यह आलेख NCERT की 2008 की मेमोरियल लेक्चर सीरीज (स्मारक व्याख्यान श्रंखला) में आयोजित सावित्रीबाई मेमोरियल लेक्चर का एक भाग है| इसके लेखक हैं प्रो हरि नारके., प्रो नारके महात्मा फुले पीठ, पुणे विश्वविद्यालय के निदेशक हैं| वे एक प्रख्यात विद्वान् हैं, जो अब तक 6000 से अधिक व्याख्यान दुनिया के प्रसिद्द विश्वविद्यालयों में दे चुके हैं|  पुणे में महात्मा फुले मेमोरियल,  नैगाँव में सावित्रीबाई फुले का मेमोरियल और संसद भवन में महात्मा फुले की प्रतिमा स्थापित करने की पहल करने का श्रेय प्रो. नारके को ही जाता है|

~~~राउंड टेबल इण्डिया

 

 1877 में महाराष्ट्र भयंकर सूखे का सामना कर रहा था| ऐसे में, लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले फुले दम्पति का इस तरह की विषम परिस्थितियों में चुप बैठना संभव नहीं था जो हमेशा लोगों की मदद करते थे,  ऐसे समय में भी इस दम्पति ने गांव-गांव जाकर धन एकत्रित किया| डॉ शिवप्पा जैसे अपने मित्रों की सहायता से उन्होंने ‘विक्टोरिया बालाश्रम’ शुरू किया जहाँ प्रतिदिन एक हजार गरीबों और जरुरतमंदों को भोजन कराया जाता था| सावित्रीबाई अपनी मित्रों की सहायता से स्वयं इस भोजन को पकाती थीं| यह विडम्बना ही कही जायेगी कि इस तरह के मुश्किल समय में भी, विष्णुशास्त्री चिपलूनकर जैसे महाराष्ट्र के ‘युग प्रवर्तक

चिन्तक’  मराठी व्याकरण की बदतर होती स्थिति पर निबंध लिखने में लीन थे|

फुले दम्पति दूरवर्ती स्थानों से शिक्षा के लिए आने वाले विद्यार्थियों के लिए अपने घर में ही एक छात्रावास भी चला रहे थे| मुंबई से एक स्टूडेंट लक्ष्मण कराडी जाया उनके हॉस्टल में रहा था और उसने सावित्रीबाई की मां जैसी देख-भाल और चिंताएं महसूस की थीं| अपने संस्मरणों में उसने लिखा है—“मैंने सावित्रीबाई जैसी इतनी दयालु महिला नहीं देखी| उन्होंने मुझे मां से भी अधिक प्यार दिया|”

एक अन्य स्टूडेंट ने अपने संस्मरण में सावित्रीबाई के स्वभाव, उनकी अति सादगीपूर्ण जीवन शैली और उनके और ज्योतिबा फुले के अपार प्रेम के बारे में एक मर्मस्पर्शी नोट लिखा है| यह लड़का, जिसका नाम महदू सह्दू वाघोले था, लिखता है- “वे बहुत उदार थीं और उनका ह्रदय दयालुता से पूर्ण था| गरीबों और जरुरतमंदों के प्रति वे अत्यंत करुणाशील थी| वे भूखों को भोजन का दान करती रहती थीं| यदि वे किसी गरीब महिला को फटे-पुराने चीथड़ों में देखतीं,  तो अपने घर से उसे साड़ियाँ निकाल कर दे देतीं थीं| उनकी इन आदतों से घर के खर्चे बढ़ते गए| तात्या (ज्योतिबा फुले) उनसे कभी-कभार कहते कि किसी को इतना ज्यादा खर्च नहीं करना चाहिए| इस पर वे मुस्कराकर जबाब देतीं,  “मरेंगे तो क्या ले जायेंगे!” इसके बाद तात्या चुप हो जाते क्यूंकि उनके पास कोई जबाब नहीं होता| वे एक-दूसरे से अथाह प्रेम करते थे|

 

