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अरविंद शेष

(Arvind Shesh)

arvind sheshअप्रैल, 2010 में हरियाणा के हिसार जिले में मिर्चपुर गांव में बाल्मीकी बस्ती के एक कुत्ते के भौंक देने के बाद बाल्मीकि बस्ती पर वहां के जाटों ने हमला कर दिया था और कई घर फूंक डाले थे। उसमें एक विकलांग लड़की सुमन को जिंदा जला दिया गया और उसके पिता को भी। उस घटना के बाद कुछ आरोपियों को पकड़ा गया और मुकदमा चल रहा है। लेकिन उन्हें रिहा करने के लिए वहां जो “आंदोलन” चल रहा है और उसके प्रति जो सरकारी रुख है, एक निचली अदालत की जज ने जो टिप्पणी की थी, वह अपने आप में इस बात का सबूत है कि हमारी व्यवस्था किसके लिए और किस तरह काम करती है। यह कड़ी रुक नहीं रही है। क्या हम एक आजाद देश में रह रहे हैं और क्या हम आज भी यह कहने की हालत में हैं कि हम एक गौरवशाली परंपरा वाले समाज और देश में रहते हैं?

जब यह घटना हुई थी, तब मैं, दिलीप मंडल, राकेश कुमार सिंह, चंद्रा और विनीत कुमार के साथ वहां गया था। तभी यह लेख लिखा था, जो जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था।

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मिर्चपुर की कड़ियां…

जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था को नस्लीय भेदभाव की तरह वंचित वर्गों के खिलाफ दमन-शोषण के एक मानक के रूप में स्वीकार करने की बात आती है, तो देश की सरकार इस मुद्दे को खारिज करने के लिए अतिरिक्त उत्साह का प्रदर्शन करती दिखती है। इससे दुनिया में यही संदेश जाता है कि यह मांग कुछ असंतुष्ट वर्गों की गैरजरूरी ‘खुराफात’ होगी और जाति-व्यवस्था एक प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के साथ सामरिक-आर्थिक समझौते करते और भावी महाशक्ति के रूप में प्रचारित हमारे देश के सामाजिक हालात क्या इतने ही सुखद हैं?

 

दरअसल, सामाजिक वर्णक्रम का मनोविज्ञान इतना आसान नहीं है कि उसकी गुत्थियां अर्थव्यवस्था के विकास दर के जुमलों से सुलझायी जा सकें। दूसरे कई राज्यों के मुकाबले हरियाणा एक समृद्ध या और ज्यादा समृद्ध होता राज्य है। ‘जिंदल प्रभाव’ से आच्छादित राज्य के एक जिले हिसार का सफर करते हुए कोई भी यह अंदाजा लगा सकता है कि रास्ते में पड़ने वाले घरों की बनावट और वहां की बहुत अच्छी सड़कें शायद ‘ईमानदार और समग्र’ विकास नीतियों का नतीजा होंगी। मिर्चपुर गांव भी बाहर से ऐसा ही दिखता है। लेकिन पिछले महीने इस गांव की एक घटना ने फिर से इस वहम को तोड़ा है कि आर्थिक विकास सामाजिक शोषण और दमन की स्थितियों से निपटने का एक आखिरी जरिया है।

एक कुत्ते के भौंकने के बाद हुई नोक-झोंक क्या इतना बड़ी वजह हो सकती है कि गांव की समूची बाल्मीकि बस्ती पर हमला करके घरों को फूंक डाला जाए? लेकिन इस बहाने ने ऐसा रूप लिया कि दबंग माने जाने वाले जाट समुदाय के लोगों ने ‘अपनी’ सत्ता और पुलिस प्रशासन में अपने लोगों के साये में बाल्मीकि बस्ती को घेर कर करीब बीस घरों को इत्मीनान से जलाया। खासतौर पर उन घरों को निशाना बनाया गया जो किसी तरह थोड़ी अच्छी हालत में आ चुके थे।

घृणा के उस पैमाने का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है जो एक विकलांग लड़की के ऊपर पेट्रोल डालने के बाद घर में बंद कर देने और बाहर से आग लगा देने को मजबूर करता है। शारीरिक रूप से लाचार अठारह साल की सुमन बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी। नफरत की इस आग में सुमन के साथ उसके पिता ताराचंद भी जला दिये गये।

सुव्यवस्थित विकास की दिख सकने वाली तस्वीरों के बीच इस स्थिति की कल्पना भी शायद मुमकिन नहीं कि अपने जलते घरों और खुद को बचाने की कोशिश करते पुरुषों और महिलाओं के सामने हमलावर निर्वस्त्र होकर नाचने लगें! यह किसी भी तरह के विकास के तमाम दावों को खारिज करने के लिए काफी है। यह हजारों साल की ‘महान’ सांस्कृतिक परंपराओं पर शर्म करने के लिए काफी है। यह एक ऐसे कबीले की कल्पना लगती है जिसे अपनी सड़ांधों पर गर्व करना सुहाता है और वह इसी में जीना चाहता है। नहीं तो क्या कारण है कि अपनी प्रकृति में समान गोहाना, दुलीना या मिर्चपुर कांड शृंखला की कड़ियों की तरह आगे बढ़ते जा रहे हैं।

