टीकम सियाग

टीकम सियाग

 

भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था को लेकर आज-कल तथाकथित सवर्ण बुद्धिजीवी वर्ग अपने अपने ढंग से इसकी पुनर्व्याख्या कर रहे हैं, और इससे संबंधित बड़े-बड़े व्याख्यान देते हुए घूम रहे हैं| इनमें कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे है कि आरक्षण व्यवस्था की अब भारत में जरुरत नही है इसको पूर्ण रूप से समाप्त कर देना चाहिए । और उसके पीछे हर जगह वह अपना एक बेबुनियाद तर्क देते हुए दिखाई पड़ते हैं कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 के अन्तर्गत सभी को समानता का अधिकार दिया गया है की किसी के साथ जाति ,लिंग, धर्म, मूलवंश, जन्मस्थान आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा । वे लोग केवल यहाँ तक ही पढ़ते हैं उसके आगे भी कुछ लिखा है जो उनको दिखाई नहीं पड़ता है| आगे अनुच्छेद 15 में यह भी लिखा हुआ है कि राज्य को महिलाओं और बच्चों या अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सहित सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों के लिए विशेष प्रावधान बनाने से राज्य को रोका नहीं गया है। इस अपवाद का प्रावधान इसलिए किया गया है क्योंकि इसमें वर्णित वर्गो के लोग वंचित माने जाते हैं और उनको विशेष संरक्षण की आवश्यकता है। अगर वह यह लिखा हुआ भी पढ़ लेते तो शायद ही इस तरीके के बेतुके तर्क देते और साथ-साथ वह लोग कहते है कि अब कहाँ है असमानता ? अभी तो सब लोग बराबर है। सभी के लिए समान अवसर है । उन लोगो को तो आरक्षण की आदत हो गई है वह इसको छोड़ना नहीं चाहते है।

 

                                  इस तरीके के तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए एक और सुझाव है की वह लोग क्यों न भारत के संविधान बनने से पहले के इतिहास को एक बार फिर से खंगाल लें, जिससे उनका सामान्य ज्ञान भी अपडेट हो जाये, अपने पूर्वजों के कुकर्मो का पता भी लग जाये और कुछ अपनी गलत फहमियां भी दूर हो जाये। और एक जिज्ञासा है कि आप ये उम्मीद क्यों करके बेठे हो कि  जो वर्णव्यवस्था , जिसमें कर्म के आधार पर लोगो का वर्गीकरण न होकर जन्म के आधार पर किया गया है। वह व्यवस्था  भारतीय समाज में लगभग दो हजार साल तक बनी रही और उस व्यवस्था को माध्यम बनाकर सवर्णों ने अपने निजी हितों की पूर्ति करने के लिए निचले वर्णों का शोषण किया। क्या उन पिछड़े, शोषित और महिलाओं के इतने गहरे जख्म केवल 70 साल में भर जायेंगे? आप अपनी बुद्धि का भी थोड़ा बहुत इस्तेमाल कीजिए। जिन लोगों का वर्णव्यवस्था और ढकोसले धर्म की आड़ में अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए शोषण किया गया वह लोग आज आरक्षण व्यवस्था के माध्यम से मुख्य धारा से  जुड़ रहे है और ताल ठोक के आपके इस ढकोसले वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं तो वह लोग आपकी आँखों में कांटे की तरह खटक रहे हैं | तब आप आरक्षण व्यवस्था को ख़त्म करना चाहते हैं जिससे वे अपना विरोधी स्वर मुखर न कर सके और पहले की तरह आपके इशारों पर नाचते रहें ।

   …और हाँ इसके लिए न तो भारतीय संविधान को कोसिये ; न ही डॉ. भीमराव अम्बेडकर को और न ही आरक्षण व्यवस्था को । अगर आपको अपनी आत्मा की संतुष्टि के लिए किसी को कोसना ही है तो बेझिझक होकर अपने उन पूर्वजों को कोसिये जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों के लिए इस व्यवस्था को इतने लम्बे समय तक सीचां था। वही एकमात्र जिम्मेदार है इसके लिए। और आप अपने बचाव के लिए मानवाधिकारों का सहारा लेंगे और कहोगे की पूर्वजों का दोष हमें क्यों ? तो आप कान और दिमाग की खिड़किया खोल के समझ लो की आप उनके वारिस बने हुए हो। अगर तुम्हें उनके द्वारा निम्न वर्णों के शोषण से लूटी हुई जमीन-जायदाद ; उनके द्वारा बनाई गई आधारहीन जाति जो तुम अपने नाम के आगे लगाये हुए यह ज्ञान बाँटते रहते हो और उनका नाम इत्यादि उनसे विरासत में लेते हुए तुम्हें शर्म नही आई ? तो उनके द्वारा किये गए कुछ कुकर्मो को स्वीकारने में क्यों आपत्ति हो रही है। उनके साथ-साथ ये भी पड़ा रहेगा किसी एक कोने में।