महिलाओं के उत्थान को लेकर सावित्रीबाई अत्यधिक उत्साहित थीं| वो एक सुन्दर दिखने वाली और मध्यम कद-काठी की महिला थीं| उनका व्यवहार अत्यंत शांत एवं संयत था| उनके संयत स्वभाव से ऐसा लगता था जैसे कि वो गुस्सा जानती ही न थीं| उनकी मुस्कान अत्यंत रहस्यमयी होती थी| सब लोग उन्हें ‘काकू’ कहकर कहकर बुलाते थे| अतिथियों के घर आने पर वो बहुत प्रसन्न होती और स्वयं उनके लिए पकवान बनाती| ज्योतिराव सावित्रीबाई का बहुत सम्मान करते थे और सावित्रीबाई उन्हें ‘सेठजी’ कहकर बुलाती थीं| उनके बीच सच्चा प्रेम था| ज्योतिबाफुले कभी ऐसा कोई कार्य नही करते थे जिसमे सावित्रीबाई की सहमति न होती|

सावित्रीबाई एक दूरदर्शी और सुलझी हुई महिला थीं| उनके रिश्तेदारों और सामाजिक संपर्कों में उनकी बहुत इज्ज़त थी| एक गर्ल्स स्कूल की अध्यापिका होने के कारण नवशिक्षित महिलाओं में भी उनके लिए बहुत आदर था| अपने पास आने वाली सभी महिलाओं और लड़कियों को वो हमेशा सलाह और मार्गदर्शन प्रदान करतीं थी| पंडिता रमाबाई, आनंदीबाई जोशी और रमाबाई रानाडे सहित पुणे की कई सुविख्यात महिलायें उनसे मिलने आती थीं|

तात्या (ज्योतिबा फुले) की तरह सावित्रीबाई भी हमेशा सादे वस्त्र पहनती थीं| एक मंगलसूत्र, गले में काले मनकों की एक माला और एक बड़े से ‘कुंकू’ (सिंदूर का टीका) के अलावा वे अन्य कोई आभूषण नही पहनती थीं| सूर्योदय से पहले ही वो घर की साफ-सफाई और स्नान कर लेती थीं| उनका घर हमेशा स्वच्छ रहता था| घर में बर्तन हमेशा दमकते हुए और सुव्यवस्थित रहते थे| भोजन वो स्वयं पकाती थीं और तात्या के स्वास्थ्य और आहार का बहुत ध्यान रखती थीं|”

यह वर्णन उस व्यक्ति का है जो स्वयं उनके साथ रहा था| सावित्रीबाई के बारे में यह संभावित से ज्यादा प्रमाणिक तथ्य है| यह वर्णन एक क्रान्तिकारी महिला के घरेलू दैनिक जीवन के बारे में एक प्रमाणिक टिपण्णी है|

सत्यशोधक समाज की स्थापना 24 सितम्बर, 1873 को हुई और सावित्रीबाई फुले इस संस्था की एक अत्यधिक समर्पित कार्यकर्ती (activist) थीं| ये संस्था कम से कम खर्चे पर,  दहेज़मुक्त और बिना पंडित-पुजारियों के विवाहों का आयोजन कराती थी| इस तरह का पहला विवाह 25 दिसम्बर, 1873 को संपन्न हुआ| बाद में यह आन्दोलन नए उदय होते देश में तेजी से फैला| संस्था की पहली रिपोर्ट गर्व के साथ इस बात का उल्लेख करती है कि सदियों पुरानी इन धार्मिक परम्पराओं को नकार कर रचनात्मक विद्रोह की इस क्रांतिकारी पहल के पीछे सावित्रीबाई फुले की ही प्रेरणा थी| सावित्रीबाई की मित्र बाजूबाई निम्बंकर की पुत्री राधा और activist सीताराम जबाजी आल्हट की शादी पहली ‘सत्यशोधक शादी’ थी| इस ऐतिहासिक अवसर पर सावित्रीबाई ने स्वयं सभी खर्चे वहन किये|

