राजेश राजमणि 

पी ए  रंजीत की फिल्म होने के नाते, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस फिल्म के बहुत सारे सामाजिक संवाद अम्बेडकरवादी विचारधारा से लिए गए हैं. फ़िल्म का नाम और इसके नायक का नाम ‘कबाली’ रखना – तमिल सिनेमा में नाम अक्सर ऐसा अनोखा पहलू होता है जिससे विरोधियों पर पदाघात किया जा सके, कबाली के सूट पहनने का राजनितिक पहलू एक निम्न जाति के मजदूर के उदय का दृढ़ निश्चय है, यह सशक्त महिला पात्रों के दावे और एक ऐसे समाज पर टिप्पणी है जो शोषितों के सामजिक और आर्थिक गतिशीलता को मानने को तैयार नहीं है.

 

कबाली एक बहुत अच्छी फिल्म है.

फिल्म प्रभावी ढंग से रजनीकांत के कई ट्रोप्स (शब्द या अभिव्यक्ति जो प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल की जाएँ) उधार लेती है और इनका स्क्रिप्ट के भीतर सार्थक उपयोग है. उदाहरण के लिए, रजनीकांत की फिल्मों की शुरुआत लगभग हमेशा एक गीत से होती है. जहां वे दर्शकों से खुद का परिचय करवाते हैं. ऐसा क्यों किया जाता है, यह कोई नहीं जानता. किसी विशेष कारण से गाना, नृत्य करना व खुद का परिचय देना अपने आप में काफी विचित्र बात है. लेकिन यहाँ, पात्र कबाली 25 साल बाद जेल से रिहा किया गया है जिसके चलते वहाँ मलेशियन तमिल लोगों के बीच उत्सव है. और वे कबाली, उसके

संघर्ष के बारे में गाते हैं और वे सोचते हैं की कैसे वह उनकी जिन्दगी को बेहतर बना सका.
कबाली कोई गैंगेस्टर फिल्म नहीं है जिस तरह की फिल्मों के साथ हम अक्सर रूबरू होते हैं. निश्चित रूप से इसे एक्शन फिल्म नहीं कहा जा सकता. यह फिल्म कोरियाई या हांगकांग गैंगस्टर फिल्मों से बहुत मिलती-जुलती है जो उनके बारे में एक निश्चित सोच और गुणवत्ता रखती है. फिल्म का नायक कबाली एक शरणार्थी, निम्न वर्ग, निम्न जाति का मजदूर है जो इन सब को पीछे छोड़ मलेशिया में तमिल आबादी के एक शक्तिशाली प्रतिनिधि के रूप में उभर कर सामने आता है, लेकिन वह अब ये सब खो चुका है. और फिल्म शुरू होती है इन सब को दुबारा पाने की जद्दोजहद से.

 इन सब को दुबारा पाने के लिए कबाली चिंताग्रस्त, असुरक्षित और सोचमग्न है. रजनीकांत अपने अभिनय के माध्यम से इन सभी को चित्रित करते में सफल रहे हैं. रजनीकांत, बहुत लम्बे समय से अपनी फिल्मों में अपने ही छोटे स्वरूप की आवाज की नकल करते आये हैं. लेकिन कबाली में, वह अपने चालबाज़ियों को आराम देकर खुद से अपने कैरेक्टर को निभाने की एक ईमानदार कोशिश करते हुए दिखाई देते हैं. जहाँ एक बढ़ते हुए अनुक्रम में कबाली अपनी खोयी हुयी पत्नी को हर जगह देखने जैसा महसूस करता है. ऐसा करने में रजनीकांत खरे उतरते हैं. मुझे हैरान करने वाली बात यह लगी की उन्होंने एक ही समय में अजेय व अभेद्य चरित्र को जिया.

महिला पात्रों को भी बहुत अच्छे से लिखा व लागू किया गया है. वे समझदार, मुखर और यहाँ तक कि कई बार खुद कबाली से अधिक शक्तिशाली साबित हुई हैं. कबाली की पत्नी उसे ‘नी’ के रूप में सम्बोधित करती है न की ‘नींगा’. रजनीकांत की फ़िल्में अक्सर नारी विरोधी और द्वेष से ग्रस्त रही हैं. इसलिए इस फिल्म में एक शक्तिशाली महिला करैक्टर का होना रजनीकांत की फिल्मों में स्वागत योग्य परिवर्तन है और सामान्य रूप से तमिल सिनेमा के लिए भी. राधिका आप्टे अपेक्षाकृत कम दृश्यों में दिखाई देती हैं लेकिन कबाली की पत्नी ‘कुमूडवाली’ के रूप में उन्होंने एक बहुत ही उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.

सेकेंडरी कैरेक्टर्स को बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत किया गया है विशेष रूप से, मुझे ‘अटकती’ दिनेश की भूमिका काफी पसंद आई. एक वफादार, उत्साही और अनाड़ी के रूप में, वह मजेदार है.

विरोधी यहाँ वैसे नहीं है जैसे की फिल्म बाशा में हैं (कई समीक्षाओं में इसकी तुलना की गई है). वह एक एकल, सुपर शक्तिशाली एंटनी (फिल्म: बाशा) नहीं है. बल्कि यहाँ कई विरोधी हैं और वे आते रहते हैं. आप एक को नष्ट करते हैं तो दूसरे आ जाते हैं. कुछ भी नहीं, तो कबाली के खुद के साथी विरोधी हो जाते हैं. जो रजनीकांत की बाकी की फिल्मों से अलग है जैसा हम अक्सर रजनीकांत की फिल्मों में देखते हैं. हम फिल्मों में एक ही विरोधी या नीलाम्बरी (फिल्म: Padaiyappa) देखने के आदी हैं और उन्हें नष्ट करना ही नायक का लक्ष्य होता है. लेकिन कबाली में, नायक का लक्ष्य विभिन्न आकार और प्रकार के विरोधियों के निरंतर हमले से बचना है.

