कण कण से अब ये रण होगा
भगवा द्वंद अब कम होगा,
नीला रण तगण अब होगा,
मूलतत्व जब सब होगा,
जितने धोखे-मृत किये,
सबका हिसाब अब होगा,
न होगा भगवा राह में,
जब नील क्रांति का बिगुल होगा। – माहे

पवनेश माहे

 

“रोहित वेमुला” सिर्फ अकेला नाम नही है जो इस साम्राज्यवाद, राजनीति और जातिवाद का शिकार हुआ| आज रोहित एक ऐसे अनंत सफ़र पर जा चुका है जहाँ से उसके वापस आने की कोई सम्भावना नही| रोहित कार्ल सेगन की तरह लेखक बनना चाहता था, सितारों का लेखक| उसने मेरिट की दीवार को तोड़ कर अपनी अलग पहचान बनाई थी| लेकिन उसका सपना और जूनून UOH के मनुवादी लोगो की आँख का नासूर बन गया|

 

कहने को ये देश संविधान से चलता है लेकिन विडम्बना यह है कि यहाँ आज भी संविधान को मानने वाले लोग बहुत कम हैं| ASA(अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन) याकूब की फांसी के विरोध में नही था वो सिर्फ फांसी जैसी सजा के विरोध में था जबकि इनसे पहले इसी मुद्दे को लेकर काफी लोग जिनमें रिटायर्ड आईएस, आईपीएस, वकील, जज, NGO’s और बहुत से विधायक तथा सांसद अपना विरोध जता चुके थे| रोहित का एक पत्र जो VC-HCU के नाम था उसमें लिखा था “10 ग्राम जहर एडमिशन के वक़्त दलित छात्रों को अवश्य दे दो ताकि अगर उनका मन अम्बेडकर को पढ़ने का हो तो वो इसे खा ले, उन्हें हॉस्टल में मजबूत रस्सी भी दी जाए ताकि फांसी भी लगा सके” क्या वाकई में अम्बेडकर को पढना इतना खतरनाक है? मैं कहूँगा हां बहुत खतरनाक है उस हर बात को पढ़ना खतरनाक है जिसमें सभी को समान माना जाए|

 

देश इस समय बेहद खतरनाक परिस्थितियों से जद्दोजहद कर रहा है, कहीं सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहे लोगों पर गोलियां और लाठियां चल रही हैं तो कहीं फैलोशिप के लिए लड़ रहे छात्रों पर सरकार और पुलिस बर्बर कार्यवाही कर रही है | कहीं गौ मांस मिलने के शक भर से भीड़ का एक हूजूम किसी अख़लाक़ को सिर्फ इस शक के चलते पीट- पीट कर मार डालती है की उसके घर में गाय का मांस मिलने की अफवाह उड़ी | भारत जैसे विविधता वाले देश को मंदिर-मस्जिद के नाम पर बांटने की साजिश तो लम्बे समय से चली आ रही है और यह आगे भी चलती रहेगी, लेकिन आज परिस्थितियां और भी विषम हो गई हैं, आज मुद्दा हिन्दू मुस्लिम, धर्म, बर्बरता से भी आगे बढ़ गया है | जहाँ सामजिक न्याय की बात बेमानी लगने लगी है, जहाँ छात्रों पर देशद्रोह के इल्ज़ाम लगने लगे हैं | उभरते दलित छात्र से सरकार इस कदर भयाक्रांत हो गई है कि, उसकी सांस्थानिक हत्या का प्रयोजन होता है |

