Author Bala J.दो ऐसे विद्वान हुए हैं जिनका देश-काल अलग रहा है मगर फिर भी उन्होंने जाति व्यवस्था से निपटने के लिए लगभग एक जैसा तरीका अपनाया. परंपरागत रूप से शिक्षित उन्नीसवीं सदी के तमिल विद्वान पंडित अयोति थास और बीसवीं सदी के पश्चिमी शिक्षाप्राप्त महाराष्ट्र के बुद्धिजीवी बाबासाहब अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को ग्रहण कर यह दर्शाया कि यह जाति व्यवस्था के उन्मूलन का एकमात्र तरीका है. दोनों ने यह पहचाना कि जाति व्यवस्था का उद्भव बौद्ध धर्म के पतन के साथ हुआ है; इसीलिए बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान संभवतः लोगों को जाति की भयानक व्यवस्था से मुक्त कर सकता है.

 

पंडित अयोति थास (1845-1914) का जन्म चेन्नई के रोयापेटा (Royapettah) में एक दलित परिवार में हुआ. वे सिद्ध पद्धति के चिकित्सक और सुशिक्षित तमिल विद्वान् थे. उन्हें ज्योतिष व ताड़-पत्र पाण्डुलिपि अध्ययन के परंपरागत ज्ञान में दक्षता प्राप्त थी. 1870 में, अयोति थास ने उडगमंडलम (Uthagamandalam),जहाँ उनकी परवरिश हुई थी, में अद्वैतानंदा सभा (Adhvaidhananda Sabha) (यह उनकी पहली संस्था-निर्माण गतिविधि मानी जाती है) की स्थापना की. 1891 में उन्होंने द्रविड़ महाजन सभा नामक संगठन की स्थापना की और 01 दिसम्बर 1891 को उन्होंने सभा का पहला सम्मलेन नीलगिरी जिला के उटी में आयोजित किया. उस सम्मलेन में दस संकल्प पारित हुए जिसमें अछूतों को परया (Pariahs) कहकर अपमानित करने वालों को दण्डित करने के लिए फौजदारी कानून के अधिनियम, अलग स्कूलों का निर्माण और अछूत विद्यार्थियों को मैट्रिक शिक्षा के लिए छात्रवृति की व्यवस्था; शिक्षित अछूतों के लिए रोजगार की व्यवस्था और अछूतों के लिए जिला व नगरपालिका बोर्डों में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था आदि सम्मिलित थे (तमिलन, 14 अक्टूबर 1908).

 

भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस और मोहम्मदन समिति को ये संकल्प 21 दिसम्बर 1891 को भेजे गए. 1896 में आदरणीय जॉन रत्नम और अयोति थास ने संयुक्त रूप से एक पत्रिका द्रविड़ पांडियन (Dravida Pandian) प्रारंभ की. एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी यह है कि 1882 में आदरणीय जॉन रत्नम और अयोति थास ने द्रविड़ कषगम (Dravida Kazhagam) नाम से एक आन्दोलन की शुरूआत की (जी. अलॉयसियस, नेशनलिज्म विदाउट ए नेशन इन इंडिया, आक्सफोर्ड, 2000). हालाँकि यह तथ्य छिपाया गया जिसके परिणामस्वरूप आज अयोति थास को द्रविड़ आन्दोलन या ब्राह्मण-विरोधी आन्दोलन के पथप्रदर्शक के रूप में याद नहीं किया जाता.

बौद्ध धर्म में वापसी

पंडित अयोति थास ने जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए दलितों को बौद्ध धर्म ग्रहण करने को प्रोत्साहित किया. इसके लिए उन्होंने तमिल साहित्य व तमिल की लोक परम्पराओं की सहायता से एक वैकल्पिक इतिहास का सृजन किया. उन्होंने साबित किया कि अछूत मूल रूप से बौद्ध थे और उनपर अस्पृश्यता थोपी गई क्योंकि उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित रुढ़िवादी परम्पराओं का विरोध किया. थास ने दावा किया कि बौद्ध धर्म भारतीय इतिहास का पहला ब्राह्मण-विरोधी आन्दोलन था. इसलिए उन्होंने दलितों से आवाह्न किया कि वे अपने मूल धर्म, बौद्ध धर्म की ओर वापस लौटें.