फिल्म में मलेशियन तमिल जीवन के विवरण पर ध्यान देना मुझे खूब अच्छा लगा. चाहे यह एक मंदिर का त्योहार हो या एक मृत व्यक्ति के घर के चारों ओर लोगों का बैठना हो या फिर पात्रों की वेशभूषा या सड़क, दुकाने और घर हो. ऐसा प्रतीत होता है की फिल्मांकन से पहले फिल्मकार ने अच्छा रिसर्च किया है और इतिहास व मलेशिया की बदलती सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पर अच्छा प्रकाश डाला है.

 

 

पी ए रंजीत की फिल्म होने के नाते, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस फिल्म के बहुत सारे सामाजिक संवाद अम्बेडकरवादी विचारधारा से लिए गए हैं. फ़िल्म का नाम और इसके नायक का नाम ‘कबाली’ रखना – तमिल सिनेमा में नाम अक्सर ऐसा अनोखा पहलू होता है जिससे विरोधियों पर पदाघात किया जा सके, कबाली के सूट पहनने का राजनितिक पहलू एक निम्न जाति के मजदूर के उदय का दृढ़ निश्चय है, यह सशक्त महिला पात्रों के दावे और एक ऐसे समाज पर टिप्पणी है जो शोषितों के सामजिक और आर्थिक गतिशीलता को मानने को तैयार नहीं है. पी ए रंजीत फिल्म की कहानी के माध्यम से अपनी राजनीति को काफी स्पष्ट करते हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से, तमिल सिनेमा में अभी तक पिछड़े व अत्याचार से पीड़ित समुदायों को रंगमंच की सामग्री, पीड़ितों के रूप में या विदेशी प्राणी के रूप में इस्तेमाल किया गया है. लेकिन कबाली में सामान्यतः, पी ए रंजीत इस स्टेरियोटाइपिंग को खत्म करते हैं और इन समुदायों व सदस्यों को मानव के रूप में दिखाते हैं.

क्लाइमैक्स से पहले के हिस्से में केवल 10-15 मिनट के लिए फिल्म लड़खडाती है. इसके अलावा, मेरे हिसाब से फिल्म काफी दिल दहला देने वाली थी. लेकिन मैं आश्चर्यचकित हूँ की बहुत सारे समीक्षकों को यह फिल्म नाकाफी लगी और उन्हें अत्ताकाठी और मद्रास निर्दोष कैसे लगे. मुझे ऐसा लगता है कि यह जल्दबाजी में की गई समीक्षा है. पी ए रंजीत की ताकत एक निश्चित भौगोलिक और सामाजिक वास्तविकता बनाने और बहुत विश्वसनीय पात्रों को भरने में निहित है. और वे इसे करने में सफल भी हुए हैं. इसके अलावा अत्ताकाठी और मद्रास में भी, क्लाइमैक्स और क्लाइमैक्स से पहले वे कुछ लड़खड़ा से गए हैं. निश्चित रूप से किसी कथन को प्रभावी रूप से लपेटकर कहने में उन्हें कुछ दिक्कतें हैं. उन्हें इस पर काम करने की जरूरत है, ऐसा मुझे लगता है.

इसलिए जाइए और फिल्म देखिये. लेकिन इस फिल्म से एक गैंगस्टर एक्शन फिल्म की उम्मीद मत करियेगा. क्योंकि यह मूवी वैसी नहीं है. लेकिन एक गैंगस्टर के निजी जीवन और उसके कठोर परिश्रम की उम्मीद आप इस फिल्म से कर सकते हैं.

मैं इस लम्बे नोट को फिल्म के मेरे सबसे पसंदीदा दृश्य की डिटेल के साथ खत्म करना चाहूँगा. आखिर में कबाली को उसकी पत्नी के होने के बारे में पता चलता है और वह भावुकता से उससे मिलने का इंतज़ार कर रहा होता है. जवान दिखने के लिए वह खुद की हजामत बना चुका होता है. और जबकि वह भावना और चिंता से भर जाता है, फिर भी वह अभी भी अपने बाल और कपड़ों को सही करने के लिए ऐसे नजर आता है जैसे वो पहली डेट पर है. मुझे लगता है कि पिछले दो दशकों में, यह रजनीकांत का सबसे प्यारा दृश्य होना चाहिए.

कबाली में, रजनीकांत ने खुद को काफी सफलतापूर्वक बदले हुए रूप में प्रस्तुत किया है. यह शायद उनके प्रशंसकों के लिए भी खुद को सुधारने का समय है. तब शायद वे भी कुछ असली जादू का अनुभव कर पाएंगे.

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राजेश राजमणि , चेन्नई में रहते हैं और एक बैंकिंग प्रोफेशनल है, इसके साथ ही वह वेब कॉमिक्स “इनेडीबल इंडिया (inedible India ) के लिए लिखते हैं । 

यह लेख अंग्रेजी में राउंड टेबल इंडिया में प्रकाशित हुआ था , इसका हिंदी अनुवाद हरीश परिहार ने किया है । 

 

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