जब अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के छात्रों  को ABVP के द्वारा “आतंकवादी” घोषित किया जा रहा था तब वह  कैसे चुप बैठ सकते थे  अचानक से AVBP की माँ (RSS) और चच्चा (BJP) वाले देशभक्ति का प्रमाण देते HCU के मसले पर एंट्री कर गये| यही होता है देशभक्त जो खुद ही पक्ष और खुद ही विपक्ष बनता है| रोहित तो जमीन से आकाश के अनंत सफ़र पर निकल गया, लेकिन जाते जाते इस देश में क्रान्ति की अलख जगा गया, देश भर में न जाने कितने रोहितों को अपनी आवाज दे गया| आज न जाने कितने ही रोहित अन्दर ही अन्दर अपनी सिसकती आवाजों को दबा चुके हैं या जातिवादी संस्थानों की भेंट चढ़ गये, इसका सबसे बड़ा कारण है सरकारी और गैर-सरकारी शिक्षण संस्थानों में दलित प्रतिनिधित्व की कमी, जिसकी वजह से छात्र अपनी परेशानी और बात रखने में हिचकिचाते हैं|

जब राजा को प्रजा से डर लगने लगता है तब वह दमनकारी हो जाती है| तब रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या करवाई जाती है तब विश्वविद्यालयों को अराजकता के पैमाने पर कसने का काम किया जाता है| हर घर से कहीं रोहित पैदा न हो जाए और गद्दीधारियों को कुर्सी छोडनी न पड़ जाए इसके लिए आन्दोलन को ख़त्म करने की पूरी कोशिश की जाती है| मैं मानता हूँ कि यह लोकतंत्र में अपने तरह का राजतंत्र हैं इसीलिए यहाँ सत्ता को राजसत्ता कह कर संबोधित कर रहा हूँ|

कुल मिलाकर पहले भूख से मरो, बेरोजगारी से मरो, और फिर भी बच गए किसी तरह से तो आपको यह ब्राह्मणवादी –पूंजीवादी तंत्र मार डालेगा |
ना जाने कितने रोहित वेमुला को आत्महत्या के लिए मजबूर करने के लिए, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय हो या फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय हर जगह जातिवाद, ब्राह्मणवाद फैला हुआ है| जिसे राष्ट्रवाद के नाम पर भारतमाता की जय से ज्यादा किसी अन्य बात से कोई मतलब नहीं | हमने तो यह मान लिया है कि यह सरकार हमारी एक न सुनेगी और हमारे पास संघर्ष के सिवा कुछ नहीं है|

ठीक ऐसा ही एक मसला “सत्येन्द्र कुमार ’मुरली’” के साथ हुआ जो राजस्थान के निवासी हैं, जब  सत्येन्द्र कुमार ’मुरली ने गांधी के ऊपर एक कार्टून  जो सोशल मिडिया में कई बार पोस्ट हो चुका था, सत्येन्द्र ने भी वही पोस्ट शेयर की | हिंदूवादी संघठन से लेकर माँ और चाचा तक सब सत्येन्द्र के पीछे लग गये, देशद्रोही का तमगा बाँट दिया, घर में तोड़फोड़ से ले के नामजद होने का दौर भी चला और धमकिया भी मिली| लेकिन उन्होंने हार नही मानी और मनुवादी सोच का डटकर सामना किया| यही है अम्बेडकर की ताकत| इस मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ एकजुट होना ही सबसे प्रबल हथियार है |
जो पढ़ेगा वो आगे बढ़ेगा, जो आगे बढ़ेगा वो लड़ेगा और जो लड़ेगा वो व्यवस्था-परिवर्तन करेगा|

पर जो लोग कहते हैं RSS एक सांस्कृतिक संगठन है और इसका सरकार से कोई लेना देना नहीं है, उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि यह सरकार संविधान से नहीं मनुस्मृति से और संसद से नहीं RSS कार्यालय से चल रही है इसका ताजा उदाहरण है रोहित वेमुला | यह तो साफ़ है कि हिंदुत्व ब्राह्मणवाद के नए अवतार के अलावा और कुछ भी नहीं है | ब्राह्मणवाद एक ऐसी स्थापना है जो ब्राह्मणों के वर्चस्व को कायम रखने में सहायक है। ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से भेदभाव, असमानता, अन्याय और गुलामी को कयाम रखने की कोशिश की जा रही है इसकी बानगी जाति व्यवस्था है|

