संजय जोठे

संजय जोठेगुजरात के गौ भक्तों ने दलितों का जो अपमान किया है और जिस तरह से उन्हें सरे आम मारा पीटा है वह अपने आप में बहुत सूचक है. उसकी प्रतिक्रया में पूरे गुजरात के दलित समुदाय में जो एक तरह का अहिंसक आन्दोलन छिड़ गया है वह भी बहुत सूचक है. इन दो घटनाओं और इनके आतंरिक संबंधों सहित इन घटनाओं के पीछे छुपे मनोविज्ञान और समाजशास्त्र को उसके पूरे विस्तार में समझने का समय अब आ गया है. अब निश्चित ही घोषणा की जा सकती है कि ब्राह्मणवाद के दिन पूरे हुए और इतिहास का चक्र घूमकर एक नए भविष्य की तरफ बढ़ चला है. यह घटना एक बड़े परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु बन चुकी है. भारत में इतिहास का चक्र बहुत धीरे धीरे घूमता है क्योंकि ब्राह्मणवादी पुराणों और धर्मशास्त्रों के सम्मोहन ने इसकी राह में हमेशा से रोड़े अटकाए हैं. उस सबके बावजूद समय को और समाज को आगे बढ़ने से कभी नहीं रोका जा सकता और आज जो कुछ गुजरात में हो रहा है वह बहुत साफ़ साफ़ हमें बतला रहा है कि पश्चिमी शिक्षा और अंबेडकरवादी मशाल की रोशनी में समय एक ख़ास दिशा में परिपक्व हो चुका है. अब राजनीति भी उसके पीछे घिसटती हुई आ जायेगी. जो राजनेता, धार्मिक सांस्कृतिक संगठन, संस्थाएं, मीडिया और समूह इन घटनाओं को हमेशा दबाती आयीं हैं या खुद ही इन घटनाओं को अंजाम देती आयी हैं वे संगठन समूह और राजनेता भी सार्वजनिक रूप से आंसू बहाने और भाईचारे की अपील करने के लिए मजबूर हो रहे हैं. दो दिन में बहुत सारे नाटक शुरू होंगे जिन्हें समय और इतिहास हमेशा नोट करके रखेगा.

 

गुजरात के गौ भक्तों और दलितों के मन को एकसाथ समझने की कोशिश करते हैं. ये गौभक्त असल में ब्राह्मणवादी संस्कारों में भीगे हुए वे नौजवान हैं जो अपने दिमाग में एक ख़ास तरह के धर्म, संस्कृति और राष्ट्रवाद की व्याख्या लिए घूमते हैं. इन तीन शब्दों में भी अगर केन्द्रीय बिंदु खोजा जाए तो वो इनका धर्म है. इनका धर्म वर्णाश्रम धर्म है. हिन्दू धर्म जैसी कोई चीज दुनिया में नहीं है यह सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है और डॉ. अंबेडकर ने तो हिन्दू धर्म को धर्म नहीं बल्कि विशुद्ध राजनीति सिद्ध कर ही दिया है. अब गौर से देखें तो इस वर्णाश्रम धर्म में वर्ण और उसके घिनौने रूप अर्थात “जाति व्यवस्था” का पालन करना ही वास्तविक धर्म है. हिन्दुओं के शास्त्रों में भारत के धर्म और धार्मिक अनुशासन को वर्णाश्रम धर्म ही कहा गया है. इस अर्थ में यह एक सामाजिक नियंत्रण का सबसे शक्तिशाली उपाय है. जाति स्वयं अपने आप में सामाजिक व्यवहारों को नियंत्रित करने का उपाय है. विवाह और व्यवसाय जैसे दो सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक व्यवहारों को एकदम लोहे की दीवारों में कैद करने के लिए ही जाति की उत्पत्ति हुई है और आज भी यही इस व्यवस्था का सबसे बड़ा उपयोग है जिसे ब्राह्मणवादी विचारधारा बरकरार रखना चाहती है. ये दुनिया के ज्ञात इतिहास में सबसे लंबा और सबसे घिनौना दमन है जो आज भी पूरी ठसक के साथ जारी है और सबसे बुरी बात ये है कि समाज का बड़ा हिस्सा इसे इतनी गहराई से आत्मसात कर चुका है कि उसे इसमें कोई बुराई ही नजर नहीं आती. उनके लिए यह एक स्वीकृत बात है कि ये तो जीवन का अनिवार्य अंग है इसमें आश्चर्य कैसा? उन्हें आतंकवाद पर आश्चर्य होता है, बलात्कार पर आश्चर्य होता है दंगों पर आश्चर्य होता है लेकिन छुआछूत और जातीय भेदभाव पर कोई आश्चर्य नहीं होता, जैसे कि यह रोजाना पानी पीने खाना खाने जैसी कोई प्राकृतिक और सहज बात है.