      यदि इतना नही कर सकते तो सबसे पहले लात मारो उनके द्वारा विरासत में दी गई आधारहीन जाति को और हटाइए अपने नाम के आगे लगी बड़े- बड़े अक्षरों वाली प्लेट को और फेकिए उसको कूड़ेदान में। और इतना ही नहीं इसके साथ-साथ अपने बच्चो के सम्बन्ध जोड़िये अपने से निचले वर्णों के साथ । तब मानेंगे की आपका कुछ दोष नही है और आपके पूर्वजों के कुकर्मों का दोष आपको न दिया जाये। कोई जनाब इसके लिए तैयार है अपनी संतान की शादी निचले वर्णो में करने को। नहीं ना ? यहाँ अपवाद की बात नहीं कर रहा हूँ मैं|  जैसे कि एक दलित बच्चा जो अपने कर्मो के आधार पर सवर्ण से कहीं अधिक योग्यता रखता है फिर भी आप अपनी बेटी का रिश्ता अधिक योग्य लड़के के साथ नहीं करते है क्योंकि वह आपके द्वारा बनाई गई जाति व्यवस्था के आधार पर अछूत है।

      इसके अलावा देश के विश्वविद्यालयों, प्रशासन व्यवस्था, न्यायिक व्यवस्था या अन्य सभी सरकारी सेवाओं की बात की जाएँ तो वहां 80 प्रतिशत से भी अधिक सवर्ण लोगों का आधिपत्य है| लेकिन यहाँ तो आपको यह दिखाई नहीं पड़ता हैं कि निचले वर्णो के लोगों की यहाँ तक पहुँच क्यों नहीं है केवल कुछ ही लोगो का आधिपत्य क्यों है? जब कभी भी इसके बारे में आपसे सवाल किया जाता हैं तब आप यह कहकर टाल देते हैं कि वह अपनी योग्यता के आधार पर आये है वह कोई आरक्षण व्यवस्था से नहीं आये हैं ।

           तो तथाकथित सवर्ण बुद्धिजीवियों आप आरक्षण व्यवस्था की आड़ क्यों ले रहे हो। और क्यों बातों को घुमा रहे हो और बहाना बना रहे हो।  सीधा-सीधा उस उत्तर प्रदेश भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष मधु मिश्रा की तरह क्यों नहीं बोल दे रहे हो ज़नाब, कि जो लोग भारत का संविधान बनने से पूर्व हमारे पैरों की जूती साफ करते थे और मैला ढ़ोते थे । वह लोग आज आरक्षण व्यवस्था के माध्यम से हमारे सिर पर चढ़ रहे हैं | और हमसे कन्धा से कन्धा मिला रहे हैं। सच कड़वा होता है उससे भी कड़वा होता है उसे स्वीकार करना | अगर आप समाज में व्याप्त गैरबराबरी को ख़तम नहीं कर सकते हैं तो उस गैरबराबरी से उपजी आरक्षण व्यवस्था को ख़तम करने की बात कैसे कर सकते हैं | समस्या को नहीं समस्या की जड़ को ख़तम करने की बात करिए इससे यह होगा कि जो आपको समस्या लग रही है(वास्तव में जो समस्या है नहीं) अगर उसके मूल में स्थित जड़ ही ख़तम हो गई तो समस्या तो अपने आप ही ख़तम हो जायेगी |

                   तो आप अपने इस ढकोसले से बाहर मत निकलो और चिल्लाते रहो आरक्षण-आरक्षण तो इससे कुछ नहीं होने वाला| और ना ही आपके द्वारा सुझाए गए किसी प्रकार के हवाई तर्को के आधार पर आरक्षण व्यवस्था में जो आप बता रहे हो उस तरह का कोई बदलाव आने वाला है । उसके लिए सबसे पहले आप ही को सब लोगों के साथ मिलकर पहल करनी होगी। तभी सब लोगो में समानता आएगी और आरक्षण पर पुनर्विचार होगा|

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लेखक, टीकम सियाग, जवाहर लाल नेहरू ,विश्वविद्यालय दिल्ली से एम. ए. हिंदी के छात्र हैं |

कार्टून :  उनमती श्याम  सुंदर 

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