इस प्रकार के विवाहों की पद्धति पंजीकृत विवाहों से मिलती जुलती होती थी जो आज भी भारत के कई भागों में पाई जाती है| पूरे देश के पुजारियों ने इन विवाहों का विरोध किया और वे इस मुद्दे को लेकर कोर्ट में भी गए| फुले दम्पति को कठोर परेशानियों का सामना करना पड़ा किन्तु इससे वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए| 4 फरवरी,  1889 को उन्होंने अपने दत्तक पुत्र की शादी भी इसी पद्धति से की| यह विवाह आधुनिक भारत में पहला अंतरजातीय विवाह था|

 

‘सत्यशोधक विवाह’ में दुल्हे को ये शपथ लेनी होती थी कि वह महिलाओं को शिक्षा का अवसर प्रदान करेगा और महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार प्रदान करेगा| शादी के समय ‘मंगलाष्टक’ (शादी के समय बोले जाने वाले मन्त्र) मन्त्रों का गायन दूल्हा-दुल्हन द्वारा स्वयं किया जाता था| ये मंत्रगीत दूल्हा-दुल्हन द्वारा एक-दूसरे के प्रति ली गयी शपथों के रूप में होते थे| यशवंत का विवाह राधा उर्फ़ लक्ष्मी से इसी पद्धति से हुआ था| राधा सत्यशोधक समाज के नेता ज्ञानोवा कृष्णाजी ससाने की पुत्री थीं| सावित्रीबाई ने राधा को शादी से पहले ही अपने घर में बुला लिया था ताकि वह और यशवंत एक-दूसरे से परिचित होने के साथ-साथ एक-दूसरे की पसंद-नापसंद से भी परिचित हो सकें| उन्होंने राधा की शिक्षा का भी बंदोबस्त किया|

इस दौरान सावित्रीबाई (काकू) का राधा के साथ जो व्यवहार था,  उसका जिक्र ज्योतिबाफुले द्वारा 24 सितम्बर, 1888 को लिखे एक पत्र में मिलता है| वे लिखते हैं, “मेरी पत्नी ने घर की सारी जिम्मेदारियां खुद ही संभाल रखी हैं और उसने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि लक्ष्मी को फुर्सत मिले ताकि उसकी पढाई सुचारू रूप से चलती रहे| “सावित्रीबाई कोई घमंडी, और उत्पीड़क सास नहीं थीं बल्कि वे तो एक ऐसी सास थीं जो खुद ही घर की सारी जिम्मेदारी सम्भाल कर अपनी बहू को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती थीं|

जुलाई 1887 में ज्योतिबाफुले को दिल का दौरा पढ़ा जिससे उनका दाहिना भाग पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गया| सावित्रीबाई ने इस बीमारी में दिन-रात उनकी देख-भाल की| वे ठीक हो गये और यहाँ तक की उन्होंने फिर से लेखन कार्य शुरू कर दिया| यह ऐसा समय था जब वे वित्तीय संकट से गुजर रहे थे| ‘पूना कंस्ट्रक्शन ठेका कंपनी’ का बिज़नेस ठप्प होने लगा था,  आय के श्रोत कम होते जा रहे थे और खर्चे बहुत ज्यादा थे| दम्पति की बुद्धि भी जबाब देने लगी थी| बीमारी का खर्च,  विधवा-शिशुहत्या निरोधी संरक्षण गृह,  हॉस्टल का रख-रखाव,  सत्यशोधक समाज और बच्चों की शिक्षा इन सब का आर्थिक बोझ उन पर था| फिर एक ऐसा समय भी आया जब उनके पास इलाज के लिए भी पैसा न बचा और डॉ विश्राम रामजी ने उनका मुफ्त इलाज किया|

