यह आलेख NCERT की 2008 की मेमोरियल लेक्चर सीरीज (स्मारक व्याख्यान श्रंखला) में आयोजित सावित्रीबाई मेमोरियल लेक्चर का एक भाग है| इसके लेखक हैं प्रो हरि नारके., प्रो नारके महात्मा फुले पीठ, पुणे विश्वविद्यालय के निदेशक हैं| वे एक प्रख्यात विद्वान् हैं, जो अब तक 6000 से अधिक व्याख्यान दुनिया के प्रसिद्द विश्वविद्यालयों में दे चुके हैं|  पुणे में महात्मा फुले मेमोरियल,  नैगाँव में सावित्रीबाई फुले का मेमोरियल और संसद भवन में महात्मा फुले की प्रतिमा स्थापित करने की पहल करने का श्रेय प्रो. नारके को ही जाता है|

~~~राउंड टेबल इण्डिया

अनुवादक के दो शब्द,

माता सावित्रीबाई फुले का जीवन करुणा और त्याग से प्रज्वलित एक मशाल हैं| पहली बार जब इस लेख को इन्टरनेट पर मैंने पढ़ा तो मुझे लगा कि यह इतना महत्वपूर्ण है कि इसे हिंदी में अवश्य होना चाहिए| मूलतः यह लेख प्रो. हरी नारके का एक आलेख है जिसे 2008 में NCERT पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया है| यह आलेख NCERT मेमोरियल लेक्चर सीरीज की एक कड़ी है| मैंने इन्टरनेट पर इसका हिंदी संस्करण ढूंढने की कोशिश की किन्तु NCERT ने मूल संस्करण (English) को ही अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया है| इसलिए मुझे लगा कि यह अनुवाद का कार्य मुझे ही करना चाहिए| सावित्रीबाई फुले के बारे में इन्टरनेट पर हिंदी में जानकारी का अत्यंत अभाव है और ऐसे में इस प्रमाणिक लेख को देखकर इसका अनुवाद करने का मोह संवरण मै कर नहीं पाया| आखिर ज्ञान से ही चेतना का विकास होता है और चेतना क्रांति का मार्ग प्रशस्त करती है| इस उद्देश्य से जब अनुवाद करने बैठा तो इस त्याग और करुणा की दास्तान में कुछ यूँ उलझता गया कि कई बार भाव-विभोर हुआ तो कई बार आँखें भी भर आयीं| खैर, अनुवाद की भी अपनी कुछ समस्याएं और सीमाएं होती हैं|  एक उत्कृष्ट अनुवाद में शब्दों से तो खेलना ही होता है,  सबसे बड़ी कठिनाई भाषा की सहजता,  शैली और मूल-भाव को ज्यों का त्यों बनाये रखने की होती है| शुद्धतावाद जैसे कुछ भाषाई दुराग्रह भी होते हैं जिनसे बचना होता है| वैसे अनुवाद की इकाई जितनी व्यापक होगी, अनुवाद उतना ही बेहतर होगा| इस तरह देखा जाय तो वाक्य से वाक्य का अनुवाद, अनुवाद की एक घटिया विधि है| अनुवाद का सबसे अच्छा आधार भाव इकाई हो सकता है| एक पूरी भाव इकाई का अनुवाद| सामान्यतः इस भाव इकाई की सीमायें पैराग्राफ से तय होती हैं किन्तु ये कोई ऐसा बंधन नहीं जो अनुल्लंघ्य हो|  शब्द, मै फिर से कहूँगा, अनुवाद के कार्य में निमित्त मात्र हैं| यदि शब्दों का उपयुक्त रूपांतर न मिले तो भी हम मूल-भाव से छेड़छाड़ नहीं कर सकते किन्तु भाव के लिए शब्दों को आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है|  तो भी, इससे उपयुक्त शब्द-चयन की महत्ता कम नही होती|
एक अंतिम बात अनुवाद कोई मौलिक कार्य नही है| मैंने कोशिश की है कि पाठकों तक ‘पाठ्यवस्तु’ को यथासंभव सरल एवं सहज भाषा में पहुंचा सकूँ| पाठकगण प्रो. हरी नारके का धन्यवाद ज्ञापन करें जिन्होंने इतना महत्वपूर्ण आलेख लिखा और हमें एक महान महिला के बारे में इतना विस्तार से जानने-समझने का अवसर प्रदान किया| मै भी प्रो. नारके को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ|

 सुधीर अम्बेडकर
 अध्यापक  
28 अप्रैल, 2015                                

प्रो. हरि नारके

“महात्मा फुले से ज्यादा उनकी पत्नी प्रशंसा की हकदार हैं| हम उनकी जितनी भी तारीफ करें, कम ही होगी| आखिर कोई कैसे उनके व्यक्तित्व का बखान कर सकता है! उन्होंने अपने पति का पूरा सहयोग किया और पथ में आई सभी बाधाओं का सामना उनके साथ किया| ऊँची जातियों की उच्चशिक्षित महिलाओं में भी इतना त्याग करने वाली महिला का मिलना मुश्किल है| दम्पति का जीवन जनकल्याण के कार्यों में ही बीता|”
               —- नारायण महादेव उर्फ़ मामा परमानन्द (31 जुलाई, 1890)