मनु स्मृति ईरानी जी जाति (खत्री) ने संसद में बोलते हुए बखूबी इमोशनल ड्रामा किया| मायावती को जवाब देते हुए उन्होंने कहा था कि अगर जवाब नहीं पसंद आया तो सर काट देंगी (वैसे मायावती ने कहा था की उन्हें जवाब पसंद नहीं आया, पर मैडम ने सिर काटा नहीं खैर)| ड्रामें तो बखूबी निभा गई स्मृति ईरानी लेकिन रोहित की माँ राधिका वेमुला ने जो सवाल पूछे उसका जवाब नहीं दे पाई या कह लीजिये देने की कोई मंशा ही नहीं थी| इमोशनल ड्रामे के बीच स्मृति जुबिन ईरानी शायद यह भूल गईं की जिस महत्वपूर्ण पद पर वह आसीन हैं वह ड्रामे बाजी से नहीं दायित्व बोध से चलता है | इस देश का नागरिक होने के नाते मेरी आपसे गुजारिश है की अपना नहीं तो कम से कम अपने पद की गरिमा का तो ध्यान रखिये|

सामजिक न्याय के संघर्ष की आग में जातिवाद, फांसीवाद और मनुवाद को जलाने हेतु एक प्रयास करना होगा| ऐसे समय में संवादहीनता की स्थिति न पैदा हो यह बेहद जरूरी है| समाज में फैले अंधियारे को मिटा कर सामाजिक न्याय का उजियारा फैलाने की एक छोटी सी कोशिश में आप सभी साथियों का साथ अपेक्षित है| अंदाजा लगाइए की अगर कोई एक हमारे खिलाफ खड़ा हो जाता है तो कितनी दिक्कत हो जाती है | अक्सर हम कहने लगते हैं की डिप्रेशन में आ गए है डॉ. के पास जा रहे हैं और भी बहुत कुछ तो, फिर सोचिए रोहित कैसी मानसिक स्थित से गुजरा होगा उसके खिलाफ तो पूरी सत्ता ही खडी हो गई थी चौतरफे विरोध से गुजरा रहा था वो |

हर जगह हम अपनी बेहतरी के लिए काम करते है लेकिन हम उस समाज को भूल जाते है जिसने हमें थोड़ा बहुत तो परिपक्व बनाया है| समाज का वास्तविक ढांचा अगर सही तरह से बनाया जाता तो आज जो छात्रों के साथ हो रहा है वो कभी नही होता| हम समाज को बनाते हैं लेकिन उसके जरुरी धरातलीय बिन्दुओं को मानने से इनकार कर देते हैं| अगर समाज के व्यक्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक समता और संभावना ही नहीं पहुंचा पाएंगे तो कैसे खुद को विकसित कर सकते हैं| देखते हैं ये कारवां अब और कौन-कौन से रंग दिखायेगा| जाति का समूलनाश जरूरी हो चला है| शिक्षित, संघठित और संघर्ष सिर्फ एक नारा न रह जाये, आगे आइये और इस श्रंखला का हिस्सा बनिए|

“ये लड़ाई विचारधारा की लड़ाई है| ये लड़ाई अम्बेडकरवाद और ब्राह्मणवाद के बीच की है|”
बहुत से रोहित है जो गुमनाम है, आवाज़ दो हम एक हैं|
सिर्फ एक आवाज़ थी सुनसान,
जब सुना तो पैयाम था सबका,
अब खड़ा हुआ है सैलाव नीला,
अब पुकारो सब है एक भीमा।
जय भीम, जय भारत|

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पवनेश कुमार सिंह , गौतमबुद्ध विश्वविधालय से मास्टर इन टेक्नोलॉजी के छात्र हैं | 

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