जातिगत भेदभाव और उत्पीडन को समझने के लिए कुछ बड़े नामों की बात करते हैं. स्वामी विवेकानंद का ब्राह्मणवादी हिन्दू बहुत सम्मान करते हैं लेकिन बहुत लोग नहीं जानते कि खुद विवेकानंद जातिगत भेदभाव के बड़े शिकार बने रहे थे. उन्होंने खुद लिखा है कि “समाज सुधारकों की पत्रिका में मैंने देखा कि मुझे शुद्र बताया गया है और चुनौती दी गयी है कि शूद्र सन्यासी कैसे हो सकता है?” इस बात को आगे बढाते हुए विवेकानंद अपना संबंध चित्रगुप्त से जोड़ते हैं और स्वयं को कायस्थ सिद्ध करते हुए अपने प्रति ब्राह्मणों की घृणा को कम करने की कोशिश करते हैं. स्वामी विवेकानंद को यह तक कहना पड़ा था कि “मुझे नीच जाति वालों के प्रति उच्च जाति वालों के अत्याचारों के कैसे-कैसे अनुभव मिले हैं. क्या वह धर्म है जो गरीबों के दुःख दूर नहीं कर सकता? क्या तुम समझते हो कि हमारा धर्म, धर्म कहलाने के लायक है? हमारा धर्म सिर्फ ‘छुओ मत’ में है, जिस देश में लाखों मनुष्य महुए के फूल से पेट भरते हैं, जहां दस-बीस लाख साधू और दस-एक करोड़ ब्राह्मण इन गरीबों का रक्त चूसते हैं, पर उनके सुधार का रत्ती भर प्रयास नहीं करते, वह धर्म है या शैतान का नंगा नाच?”.दूसरा उदाहरण शिवाजी महाराज का है. उन्होंने अपने महान शौर्य से जिस हिन्दवी राज की स्थापना की उसकी शुरुआत के पहले दिन ही उन्हें भयानक रूप से अपमानित होना पड़ा था. महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र बताकर उनका राजतिलक करने से साफ़ इनकार कर दिया. इसके बाद बहुत कोशिशों के बाद बहुत धन देने पर बनारस के पंडित गागा भट्ट को बुलाया गया और उन्होंने शिवाजी महाराज का संबंध मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश से बताकर उन्हें क्षत्रिय सिद्ध किया और तब जाकर उनका राजतिलक वैदिक रीति से हुआ. मस्तराम कपूर ने अपनी किताब “नैतिक लोकतंत्र की तलाश” में लिखा है कि पचास हजार ब्राह्मणों को चार महीने तक भोजन और स्वर्ण मुद्राओं से परिपूर्ण करने के बाद भी उनके ब्राह्मण मंत्री उन्हें शूद्र मानते रहे. इसी कड़ी में रविन्द्रनाथ टैगोर भी हैं जो पिछड़ी जाति से आते हैं जिन्हें बंगाल में नामशुद्र कहा जाता है, रविन्द्रनाथ को इसी वजह से पुरी के जगन्नाथ मंदिर में जाने से रोक दिया गया था. यहाँ स्वामी विवेकानंद, शिवाजी महाराज और महाकवि रविन्द्रनाथ के शूद्र होने या न होने पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं दिया जा रहा है लेकिन उन्हें उनके समय में किसी भी भांति पिछड़ा या नीचा जरुर माना गया है इसलिए उनके उदाहरण बहुत प्रासंगिक हैं.

ये तीन उदाहरण देखिये आपको ब्राह्मणवाद का घमंड और शूद्रों की मजबूरी एक साथ नजर आएगी. और शूद्र कितना भी शूरवीर और ज्ञानी हो उसका स्वयं में कोई मूल्य नहीं है. उसका मूल्य तभी है जबकि किसी तरह उसका सम्बन्ध इस देश के वर्णाश्रम धर्म की स्वीकृत व्यवस्था के अनुरूप किसी कुल, वर्ण या परम्परा से न जुड़ जाए. यहाँ इंसान नहीं जातियां तौली जाती हैं. इसीलिये डॉ. अंबेडकर ने इस धर्म को त्यागने का निर्णय लिया था और आज की घटनाएँ बताती हैं कि उनका निर्णय कितना सही था और दलितों को भविष्य में क्या करना है.

