satvendra madara

 

सतविंदर मदारा (Satvendar Madara)

satvendra madara6 दिसंबर 1992 को बाबासाहब के परिनिर्वाण दिवस पर, जब देश की ब्राह्मणवादी ताक़तों ने बाबरी मस्जिद को गिराया, तो राजनीतिक हालात तेजी से बदले। उत्तर प्रदेश इसके केंद्र में था। राम मंदिर के नाम पर पिछड़ी जातियों का मुसलमानों के खिलाफ ध्रुवीकरण करके महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों का संगठन RSS, राज्य और देश की सत्ता पर काबिज होना चाहता था। 

1970 के दशक में चली समाजवाद की लहर से बड़ी तादाद में पिछड़ी, अनुसूचित जातियाँ और अल्पसंखयक लोग जुड़ चुके थे। इसने कांग्रेस को कमज़ोर किया। RSS भी राजनीति में पहले जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी के ज़रिये अपना दखल बढ़ाना चाहता था। उसे कोई ज़्यादा राजनीतिक सफलता हासिल नहीं हुई थी और 1984 के लोक सभा चुनावों में सिर्फ दो सीटें ही मिल पाईं। अपनी रणनीति बदलते हुए उसने समाजवादी आंदोलन की बढ़त का फ़ायदा उठाने के लिए वी.पी.सिंह से समझौता किया।1984 में दो के मुक़ाबले 1989 के चुनावों में उसे 88 सीटें हासिल हुईं। इसी दौर में जब मंडल कमीशन का मुद्दा गरमाया, तो पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों-जनजातियों की ही तरह देश में आरक्षण देने की मांग राजनीति पर छा गयी। पिछड़ी जातियों को अगर 52% आरक्षण मिल जाता तो SC-ST के 22.5% की ही तरह, उन्हें भी शासन-प्रशासन में अपनी भागीदारी मिल पाती। 

उन्हें यह भागीदारी न मिल सके और राजनीतिक तौर पर उन्हें समाजवादी आंदोलन से तोड़कर ब्राह्मणवादी ताक़तों से जोड़ा जा सके, इसके लिए RSS ने बाबरी मस्जिद – राम मंदिर का मुद्दा उछाला। उन्हें लगा कि ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर तो उनके साथ हैं ही, बड़ी तादात में पिछड़ी जातियों को मुर्ख बनाकर वो न सिर्फ सत्ता पर काबिज़ हो सकेंगे बल्कि उनके आरक्षण के मुद्दे को भी दबा देंगे। 

इसी उथल-पुथल के बीच उत्तर भारत में एक ऐसा शख्स राजनीति में कदम रख चुका था जो उनका यह प्लान फेल करने वाला था। 15 मार्च,1934 को पंजाब के एक अनुसूचित जाति परिवार में जन्में कांशी राम महाराष्ट्र में 1960 के दशक में फुले-शाहू-आंबेडकर आंदोलन से जुड़े और 1970 के दशक में महाराष्ट्र के आंबेडकरवादियों से निराश होकर उन्होंने उत्तर भारत का रुख किया। 1978 में बामसेफ की स्थापना की, जिसके ज़रिये उन्होंने OBC, SC, ST और Minorities के सरकारी कर्मचारियों को एक मंच दिया और 1981 से DS-4 बनाकर पुरे देश में उनके अधिकारों के लिए संघर्ष छेड़ दिया। 14 अप्रैल, 1984 को BSP की नींव डाली और राजनीति में कदम रखा। 1989 के लोकसभा चुनावों में 3 सांसद जितवाए; दो उत्तर प्रदेश से और एक पंजाब से। 

बगैर किसी ज़्यादा तामझाम के और मीडिया द्वारा नज़रअंदाज़ करने के बावजूद साहब कांशी राम के नेतृत्व में यह काफिला 1992 तक अपनी मज़बूत ज़मीन बना चूका था। इसका आधार अनुसूचित जातियां थी, लेकिन वे इसमें काफी हद तक OBC की कमज़ोर जातियों और अल्पसंखयकों को जोड़ने में कामयाब हो गए थे। 

