Dhamma

 

धम्म दर्शन निगम (Dhamma Darshan Nigam)

Dhammaजो इंसान ठगी और दूसरों को मूर्ख बनाने का रास्ता अपनाता है वह सिर्फ दूसरे ठगों द्वारा ही विकास पसंद कहा जाता है. अन्यथा जीवन में असली विकास वही इन्सान करता हैं जो वैज्ञानिक, नैतिक और तर्कसंगत बात करता है. वैज्ञानिक स्वभाव वाला इंसान दूसरों से भी वास्तविकता में विश्वास रखने तथा उसमें जीने की बात कहता है. जबकि दूसरों को मूर्ख बनाने वाला इंसान उन्हें झूठे सपने दिखाता है, उन्हें कल्पनाओं में ही रहने की आदत डलवा देता है. कल्पनाओं में रहने से इन्सान वास्तविकता में कम और सपनों में ज्यादा जीता है, तथा अपनी वर्तमान वास्तविक स्थिति पर काम करने की बजाए भविष्य पर ज्यादा निर्भर रहता है. जैसा कि जाति व्यवस्था में नीचे और मध्य वर्ग की जातियों को कहा जाता है कि आपकी जो अभी की दशा है वह आपके पिछले जन्म की वजह से है और अब यह दशा अगले जन्म में ही अपने से ऊपर वाले वर्ग में जन्म ले कर सुधरेगी. और अगले जन्म में ऊपर वाले वर्ग में जन्म भी तब मिलेगा जब आप इस जन्म का निर्धारित काम पूरी ईमानदारी से करेंगे. मतलब इस जन्म में आपकी स्थिति सुधरने की कोई सम्भावना नहीं है, और आपको अपनी जाति के हिसाब से यही निर्धारित काम ही करना पड़ेगा. अतः जाति व्यवस्था वास्तविकता में नहीं, काल्पनिकता में जीना सिखाती है. वर्तमान वास्तविकता से बनता है, कल्पना से नहीं. अगर लोगों को जाति व्यवस्था से बाहर निकलना है, अपना वर्तमान सुधारना है, तो उन्हें कल्पनाओं पर विश्वास करना छोड़ उनकी वास्तविकता पर काम करना होगा. उन्हें वैज्ञानिक स्वभाव अपनाना होगा. 

अतः वास्तविकता सत्य है और कल्पना असत्य. कल्पना भी सत्य हो सकती है अगर उस पर वैज्ञानिक तरीके से काम किया जाए. यह वास्तविकता और कल्पना, क्रमानुसार सत्य और असत्य भी इसी क्षण के लिए है, क्योंकि हमें नहीं मालूम होता कि अगले क्षण की वास्तविकता क्या होगी. हो सकता है कि अभी कि वास्तविकता कल की कल्पना हो या अभी की कल्पना कल की वास्तविकता.

इंसान इस प्रकृति का हिस्सा है, इस प्रकृति से ये धरती बनी है, और यह धरती पूरे ब्रह्माण्ड का हिस्सा है. अगर इंसान, प्रकृति, और धरती आपस में जुड़े हुए हैं तो उनके पीछे वैज्ञानिक वास्तविकताएं हैं, कल्पनाएँ नहीं. अगर प्राकृतिक संसाधनों का किसी निश्चित समय में हद से ज्यादा इस्तेमाल करना अवैज्ञानिकता है तो इंसान-इंसान में भेद करना सिखाना भी अनैतिकता ही नहीं अवैज्ञानिकता भी है. 

अगर ब्रह्माण्ड एक अनंत सच्चाई है, वास्तविकता है, तो इसकी सबसे छोटी सच्चाई है परमाणु. विज्ञान से हमने सीखा है कि अणु और परमाणु आपस में सम्बंधित होते हैं. और इंसानी शरीर भी इन्हीं अणुओं और परमाणुओं के सम्बन्ध से बना है. और जब यह इन्सान किसी दूसरे इन्सान के साथ सम्बन्ध में आता है, उसके साथ रहता है, उसके साथ जीवन जीता है तो समाजशास्त्र इस सम्बन्ध को परिवार कहता है. इसका मतलब साथ रहने की इस प्रक्रिया को हम परिवार कहते हैं. तो परिवार अणुओं और परमाणुओं का भी हुआ. अतः हम कह सकते है कि आपसी सम्बन्ध परिवार कहलाता है. इस तरह से परिवार एक वास्तविक इकाई है, कोई कल्पना मात्र नहीं. सूरज, चाँद, पृथ्वी और बाकी गृह भी एक परिवार है. विज्ञान हमें बताती है कि अणुओं और परमाणुओं से इन्सान ही नहीं बना बल्कि ये ज़मीन, पानी, पहाड़, जानवर, पेड़, चाँद, सूरज सभी अणुओं और परमाणुओं से बनें हैं.

