satvendra madara
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सतविंदर मदारा (Satvendar Madara)

satvendra madaraदलित शब्द के इस्तेमाल को लेकर पिछले काफी समय से विवाद बना हुआ है. भारत की अनुसूचित जातियों का बुद्धिजीवी वर्ग इस विषय पर बुरी तरह बट चुका है और इसके पक्ष और विपक्ष में अलग-अलग दलीलें दी जाती हैं. पिछले दिनों भारत सरकार की तरफ से एक आदेश जारी किया गया, जिसमें इसे  इस्तेमाल न करने की सलाह दी गयी. इसके बाद से यह मुद्दा एक बार फिर गरमा गया. 

पिछले कुछ समय से साहब कांशी राम के विचारों को गहराई से जानने की कोशिश में मैंने काफी बार उन्हें इस नाज़ुक विषय पर अपनी राय देते हुए पाया. लगभग सभी जगह उन्होंने इस शब्द के इस्तेमाल को लेकर अपना विरोध जताया और सिर्फ अनुसूचित जाति ही नहीं बल्कि पुरे बहुजन समाज(ST, SC, OBC) को इससे होने वाले नुकसान से आगाह करवाया. 

इस विषय पर मैंने पहले भी दो लेख लिखे; पहला “साहब कांशी राम और दलित शब्द का सवाल” और दूसरा “दलित शब्द एक साजिश या भूल“. पहले लेख में मैंने साहब कांशी राम के कई भाषणों और साक्षात्कारों (इंटरव्यू) का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने इस शब्द का विरोध किया था. दूसरे में मैंने महात्मा जोतीराव फूले, बाबासाहब अम्बेडकर और साहब कांशी राम तक के नेतृत्व में बने संगठनों और आंदोलनों का ज़िक्र किया कि कहीं भी “दलित” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया. सभी ने ST, SC, OBC में बिखरी 6000 जातियों को जोड़ने वाले शब्दों का प्रयोग किया ताकि एक मज़बूत और बड़ी पहचान बन सके. 

मैंने कई बार सुना था कि बाबासाहब अम्बेडकर भी “दलित” शब्द के इस्तेमाल के खिलाफ थे, लेकिन उनके द्वारा इस सम्बन्ध में लिखे गए विचारों को कभी पढ़ा नहीं था. कुछ दिन पहले YouTube पर एक वीडियो देखा, जिसमें बिहार से आते एडवोकेट माला दास इस विषय पर बोल रहीं थीं कि बाबासाहब के खंड 4 के आखरी पृष्ठों पर “नामकरण” शीर्षक के अंतर्गत उनके यह विचार पढ़े जा सकते हैं. 

जब मैंने खंड 4 के पृष्ट 228 को खोला तो “नामकरण” शीर्षक के अंतर्गत दिए बाबा साहेब के विचारों को पढ़कर हैरान रह गया. वो न सिर्फ इस शब्द के सख्त खिलाफ थे बल्कि उन्होंने इस बारे में कई तर्क भी दिये हैं. यह विचार बाबासाहब ने 1 मई 1932 को लोथियन कमेटी के सामने अनुसूचित जातियों को वोट का अधिकार दिए जाने के संबंध में दी गयी अपनी रिपोर्ट में रखे थे. इस रिपोर्ट का मुख्य विषय तो वोट के अधिकारों से जुड़ा था, लेकिन बाबासाहब ने अनुसूचित जातियों के एक उचित नाम रखे जाने को भी इसमें शामिल किया ताकि इस मसले का भी हल ढूंढा जा सके. मैं यहां उनके विचारों को संदर्भ के तौर पर दे रहा हूँ ताकि हम सब इसके बारे में जान सके.