RSS द्वारा 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के खिलाफ, उत्तर प्रदेश में समाजवादी आंदोलन के नेता मुलायम सिंह यादव डटकर मैदान में खड़े थे। उन्हें यादवों और मुसलमानों का पूरा समर्थन हासिल था। लेकिन सिर्फ इन दो समुदायों के बल पर RSS द्वारा तेजी से किये जा रहे हिंदूवादी ध्रुवीकरण को रोक पाने में वह बेबस थे। उन्हें इस बात का अहसास था कि गेंद अब RSS-BJP के पाले में जा चुकी है और अगर उन्हें रोकना है तो नए समीकरण बनाने होंगे। 1984 से शुरू करके 1992 तक, साहब कांशी राम जिस तेजी से राजनीति में आगे बढ़े, उससे वो अनजान नहीं थे। इन्हीं हालातों के बीच उन्होंने साहब कांशी राम की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। राजनीति में चल रही इस उठा-पटक पर साहब कांशी राम की भी पैनी निगाह थी और मंडल कमीशन को लागू करवाने के लिए वो देश में सबसे बड़ा आंदोलन भी चला चुके थे। उत्तर प्रदेश और फिर उसके बाद देश में ब्राह्मणवादी RSS-BJP को रोकने के लिए उन्होंने भी आगे बढ़कर मुलायम सिंह के हाथ में हाथ मिलाया और पूरी राजनीति की दिशा बदल डाली।

Mulayam Kashiram

चुनावों से ठीक पहले ‘नई ज़मीन’ को दिए अपने एक इंटरव्यू में साहब कांशी राम ने साफ कहा कि “हमारा लक्ष्य भाजपा को दिल्ली के तख़्त पर बैठने से रोकना है। हमनें मुलायम सिंह से लम्बी बातचीत करके 14 दिसंबर, 1992 को ऐलान कर दिया कि अब हम दोनों मिलकर भाजपा को लखनऊ में घेरेंगे। क्योंकि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है।” [Page 187, मा.कांशी राम साहब के साक्षात्कार]

उनके इस फैसले ने अनुसूचित जातियों, पिछड़ों और मुसलमानों को जिन्हें वो ‘बहुजन समाज’ कहते थे, एक साथ ला खड़ा किया। अब तक चारों तरफ बाबरी मस्जिद- राम मंदिर मुद्दे के बहाने चर्चा में बनी BJP से लोगों का ध्यान हटकर कांशी राम और मुलायम सिंह की हुई इस दोस्ती पर चला गया। इसने RSS-BJP को सकते में डाल दिया और उत्तर प्रदेश में अपनी जीत को यकीनी मान चुके इस खेमे में बौखलाहट पैदा कर दी। जब साहब कांशी राम ने यह नारा दिया कि ‘मिले मुलायम कांशी राम, हवा हो गए जय श्री राम’ तो BJP के गुब्बारे की बची-खुची हवा भी निकल गई। राजनीतिक विशेलषकों को भी इस बात का अहसास हो गया कि राजनीति ने फिर करवट ले ली है और RSS के रास्ते में कांशी राम रोड़ा बनकर खड़े हो गए हैं। इस ऐतिहासिक गठजोड़ ने सपा-बसपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों में नया जोश भर दिया और यह दोनों नेता पूरी आक्रामकता के साथ 1993 के चुनावी दंगल में उतरे। 