इस तरह की घटनाओं के बावजूद अक्सर खाप पंचायतों में अपनी तीन हजार साल की परंपरा पर गर्व की घोषणा की जाती है। इन पंचायतों में वे लोग भी बैठे होते हैं, जिनके घरों में आधुनिकतम सुख-सुविधाओं के सभी साधन मौजूद होंगे और संभव है कि उनमें से बहुत सारे डॉक्टर-इंजीनियर या स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने वाले शिक्षक हों। जिस मिर्चपुर गांव में बाल्मीकि बस्ती को जलाया गया, वहां दूसरी सरकारी नौकरियों के अलावा शिक्षण के पेशे में चार सौ लोग हैं। इन चार सौ में से तीन सौ अस्सी शिक्षक अकेले जाट बिरादरी से हैं। लेकिन मिर्चपुर की घटना के बाद भी इनके बीच का कोई शिक्षक अगर बाल्मीकियों को बदमिजाज और सिरचढ़ा कहता हुआ मिल जाए तो समझा जा सकता है कि अपने समाज पर इन शिक्षकों का क्या असर होगा और अगर होगा तो वह किस तरह का होगा। कहते हैं कि शिक्षा सभी तरह की जड़ताओं और अंधेरों को दूर करती है। लेकिन हकीकत यह भी है कि सत्ता और सत्ता में बने रहने की चाहत शिक्षा को एक साजिश में तब्दील कर देती है। राजनीतिक सत्ताएं आमतौर पर सामाजिक सत्ताओं का ही प्रतिरूप होती हैं। और यह जगजाहिर है कि राजनीतिक सत्ताओं के लिए सामाजिक सत्ताओं के हित क्यों सर्वोपरि होते हैं।

यह अनायास नहीं है कि खाप पंचायतों को न केवल पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनकी पार्टी का, बल्कि हरियाणा के औद्योगिक विकास में अपनी खास जगह रखने वाले कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल का भी खुला समर्थन मिलता है। राज्य सरकार की ओर से मुआवजे की रस्म अदायगी को खारिज करके मिर्चपुर के पीड़ित जब अपनी मांगों के साथ हिसार जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे थे, तो उन्हें एक तरह से जबर्दस्ती वहां से हटा दिया गया। वे कौन-सी ताकतें हैं, जो राजनीतिक सत्ताओं को इस तरह के ‘खेल’ को जारी रखने के लिए मजबूर करती हैं? दरअसल, बदलती आर्थिक संरचनाओं का असर वंचित तबकों की सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्थितियों पर जरूर हुआ, जिसमें उन्हें सशक्तीकरण की एक प्रक्रिया में जाने का मौका मिला। नये दौर के संपर्कों के कारण बड़े पैमाने पर दलित अपने पारंपरिक पेशों से बाहर आये और मजदूरी से लेकर दूसरे कई तरह के काम-धंधों में उन्होंने दखल देना शुरू किया। पारंपरिक पेशे जहां उनकी सामाजिक हैसियत और आर्थिक बदहाली को बनाये रखने में ही अपनी भूमिका निभाते थे, वहां अब उन्होंने अपने घर की दीवारें अच्छी बनायीं, टीवी, फ्रिज या मोटरसाइकिल भी खरीदे। निजी स्कूलों का खर्च वे नहीं उठा सकते थे, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में ही सही, भेजना शुरू किया।

यह एक ऐसी स्थिति है जिससे समूची सामाजिक सत्ता-संरचना में टूट-फूट मच सकती है। और संस्कृति का ‘राग- उदार’ गाता हुआ हमारे देश या समाज का प्रभु वर्ग अभी इतना उदार नहीं हुआ है कि अपनी हैसियत की कुर्सी की ओर बढ़ते किसी कदम का वह स्वागत करे। जाहिर है, कमजोर वर्गों के लोगों का अपने अस्तित्व को लेकर जागरूक होना समाज पर पहले से काबिज प्रभु वर्गों को नागवार गुजरा है।

मुश्किल यह है कि सशक्तीकरण की इस प्रक्रिया ने दबंग समुदायों के बीच उदार या मानवीय होने की प्रेरणा भरने के बजाय अपनी परंपरागत हैसियत के छिन जाने का भय पैदा किया। जब तक समाज अपनी परंपराओं के हिसाब से चलता रहा और दलित-दमित तबके ‘अपनी सीमा’ में रहे, यह ‘गर्व’ करने का विषय रहा। और जब सामाजिक सत्ता के सूत्र बिखरने लगे तो इस श्रेष्ठता-बोध के मनोविज्ञान के सामने नयी चुनौतियां खड़ी हुईं। इसी यथास्थितिवाद को कायम रखने या इसे बचाने की कोशिशों के तहत प्रभु वर्ग ज्यादा आक्रामक हुए। गोहाना या मिर्चपुर जैसे कांड दरअसल उसी प्रतिक्रिया का नतीजा कहे जा सकते हैं, जिसकी मार्फत यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि समाज की लगाम किसके हाथों में है और किसे अपनी तय सामाजिक हैसियत से ऊपर आने का हक नहीं है।

मगर सामाजिक सत्ताओं और उसके प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र के सामने स्थितियां क्या पहले की तरह ही आसान रह गयी हैं?

