मैं पत्रकारिता की छात्रा रही हूँ| कायदे से कहूँ तो डिग्रीधारी पत्रकार हूँ , जिसने कई पत्रकारिता संस्थानों में अपने डिग्री और लेखन के बल पर कार्य भी किया है | लेकिन हर जगह नौकरी छोड़नी पड़ी । कहीं पर जातिगत मान्यताओं के चलते तो कहीं अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करने के चलते, इनमें से कई जगहें ऐसी भी मिली जहाँ मुझे काम का माहौल भी मिला और अच्छे पैसे भी मिल रहे थे लेकिन वहां के पुरुष सहयोगियों और बॉस के लिए मैं एक देह थी जिसे पाना उनकी सबसे बड़ी इच्छा …..

आप मानिए या ना मानिए लेकिन पुरुषों के लिए आज भी यह मानना बहुत मुश्किल है की स्त्री की देह से परे भी एक भूगोल है, जहाँ वह ना सिर्फ एक सफल बल्कि टक्कर की सहकर्मी भी साबित हो सकती है| मुझे याद है, एक संस्थान में काम करते हुए मैं इसी तरह के अनुभव से गुजर रही थी और मानसिक रूप से बहुत ही ज्यादा अस्थिर हो गई थी| मेरी हालत देखते हुए मेरे साथ काम करने वाली एक महिला सहयोगी ने मुझे समझाते हुए कहा था.. ‘समझौता कर लो कोई भी चीज इतनी आसानी से नहीं मिलती, कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है दिल्ली में रहना है और इस भीड़ में अपनी पहचान बनानी है, तो समझौते तो करने पड़ेंगे, मेरा जवाब था कुछ खोने का मतलब अपनी अस्मिता अपने ज़मीर को खोना नहीं होता और रही बात पहचान की तो, ज्यादा से ज्यादा क्या होगा इस भीड़ में मैं कहीं गुम हो जाउंगी यही ना ..मंज़ूर है मुझे! लेकिन इस तरह का कोई समझौता मुझे कभी मंज़ूर नहीं होगा जहाँ मेरा अस्तित्व ही बिखर जाए|’

 

और यह सब ऐसी जगह घटा जहाँ का माहौल हाइली फेम्निस्ट माना जाता है| यहाँ एक बात का जिक्र करना जरूरी है की पूरे संस्थान में मैं अकेली महिला थी जो दलित-बहुजन समुदाय से आती थी| आप में से बहुतों को मेरी बात से ऐतराज हो सकता है और बहुतों को नाराजगी भी| बहुत से लोग यह भी कह सकते हैं ये सब गुजरे जमाने की बातें हैं अब कहाँ होता है ऐसा? आप मेरी दोनों ही बातों से असहमत हो सकते हैं, जातिगत भेदभाव और जेंडर डिस्क्रिमिनेशन दोनों से आप इनकार कर सकते हैं | करिए! लेकिन आपका इनकार मेरी नज़र में यथार्थ से भागना होगा और कुछ नहीं |

अपने व्यक्तिगत अनुभव को सार्वजनिक पटल पर बांटने का सबसे बड़ा खतरा यह रहता है की आप कड़ी आलोचना के शिकार हो सकते हैं और आपके चरित्र पर भी सवाल उठाये जाने का खतरा बराबर बना रहता है| इतना ही नहीं लोग आपको हज़ार तरीके बताएँगे कि अगर उसने ऐसा किया तो आपने जवाब में यह क्यों नहीं किया, पुलिस कम्प्लेंट क्यों नहीं की, उसे मारना चाहिए था | अगर तब विरोध नहीं किया तो अब लिखने से क्या फायदा वगैरह -वगैरह  | तब क्या किया ?,  क्या नहीं यह गिनना या गिनाना मेरा उद्देश्य नहीं ,  आज लिखा इसलिए, क्योंकि मन में डर ख़त्म हो गया है | इसलिए सोचा की अपनी  जातिगत पहचान और स्त्री होने की  पहचान के अंतर्गत , मैं जिस अपमान और तिरस्कार से गुज़री हूँ उन्हें आप सब से साँझा करूँ | क्योंकि कई बार ऐसा होता है की आपकी गलती ना भी , हो तब भी आप अपने को उम्र भर दोषी मानते हैं और उस गलती की सज़ा खुद को देते हैं जो दरअसल आपकी थी ही नहीं|

