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डॉ. अम्बेडकर द्वारा स्थापित राजनीतिक प्रवेश प्रशिक्षण विद्यालय: एक भूली हुई दास्ताँ

बाबासाहेब अम्बेडकर (१८९१-१९५६) की १२५ वीं जयंती केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से धूमधाम से मनाई गई, यद्यपि,  इस उमंग और उत्साह से भरे माहौल में डॉ. अम्बेडकर से सम्बंधित आज तक उपेक्षित रहे ऐसे कुछ मुद्दे इस वर्ष भी नदारद दिखे, जिनकी आज के समय में अत्यन्त आवश्यकता है, ऐसा ही एक विषय अम्बेडकर द्वारा स्थापित किया गया एक ऐसा दुर्लभ विद्यालय है जो कि राजनीति में इच्छुक युवाओं की ट्रेनिंग के लिए बनाया गया था| जिसका नाम ‘राजनितिक प्रवेश प्रशिक्षण विद्यालय’  यानि ट्रेनिंग स्कूल फॉर एंट्रेंस टू पॉलिटिक्स था|

 

अपने आप में ये देश का एकमात्र ऐसा पहला विद्यालय था जिसकी शुरुआत डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं १ जुलाई, १९५६ को भारत में की थी,  लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी मृत्यु-उपरांत, ये विद्यालय ज्यादा दिन तक टिक नहीं सका और किसी अनाथ-शिशु के सामान जल्द ही इसका भी अंत हो गया| १ जुलाई २०१६ को इस विद्यालय की स्थापना को ६० वर्ष होने जा रहे हैं, ऐसे में इसके माध्यम से डॉ. अम्बेडकर ने भविष्यकालीन राजनीति का जो सपना देखा था उसके उदिष्ट दृष्टिकोण पर आज विचार-विमर्श करना अत्यन्त प्रासंगिक एवं महत्वपूर्ण हो जाता है|

 

डॉ. अम्बेडकर के निदेशन में इस विद्यालय की स्थापना मुंबई में १९५६ को हुई थी| प्रारम्भ में कुल पंद्रह विद्यार्थियों ने प्रशिक्षण में प्रवेश लिया और वही इसके अंतिम विद्यार्थी भी रहे,  अम्बेडकर स्वयं निदेशक और उनके सहयोगी एस. एस. रेगी इसके रजिस्ट्रार थे| स्थापना के बाद नौ महीने तक यानि जुलाई १९५६ से मार्च १९५७ तक ये विद्यालय संचालित रहा| लेकिन डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बाद ये पूरी तरह ठप्प पड़ गया| बाबासाहेब इस विद्यालय के लिए किसी ऐसे प्रधानाचार्य की खोज में भी थे जिसका व्यक्तित्व आकर्षक हो, ज्ञानवान व सुवक्ता हो| इस विद्यालय के प्रति उनका विशेष लगाव होने की वजह से उन्होंने लगभग १० जुलाई १९५६ का दिन विद्यालय में ट्रेनिंग ले रहे विद्यार्थियों को वक्तृत्व कौशल पर मार्गदर्शन करने के लिए भी सुनिश्चित किया था| लेकिन कुछ ही दिन पूर्व यानि ६ दिसंबर १९५६ को उनका परिनिर्वाण होने के कारण उनकी ये विशिष्ठ इच्छा अधूरी ही रह गई|