साधारणतः ज़मीन, पानी, पहाड़, जानवर, पेड़, और इन्सान को मिला कर हम प्रकृति कहते हैं. इन्हें हम प्रकृति के अंग भी कह सकते हैं. प्रकृति और प्रकृति के यह अंग, जो देखे, सुने, और महसूस किये जा सकते हैं वास्तविकता हैं, कोई कल्पना नहीं. इसका मतलब जो देखा-सुना-महसूस किया जा सकता है, जिसके विज्ञान में प्रमाण है वह वास्तविक है, और जिसके विज्ञान में प्रमाण नहीं हैं वह काल्पनिक है.

प्रकृति का एक नियम है बदलाव, जो प्रकृति के हर अंग पर लागू होता है. प्रकृति खुद और इसके यह अंग वातावरण और दूसरे कारणों की वजह से समय के साथ लगातार बदलते रहते हैं. लेकिन बदलने के बावजूद यह वास्तविक रहते हैं, काल्पनिक नहीं! क्योंकि ऐसा असलियत में हुआ होता है. सिर्फ किसी की कल्पना में नहीं होता.

इन्सान ने खुद का जीवन सरल करने के लिए शब्द रचे और इस बदलाव को विकास (या पिछड़ना) कहा. इस बदलाव का एक उदाहरण है, प्रकृति का एक अंग, खुद इंसानी नसल. जो पहले दो हाथ और दोनों पैरों की मदद से चलते थे, लेकिन आज इसे चलने के लिए हाथों की जरुरत नहीं पड़ती. यह सीधे खड़े होकर सिर्फ दो पैरों पर चलते हैं. और इन्सान ने इसके दो हाथ दो पैर से सिर्फ दो पैर पर चलने तक को विकास का नाम दिया. मतलब बदलाव तो निश्चित है, जो अपने-अपने समय की वास्तविकता होती है, लेकिन वह विकसित होना कहा जाए या पिछड़ना यह इंसानी फितरत पर निर्भर करता है. अतः प्रकृति का एक शाश्वत नियम इसका लगातार बदलाव तो है ही. 

इस धरती पर, इस प्रकृति में सिर्फ इंसानी नसल नहीं बसती. यह धरती सिर्फ इंसानी नसल के लिए नहीं है. इस प्रकृति में और भी नस्लें है (इसके दूसरे अंग) जिसके सामने इंसानी नसल कुछ भी नहीं है. लेकिन इसने दूसरी नस्लों के रहने के अनुरूप वातावरण ही नहीं छोड़ा. इसने जंगल काटे, जंगल जलाये. नदियों के बहाव को रोका, नदियों को रास्ता संकरा किया. पानी का आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल किया. इसके फलस्वरूप, आज नदियाँ ख़तम हो रहीं हैं. कई प्रजातियाँ धीरे-धीरे ख़तम हो रही हैं जबकि पहले हज़ारों प्रजातियाँ थीं. आज चारों तरफ बस एक ही प्रजाति नज़र आती है, इंसान. यह इंसानी नसल जिसे प्रकृति ने जनम दिया प्राकृतिक अधिकार नहीं समझती. इसलिए इसने दूसरी नस्लों के प्राकृतिक अधिकारों पर कब्ज़ा करना शुरू करा. इसनें जानवर, नदियाँ, ज़मीन, पेड़-पौधों को ही ख़तम नहीं करा, बल्कि एक दूसरे को भी आपस में मारना शुरू करा. और इसने इतना सब सिर्फ खुद के ही नसल के लोगों से खुद को सुबह-शाम सलाम कहलवाने, मुफ्त या सस्ती सेवा पाने के लिए और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा करने के लिए करा. ताकि ये खुद (अति) लोभ-विलास में जी सके और प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग कर सकें.