अगर मैं कहूँ की अपने वर्कप्लेस के जिस अनुभव को मैं आप सबके साथ बाँट रही हूँ उसमें मेरा सिर्फ यह दोष है की मैं एक लड़की थी , और एक ऐसी जगह और समुदाय से थी जिसका कोई गाडफादर नहीं था, इसलिए मेरे साथ यह घटा तो क्या आप आसानी से मानेंगे? शायद नहीं |

कन्धों पर जब दायित्व का बोझ हो तो प्रतिकार के स्वर उस दायित्व के बोझ से दबने लगते हैं, और वह कब चाहे अनचाहे समझौते के रूप में बदलने लगते हैं खुद को भी पता नहीं चलता | अपने समुदाय से, अपने घर-परिवार यहाँ तक की अपने पैतृक निवास स्थान से मैं पहली लड़की हूँ जिसने न सिर्फ यहाँ तक पहुँचने की हिम्मत दिखाई बल्कि अपने खुद के भरोसे अपने पैरों के नीचे जमीन और सर पर छत की तलाश की | सब सुन कर यह कहना बहुत आसान हो सकता है की तुरंत नौकरी छोड़ देनी चाहिए थी| लेकिन यह करना उसके लिए उतना ही मुश्किल है जिसका आर्थिक बल वह नौकरी ही हो, जो घर से यह कह कर निकली हो , कि  अपने हिस्से की  जमीन तलाशने जा रही हूँ , और ये मेरा हक़ है और अपना हक़ मुझे हर हाल में चाहिए |

आज पत्रकारिता के कुछ ख़ास पहलुओं पर और सवर्ण नारीवाद पर लिखने का मन किया तो सोचा शुरुआत अपने व्यक्तिगत अनुभव से करती हूँ, बात को आगे बढ़ाना थोड़ा आसान हो जाएगा | अपने व्यक्तिगत अनुभव से बात शुरू करने की वजह है ..सोचिये आज के तथा-कथित  प्रगतिशील समाज में जब काम करना और खुद के अस्तित्व को बचाए रखना इतना मुश्किल है , तो फिर बाबा साहब अम्बेडकर, माँ सावित्रीबाई, ज्ञानज्योति फुले तो उस दौर में काम कर रहे थे जब जातिगत असमानता कि खाई अपने चरम पर थी, जब स्त्री सिर्फ भोग्या समझी जाती थी उससे ज्यादा उसके लिए समाज में कोई स्थान न था | कैसे सामना किया होगा माँ सावित्री ने उन तानों का कैसे? कैसे झेले होंगे उन्होंने उनके साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार को ?, अपमान को ?, जो उनके साथ लड़कियों के लिए स्कूल खोलने पर सवर्णों तथा उनके भड़काए जाने पर उनके अपने भाई बांधवों ने भी उनके साथ किया?