पुलिस प्रशासन के साये में सुनियोजित तरीके से हुए मिर्चपुर कांड के बाद सिर्फ सार्वजनिक शर्म से बचने के लिए हरियाणा सरकार ने जो औपचारिक कार्रवाई की, उसकी असलियत का अंदाजा भी स्थानीय दलितों के इस आरोप से लगाया जा सकता है कि घटना को अंजाम देने वाले अब भी खुलेआम घूम रहे हैं और लोगों को धमका रहे हैं।

गौरतलब है कि मिर्चपुर में दलित उत्पीड़न का लंबा इतिहास रहा है और खासतौर पर दलित महिलाओं का यौन उत्पीड़न और उन्हें नंगा करके घुमाने जैसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं। अपनी मर्जी से वोट नहीं डाल पाने या गांव के मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित होने जैसी स्थितियां अगर आज भी बनी हुई है तो यह किसकी विफलता है? शायद यही वजह है कि हालिया घटना के बाद प्रशासन की ओर से दिये गये सुरक्षा के आश्वासन के बावजूद कुछ भुक्तभोगी गांव में लौटे, लेकिन उन्होंने अपने परिवार की युवतियों और लड़कियों को गांव से दूर अपने रिश्तेदारों के पास रखने का विकल्प चुना।

यह उस इलाके में दलित वर्गों के लिए सम्मान और सुरक्षा के माहौल और प्रशासन के आश्वासन की सच्चाई है। वे कौन-से हालात होंगे, जिनमें स्थानीय दलित परिवारों ने दावा किया कि अगर पुलिस ने चाल नहीं चली होती तो हमारे लड़के इतना बड़ा कांड नहीं होने देते, और कि अब लड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचा? साफ है कि अब दलित भी शायद खुद सामना करने के विकल्प की ओर बढ़ रहे हैं। क्या यह सरकारों के चेतने का समय है? यह बेवजह नहीं है कि घटना के लगभग तीन हफ्ते बाद मिर्चपुर में एक ओर सर्वखाप पंचायत में आठ-दस हजार लोगों की भीड़ के सामने दावा किया जा रहा था कि ‘बाल्मीकि भाइयों ने अब समझौता कर लिया है और वे भाईचारे के साथ गांव में रहने को तैयार हो गये हैं’ और दूसरी ओर, जलायी गयी बस्ती के भुक्तभोगी परिवारों का साफ कहना था कि किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता और दोषियों को हर हाल में सजा मिलनी चाहिए।

मगर राज्य की राजनीतिक ताकतों को दलित वर्गों की पीड़ा और उनके गुस्से की कोई परवाह नहीं है। दलितों पर अत्याचारों से लेकर इज्जत बचाने के नाम पर हत्या जैसे बर्बर फरमानों के बावजूद अगर राजनीतिक दल खाप पंचायतों के सामने सिर झुकाये नजर आते हैं तो इसके कारण क्या हो सकते हैं? या तो उनका मकसद सिर्फ वोट लेना है, या फिर वे खुद भी उसी मध्ययुगीन मानसिकता में कैद हैं! परंपरा को बचाने के नाम पर जातीय और राजनीतिक स्वार्थों का यह घालमेल संविधान तक को खारिज करने में नहीं हिचकता।

सामाजिक विकास नीतियों की इससे बड़ी विफलता और क्या हो सकती है कि शिक्षा और सभ्यता के तमाम दावे जाति की जड़ों के सामने हार जाते हैं! देश के सभी हिस्सों में लागू पाठ्यक्रमों में अपनी संस्कृति की उदारता पर गर्व करने का मनोविज्ञान तैयार किया जाता है। लेकिन अलग-अलग रूपों में देश के सभी हिस्सों में कमजोर तबकों के खिलाफ अक्सर होने वाली अत्याचार की घटनाएं व्यवहार में उस उदारता की हकीकत बयान करती हैं। इस सच्चाई को दुनिया के सामने नस्लीय भेदभाव के आईने में देखने से हमारी सरकारें क्या इसलिए कतराती रही हैं कि इससे गोहाना, दुलीना या मिर्चपुर जैसे कांडों पर पड़ा पर्दा उघड़ जाएगा?

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अरविन्द शेष ,बिहार के सीतामढ़ी से हैं और दिल्ली में जनसत्ता (दैनिक हिंदी अखबार ) में सहायक सम्पादक  हैं|

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