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1898 में, अयोति थास ने पंचमा स्कूल के प्रधानाध्यापक कृष्णस्वामी के साथ श्रीलंका की यात्रा की और वहाँ उन्होंने बौद्ध-धर्म अपनाया. दी थियोसोफिस्ट (थियोसोफिकल सोसाइटी की अदयार,चेन्नई से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका) के अनुसार:

पंडित सी. अयोति थास, उन दो सज्जनों में से एक थे जिन्हें मद्रास के पंचमा समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में 1898 में कर्नल अल्कॉट के साथ सीलोन ले जाया गया. दोनों को उच्च धर्माध्यक्ष सुमंगला द्वारा बौद्ध धर्म में शामिल किया गया. इस प्रकार दक्षिण भारत के अभागे पंचमा लोगों (दलितों) के इतिहास में
एक नए युग का आरम्भ हुआ.

बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद, जल्द ही 1898 में उन्होंने रोयापेटा, मद्रास में ‘शाक्य बौद्ध समाज’ की स्थापना की. उन्होंने इस संगठन के अंग के रूप में ओरु पैसा तमिलन (Oru Paisa Tamilan) नामक पत्रिका प्रारंभ की. 1907 से लेकर 5 मई 1914 को उनकी मृत्यु तक उनके समस्त सामाजिक व धार्मिक गतिविधियाँ इस पत्रिका में दर्ज हैं. अयोति थास का कर्नल हेनरी स्टील अल्कॉट (एक अमरीकी सैन्य अधिकारी जिसने थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना की) और अदयार में थियोसोफिकल मूवमेंट से निकट सम्बन्ध था. अल्कॉट लिखते हैं:

दक्षिण भारत के परया लोगों की उत्पत्ति व धार्मिक मूल का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण था कि मैंने इन समुदायों
को उच्च धर्माध्यक्ष सुमंगला के संपर्क में लाने के लिए दृढ निश्चय कर लिया था. अगर यह प्रमाणित होता है कि वे मूलतः बौद्ध धर्म के रहे हैं तो उनके समुदाय को सीलोन के बौद्धों के निकट संपर्क व निरीक्षण में लाया जा सके (थियोसोफिस्ट मैगजीन, अप्रैल-जून 1914, पेज.सं. 315).

शाक्य बौद्ध समाज की शाखाओं की स्थापना न केवल मद्रास प्रेसीडेंसी के तिरुपत्तूर और वेल्लोर में हुई बल्कि समुद्र पार दक्षिण अफ्रीका के नेटल(Natal), रंगून और श्रीलंका में भी हुई. गौरतलब है कि यहाँ मजदूरों के रूप में दलितों का पलायन हुआ था| इसी प्रकार शाक्य बौद्ध समाज की शाखाओं की स्थापना अन्य स्थानों पर भी हुई जैसे चैंपियन रीफ, मरिकुप्पम और बैंगलोर के निकट कोलार गोल्ड फ़ील्ड्स, जो तत्कालीन मैसूर के रजवाडे के हिस्से थे, जहां दलित खदान-मजदूरों के रूप में बसे थे. शोषित लोगों ने औपनिवेशिक शासन को जाति-शोषण से बाहर आने के एक अवसर के रूप में देखा. वे केवल सुधार नहीं चाहते थे बल्कि उन्होंने अपने मूल धर्म बौद्ध धर्म की ओर वापस लौटकर हिन्दू वर्चस्व को जड़ से उखाड़ते हुए जाति के उन्मूलन के लिए कार्य किया.