 कभी कभी सोचती हूँ फिल्म ‘जब वी मेट’ का -राइटर जब लिखता है कि ‘अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है’ तो उस वक्त उसके दिमाग में एक अकेली लड़की को लेकर क्या धारणा आई होगी? कैसे देखा होगा उसने एक स्त्री को? शायद सिर्फ एक मांसल देह की तरह क्योंकि किसी और नजरिये से अगर उसने अकेली स्त्री की कल्पना की होती तो बहुत ही मुश्किल था इस तरह का संवाद लिखना फिर वह कुछ और लिखता ..कुछ भी लिखता, लेकिन ये शब्द वो स्टेशन मास्टर के मुहं से कत्तई ना बुलवाता | ठीक से देखा जाए तो दोष उसका नहीं है दोष इस पितृसत्तात्मक समाज का है जहाँ लोग स्त्रियों की कल्पना ही उसकी देह से शुरू करते हैं| उसके शरीर के उतार चढ़ाव से करते हैं कि, कितने इंच की छाती होगी, तो कितने की कमर |
 मंडल कमीशन जब आया था तो इसके विरोध में नारे लगे थे जिसमें एक नारा यह भी था – “आरक्षण कहाँ से आई कर्पूरी के माई बियाई”, इसी तरह भोजपुरी में एक और कहावत बहुत प्रचलित है- “कमजोरे क लुगाई गाँव भर क भौजाई”| कहाँ से आते हैं ऐसे वाक्य लोगों के दिमाग में  ? कैसे स्त्री ही इन सबके केंद्र बिंदु में होती है?  इन सब को समझने के लिए इस देश कि पितृसत्तात्मक और जातिगत व्यवस्था को समझना बहुत जरूरी है | राज बब्बर जब मायावती को चुनाव के समय एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए खुले चुनावी मंच से यह कहता है कि “हाथी नहीं वो हथिनी है, राजनाथ की पत्नी है”, (आजमगढ़ में काफी पहले चुनाव के समय सपा की तरफ से मंच पर बोलते हुए राज बब्बर)| तो मायावती के चरित्र को लेकर उसके दिमाग में कैसी छवि रही होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है |

यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा की ज्यादातर सवर्ण पितृसत्ता की  मानसिकता से ग्रसित पुरुष यह कहते हुए आपको मिल जायेंगे कि, अकेली स्त्री वो भी दलित, अगर उत्तर प्रदेश जैसे सत्ता के केंद्र बिंदु माने जाने वाले प्रदेश की  मुख्यमंत्री बनी तो, ऐसे तो नहीं ही बन गई होगी | कुछ समझौते तो जरूर किये होंगे | अगर ऐसी सोच लोगों की नहीं होती तो यकीन मानिये राज बब्बर एक खुले मंच से इतनी बड़ी बात कहने की हिम्मत कभी नहीं करता|

जब मैं नारीवादी आन्दोलनों के पुरोधाओं को, नारीवादियों को बड़ी बड़ी सभाओं, सेमिनारों में यह कहते हुए सुनती हूँ कि  सभी स्त्रियाँ एक समान हैं और सभी की तकलीफें भी एक जैसी ही हैं,  तो मन करता है उनसे जा कर पूछूं की किस आधार पर यह विश्लेषण किया है आपने ? क्या आप मुझे समझा सकेंगें/सकेंगी ,कि  एक सवर्ण और एक दलित –बहुजन स्त्री की समस्याएं एक जैसी कैसें हैं? क्या असमानताओं से भरे इस देश में यह संभव है की सभी समुदाय के स्त्रियों की समस्याएं एक जैसी हों? क्या आप मुझे एक भी आंकड़ा ऐसा उपलब्ध करवा सकते हैं जो इस बात की तरफ संकेत करे कि  खेतों में मजदूरी करते वक्त सरेआम जो औरतें अपने सवर्ण मालिकों द्वारा उठा ली जाती हैं वो दलित- बहुजन नहीं बल्कि सवर्ण होती हैं | सवर्ण बस्तियों में ऐसी कोई एक बस्ती गिना दीजिये मुझे , जो मिर्चपुर जैसी हो, एक जीशा जैसा केस किसी सवर्ण लड़की के साथ घटित हुआ हो बताइये मुझे?

रहने दीजिये आप.., आपसे ना हो पायेगा | जानते हैं क्यों?.. क्योंकि आपको या मुझे किसी को ऐसे आंकड़े नहीं मिलेंगे क्योंकि यह घटनाएँ झेलने के लिए अभिशप्त सिर्फ दलित-बहुजन महिलाएं हैं सवर्ण महिलाएं नहीं | और यह तय करने वाला यह जातिगत समाज है | जो दलित-बहुजन महिलाओं को अपनी प्रोपर्टी मानता है | जब दामिनी केस होता है तो तथा-कथित  पूरा देश सड़कों पर विरोध करने उतर जाता है, लेकिन जब भगाणा में लड़कियों के साथ बलात्कार होता है , जब मिर्चपुर में ऐसा भयानक कृत्य होता है, जब जीशा बलात्कार करके मारी जाती है.. सनद रहे जीशा के साथ भी उतना ही भयानक अत्याचार हुआ जितना दामिनी के साथ, जब सोनी सूरी के गुप्तांगों में पत्थर भरे जातें है तब इस देश की जनता को क्या हो जाता है ? क्यों नहीं उतरती वह सड़कों पर ? तब क्यों इस देश के नारीवादियों की  अंतरात्मा नहीं जागती ? मैं इस देश के सवर्ण नारीवादियों से कहना चाहती हूँ कि स्त्री मुक्ति सिर्फ देह से मुक्ति से नहीं आयेगी|

