पश्चिमी दार्शनिक और भारतीय पोंगा पंडित, एक नजर में

sanjay sharman jothe

 

संजय जोठे (Sanjay Jothe)

sanjay sharman jotheबहुजन (ओबीसी, दलित,आदिवासी, अल्पसंख्यक)  समाज को अपनी पहचान और अपना नाम खुद तय करना चाहिए। किसी अंधविश्वासी, शोषक, असभ्य और बर्बर जमात को यह अधिकार क्यो दिया जाए कि वो हमारा नाम तय करें?

एक उदाहरण से सनझिये। अक्सर मांस खाने वालों को नॉन-वेजिटेरियन कहा जाता है। अब नॉन-वेजिटेरियन क्या होता है? क्या वो कभी वेज नहीं खाते? जिन्हें हम वेजिटेरियन कहते हैं असल मे उन्हें “नॉन-मीटइटर” कहना चाहिए।

“वेजिटेरियन” और “नॉन वेजिटेरियन” कहकर आप “गैर-मांसाहारियों” का सम्मान करते हैं, और “मांसाहारियों” का अपमान करते हैं। इसी तरह “ब्राह्मण या सवर्ण” कुछ नहीं होता। बेहतर है ब्राह्मण और सवर्ण को “नॉन-बहुजन” की तरह देखा जाए।

जो लोग भारत की ओबीसी (यादव अहीर कुर्मी इत्यादि), दलित जैसी श्रमशील जातियों और अल्पसंख्यक मुसलमानों इसाइयों में इंसानों की तरह शामिल नहीं होे सकते उन्हें नकारात्मक संबोधन देना चाहिए।

सवर्ण, ब्राह्मण और नॉन-ब्राह्मण कहकर आप सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद को ही मजबूत करते हैं।

आप अगर “बहुजन” और “नॉन-बहुजन/ गैर-बहुजन” की तरह देखते है तो आप बहुजन का सम्मान करते हैं, तब आप बहुजन भारत को मजबूत करते हैं। ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण शब्दों के उपयोग से आप ब्राह्मण को ही विजिबल बनाकर आप उनकी मदद कर रहे हैं।

शब्दों के मनोविज्ञान को समझिये। आपको अगर स्त्री की बजाय “गैर मर्द” कहा जाए तो फोकस कहाँ हो रहा है? स्त्री पर या मर्द पर? आपका स्त्री होना अगर उभारना है तो  आपको “गैर मर्द” नहीं बनना चाहिए। आपको स्त्री बनना चाहिए। 

आप सारी शक्ति यदि मर्द को कमजोर बनाने में लगाएंगे तो वो और मजबूत होगा, आप स्त्री को मजबूत कीजिये मर्द को उसके हाल पर छोड़ दीजिए।

इसी तरह ब्राह्मण को गैर बहुजन की तरह उसके हाल पर छोड़ दीजिए। उसके षड्यंत्रों को समझकर बहुजन समाज को उनसे बचाते हुए बहुजन समाज को मजबूत बनाइये। 

यही मार्ग है।

नये शब्दयुग्मों का निर्माण हम स्वयं करें, गैर बहुजनों को हमारा नाम तय करने का अधिकार क्यों दिया जाए? हम बहुजन इस देश के वास्तविक निर्माता, श्रमशील और उत्पादक लोग हैं। जीवन और समाज को चलाने वाली हर वस्तु का निर्माण और उत्पादन हम करते आये हैं। 

अन्न, दूध, चमड़े लोहे लकडी मिट्टी का सामान, कपड़े, भवन, शिल्प, तकनीक, लोककथाएं, लोकगीत, संगीत और ज्ञान विज्ञान भी हमारे पुरखों ने रचा है। उसे तोड़ मरोड़ कर जो लोग सिर्फ नामकरण करना जानते थे वे नाम बदलकर राजनीति खेल रहे हैं।

बुध्द का नाम बदलकर कहीं बुद्धू बना दिया कहीं विष्णु अवतार बना दिया कहीं इसी बुध्द को कपड़े और श्रृंगार में छिपाकर कोई अन्य देवीदेवता बना दिया।

नाम और पहचान बदलने की रणनीति बहुत गहरी रणनीति है। आप इसे समझकर बदल सकें तो आप बहुत बड़ी जीत हासिल कर सकते हैं।

कुछ नये शब्दयुग्म इस प्रकार हो सकते हैं:

1. मीटइटर, नॉन-मीटइटर

2. बहुजन, गैर-बहुजन 

3. द्रविडियन, गैर-द्रविडियन 

4. बहुजन साहित्य, गैर-बहुजन साहित्य

5. बहुजन समाज, गैर-बहुजन समाज

6. बहुजन धर्म, गैर-बहुजन धर्म

7. बहुजन-श्रमण सँस्कृति, आर्य-ब्राह्मण सँस्कृति (गैर-बहुजन सँस्कृति)

8. मूलनिवासी- विदेशी (गैर-मूलनिवासी)

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संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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