प्रकृति के और भी नियम है. जैसे, जीयो और जीने दो. यह इंसानी नसल पर मुख्य रूप से लागू होता है, क्योंकि इसमें बाकी नस्लों से सोचने-समझने की क्षमता ज्यादा होती है. इन्सान के लिए ज़रूरी है कि वह दूसरी नस्लों के प्राकृतिक अधिकार को समझे. जानवरों और नदियों को नुकसान ना पहुचाएं. जंगलों और पहाड़ों को ना काटे, क्योंकि हमारा वातावरण, जिस वजह से हम सांस लेते हैं, इसी पर निर्भर करता है. और जब इंसान सोच समझ सकता है तो अपनी जनसँख्या का भी ध्यान रखे. क्योंकि इसका जनसँख्या विस्फोट बाकी नस्लों के साथ-साथ प्रकृति के लिए भी नुकसानदेह है. यह इंसानी नसल आपस में भी भेदभाव ना करे. शारीरिक शक्तिशाली या मानसिक बुद्धिमान होने का फायदा ना उठाये. दूसरे इंसानों पर अपना अधिकार साबित ना करे. उन्हें अधिकारहीन ना करे. अन्धविश्वास ना फैलाए. काल्पनिक चीजों को बढ़ावा ना दे. इंसान का ऐसा कुछ भी करना प्रकृति के नियम के खिलाफ़ है. 

लेकिन जैसे ऊपर कहा गया है इंसानी नसल प्राकृतिक अधिकार की परिभाषा नहीं समझती. इसने खुद के ही नसल के लोगों पर अधिकार ज़माना शुरू करा. भगवान नाम का आडम्बर रचा. जन्म, कर्म, और पुनर्जन्म के नाम पर को लोगों डराए रखा. वास्तविकता को नकार कल्पना को बढ़ावा दिया. अन्धविश्वास को इस कदर बढ़ावा दिया कि कल्पना को लोग वास्तविकता समझने लगे. और कल्पना को वास्तविकता में जीने लगे. वर्चस्ववादी लोगों ने पुनर्जन्म को वास्तविकता बना दिया. 

प्रकृति का एक नियम और भी है कि हमें एक ही जन्म मिलता है. हम खुद को महसूस कर सकते हैं. यही हमारी वास्तविकता है. अगर दूसरा जन्म या पुनर्जन्म है भी, तो वो हमें दूसरा जन्म लेने पर ही पता चलेगा, नाकि इसी जन्म में. और इसके साथ-साथ जब हम पुराने जन्म की बातें याद रख पायें. इसलिए हमें अपने अभी के जन्म में जीना चाहिए और पुनर्जन्म जैसी बातें नहीं करनी चाहिए और ना उनमें विश्वास करना चाहिए. कर्म और पुनर्जन्म के आधार पर क्रमबद्ध तरीके से लोगों को अलग-अलग जाति में बांटना इंसानी इतिहास की सबसे ज्यादा दुखद घटना है.

why do you worry about caste

इंसानी नसल को अलग-अलग जाति में बांटने वाले लोगों ने खुद को जातियों में सबसे ऊपर रखा और क्रम में नीचे के लोगों को तुच्छ, निरर्थक, महत्वहीन प्राणी कहा. खुद को सभी लोगों में एकदम श्रेष्ठ बताया. खुद को “मैं समय हूँ” कहा. इन्सान जो खुद समय की वजह से है, उसने खुद को ही समय बताया. खुद की क्षणिक वास्तविकता को अनंत वास्तविकता बताया. खुद की लिखी बातों को अनंत सत्य बताया, और दूसरा कोई कुछ पढ़-लिख-समझ ही ना पाए इसलिए उसे अज्ञान बनाये रखा. भगवान और पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक बातों को वास्तविकता बताकर लोगों की अज्ञानता को मूर्खता में बदल दिया. और इन काल्पनिक बातों को वास्तविकता बनाये रखने की कोशिश अभी भी जारी है. लोगों को मूर्ख बनाये रखने की कोशिश अभी भी जारी है. संचार का एक-एक माध्यम आज भगवान, पुनर्जन्म की बातें और अन्धविश्वास फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इन्सान की हर उम्र के लिए भगवान नाम की ख़ुराक टेलिविज़न और किताबों में अलग-अलग तरह से परोसी जा रही है. इंसानों का इंसानों में ही भेद करना, उनको क्रमबद्ध रूप में बांटना, उनकी एक संक्रामक बीमारी है जो दूसरे इंसानों में भी फ़ैल रही है. 