महात्मा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भारत के सामाजिक और शैक्षिक इतिहास में एक असाधारण दम्पति हैं| वे महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता तथा सामाजिक न्याय लाने के लिए एक जोशपूर्ण आन्दोलन को स्थापित करने में लगे रहे|  उन्होंने माना कि ज्ञान ही शक्ति है और इसके बिना महिलाओं और दलित-बहुजनों की प्रगति असंभव है उन्होंने अपने पूरे जीवन को ही शिक्षा के प्रसार में लगा दिया| 1854-55 में देश में पहला देशी पुस्तकालय और लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोलने का श्रेय उन्ही को जाता है|  1863 में गर्भवती ब्राह्मण विधवाओं की सुरक्षा के लिए उन्होंने अपने ही घर में ‘भ्रूण-हत्याओं की रोकथाम के लिए आश्रम’ की स्थापना की ताकि ऐसी महिलाएं सुरक्षित रहकर बच्चे को जन्म दे सकें और उसका पालन पोषण कर सकें|  1873 में सत्यशोधक समाज (सत्य की खोज के लिए समाज) की स्थापना करके उन्होंने ‘सत्यशोधक विवाह’ की शुरुआत की|  इस प्रकार की शादियाँ बिना दहेज़ के और कम से कम खर्च में होती थीं| अपने घर के कुएं को अछूतों के लिए खोलकर ज्योतिबा फुले ने सीधे जाति-व्यवस्था का विरोध करने का कार्य प्रारंभ कर दिया| ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई दोनों ने ही न केवल बाल-विवाह का विरोध किया बल्कि विधवा पुनर्विवाहों का भी आयोजन किया| उनकी अपनी कोई संतान नही थी लेकिन उन्होंने एक विधवा ब्राह्मणी के बच्चे को गोद लिया और उसे ‘चिकित्सा विज्ञान’ की शिक्षा दिलाकर उसका अंतरजातीय विवाह कराया|

इस दम्पति ने देश में शुद्रो-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए एक समग्र और एकीकृत क्रांतिकारी, सांस्कृतिक,  सामाजिक एवं शैक्षिक आन्दोलन का निर्माण करने का ऐतिहासिक कार्य किया| यह एक नए क्रान्तिकारी युग का सूत्रपात था|

स्वतंत्रता से पहले के युग में हम इस बात पर बहस देखते हैं कि सामाजिक और राजनैतिक  सुधार में से किसे प्राथमिकता दी जाय| चूँकि ब्रिटिश शासन के रूप में हमें दुश्मन स्पष्ट दिखाई दे रहा था, अतः हमने राजनैतिक सुधार को प्राथमिकता दी| लोगों का विश्वास था कि एक बार अगर हमें स्वतंत्रता मिल गई तो हमारी सामाजिक समस्याएं स्वतः हल हो जायेंगी|  लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया,  उनका यह भ्रम टूटता गया. इस भ्रम के टूटने से ही सामाजिक  आन्दोलनों को बल मिला| सामाजिक न्याय के विभिन्न क्षेत्रों में आन्दोलन करने वाले लोगों को यह अहसास हुआ कि इन मुद्दों पर ज्योतिराव और सावित्री बाई द्वारा किये गए काम और विचार आज भी उनका पथप्रदर्शन कर सकते हैं| जब उन्होंने यह महसूस किया कि उनके विचार, भावना और विश्लेषण आज भी उपयुक्त और प्रासंगिक हैं तो उन्होंने फुले-साहू-अम्बेडकर के जीवन, काम और विचारों में विशेष रूचि लेना शुरू किया|  

ज्योतिराव और सावित्रीबाई पर मराठी भाषा में 200 से अधिक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं| मराठी के साथ-साथ हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु, कन्नड़, पंजाबी, उर्दू, सिन्धी और गुजराती में भी उन पर लिखी हुई पुस्तके प्रकाशित हुई हैं|  इनमे 40 पुस्तकें सावित्रीबाई पर लिखी गयीं हैं| यदि हम गैर साहित्यिक और शैक्षणिक पुस्तकों की बात करें तो 1939 में शांताबाई रघुनाथ बनकर द्वारा लिखित सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले यांची अल्पचरित्र और 1966 में फुलवंतीबाई ज़ोद्गे द्वारा लिखित क्रांतिदेवता साध्वी सावित्रीबाई फुले विशेषरूप से महत्वपूर्ण है | इनके नक्शेकदम पर चलते हुए बाद में डॉ. एम्. जी. माली ने 1980 में क्रान्तिज्योती सावित्रीबाई फुले नामक जीवनी लिखी तथा डॉ. के.पी. देशपांडे ने 1982 में अग्निफुले लिखी जो सावित्रीबाई के जीवन और साहित्य पर आधारित है | इनमें से ज्यादातर प्रकाशित पुस्तकों में नई जानकारी का अभाव है | लेकिन उससे भी ज्यादा दुःख की बात यह है कि अभी तक सावित्रीबाई की एक भी जीवनी लिखी नहीं गई है|

 सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को पुणे से 50km दूर पुणे-सतारा मार्ग पर स्थित नैगांव (Naigaon) में हुआ था| वो अपने पिता खंडोजी पाटिल की सबसे बड़ी पुत्री थीं|  1840 में 10 वर्ष की उम्र में उनका विवाह ज्योतिराव के साथ हुआ था जोकि उस समय 13 वर्ष के थे|

 सरकारी आंकड़े बताते हैं कि ज्योतिराव ने शादी के बाद सावित्रीबाई को घर पर ही शिक्षित किया था| 1 मई 1851 तक के शिक्षा रिपोर्ट के अनुसार- “ज्योतिराव ने अपनी पत्नी को घर  पर ही पढाया और उन्हें शिक्षिका के तौर पर प्रशिक्षित किया|” बाम्बे गार्जियन के 22 नवम्बर 1851 में प्रकाशित एक खबर के अनुसार उनकी आगे की शिक्षा की जिम्मेदारी ज्योतिराव के मित्र सखाराम यशवंत परांजपे और केशव शिवराम भावलकर(जोशी) ने संभाली|  सावित्रीबाई ने सुश्री फ़रार अहमदनगर और पुणे में सुश्री मिशेल की संस्थाओं से अध्यापकीय प्रशिक्षण भी प्राप्त किया था| इन दस्तावेजों के आधार पर सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला अध्यापिका और प्रधानाध्यापिका थीं| घर की देहरी लांघकर बाहर पढ़ाने जाने के उनके इस कदम से आधुनिक भारतीय महिला के ‘सार्वजानिक जीवन’  का प्रारंभ होता है|

19 अक्टूबर 1882 को हंटर एजुकेशन कमीशन को दिए साक्ष्य में अपने शैक्षिक योगदान का उल्लेख करते हुए ज्योतिबा फुले ने कहा, “उस समय लड़कियों के लिए यहाँ कोई ऐसा स्कूल नहीं था जिसे ‘स्थानीय’ कह पाते| इसलिए मुझे ऐसा स्कूल खोलने की प्रेरणा मिली| मैंने और मेरी पत्नी ने उस स्कूल में कई वर्ष कार्य किया| “ एजुकेशन बोर्ड के चेयरपर्सन सर Arskin Perry और तत्कालीन भारतसचिव Lumsden ने स्कूल का भ्रमण किया और शिक्षा के क्षेत्र में इस नए आन्दोलन पर संतुष्टि व्यक्त की|”

15 सितम्बर, 1853 को ‘ज्ञानोदय’ को दिए गए एक इंटरव्यू में ज्योतिबा फुले कहते हैं—– “मुझे ऐसा लगता है कि बच्चे में जो संस्कार माता कि वजह से आता है वह बहुत ही महत्वपूर्ण और अच्छा होता है| इसलिए जो लोग इस देश की सुख-समृद्धि के लिए चिंतित हैं,  उन्हें महिलाओं की  दशा पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और यदि वे वास्तव में चाहते हैं कि देश प्रगति करे तो उन्हें महिलाओं को ज्ञान प्रदान करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए| इसी विचार के साथ मैंने पहले लड़कियों के लिए स्कूल खोला| लेकिन मेरी जाति के लोगों को यह बात अच्छी नही लगी कि मै लड़कियों को शिक्षित करूँ और स्वयं मेरे पिता ने मुझे घर से निकाल दिया|  न तो स्कूल के लिए कोई जगह देने के लिए तैयार था और न ही इसे बनाने के लिए मेरे पास पैसे थे | लोग तो अपने बच्चों को स्कूल भेजने को ही तैयार नहीं थे लेकिन लाहूजी राघराउतमंग और रनबा महार ने अपने जाति-भाइयों को इस बात का विश्वास दिला दिया कि शिक्षित होने के बहुत फायदे होते हैं|”

ज्योतिबा फुले ने जब यह ऐतिहासिक कार्य प्रारंभ किया तो वे महज 21 वर्ष के थे और उनकी पत्नी सावित्रीबाई,  जिन्होंने हर तरह से उनका साथ दिया,  मात्र 18 वर्ष की थीं|  जिस समुदाय को हजारों वर्षों तक शिक्षा से दूर रखा गया,  उसी शुद्र समुदाय ने ऊँची जातियों द्वारा भड़काए जाने पर ज्योतिबा फुले के कार्य को ‘खराब’  कहते हुए विरोध करना शुरू कर दिया| इस दम्पति का अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण इतना अधिक था कि उन्होंने इस कार्य को तब भी नही छोड़ा जब उन्हें घर छोड़ना पड़ा| अपनी जीविका(रोजी-रोटी) चलाने के लिए ज्योतिराव एक मिशनरी स्कूल में पार्ट-टाइम काम करते और बचा हुआ समय खुद के स्कूल में पढ़ाते जबकि सावित्रीबाई बिना किसी पारिश्रमिक(तनख्वाह) के पूरे समय पढ़ातीं थीं| उस समय के अखबार बताते हैं कि “कई बार तो इस दम्पति के पास खाना खाने को भी समय नहीं होता था|” यह बिडम्बना ही कही जायेगी कि इतिहास महात्मा फुले के इस आन्दोलन में उनके ब्राहमण सहकर्मियों के योगदान के बारे में तो बताता है किन्तु उनके दलित सहयोगियों के बारे में इतिहास प्रायः खामोश रहता है|  वास्तव में तो,  इस आन्दोलन में तथाकथित अछूतों के योगदान को क्रांतिकारी माना जाना चाहिए जिन्हें हजारो सालों से पढने लिखें का अधिकार नही था|