5. नामकरण 

14. संविधान में प्रस्तावित परिवर्तनों के फलस्वरूप मतदाता सूचियों में जो संशोधन हो रहा है, वह इस प्रश्न पर विचार के लिए एक अति उत्तम अवसर है कि दलित वर्गों का एक उचित और उपयुक्त नामकरण किया जाए. अतः मैं इस प्रश्न पर अपनी राय व्यक्त करना चाहता हूँ. जिन जातियों को इस समय “दलित वर्ग” कहा जाता है, उन्हें इस शब्द के प्रयोग पर काफी आपत्ति है. कमेटी के सामने जो अनेक साक्षी उपस्थित हुए हैं, उन्होंने इस भावना को व्यक्त किया है. इसके अलावा दलित वर्ग शब्द ने जनगणना में काफी भृम पैदा करा दिया है क्योंकि इसमें उन दूसरे लोगों का भी समावेश(शामिल) है, जो वास्तव में अस्पृश्य नहीं हैं. दूसरे वह यह धारणा पैदा करता है कि दलित वर्ग एक निम्न और असहाय समुदाय है, जब की वास्तविकता यह है कि हर प्रांत में उनमें से अनेक सुसम्पन्न(खुशहाल) और सुशिक्षित लोग हैं और समूचे समुदाय में अपनी आवश्यकताओं के प्रति चेतना जागृत हो रही है. उसके मानस में भारतीय समाज में सम्मानजनक दर्जा प्राप्त करने की प्रबल लालसा पैदा हो गई है और वह उसे प्राप्त करने के लिए भागीरथ(काफी बड़े) प्रयास कर रहा है. इन सब कारणों के आधार पर “दलित वर्ग” शब्द अनुपयुक्त और अनुचित है. असम के जनगणना अधीक्षक श्री मुल्लान ने अस्पृश्यों के लिए “बाहरी जातियां” नामक नये शब्द का प्रयोग किया है. इस बोध नाम के अनेक लाभ हैं. यह उन अस्पृश्यों की स्थिति की सही व्याख्या करता है, जो हिन्दू धर्म के भीतर तो हैं, लेकिन हिन्दू समाज से बाहर हैं और वह उसका विभेद(अंतर) उन हिन्दुओं से करता है, जो आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से दलित तो हैं – लेकिन हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज दोनों की परिधि(घेरे) के भीतर हैं. इस शब्द के दो अन्य लाभ हैं, दलित वर्ग जैसे अनिश्चित शब्द के प्रयोग से इस समय जो समूचा भ्रम जाल फैला हुआ है, वह तो “बाहरी जाती” के प्रयोग से दूर होता ही है पर साथ ही साथ वह भौंडा(अपमानजनक) भी नहीं है. हमारी कमेटी का विचार है कि वह इस संबंध में सिफारिश करने के अधिकार नहीं रखती, लेकिन दलित वर्गों के प्रतिनिधि के नाते मैं बिना किसी संकोच के कह सकता हूं कि जब तक कोई और बेहतर नाम न मिल जाए, तब तक अस्पृश्य वर्गों को अधिक व्यापक शब्द “बाहरी जातियों” या बहिष्कृत जातियों के नाम से पुकारा जाए न कि दलित वर्गों के नाम से. (बाबासाहेब अम्बेडकर, 1 मई, 1932; पृष्ट 228, खंड 4)

इनको पढ़ने के बाद मुझे नहीं लगता कि इस बात पर किसी भी तरह का कोई विवाद बाकी रह जाना चाहिए कि हमें “दलित” शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं? हमारे समाज के बुद्धिजीवी कम से कम बाबासाहब के कहे गए इन विचारों से असहमत तो नहीं हो सकते, वो भी जब उन्होंने इतनी स्पष्टता से इस पर अपनी राय रखी हो. अगर फिर भी वो “दलित” शब्द के प्रयोग को सही ठहराते हैं तो फिर उन्हें पहले बाबासाहब अम्बेडकर के ऊपर दिए गए विचारों से अपनी असहमति जतानी होगी. उन्हें पूरे समाज के सामने अपना तर्क रखना होगा कि वो बाबासाहब के इन विचारों से क्यों असहमत हैं? यह भी हो सकता हैं कुछ ने बाबासाहब की यह रिपोर्ट न पढ़ी हो. उन्हें अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और इस गैर ज़रूरी विवाद, जिसका फैसला बाबासाहब ने 1932 को ही कर दिया था, से खुद को और अपने समाज को हमेशा के लिए बाहर निकालना चाहिए.  

साहेब कांशी राम कहा करते थे कि अगर हमें इस देश का शासक बन कर बाबासाहब अम्बेडकर का सपना पूरा करना है तो हमें “दलित” (कमज़ोर) नहीं बल्कि बहुजन (बहुसंख्यक) बनना होगा. आधुनिक समय में “बहुजन” शब्द हमें सामाजिक क्रांति के पितामह महात्मा जोतीराव फूले ने दिया था. महाराष्ट्र की अपनी एक जन सभा में बोलते हुए साहब ने कहा था कि जिन बातों पर हमारे महापुरषों ने दिमाग लड़ाया है, अब हमें उन पर अपना दिमाग नहीं लड़ाना है. बस सीधे-सीधे अपना लेना है. मेरा दिमाग आगे की तरफ चलना चाहिए न की पीछे की तरफ. 

शायद ही इससे बेहतर कोई मिसाल दी जा सकती हो.  

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सतविंदर मदारा पेशे से एक हॉस्पिटैलिटी प्रोफेशनल हैं। वह साहेब कांशी राम के भाषणों  को ऑनलाइन एक जगह संग्रहित करने का ज़रूरी काम कर रहे हैं एवं बहुजन आंदोलन में विशेष रुचि रखते हैं।

 

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