 

गुजरात में दलितों पर जो जुल्म हो रहा है उसे इस तरह के इतिहास की निरन्तरता में देखिये, गुजरात के दलितों का दमन एक देशव्यापी घटना का उदाहरण मात्र है. सब जानते हैं कि ज़िंदा गाय की खाल नहीं उतारी जा सकती. अगर चर्मकार समुदाय के युवक बुलाये जाने पर किसी गाय की खाल उतार रहे थे तो ये हर दृष्टि से एक निरापद व्यवहार था. पहली बात तो ये कि वर्णाश्रम धर्म ने जो भूमिका उनके लिए तय की वे उसका पालन कर रहे थे. दूसरी बात ये कि वे गाय की ह्त्या नहीं कर रहे थे, पहले ही मर चुकी गाय उन्हें दी गयी थी. अब इस निरापद से व्यवहार में गौ भक्त हिन्दुओं द्वारा एक महापाप को खोजकर इन दलितों पर चढ़ाई कर देना और इसे एक सार्वजनिक रूप दे देना एक गजब की बात है. इसका मतलब ये हुआ कि ये गौभक्त इतने सुनिश्चित रूप से यह जानते हैं कि उनके द्वारा इन दलितों को सार्वजनिक रूप से पुलीस थाने के सामने पीटने पर भी न तो समाज कुछ बोलेगा और ना क़ानून कुछ करेगा. इस बात को ठीक से समझिये, यही असली मुद्दा है. उन गौभक्तों को यह भरोसा है कि उनके इस कारनामे को वृहत्तर समाज से सहमति मिलेगी और पुलिस भी उनका विरोध नहीं करेगी. यहीं इस बात पर भी गौर कीजिये कि पीटे जाते हुए उन दलितों ने डरते हुए हाथ जोड़े थे और इन लोगों से माफी भी माँगी थी. इसका अर्थ ये निकलता है कि उन दलित युवकों को भी पक्का पता है कि आसपास खड़ी भीड़ या पुलिस को उनसे कोई सहानुभूति नहीं मिलने वाली है और उन्हें उनसे अपने हक़ की बात करने का कोई अधिकार नहीं है. इसीलिये वे भी माफ़ी मांगने के लिए मारने वालों से मुखातिब हैं आसपास के लोगों से नहीं. ये सब इस घटना के विडिओ में साफ़ नजर आता है. इससे ऐसा लगता है जैसे कि यह दो अलग अलग राष्ट्रीयताओं के या दो अलग अलग धर्मों के लोगों का संघर्ष है जिसमे एकदूसरे के लिए भयानक घृणा और अविश्वास कूट कूट कर भरा हुआ है. यह घटना एक समाज के दो गुटों के बीच घट रही घटना नजर नहीं आती यहाँ एक गहरा मनोवैज्ञानिक विभाजन साफ़ नजर आता है और सिद्ध करता है कि भारतीय भीड़ किसी भी अर्थ में आज तक एक सभ्य समाज नहीं बन पायी है. राष्ट्र या देश होने की बात तो अभी बहुत दूर है.   