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई पुणे की दलित-मजदूरों की बस्ती में रहते थे| उनके सामाजीकरण  में उनके आस-पास के सांस्कृतिक वातावरण ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| बचपन में एक रुढ़िवादी ब्राह्मण के कहने पर ज्योतिबा फुले के पिता ने उनकी पढाई-लिखाई बंद करवा दी थी| उस समय मुंशी गफ्फार बेग और Sir  Lijit ने बालक ज्योतिबा की प्रतिभा को पहचान कर उनके पिता से कहकर उनकी पढ़ाई फिर से शुरू करवा दी|  इस बात को ज्योतिराव कभी नहीं भूले और सबसे पहले उन्होंने  1848 में दलित-मुस्लिम महिलाओं के लिए स्कूल की शुरुआत की|

महात्मा फुले शिक्षा के क्षेत्र में अपने इस आन्दोलन की वजह बताते हुए कहते हैं, “अज्ञानता, जातिगत और भाषाई भेदभाव इस देश में अभिशाप की तरह हैं| सवाल उठता है कि जब सब कोई दुखी है तो किसकी मदद की जाए| लेकिन इस सवाल से परेशान होकर हाथ पर हाथ रखकर बैठने की बजाय उनकी मदद की जाए जो सबसे ज्यादा पीड़ित हैं|  महार और मंग  जातियों को जातिगत भेदभाव की वजह से यहाँ सर्वाधिक कष्ट झेलने पड़ते हैं| और उन्हें इस कष्ट से छुटकारा सिर्फ ज्ञान(शिक्षा) प्राप्ति से ही मिल सकता है| इसलिए सबसे पहले मैंने उन्ही के लिए कार्य शुरू किया|”  ज्योतिबा फुले को इस बात पर पूरा विश्वास था कि महारों और मंगों  को शिक्षित करने से बड़ा और कोई कार्य इस देश के हित में नही किया जा सकता है,  और इसलिए वे अपने कार्य में लग गए|

इस महान कार्य को अकेले करने के बजाय उन्होंने एक मंडली (संस्थान) स्थापित किया ताकि उनके समान विचार रखने वाले लोग एक मंच पर आकर साथ-साथ कार्य कर सकें| पिछली सदी से शुरू हुए संस्थागत नेटवर्क कि वजह से देश में बहुत सारे काम संभव हो सके| संस्थानीकरण आधुनिक भारत की नींव साबित हुई | ज्योतिराव और सावित्रीबाई ने दो संस्थाओं की शुरुआत की — देशज बालिका विद्यालय,  पुणे और दूसरी— महारों और मंगों के शैक्षिक उत्थान के लिए सोसाइटी| इन संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने पुणे क्षेत्र में विद्यालयों का एक नेटवर्क तैयार कर दिया|

कुछ शोधार्थी यह मानते हैं कि ज्योतिराव और सावित्रीबाई ने अपना शैक्षणिक कार्य 1851 में शुरू कर दिया था लेकिन यह सही प्रतीत नहीं होता | उन्होंने 1848 में इस कार्य को प्रारंभ किया इसका साक्ष्य हमें दोनों ही समाचार पत्रों ‘बॉम्बे गार्डियन’ और दन्यानोदय में छपी एक रिपोर्ट से मिलता है| ज्योतिराव की मृत्यु के पश्चात् दन्यानोदय ने 18 दिसंबर 1890 को उनकी मृत्यु पर अपना सम्पादकीय लेख लिखा, जिसमें उसने साफ़ साफ़ लिखा कि उन्होंने 1848 में अपने काम कि शुरुआत की| बाम्बे गार्डियन ने भी 22 नवम्बर 1851 को इसी बात को लेकर एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया इस रिपोर्ट के अनुसार, “जब सदाशिव गोवंदे ने अहमदनगर के जज कार्यालय में 1848 में कार्य शुरू किया तो वो वहां अपने मित्र ज्योतिबा फुले को ले गए| एक दिन दोनों मित्र Miss Farar के गर्ल्स स्कूल में गए| वहां की व्यवस्था देखकर उन्होंने इस बात पर अफ़सोस व्यक्त किया कि लड़कियों को अपने ही देश में शिक्षा नही दी जा रही थी| फुले पुणे लौटे और उन्होंने इस कार्य को हाथ में लेने की योजना अपने दोस्तों को बतायी| अपनी पत्नी को ट्रेनिंग देने के बाद उन्होंने स्कूल खोला|  फिर उन्होंने, महारों और मंगों के लिए स्कूल खोला|  लेकिन छः महीनों के भीतर ही उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा जब उनके पिता ने लोगों के बहकावे में आकर उन्हें घर से निकाल दिया| और इस तरह विद्यालय का कार्य ठप्प हो गया| सदाशिव गोवंदे पुणे आये और सावित्रीबाई को अपने साथ नागर ले गए| वहां से वह बरसात की शुरुआत के समय लौट आयीं| तब केशवशिवराम भवालकर ने सावित्रीबाई को शिक्षित करने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली| युवा महिलाओं के लिए प्रशिक्षण कक्षाएं प्रारंभ करने का फैसला भी किया गया ताकि ऐसी महिलायें बाद में विद्यालयों में अध्यापन कार्य कर सकें| भावालकर ने ऐसी महिलाओं को खोजकर उन्हें प्रशिक्षित करने का कार्य किया|”

इस प्रकार, जो कार्य 1848 के अगस्त में प्रारंभ हुआ था, और जो कुछ समय तक बाधित रहा, 1851 में पुनः प्रारंभ हो गया|

मुंबई अभिलेखागार में संरक्षित दस्तावेजों में 5 फरवरी 1852 का एक आवेदन पत्र जो ज्योतिराव द्वारा उनकी शैक्षिक संस्था को सरकार द्वारा आर्थिक सहयोग प्रदान करने हेतु लिखा गया है| पत्र के साथ दूसरी प्रति पूना कालेज के प्रिंसिपल मेजर कैंडी का सिफारिश पत्र है| इसके अनुसार, लड़कियों के लिए पहले तीन स्कूल 3 जुलाई 1851, 17 नवम्बर 1851 और 15 मार्च 1852 चिपलूनकर वादा, रास्ता पेठ और वेटल पेठ क्रमशः शुरू किये गए| यहाँ यह उल्लेखनीय है कि वहां क्रमशः चार, तीन और एक शिक्षक तथा अड़तालीस , इक्यावन और तैंतीस लड़कियां इन स्कूलों में थीं| सावित्रीबाई फुले इनमे से सबसे पहले स्थापित स्कूल की प्रधानाध्यापिका थीं और  इनके सह-अध्यापक विष्णुपंत मोरेश्वर और विट्ठल भास्कर थे|  विद्यालय की शुरुआत के प्रथम दिन विद्यालय में आठ लड़कियां थीं, किन्तु जल्द ही उनकी संख्या अड़तालीस  तक पहुँच गयी|

विद्यालय निरीक्षक दादोवा पांडुरंग ने 16 अक्टूबर, 1851 को विद्यालय का निरीक्षण किया और लड़कियों की प्रगति की जांच की| हालांकि अभी ज्यादा समय नही बीता था तो भी लड़कियों की प्रगति उल्लेखनीय थी| विद्यालय की प्रथम वार्षिक परीक्षा 17 फरवरी, 1852 को आयोजित की गयी जबकि दूसरी वार्षिक परीक्षा पूना कॉलेज में 12 फरवरी, 1853 को आयोजित की गई| ये रिपोर्टें बताती हैं कि पुणे में आयोजित परीक्षा को देखने लिए अप्रत्याशित भीड़ इकट्ठी हुई| लगभग तीन हजार लोग कॉलेज के परिसर में जमा थे और इससे भी ज्यादा लोग बाहर इंतजार कर रहे थे| दो सौ सैंतीस लड़कियां परीक्षा में सम्मिलित हुईं| कॉलेज के खातों का वार्षिक परीक्षण हुआ|  1947 रुपये और पचास पैसे का दान संग्रह और हिस्सेदारी से हुआ| सरकार ने भी 900 रुपये की वित्तीय सहायता ‘दक्षिणा प्राइज फण्ड’ से प्रदान की| ज्योतिराव और सावित्रीबाई सार्वजनिक रूप से जनता के पैसों का सही और समय पर हिसाब रखने में विश्वास रखते थे |

2 फरवरी 1858 में बाबाजी मनाजी के कोच फैक्ट्री में आयोजित ‘अछूतों” के लिए खोले गए विद्यालयों की परीक्षा की विस्तृत रिपोर्ट अभिलेखागार में मौजूद है| 29 अगस्त 1856 को पूर्व परीक्षा आयोजित की गई थी| इस संस्था के तीन स्कूल पहले से ही थे और इसके विस्तार की योजना भी थी| किन्तु 1857 के विद्रोह के बाद सरकार ने वित्तीय सहायता में कमी कर दी जिससे कि यह संस्था 300 रुपये के गंभीर वित्तीय संकट में पड़ गई जिसे हर साल दक्षिणा प्राइज़ कमेटी द्वारा दिया जाना था इसके अलावा सरकार ने स्कूल कि बिल्डिंग के लिए 5000 का फंड भी देना स्वीकार किया था| रिपोर्ट में इस तथ्य पर अफ़सोस प्रकट किया गया है कि बिलकुल तब जबकि अछूतों में शिक्षा के प्रति ललक पैदा होने लगी थी उसी समय स्कूल बंद होने के कगार पर पहुँच गया| इन तीन विद्यालयों में कुल मिलाकर दो सौ अट्ठावन विद्यार्थी अध्ययनरत थे|  ज्योतिबा जी के सहकर्मी गनु शिवाजी मंग और धूराजी अप्पाजी चम्भर भी इन विद्यालयों में अध्यापक के रूप में कार्य कर रहे थे| सरकार को भेजे एक पत्र में संस्था के एक कर्मचारी ने लिखा है,  “अध्यापकों को अच्छा वेतन नहीं दिया जा सकता क्यूंकि संस्था की आर्थिक स्थिति ठीक नही है| इसलिए अध्यापक उन विद्यालयों में जाना पसंद करते हैं जो अधिक वेतन देते हैं| अध्यापकों का इस तरह विद्यालय छोड़ना विद्यालय के लिए बड़ी क्षति है| विद्यालय की प्रधानाध्यापिका, सावित्रीबाई ने उदारभाव से अपने जीवन को महिलाशिक्षा के सुधार के प्रति समर्पित कर दिया है और यह महान कार्य वे बिना किसी पारिश्रमिक के कर रही हैं| हमें आशा है कि सूचना और ज्ञान के प्रसार के साथ ही लोग महिला शिक्षा के लाभों को समझने लगेंगे|”