यद्यपि, डॉ. अम्बेडकर द्वारा स्थापित इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य न केवल भारतीय राजनीति में युवा राजनीतिकों को प्रशिक्षित करना था बल्कि, उभरते राजनीतिकों को व्यवहारिक राजनीति में विज्ञाननिष्ठ, बौद्ध दृष्टिकोण (प्रज्ञा) तथा उत्तम चरित्र (शील) से सुसज्जित भी बनाना था। डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि, विद्यालय में राजनीतिक प्रशिक्षण लेने वाले प्रशिक्षणार्थी समाज-विज्ञान के विभिन्न विषयों में प्रशिक्षित किये जायें और खासकर उन्हें संसदीय-विधायिका की संपूर्ण प्रक्रिया का भी ज्ञान हो, जो किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के लिए मूलतः जान लेना अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। उनकी दृष्टि में यदि कोई उम्मीदवार चुनाव लड़ता है और वह जीत भी जाता है तो भी, अपने चुनाव क्षेत्र की समस्याओं को किस प्रकार से समझा जाए,  उक्त समस्याओं से संबंधित कानून कैसे बनाएं जाएँ तथा किस प्रकार उन समस्याओं को सदन में उठाया जाए यह यदि जनप्रतिनिधियों को मालूम न हो तो सच्चे प्रतिनिधित्व का हेतु हमारे लोकतंत्र में कभी पूरा नहीं हो सकता। 

 

जिस समय डॉ. अम्बेडकर ने इस विद्यालय की स्थापना की थी उस समय कई संस्थाओं में राजनीति विज्ञान को एक विषय के रूप मे तो पढ़ाया जाता था। लेकिन यह विद्यालय उन सभी संस्थाओं से एकदम अलग था जिसका उद्देश्य केवल विषय का ज्ञान देना ही नहीं बल्कि राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले नेताओं को व्यवहारिक राजनीतिक क्षेत्र में प्रशिक्षण भी प्रदान करना था। इस संबंध में बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के जीवनीकार श्री. धनंजय कीर लिखते हैं कि, ‘यह विद्यालय उन लोगों के लिए था जो कि विधायिका में काम करने के लिए उत्सुक एवं महत्वाकांक्षी थे और इस प्रकार उन्हें प्रशिक्षित करने वाली यह देश की एकमात्र संस्था थी। इससे स्पष्ट होता है कि, उपरोक्त विद्यालय उन वंचित एवं पिछड़े समूह के लिए किसी बहुत बड़े  पायदान के समान था, जो न केवल उन्हें प्रत्यक्ष राजनीति में आने के लिए तैयार करती बल्कि, राजनीति से जुड़े प्रशिक्षण तथा उससे संबंधित कई अन्य प्रकार के कौशल को उनमें विकसित करने का भी काम करती।

 

यद्यपि,  इस विद्यालय का दुखद: इतिहास यह है कि बाबासाहेब द्वारा स्वयं स्थापित यह विद्यालय आरंभ होने के बाद मात्र एक साल के भीतर ही ठप्प पड़ गया । जबकि उनके द्वारा मात्र प्रस्तावित की गयी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) को उनके जोशीले अनुयायियों ने न केवल स्थापित किया बल्कि, उसे कई टुकड़ो में भी विभाजित कर दिया। डॉ. अम्बेडकर अपने इस विद्यालय के माध्यम से नेृतत्व विकास के आधार पर जिस लोकतांत्रिक शक्ति को मजबूत करना चाहते थे, उस इच्छा को आर.पी.आई के विभिन्न गुटों के नेताओं ने अपनी व्यैक्तिक महत्वाकांक्षाओं के कारण सूली पर चढा़ दिया। इस प्रकार हमें अम्बेडकर और उनके विचारों के ठेकेदारों के दृष्टिकोण में जो भेद दिखायी देता है उसे चिन्हित करके इस समस्या को समझ सकते हैं।

जहाँ डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में यह विद्यालय उन्हीं के द्वारा प्रस्तावित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (RPI ) को नेतृत्व प्रदान करने के लिए प्रवेश द्वार के समान था। और वह ये भी जानते थे कि, जो कार्यकर्ता आर.पी.आई. में कार्य करेंगे वह व्यवहारिक राजनीति को उपरोक्त विद्यालय में प्रक्षिशण लिए बगैर कभी समझ नहीं पायेंगे। वहीँ बिना डॉ. अम्बेडकर के राजनीतिक दर्शन को जाने अतिउत्साही राजनीतिज्ञों ने (इनको शायद नेता कहना उचित नहीं होगा) या तो अम्बेडकर के द्वारा स्थापित इस राजनीतिक प्रवेश प्रशिक्षण विद्यालय को नजरअंदाज कर दिया है या इसकी उपयोगिता को पूरी तरह से नकार दिया है|

जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे RPI के किसी भी गुट ने या बहुजन समाज पार्टी जैसे अन्य राजनीतिक पार्टियों ने जो स्वयं को दुसरों से ज्यादा अम्बेडकरवादी बताती हैं, इस विद्यालय को कभी रत्ती भर भी महत्व नहीं दिया। इसलिए डॉ. अम्बेडकर ने जिस संस्था के माध्यम से पिछड़ों की राजनीतिक पार्टी में सच्चे और जनहित में कार्य करनेवाले प्रतिनिधि तथा नेताओं की आपूर्ति करने के लिए प्रक्षिशण विद्यालय की स्थापना की थी उसके मूल्य आज भी तथाकथित अम्बेडकरवादी राजनीतिक पार्टियों में कहीं भी दिखायी नहीं देते। यही बात अकादमिक क्षेत्र में भी लागू होती है, वहां भी डॉ. अम्बेडकर द्वारा स्थापित इस राजनीतिक विद्यालय की कल्पना पूर्णतया नदारद है।

इसलिए डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण के बीते लगभग साठ सालों से जिस ‘राजनीतिक प्रवेश प्रशिक्षण विद्यालय‘ के संबंध में गहन खामोशी छाई हुई है, उस पर अम्बेडकर के विचारों को सही रूप में मानने वाले लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। मेरे विचार से इससे संबंधित विचारणीय तीन मुद्दे हो सकते हैं जोकि इस विद्यालय के उद्देश्यों को रेखांकित कर सकते हैं । पहला, अपने जीवन के अंतिम क्षणों में ही क्यों डॉ. अम्बेडकर ने ‘राजनीतिक प्रशिक्षण प्रवेश संस्था‘ स्थापित करने पर बल दिया, जबकि, सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते ही उन्होंने विभिन्न शैक्षिणिक संस्थाओं को स्थापित किया था? दूसरा, भारत में सच्चे प्रतिनिधित्व को स्थापित करने में राजनीतिक पार्टीयों की अपनी जो सीमाएं लोकतंत्रिक परिवर्तन लाने के विरोध में स्थापित हो गई हैं. क्या डॉ. अम्बेडकर ने इसको ध्यान में रखकर इस विद्यालय की स्थापना की? तीसरा, पूना पैक्ट में मिले अनुसूचित जाती/जनजाति समुदाय को मिले राजनीतिक आरक्षण से उभरे नकली नेृतत्व/प्रतिनिधित्व को ये विद्यालय सच्चे प्रतिनिधि तैयार करके क्या क्षतिपूर्ति होने से बचा सकता था?

आज इस विद्यालय की बुनियाद की ६० वीं वर्षगांठ पर अगर हम उपरोक्त प्रकार के सवालों पर विचार-विमर्श करें और विद्यालय को पुनर्जीवित करने का प्रयास करें, तो डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा आपेक्षित लोकतंत्र को अधिक मजबूती व् सबल नेृतत्व मिल सकता है. साथ ही युवाओं में पैदा हो रही राजनीतिक उदासीनता को भी ये विद्यालय दूर करने की क्षमता रखेगा।

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इस विषय पर और अधिक चर्चा के लिए 1 जुलाई 2016 को नागपुर में people leadership forum द्वारा आयोजन किया गया है | और अधिक जानकारी के लिए   https://www.plfindia.org देखें 

लेखक डॉ. शिवशंकर दास जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में PHD हैं| 

संपर्क : +91-9868099669 ,shivshankarjnu@gmail.com

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