अब इस मार पीट और अपमान की प्रतिक्रया जिस ढंग से हुई है वह और भी ज्यादा रोचक और महत्वपूर्ण है. दलितों ने बाबा साहेब अंबेडकर की रक्तहीन सामाजिक क्रांति की सलाह को मानकर अपनी पहली प्रतिक्रया दर्ज कराई है. उन्होंने विरोध प्रदर्शन का जो संकेत चुना है वो वर्णाश्रम धर्म की मूल मान्यताओं पर चोट करते हुए इस तथाकथित हिन्दू धर्म के पूरे ढाँचे को ही सवालों के दायरे में ले आता है. मृत गायों के अवशेष सार्वजनिक रूप से हिन्दू समाज के हवाले करना अपने आप में बहुत गहरा और सुविचारित जवाब है, जिन लोगों ने इसकी कल्पना की है उनकी बुद्धिमानी की तारीफ़ करनी होगी. इस उपाय की आंतरिक संरचना बहुत गजब की है और इसमें इस समाज को झकझोरने की बड़ी ताकत है. इसमें इस तथाकथित हिन्दू धर्म के मूल पाखण्ड और शातिर षड्यंत्र को एकदम से बेनकाब करने की शक्ति छुपी हुई है. इस उपाय में जो सवाल उठाया गया है वो ये है कि अगर गाय हिन्दुओं के लिए पवित्र है, या उनकी माता है तो वो ही अपनी माता का क्रियाकर्म करें और उसे ठिकाने लगाएं. गौहत्या को पाप घोषित करने के पीछे जो सांस्कृतिक प्रेस्क्रिप्शन है उसी से यह सलाह भी निकलती है कि गाय एक परम सम्मानित जीव है जिसकी कीमत शूद्र समझे जाने वाले इंसानों से भी अधिक है. इस दशा में पवित्र हिन्दुओं का पहला कर्तव्य है कि वे अपनी परम पवित्र माता को अपमान और दुर्गति से बचाते हुए उसका अंतिम संस्कार अपने हाथों से करके सुपुत्र होने का प्रमाण दें. दलितों द्वारा हिन्दुओं को गौमाता का जिम्मेदार सपूत होने का यह आग्रह एक बहुत भयानक पहल है और एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर सोचते हुए ब्राह्मणवाद की मूल संरचना का पोस्टमार्टम अपने आप हो जाएगा और उसमे छुपे कैंसर का बढ़िया निदान भी हो जाएगा.

जैसे ही गौमाता के क्रियाकर्म से ब्राह्मणवादी पल्ला झाडेंगे वैसे ही उनका सनातन पाखण्ड बेनकाब हो जाएगा. जब पर्दा हटेगा तो ये साफ़ नजर आयेगा कि गाय वास्तव में हिन्दुओं के लिए पवित्र है ही नहीं यह तो सिर्फ दलितों और मुसलमानों को दबाये रखने का एक उपकरण मात्र है. अगर हिन्दुओं के सभी गुरु मिलकर भी हिन्दुओं को समझाने की कोशिश करें कि सब लोग अपनी अपनी गायों का क्रियाकर्म अपने हाथ से करें, तब भी उनकी बात कोई नहीं सुनेगा और फिर से सिद्ध होगा कि हिन्दू असल में ऐसी भीड़ हैं जिनको किसी एक बात पर सहमत होना आता ही नहीं और जिसके पास कोई प्राकृतिक नैतिकता या मानवता बोध या न्यायबोध नहीं है. वैसे भी हिन्दुओं के सामने गायें प्लास्टिक और गंदगी खाती रहती हैं इस स्थति को बदलने की उनमे कोई प्रेरणा कभी रही ही नहीं इससे सिद्ध होता है कि ये मुद्दा धर्म का मुद्दा नहीं है और उनका धर्म भी स्वयं में धर्म नहीं है. इस घटना के बाद हिन्दुओं के गाय के प्रति व्यवहार पर सवालों की बारिश होने लगेगी और उनके तथाकथित धर्म के श्रेष्ठ इतिहास और उसकी आधारभूत संरचना ही कटघरे में खड़ी हो जायेगी.

दलितों ने इतनी सूझ बूझ से प्रतिक्रिया देकर इस सड़े हुए समाज की सडांध को एकदम चौराहे पर ला पटका है. वे मरी हुई गायों के अवशेष सामने नहीं ला रहे हैं बल्कि इस मरे हुए और जीवाश्म बन चुके धर्म और संस्कृति के अवशेष सबके सामने ला रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भी अब पता चल ही जाएगा कि योग और वेदान्त की बात करने वाले इस समाज में असल में जमीन पर चल क्या रहा है. इस आन्दोलन का परिणाम दूरगामी होगा. गुजरात अपने जिन तथाकथित माडलों के लिए जाना जाता है वे माडल अब बहुत पीछे छूट जायेंगे. दलित प्रतिरोध का ये गुजरात माडल ही भारतीय समाज क्रांति की संभावना को गुजराती दलितों द्वारा दी गयी एक वास्तविक देन साबित होगा. यह बात आज हम सबको नोट करके रख लेनी चाहिए.

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संजय जोठे फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेेश से हैं। समाज कार्य में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से एम् ए के बाद ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में M.A. हैं और वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में बहुजन समाज और दलित विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

 

Photo credit : from Facebook wall of Dilip Mandal

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