एजुकेशन बोर्ड के चेयरपर्सन,  माननीय जॉन वार्डन ने एक सार्वजनिक समारोह में स्कूल के बारे में इस तरह वर्णन किया—–“1851 में कमिश्नर के रूप में मैं जब पहली बार पुणे आया,  तो मैंने वहां के गर्ल्स स्कूल का भ्रमण किया| वहां जाने पर मुझे याद आया कि किस तरह यहूदियों के डर से क्रिस्चियन(ईसाई लोग) शुरुआत में अपने स्कूलों को दूसरी मंजिल पर दरवाजे बंद करके चलाते थे| उस विद्यालय की अध्यापिका एक माली की पत्नी थी| इस आदमी ने अपनी पत्नी को पढ़ाया-लिखाया था ताकि वह अपने देशवासियों के उत्थान में योगदान कर सके और उन्हें अज्ञानता से मुक्ति दिलाने में मदद कर सके | मैंने उस महिला से अपनी उपस्थिति में लड़कियों से कुछ सवाल करने को कहा| कुछ विवाहित युवतियों के लिए वहां प्रशिक्षण कक्षाएं भी चलायी जा रही थीं|”

सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले के प्रयासों की प्रगति उल्लेखनीय थी|  इस बात का पता कुछ यूँ चलता है कि उच्च जाति के लड़कों के लिए सरकारी विद्यालय थे| इनमे से एक विद्यालय ने 29 मई, 1852 के ‘पूना आब्जर्वर’ में महिलाओं की शिक्षा से पुरुष वर्चस्व टूटने की अपनी आशंकाओं को जाहिर करते हुए लिखा,—-“ज्योतिराव के स्कूल में पढने वाली लड़कियों की संख्या सरकारी विद्यालयों में पढने वाले लड़कों की संख्या से दस गुनी ज्यादा है| और ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकारी विद्यालयों में प्रचलित व्यवस्था की तुलना में लड़कियों के विद्यालयों में पढाई-लिखाई की व्यवस्था बहुत ज्यादा अच्छी है| यदि यह स्थिति यूँ ही बनी रहती है तो ज्योतिराव के स्कूल की लड़कियां सरकारी स्कूलों के लड़कों से ज्यादा श्रेष्ठ साबित हो जायेंगी| और यदि गवर्नमेंट एजुकेशन बोर्ड जल्द ही इस सम्बन्ध में कोई कदम नहीं उठाता है तो इन महिलाओं को पुरुषों से आगे निकलते देखकर हमारे सिर शर्म से झुक जायेंगे|”
ज्योतिबा फुले के कार्य के महत्व को समझते हुए,  ब्रिटिश सरकार ने 16 नवम्बर 1852 में विश्रामबुग वाडा में एक विशाल सार्वजनिक समारोह में उन्हें सम्मानित किया|  हालांकि कट्टरपंथियों को यह बात बिलकुल नही सुहायी कि ज्योतिबा फुले जैसे शुद्र को शॉल (महावस्त्र) भेंट कर सम्मानित किया जाय|

फुले दम्पति ने लड़कों और लड़कियों की शिक्षा को व्यवसायपरक बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें और स्वतंत्र होकर सोच सकें और उन्होंने ऐसी व्यवस्था का निर्माण भी किया| 1852 कि रिपोर्ट में उन्होंने इस पर अपनी राय कुछ इस तरह व्यक्त की, “स्कूलों में औद्योगिक विभाग भी होने चाहियें जहाँ बच्चे उपयोगी व्यापार और शिल्पों को सीख सकें जिससे कि स्कूल छोड़ने के उपरान्त वे अपने जीवन को आराम से और स्वतंत्र रूप से चला सकें|” उन्होंने इसी प्रकार की व्यवस्था बनाई |

