात करते हैं. गुहा अपने लेख में मैसूर विश्वविद्यालय के कुलपति (वाइस चांसलर) के रिक्त पद के संबंध में एक स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशित एक समाचार का उल्लेख करते हैं और गुहा के अनुसार यह समाचार-अंश तीन प्रोफेसरों के नाम दर्ज करता है जो इस पद के लिए प्रस्तावित माने जा रहे थे. समाचार पत्र यह भी ज़िक्र करता है कि उनमें से दो ओ.बी.सी. और एक अनुसूचित जाति प्रोफेसर हैं. तो रामचंद्र गुहा समाचार-अंश के आधार पर एक बहुत क्षुब्ध लेख लिखते हैं. वह लिखते हैं – मैसूर विश्वविद्यालय सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में से एक हुआ करता था, लेकिन अब कुलपतियों को जाति के आधार पर चुना जा रहा है. वह फिर इन तीनों प्रोफ़ेसरों की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि जाति ने मैसूर विश्वविद्यालय को बर्बाद कर दिया है. मैंने एक प्रत्युत्तर लिखा और पूछा कि आपको किसने बताया कि ये तीन व्यक्ति सुयोग्य नहीं हो सकते और इस पद के लिए केवल अपनी जातीय पृष्ठभूमियों के आधार पर विचारित किए जा रहे थे. इस समाचार-अंश ने, जिसका गुहा ने हवाला दिया, केवल उनकी जातीय पृष्ठभूमियों की चर्चा किया और उस एक पंक्ति से कि वे ओ.बी.सी. और अनुसूचित जाति पृष्ठभूमि से हैं, आपने ओबीसी/ अनुसूचित जातियों पर ‘मैसूर विश्वविद्यालय के पतन’ का आरोप लगाते हुआ एक पूरा लेख लिख दिया ! आपने यहां तक कि पता लगाने का कष्ट भी नहीं किया कि उनकी योग्यताएं क्या थीं !  
देखिए ये सभी वी.सी. के पद राजनीतिक पद हैं. आपके अपने TISS के निदेशक यहां बिना किसी राजनीतिक समर्थन के नहीं आए हैं. इसलिए कृपया ये मत मानिए कि ये सभी पद सिर्फ योग्यता पर चुने जाते हैं. ये सब राजनीतिक पद हैं. प्रत्येक राज्य विश्वविद्यालय का कुलपति जो हम देखते हैं, राजनीतिक रूप से नियुक्त व्यक्ति है. और आप उस पर अनजान होने का दिखावा करते हैं और सिर्फ इसलिए कि उस मूर्ख समाचारपत्र ने प्रोफेसरों की जातीय पृष्ठभूमि के बारे में एक पंक्ति लिख दिया, आपने एक पूरा लेख लिखा कि कैसे जाति मैसूर विश्वविद्यालय को बर्बाद कर रही है. मेरा प्रश्न बहुत सीधा था, जब आप यह बात करते हैं कि कोई अवनति हुई है, इसका मतलब है कि उस विश्वविद्यालय का कोई स्वर्णिम काल भी था. तो यदि आप यह कह रहें है कि अब विश्वविद्यालय में गिरावट आई है, वह स्वर्णिम काल फिर क्या था? वह स्वर्णिम काल ब्रिटिश काल था. वह स्वयं अपने लेख में कहते हैं. वे कहते हैं कि एक समय जब ब्रिटेन में विश्वविद्यालय अभिजातीय थे, भारत में विश्वविद्यालय बहुत अधिक समतावादी थे. किस भारतीय विश्वविद्यालय की वे बात कर रहे हैं? सभी विश्वविद्यालय जो ब्रिटिश द्वारा स्थापित किये गए थे! वे कहते हैं कि ये विश्वविद्यालय तब समतावादी थे. मेरा प्रश्न है कि स्वतंत्रता से पूर्व कितने दलित स्नातकों को इन समतावादी विश्वविद्यालयों ने पैदा किया? आप उन्हें समतावादी विश्वविद्यालय कैसे कह सकते हैं? क्योंकि आपको निम्न जातियों को किसी चीज के लिए दोषी ठहराना है तो आपको तब एक आख्यान गढ़ना है कि अतीत में कुछ अच्छा था.