शाक्य बौद्ध समाज द्वारा बौद्ध धर्म पर नियमित व्याख्यान ‘बौद्ध धम्म पिरसंघम’ Buddha Dhamma Pirasangam (बौद्ध धर्म के सिद्धांतो का उपदेश) का आयोजन शुरू हुआ. ये व्याख्यान शाम को शुरू होकर देर रात तक चलते थे. समाज के प्रत्येक शाखा के कार्यालयी अधिकारियों के द्वारा अपने समाज की गतिविधियों से सम्बंधित रिपोर्ट नियमित रूप से तमिलन में प्रकाशित किए जाते थे. अयोति थास के नेतृत्व में अनेक बुद्धिजीवियों ने बौद्ध धर्म के सिद्धांतो के प्रचार में अपने को समर्पित कर दिया. बड़ी संख्या में लोगों ने बौद्ध रिवाजों,कार्यक्रमों व उत्सवों में भाग लिया. दलितों का सांस्कृतिक जीवन बौद्ध धर्मानुसार बन गया और जन्म, विवाह व मृत्यु के जीवन घटनाओं पर बौद्ध रिवाजों का पालन किया जाने लगा. बौद्ध धर्म में परिवर्तित लोगों के नाम तमिलन(24 अगस्त,1912) प्रकाशित हुए. ये प्रयास काफ़ी सफल रहे, उदाहरणतः 1911 में मैसूर दक्किनी जनगणना रिपोर्ट में दलितों ने खुद को ‘बौद्ध’ के रूप में वर्गीकृत कराया.

जातिविहीन अस्मिता निर्माण

1881 में,जब औपनिवेशिक सरकार ने दूसरी जनगणना कराने की योजना बनाई, पंजीकरण कर्मचारियों ने ‘डिप्रेस्ड क्लासेस’ को एक नए वर्ग के रूप में हिन्दू धर्म के अंतर्गत वर्गीकृत किया. उस समय अयोति थास ने ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन दिया कि तमिल-भाषी क्षेत्र में ‘डिप्रेस्ड क्लासेस’ के लोगों को आदि-तमिलर माना जाए न कि हिन्दू.

इसके बाद के दशकों में हुए जनगणना विभाग की रूचि लोगों को स्थापित परम्पराओं और धर्म के आधार पर (जिसका अर्थ हिन्दू वर्ण व्यवस्था थी) वर्गीकृत करने में थी. इसलिए प्रत्येक जाति ने जनगणना में अपनी जाति की प्रस्थिति को ऊंचा दिखाने के लिए अपने जाति-संघों को स्थापित करना शुरू कर दिया. यह कोई अतिश्योक्ति नहीं बल्कि ऐतिहासिक तथ्य है कि प्रत्येक गैर-ब्राहमण जाति ने अपनी जाति-स्थिति को या तों क्षत्रिय या फिर वैश्य से जोड़ा. परन्तु अयोति थास ने अछूतों से आग्रह किया कि वे अपने धर्म के रूप में बौद्ध दर्ज़ कराएँ. उन्होंने दलितों को जातिविहीन द्रविड़ (सथी पेथमात्र द्रविड़दर Sathi Pethamatra Dravidar) बताया क्योंकि वे जाति की व्यवस्था से बाहर थे.

अयोति थास ने बौद्ध धर्म का अनुसरण करने वाले मूल निवासियों को ‘यथार्थ ब्राह्मण’ (Yathartha Brahmana) (वास्तविक ब्राह्मण) की संज्ञा दी. आर्यों के आक्रमण के पहले ये मूल निवासी बौद्ध धर्माचार्य भी थे| पर आक्रान्ता आर्यों ने इन मूलनिवासी बौद्धों के कुछ रिवाजों की नक़ल की और अपने स्वार्थी प्रयोजनों के लिए लोगों को ठगना प्रारंभ किया. इसलिए आयोथी थास ने उन्हें वेश ब्राह्मण Vesha Brahmana (छद्म/नकली ब्राह्मण) कहा है. एक राजनीतिक वर्ग के रूप में ‘गैर-ब्राह्मण’ की भी उन्होंने आलोचना की. उन्होंने आश्चर्य प्रकट किया कि कैसे जाति-आधारित हिन्दू परम्पराओं के सिद्धांतो का पालन करते हुए भी वे यह दावा कर सकते हैं कि वे गैर-ब्राह्मण है [गैर-ब्राह्मण का गैर-हिन्दू होना ज़रुरी है].