विद्यार्थियों द्वारा विद्यालय छोड़ने (ड्राप-आउट) की समस्या उन दिनों और भी ज्यादा गंभीर थी| फुले और उनके सहयोगियों ने इसके लिए व्यावहारिक समाधानों की खोज की| उन्होंने पाया कि ड्राप-आउट की सबसे बड़ी वजहें थीं— गरीबी और शिक्षा के प्रति रूचि का अभाव|  उन्होंने विद्यार्थियों को ‘सैलरी’ देने की व्यवस्था की और पाठ्यक्रम का निर्माण इस तरह से किया ताकि यह गरीब तबकों के विद्यार्थियों की जरूरतों पर खरा उतर सके| उन्होंने एक जागरूकता अभियान भी चलाया जिसके माध्यम से दलित-बहुजनों को शिक्षा से होने वाले लाभों से परिचित कराया गया| ये प्रयास यहीं तक सीमित नही थे| उन्होंने माता-पिताओं के लिए भी एक साक्षरता अभियान चलाया और इस तरह उन्होंने एक ‘समग्र शैक्षणिक परियोजना’ का निर्माण किया| ड्राप-आउट के जो कारण थे, जैसे- जात्राखेत्र (मेले और तीर्थभ्रमण),  जाति-पंचायतें, अन्धविश्वास और गरीबी और इन कारणों का जिस तरह ज्योतिबा फुले ने समाधान तलाशा, वे तरीके आज भी प्रासंगिक हैं| महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में आदिवासी लड़कों और लड़कियों के ड्राप-आउट को रोकने के लिए ‘उपस्थिति भत्ता’  Attendence Allowance  नामक योजना शुरू की है|

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने हमेशा ही इस बात पर जोर दिया कि “शिक्षा द्वारा व्यक्ति में यह योग्यता विकसित की जानी चाहिए जिसके द्वारा वह जीवन में सही-गलत और सत्य-असत्य का भेद करके उनके बीच चुनाव कर सके| “ विद्यार्थियों में सृजनात्मकता के विकास के लिए भी विशेष प्रयास कर रहे थे| वे इस दिशा में कहाँ तक सफल हुए, इस बात का पता इस घटना से चलता है जब विद्यालय के एक समारोह में एक छोटी लड़की पुरस्कार ग्रहण करने मंच पर गई, तो मुख्य अतिथि को संबोधित करते हुए उसके मुंह से ये शब्द निकल पड़े——“सर, पुरस्कार के रूप में हमें खिलौने नहीं चाहिए,  हम अपने स्कूल के लिए एक पुस्तकालय चाहते हैं|”  उस लड़की के माता-पिता को शिकायत थी कि यह लड़की आधी रात तक पढने-लिखने में लगी रहती है|  सरकारी निरीक्षकों ने स्कूल के स्वस्थ वातावरण, रुचियों के परिष्कार, सृजनात्मकता और चरित्र निर्माण पर दिए जा रहे ध्यान इत्यादि की प्रशंसा की|
सावित्रीबाई की एक मतंग (अछूत) छात्रा मुक्ता ने 1855 में एक आत्मकथात्मक निबंध लिखा जब वह मात्र 14 वर्ष की थी| यह निबंध इतना महत्वपूर्ण है कि इसे मराठी साहित्य में एक बड़ा मील का पत्थर माना जासकता है| इस निबंध से आधुनिक दलित साहित्य की शुरुआत भी मानी जा सकती है. वह लिखती है—–“ये लड्डूखाऊ (लड्डू खाने वाले) ब्राह्मण कहते हैं कि वेदों पर सिर्फ उनका एकाधिकार है| गैर-ब्राह्मणों को वेदों को पढने का अधिकार नही है| क्या इससे यह साबित नही होता कि हमारा कोई धर्म नहीं है क्योंकि हमें धर्म ग्रंथों में झांकने तक का अधिकार नहीं है?  हे भगवान्,  कृपा करके हमें बताओ हम किस धर्म का पालन करें|”  ‘दन्यानोदय’ के सम्पादक ने जब इस लड़की के निबंध के बारे में सुना तो अत्यंत चकित हुआ और उसके क्रांतिकारी विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ| उसने अपने समाचारपत्र में इसे दो भागों में 15 फरवरी और 1 मार्च, 1855 को प्रकाशित किया|  यह निबंध उस साल की बॉम्बे प्रेसीडेंसी एजुकेशन रिपोर्ट में भी प्रकाशित हुआ था और यह एन.वी. जोशी की किताब ‘पुणे शहराचे वर्णना’ (The Description of Pune City) में भी 1868 में प्रकाशित हुआ था |
सावित्रीबाई फुले को समाज का कटु विरोध झेलना पड़ा,  उन्हें लोगों की गालियाँ भी सहनी पड़ीं, किन्तु उन्होंने अपना काम शांतिपूर्वक जारी रखा| पुरुष जानबूझकर उनका सड़कों पर इंतज़ार करते और जैसे ही वे स्कूल के लिए निकलती उन पर अश्लील टिप्पणियां करते और कभी-कभार तो वे उन पर पत्थर,  कीचड और गोबर भी मारते थे| ये महान महिला सावित्रीबाई स्कूल जाते वक्त दो साड़ियाँ ले जाती थीं और कीचड से सनी हुई साड़ी को स्कूल में जाकर बदलती थीं किन्तु लौटते वक्त नयी साड़ी भी गन्दी हो जाती थी| इसके बावजूद उन्होंने अपना कार्य दृढ़तापूर्वक और बिना रुके जारी रखा| यह दुर्व्यवहार इस हद तक बढ़ गया था कि संस्था को उनके और लड़कियों के लिए एक गार्ड रखना पड़ा| सावित्रीबाई खुद को परेशान करने वाले लोगों को जो जबाब, जो प्रतिक्रिया देतीं थीं,  उस जबाब,  उस प्रतिक्रिया का जिक्र बलवंत सखाराम कोल्हे ने अपने एक संस्मरण में किया है—“चूँकि मै अपनी बहनों को शिक्षा देने का पवित्र कार्य कर रही हूँ इसलिए तुम लोग ये जो पत्थर और गोबर मुझ पर फेंकते हो,  वो मुझे फूलों जैसे लगते हैं| भगवान् तुम्हे आशीष दे!”  सखाराम कोल्हे की ये स्मृतियाँ सावित्रीबाई के दृढ चरित्र और साहस पर प्रकाश डालती हैं|