तो इस तरह से उच्च जाति विद्वानों ने ज्ञान का उत्पादन किया है. इस तरह उन्होंने दोष दिया है कि जाति एक समस्या केवल तब है जब आरक्षण की बात आती है या जाति केवल ‘निम्न जातियों’ के बारे में है. यह आश्चर्य नहीं है कि तब हमारे छात्रों के साथ भेद-भाव होता है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि उच्च जातियां हमारे छात्रों से नफरत करती हैं. क्योंकि इस तरह से ज्ञान हमारे देश में पैदा किया गया है. आंद्रे बेटले कहते हैं कि यह आरक्षण है जो कि उच्च शिक्षा को बर्बाद कर रहा है; रामचन्द्र गुहा एक उदाहरण लेते हैं और इसके बारे में सब कुछ भूलते हुए कि कैसे ये नियुक्तियां होती हैं, मैसूर विश्वविद्यालय के सारे पतन का दोष छोटी जातियों पर मढ देते हैं. यहां तक कि चपरासी की नियुक्ति के लिए उत्तर भारत में जाति और यहां तक कि गोत्र तक जांचा जाता है. उदाहरण के लिए, लोग जो बिहार से हैं, लोग जो पटना से है, अगर मैं गलत हूं मुझे सही करें, प्रत्येक विश्वविद्यालय विभाग वहां एक विशेष जाति विभाग के रूप में जाना जाता है. अगर विभाग का अध्यक्ष( HOD) भूमिहार जाति का है, सारी नियुक्तियां चपरासी से लेकर पीएचडी छात्रों तक वहां भूमिहार जाति से होंगी. अगर HOD मैथिली ब्राहमण है, केवल मैथिली ब्राह्मण लिए जायेंगे. कोई इस बारे में बात नहीं करता है. गुहा ने कभी इस बारे में नहीं लिखा. आंद्रे बेटले इसके बारे में कभी नहीं लिखते हैं. यह उच्च जातियां हैं जिन्होंने इस पूरे माहौल का निर्माण किया है, आपने इसे बनाया है लेकिन जब यह विफल हो जाता है, आप हमें दोष देते हैं. निश्चित रूप से जाति-समाज योग्यता का उत्पादन नहीं कर सकता. एक असमतावादी समाज ज्ञान पैदा नहीं कर सकता; असमतावादी समाज योग्यता पैदा नहीं कर सकता. भारत इसका सबसे सटीक उदाहरण है. इसलिए आप भारतीय विश्वविद्यालयों में कोई गुणात्मक शोध होते नहीं देखते हैं. और वे उसके लिए हमें दोष देते हैं! JNU समाजशास्त्रियों ने यहां तक कि यह सिद्धांत जुटा लिया है कि ‘शिक्षा के द्वार पूरे खुले छोड़ दिए गए हैं’. इसका अभिप्राय है बहुत सारे अवांछित लोग प्रवेश कर रहे हैं. वे खुलकर कह पाने में सक्षम नहीं हैं कि ये अवांछित लोग कौन हैं लेकिन हर कोई जानता है.

यह पूरा विमर्श है और इस विमर्श की पृष्ठभूमि में, यदि गैर- दलित छात्र दलित छात्रों के खिलाफ़ भेदभाव कर रहे हैं, मैं आश्चर्यचकित नहीं हूं. उनके पास निश्चित तौर पर हमसे नफ़रत करने का आधार है. और आधार गुहा ,बेटेले जैसे लोगों के द्वारा बनाया गया है जिन्होंने हमारे अनुभवों के बारे में कभी बात नहीं की, जिन्होंने 1990 के पहले, मंडल आयोग लागू होने से पहले, 1980 के दशक से पहले, वास्तव में राज्य विश्वविद्यालयों की क्या स्थिति थी, इसके बारे में कभी बात नहीं की लेकिन अब इन विश्वविद्यालयों में सभी गलत चीज़ों के दोष को हमारे सिर मढ़ने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.

यह लेख आगे जारी रहेगा। ….

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अनूप कुमार एक अध्यापक हैं ; उनका  ईमेल पता है:anoopkheri(at)gmail(dot)com

वल्लिंमल करुणाकरण संयुक्त राज्य अमेरिका में एक जीवरसायन ज्ञानी और जाति-विरोधी कार्यकर्त्ता हैं.

हिन्दी अनुवादक :पुष्पा यादव और महिमा यादव

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