स्त्रियों की  मुक्ति के लिए कुछ करना ही है, तो उनकी आर्थिक आजादी के लिए संघर्ष करिए| उनकी शिक्षा और रोजगार पर ध्यान दीजिये| जिसे ज्योतिबा फुले और माँ सावित्रीबाई फुले आज से सालों पहले ही समझ गए थे और शायद इसीलिए उनका पहला प्रयास था स्त्रियों कि शिक्षा | क्योंकि वो जानते थे बिना शिक्षा के स्त्री की मुक्ति असंभव है | स्त्री शिक्षा पर बात करते हुए ज्योतिबाफुले 15 सितम्बर, 1853 को ‘ज्ञानोदय’ को दिए गए एक इंटरव्यू में कहते हैं—– “मुझे ऐसा लगता है कि बच्चे में जो संस्कार माता की  वजह से आता है वह बहुत ही महत्वपूर्ण और अच्छा होता है| इसलिए जो लोग इस देश की सुख-समृद्धि के लिए चिंतित हैं,  उन्हें महिलाओं की दशा पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और यदि वे वास्तव में चाहते हैं कि देश प्रगति करे तो उन्हें महिलाओं को ज्ञान प्रदान करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए|’

इस लेख को लिखने का सबसे बड़ा कारण यही है की आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी देश जातिगत भेदभाव और लैंगिक भेदभाव से उबर नहीं पाया है | अपितु यह कहना ज्यादा सही रहेगा कि  समय के साथ साथ उत्पीड़कों ने उत्पीड़न के नए तथा और भी ज्यादा खतरनाक तरीके इजाद कर लिए हैं | इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे नायकों ने लम्बें आन्दोलनों के बाद अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन तो तैयार किया ही है | लेकिन जब अवसर और संभावनाएं बढ़ती हैं तो वो अपने साथ और भी गहरी चुनौतियाँ लेकर सामने आती हैं| ऐसे में यह सवाल उठाना लाज़मी हो जाता है कि हमें इन चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ नए तरीके इजाद करने की जरूरत है या फिर हमारे पास उपस्थित पुराने विचार और तरीके सक्षम हैं इन चुनौतियों से निपटने के लिए|

जातिगत असमानता, लैंगिक भेदभाव भारत की सामजिक व्यवस्था के बेहद अहम् और बुनियादी सवाल है| जिसे दरकिनार करके आगे बढ़ना असंभव है | बिना इस महत्वपूर्ण पहलू पर बात किये आगे बढ़ने का मतलब है या तो हम भारतीय सामजिक संरचना को समझ नहीं पाए हैं या फिर समझना नहीं चाहते | जो भी इस तरह के लैंगिक भेदभाव या जातिगत भेदभाव की पीड़ा से गुजरता है उसका इसे छोड़ कर आगे बढ़ना असंभव है | लेकिन जो इस तरह के किसी भी भेदभाव से गुजरा ही नहीं उसके लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं जिस पर बात किया जाए या ध्यान दिया जाए | उच्च वर्ग में पैदा हुए लोग बड़ी आसानी से यह कहते हुए मिल जायेंगे कि ‘जाति जैसा कुछ नही होता यह गुजरे हुए जमाने की बात है, ठीक उसी तरह जैसे की पितृसत्ता के मापदंडो से संचालित बहुत सारे पुरुष कहते हैं कि ‘आज की स्त्री कहाँ दबी कुचली है?’

 

लेखिका , श्वेता  यादव , राउंड टेबल इंडिया , हिंदी संस्करण की सहयोगी सम्पादिका हैं 

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