सावित्रीबाई और ज्योतिबाफुले द्वारा 1863 में शुरू किये गए “शिशुहत्या के विरुद्ध संरक्षण गृह” के बारे में सही जानकारी अभी हाल में ही उपलब्ध हो पायी है| इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ‘घर’  केवल ‘ब्राह्मण विधवाओं’  के लिए ही खोला गया था और सावित्रीबाई ने ही इसकी पहल की थी| इस सम्बन्ध में समस्त जानकारी ज्योतिबा फुले द्वारा 4 दिसम्बर, 1884 को बम्बई सरकार के अवर सचिव को लिखे गए पत्र में दर्ज की गयी है|

यहाँ पर एक घटना का उल्लेख करना पाठकों के लिए लाभप्रद रहेगा| ज्योतिबाफुले के मित्र गोवंदे के यहाँ एक युवा ब्राह्मण विधवा काशीबाई रसोइयें के रूप में कार्य करती थी| काशीबाई एक गरीब किन्तु एक सुन्दर महिला थी और एक सम्मानित ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती थी| पड़ोस में रहने वाले एक कुटिल शास्त्री ने इस अनपढ़ महिला का फायदा उठाया जिसके फलस्वरूप वह गर्भवती हो गई| जब गर्भपात का कोई उपाय सफल नही हुआ तो उसने एक सुन्दर शिशु को जन्म दिया| चूँकि उस शास्त्री ने इस शिशु को अपनाने से इनकार कर दिया तो काशीबाई बुरी तरह से फंस गयी| अब उसे समाज का भय था कि समाज उसे जीने नहीं देगा इसलिए उसने मासूम शिशु की गला रेत कर हत्या कर दी|  गोवंदे के आँगन में स्थित कुएं में उसने शव को फेंक दिया|  बाद में पता चलने पर उस पर मुकद्दमा हुआ और उसे अंडमान में ‘काले पानी’ की सजा हुई. यह घटना 1863 में घटित हुई| पहली बार किसी महिला को इतनी कठोर सजा मिली थी|

इस घटना से सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले बहुत परेशान और दुखी हुए| उस समय उनकी आय बहुत सीमित थी| हालांकि उन्हें रोजी-रोटी के भी लाले पड़ रहे थे फिर भी उनका ह्रदय करुणा और उदारता का सागर था|  उन्होंने बिना देर किये 395, गंजपेठ,  पुणे स्थित अपने मकान में ऐसी ब्राह्मण विधवाओं के लिए एक आश्रयगृह (शेल्टर होम) की शुरुआत कर दी| पूरा देश जबकि इस घटना की चर्चा में मशगूल था,  फुले दम्पति ने इन शोषित महिलाओं के लिए वास्तविक कार्य किया|  उन्होंने पूरे शहर और तीर्थस्थलों पर “काले पानी से बचने का उपाय” की घोषणा करते हुए विज्ञापन (पोस्टर) लगा दिए और इस प्रकार शेल्टर होम के बारे में जानकारी फैलती गई|  1884 में विभिन्न स्थानों से 35 ब्राह्मण विधवाएं शेल्टर होम में रह रहीं थीं| सावित्रीबाई उन महिलाओं के प्रसव में स्वयं ही मदद करती थीं,  और उनकी देख-भाल भी करती थीं|

1874 में एक और शोषित ‘काशीबाई’ उनके पास आई और उन्होंने उसके पुत्र को गोद ले लिया| उन्होंने इस बच्चे का पालन-पोषण किया और उसे शिक्षित करके डॉक्टर बनाया|  बाद में उसने फुले दम्पति द्वारा प्रारंभ किये गए कार्य को आगे बढाया| 10 जुलाई, 1887 को ज्योतिबा फुले ने अपनी वसीयत लिखी और इसे उपनिबंधक कार्यालय में पंजीकृत कराया| इस बसीयत में महात्मा फुले बड़े गर्व के साथ लिखते हैं कि सावित्रीबाई इन सभी महिलाओं की देख-भाल अपनी पुत्री मानकर करेगी|

ब्राह्मण विधवाओं के लिए एक और आन्दोलन की शुरुआत ‘दीनबंधु’ के संपादक और श्रमिक वर्ग के नेता नारायण मेघाजी लोखंडे ने शुरू की थी जिसकी प्रेरणा सावित्रीबाई फुले ही थीं. इस आन्दोलन का उद्देश्य ब्राह्मण विधवाओं के सर मुंड़ाने की प्रथा को ख़त्म करना था|  इसके लिए लोखंडे ने नाइयों को संगठित करके उनकी हड़ताल आयोजित की थी| इस ऐतिहासिक हड़ताल की खबर 9 अप्रैल, 1890 के ‘The Times’ में छपी थी| इंग्लैंड की महिलाओं ने भी इसके लिए उन्हें पत्र लिखकर बधाईयाँ प्रेषित की थीं|….शेष अगले  भाग में जारी

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