ठीक पहले 1991 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में भाजपा 221 सीटें जीतकर आसानी से सरकार बना चुकी थी। बाबरी मस्जिद गिराने के बाद किये गए हिन्दू ध्रुवीकरण (जोकि हक़ीक़त में ब्राह्मणों का आंदोलन था) के सहारे पिछड़ों का वोट लेकर वो अब इससे भी कही ज़्यादा सीटें जीतने के चक्कर में थी। लेकिन जब चुनाव के नतीजे आये तो उन्हें इस हक़ीक़त का सामना करना पड़ा कि ‘मिले मुलायम कांशी राम, हवा हो गए जय श्री राम’ के नारे ने उन्हें ज़मीन पर ला पटका है। बीजेपी 221 से घटकर 177 पर चली गयी और समाजवादी पार्टी के 109 विधायक जीते। लेकिन सबसे बड़ा फ़ायदा बहुजन समाज पार्टी को हुआ और 1991 के चुनाव में सिर्फ 12 सीटों के मुक़ाबले वो 67 सीटों पर जा पहुँची और देश के सबसे बड़े  प्रदेश की सत्ता की चाबी उसके हाथों में आ गयी। इसी चुनाव ने साहब कांशी राम की जी तोड़ मेहनत को चुनावी नतीजों में बदला और मुलायम सिंह एक स्वतंत्र नेता के रूप में उभरे। यह साहब कांशी राम द्वारा किया गया पहला राजनीतिक समझौता था और इसकी कामयाबी ने उन्हें इतना प्रोत्साहित किया कि आगे चलकर उन्होंने देश के कई और हिस्सों में भी चुनावी समझौते किये। 

आज के हालात भी कुछ उसी तरह के हैं जैसे 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद के थे। बीजेपी अपने चरम पर है और अब तो देश और उत्तर प्रदेश की सत्ता पर भी वो काबिज है। पिछड़ों और अनुसूचित जातियों का तालमेल टूट चुका है। बीजेपी के पास 40% वोट हैं तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के पास 20-20%। गणित बिलकुल साफ और सीधा है। एक तरफ पिछड़ों, अनुसूचित जातियों और अल्पसंखयकों के वोट का बटवारा है और दूसरी तरफ ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर और दोबारा से कुछ पिछड़ी जातियों को अपनी तरफ खींचने के लिए वोटों का ध्रुवीकरण है। वोट के मामले में 1993 के मुक़ाबले SP-BSP का वोट आज ज़्यादा है और संसाधनों की निगाह से भी यह दोनों दल ज़्यादा मज़बूत हैं। ज़रूरत है तो इतिहास को दोबारा दोहराने की और 1993 की ही तरह ‘हाथी’ और ‘साइकिल’ के नीचे फूल को कुचल डालने की।अब न तो साहब कांशी राम हमारे बीच हैं और न ही मुलायम सिंह का नेतृत्व। यह फैसला आज के दोनों दलों के नेताओं को करना है कि वो अपने पूर्व के नेताओं से सबक लेते हुए RSS-BJP को देश की सत्ता से उतारते हैं या 2019 में दुबारा पहुँचने देते हैं।

अगर अब भी हमनें इतिहास से सबक नहीं लिया तो फिर बाबासाहब और हमारे दूसरे महापुरुषों की कड़ी मेहनत से बना संविधान और लोकतंत्र खत्म होने के कगार पर खड़ा है। समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के विचारों पर बनाया गया हमारा देश, मनु के गैर-मानवतावादी संविधान पर चलेगा और ब्राह्मणवादी ताक़तों का आतंक देश की सभी जातियों और धर्मों पर बरसेगा। 

साहब कांशी राम का इस बात को बार-बार दोहराना कि ‘इतिहास बनाने वालों को इतिहास से सबक लेना बहुत ज़रूरी है‘ से सबक लेने की घड़ी आ चुकी है। 

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सतविंदर मदारा पेशे से एक हॉस्पिटैलिटी प्रोफेशनल हैं। वह साहेब कांशी राम के भाषणों को ऑनलाइन एक जगह संग्रहित करने का ज़रूरी काम कर रहे हैं एवं बहुजन आंदोलन में विशेष रुचि रखते हैं।

 

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