ओरु पैसा तमिलन और तमिलन (Oru Paisa Tamilan and Tamilan)

ओरु पैसा तमिलन (एक साल बाद नाम बदलकर तमिलन किया गया) नाम से 19 जून 1907 को एक तमिल साप्ताहिक की शुरुआत हुई. पंडित अयोति थास इस पत्रिका का संपादन और प्रकाशन वे स्वयं करते थे. इस साप्ताहिक पत्रिका का प्रसार लगभग 500 था. दलित प्रिंट इतिहास में तमिलन अपने समृद्ध विषय-वस्तु और विचारधारा के चलते सर्वाधिक ख्याति प्राप्त पत्रिका रही है. चार-पेज का यह साप्ताहिक टेबलायड आकार में प्रत्येक बुधवार को प्रकशित होता था. उन्होंने सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर लेखों की एक श्रृंखला लिखी. इस पत्रिका में संपादक के नाम पत्र, लेख, ज्ञापन, सर्कुलर आदि सम्मिलित होते थे. उनकी गतिविधियों का मुख्य केंद्र तमिल भाषी लोगों के बीच तमिल बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान व पुनर्गठन था.

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दलित मुक्ति के इतिहास में अयोति थास की भूमिका अति महत्वपूर्ण है. उन्होंने आंबेडकर से लगभग आधी सदी पहले इतिहास, धर्म व तमिल लोगों के साहित्य की व्याख्या बौद्ध धर्म के दृष्टिकोण से करने का प्रयास किया(अलॉयसियस, नेशनलिज्म विदाउट ए नेशन इन इंडिया,पे.58). अयोति थास ने अपनी इस व्याख्या के लिए अनेक स्रोतों, जैसे- तमिल साहित्य, पाली पाठ्यों से अनुवाद, लोक कथाएँ, मुहावरें, औपनिवेशिक आँकड़ें आदि, का इस्तेमाल किया.

अयोति थास ने एक जातिविहीन समाज की कल्पना की. वह इस वैचारिक निष्कर्ष पर पहुचें कि इस आदर्श की प्राप्ति के लिए उचित मार्ग तमिल बौद्ध धर्म है. उन्होंने इन्थिरारदेसा सरिथिराम Inthirardesa Sarithiram में भारत का इतिहास लिखा, जिसमें उनका कहना है कि आर्यों के आक्रमण के पहले भारतीय बौद्ध धर्म के सिद्धांतो का पालन करते हुए जाति के बिना शांतिपूर्ण ढंग से रह रहे थे. उनके बीच ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र जैसे विभाजन थे पर यह विभाजन श्रम आधारित था और उनके पेशों के आधार पर कोई श्रेणीकृत हैसियत नहीं थी. असभ्य आर्यों ने इस श्रम आधारित विभाजन को अपने लाभ के लिए जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदल दिया. अयोति थास ने अनेक रिवाजों,धार्मिक कथाओं और परम्पराओं की बौद्ध धर्म के दृष्टिकोण से पुनर्व्याख्या की.