इस बीमारी के खिलाफ, इन काल्पनिक बातों के खिलाफ अगर कोई लिखता है, लोगों को बताता है, तो बहुत तकनीकी रूप से या जरुरत पड़े तो जबरदस्ती भी उन्हें चुप कराया जाता है. उनकी किताबों को प्रतिबंधित कराया जाता है. इस पर भी वो इंसान ना माने तो उसे मरवा दिया जाता है. इंसानी नस्ल के इन बीमार लोगों को पहचानना और उनकी इस बीमारी का इलाज करना बहुत ही ज़रूरी है. नहीं तो वो उनकी नसल और दूसरी नस्लों को ही नुकसान नहीं पहुचाएंगे, बल्कि पूरी प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ कर रख देंगे. कल्पना और वास्तविकता में कोई भेद नहीं छोड़ेंगे. प्राकृतिक अधिकारों को कोई नहीं पूछेगा. यह इंसानी नसल के लिए दुर्भाग्यवश है कि इसके वर्चस्ववादी लोगों ने प्रकृति का कोई भी नियम नहीं माना. ना दूसरों को जीने दिया और खुद को कभी शारीरिक तो कभी आत्मा के रूप में अजर-अमर साबित किया.

इन लोगों को शायद यह नहीं मालूम कि अगर प्रकृति में इसी तरह असंतुलन बढ़ता गया तो प्राकृतिक आपदाएं आएंगी और कोई भी नहीं बचेगा. भगवान और धार्मिक ग्रन्थ कुछ नहीं बचेगा. पूर्व में भी पूरी की पूरी सभ्यताएं ख़तम हुई हैं! और आख़िरकार कुछ बचता है तो बस एक अनंत सत्य, अणु और परमाणु. 

अतः इन्सान विज्ञान को बढ़ावा दे, वास्तविकता को बढ़ावा दे, जो दिखता है उसमें विश्वास करे, सत्य को बढ़ावा दे, इन्सान और प्रकृति और इसके अनेक अंगो के प्राकृतिक अधिकार को समझे, अन्धविश्वास न फैलाये, जाति-जन्म-कर्म-पुनर्जन्म के नाम पर लोगों को आपस में न बाटें और न ही आपस में लड़वायें. 

इन्सान-इन्सान में भेद कर के जाति के आधार पर एक से ताउम्र बिना मेहनताना मेहनत मजदूरी करवाना, एक समुदाय से ताउम्र टट्टी ढुलवाना, और दूसरा सिर्फ अन्धविश्वास फैलाने से, लोगों को बांटने वाली बातें करने से उसकी रोज़ी-रोटी कमाए, किसी न्यायसंगत-तर्कसंगत समाज की पहचान नहीं है. 

प्रकृति का एक अटल नियम है बदलाव. और अगर आप इस नियम के विपरीत जाते हैं, इंसानों को अलग-अलग जातियों में बाँटते हैं, उन्हें उन्हीं जातियों में बने रहने को मजबूर करते हैं या वैसी स्थिति पैदा करते हैं, इन्सान–इन्सान और जाति-जाति में भेद करना सिखाते हैं, इन्सान के बदलाव को रोकते हैं, जाति के आधार पर लोगों के काम के बंटवारे में विश्वास रखते हैं तो आप अवैज्ञानिकता ही नहीं, मूर्ख भी है. जाति आधारित गैरबराबरी में विश्वास रखना आपकी वैज्ञानिकता नहीं, मुर्खता है!

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धम्म दर्शन निगम ‘सफाई कर्मचारी आन्दोलन’ के सक्रिय सदस्य हैं, लेखक हैं. उनसे ddnigam@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

*कार्टून स्याम सुंदर उन्नामती के सौजन्य से 

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