तमिलन के पाठक मुख्यतः खदानों और घरेलू फुटकर कामों में लगे नए प्रकार के मजदूर थे. 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में उपनिवेशवाद के संरक्षण में नए रोजगारों का विकास हुआ; उदाहरण के लिए, खदान, सेना, चाय बागान आदि. भूमिहीन दलितों ने इन नए अवसरों का उपयोग स्वयं को जाति-आधारित कृषि व्यवस्था से मुक्त करने के लिए किया. जहाँ भी अवसर मिला उन्होंने प्रवास किया. आधुनिक कार्य-संस्कृति ने उन्हें पढ़ने-लिखने की संभावना उपलब्ध कराई और उन्हें अपने समुदाय के लिए सोचने व कार्य करने को प्रेरित किया. तमिलन ने इस नई पीढ़ी (गैर-कृषक मजदूर) को अपने पाठक के रूप में पहचाना. तमिलन के ग्राहकों की सूची से हम अनुमान लगा सकते हैं कि इस पत्रिका का प्रसार केवल तमिल क्षेत्र में नहीं था बल्कि दक्षिण अफ्रीका, बर्मा, श्रीलंका, फिजी, मारीशस, सिंगापुर, मलेशिया, तंजानिया आदि तमाम जगहों पर था जहाँ निचली जातियों के तमिल लोग रोजगार के लिए जाकर बस गए थे.

अयोति थास को याद रखना

भारतीय समाज में आधुनिकीकरण के दौरान, एक दलित बुद्धिजीवी अयोति थास ने आधुनिकता के उपकरण -प्रिंट माध्यम- का प्रयोग अपने विचारों व मतों को अभिव्यक्त करने के लिए किया. अभी तक भारतीय इतिहास-लेखन में केवल दो दृष्टिकोणों – राष्ट्रवादी और साम्राज्यवादी- को महत्व दिया गया है; लेकिन इसी काल के दौरान एक स्वतंत्र दृष्टिकोण भी मौजूद था- दलितों का – जिसे समस्त इतिहास लेखन में उपेक्षित किया गया. दलितों के संगठन के लिए प्रिंट का प्रयोग काफी रुचिकर है क्योंकि आमतौर पर दलितों को निरक्षर व अशिक्षित के समझा जाता है. यहाँ अयोति थास के तमिलन में दर्ज कुछ मतों को रेखांकित करना उचित होगा. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस दावे पर सवालिया निशान लगाए कि वह भारतीयों की एक मात्र प्रतिनिधि संस्था थी. वे कभी सहमत नहीं हुए कि स्वशासन दलितों के जीवन में कोई परिवर्तन लाएगा. उन्होंने राजनीतिक रूपांतरण के बजाय सामाजिक रूपांतरण पर बल दिया.

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अयोति थास ने अछूतों के लिए विशिष्ट राजनीतिक अस्मिता निर्माण का प्रयास किया – जैसे – आदि-तमिलर, तमिलन, बौद्ध व अन्य. अयोति थास की रचनाओं से यह स्पष्ट है कि उन्होंने जाति-व्यवस्था के विभेदक व शोषक चरित्र को राष्ट्रवाद की भावना के विपरीत माना. श्रेणीकृत सामाजिक संरचना में दलितों का ब्रिटिश सरकार को सहयोग देना उचित ही था. यह केवल तमिलनाडु में ही नहीं महाराष्ट्र में भी हुआ जहाँ दलितों ने स्वदेशी का विरोध किया. साथ ही बंगाल में भी नमोशूद्र लोगों ने खुलकर ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया| दलित बहुत स्पष्ट थे कि यही उनके लिए सामाजिक व राजनीतिक अधिकारों का दावा पेश करने का उचित समय. एक आधुनिकतावादी के रूप अयोति थास ने इन संघर्षो को आगे बढ़ाने के लिए आध्यात्मिक पहलू को केंद्र में लेकर आए.

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बाला, जे. ने मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेवेलोपेमेंट स्टडीज से दलितों का प्रिंट संस्कृति इतिहास पर पीएचडी की है. वे पिछले छः सालों से असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में पत्रकारिता विभाग, मदुरई कामराज यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं|

यह लेख इससे पहले अंग्रेजी में Round Table India में प्रकाशित हो चुका है 

हिन्दी अनुवादक :पुष्पा यादव और महिमा यादव 

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