ज्योतिबा फुले के शुभचिंतक,  महान विचारक,  और ‘राजनीतिक संत’  मामा परमानन्द ने बड़ौदा के राजा- सयाजीराव गायकबाड़ को फुले दम्पति की वित्तीय मदद करने हेतु एक पत्र लिखा| 31 जुलाई, 1890 को लिखे इस पत्र में उन्होंने फुले दम्पति द्वारा किये जा रहे ऐतिहासिक कार्य का उल्लेख किया है| एक समकालीन चिन्तक द्वारा उनके कार्य का यह मूल्यांकन बहुत महत्वपूर्ण है- “बहुत ही विषम परिस्थितियों में ज्योतिराव ने अपनी पत्नी को शिक्षित किया और उनके (पत्नी) द्वारा ब्राह्मण लड़कियों को शिक्षित किया और वो भी रुढ़िवादियों की इच्छा के विरुद्ध उन्ही के गढ़ में उन्होंने यह कार्य किया| रुढ़िवादियों के गढ़ में महार और मंग जातियों के लिए स्कूल खोलना और उन्हें संचालित करना शेर पर गुर्राने के समान था| ज्योतिराव से ज्यादा उनकी पत्नी प्रशंसा की हकदार हैं| हम उनकी जितनी भी तारीफ करें, कम ही होगी| आखिर कोई कैसे उनके व्यक्तित्व का बखान कर सकता है! उन्होंने अपने पति का पूरा सहयोग किया और पथ में आई सभी बाधाओं का सामना उनके साथ रहकर किया| ऊँची जातियों की उच्चशिक्षित महिलाओं में भी इतना त्याग करने वाली महिला का मिलना मुश्किल है| दम्पति का जीवन जनकल्याण के कार्यों में ही बीता|”

इसके बाद मामा परमानन्द ने 9 अगस्त, 1890 को तत्काल आर्थिक मदद का अनुरोध करते हुए एक और पत्र लिखा- “ज्योतिबाफुले ने अपने जीवन के न जाने कितने ही वर्ष निस्वार्थ जन-सेवा में बिताया है और आज वे लाचारी का जीवन जी रहे हैं| वास्तव में उन्हें अविलम्ब मदद की जरुरत है|”

बड़ोदा के राजा की नजर में ज्योतिबा फुले के कार्य का बहुत सम्मान था लेकिन यह संभव है कि उच्च जाति के अधिकारियों ने राजा के पास ये पत्र पहुँचने ही न दिए हों| खैर जो भी हो इन सब के दौरान, 28 नवम्बर, 1890 को ज्योतिराव इस बीमारी के चलते गुजर गए| दिसम्बर,  1890 को मामा ने एक तीसरा पत्र लिखा, जिसमे उन्होंने लिखा- “उस महान आत्मा ने कभी भी अपने सुख-दुःख को महत्व नहीं दिया| वह केवल अपनी पत्नी और अपने दत्तक पुत्र,  यशवंत के लिए चिंतित थे. कम से कम अब तो उनके परिवारजनों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाय|”  जिद्दी मामा ने हार नहीं मानी और इस मामले को लेकर डेढ़ साल तक राजा के पीछे पड़े रहे| उन्होंने यशवंत के नाम से मदद के लिए एक और आवेदन किया. अभी तक सावित्रीबाई और यशवंत, मामा परमानंद और ज्योतिराव के एक अन्य मित्र रामचंद्रराव धमनास्कर द्वारा उपलब्ध करवाई जा रही बहुत थोड़ी सी मदद पर गुजारा कर रहे थे|

आख़िरकर, 10 फरवरी, 1892 को महाराजा सयाजीराव ने 1000 रुपये का चेक सावित्रीबाई के लिए दिया| इस राशि का निवेश तुकारामतात्या पडवाल की ‘नारायण कंपनी’ में कर दिया गया और तिमाही पर मिलने वाली ब्याज की राशि सावित्रीबाई को भेजी जाने लगी| 2 मार्च, 1892 को धमनास्कर ने मामा को एक पत्र भेजा, जिसमे लिखा था—“महाराजा का विचार है कि ज्योतिबाफुले की स्मृति में एक बड़ा सा स्मारक बनाया जाना चाहिए| महाराजा इस स्मारक हेतु एक बड़ी राशि का योगदान करेंगे|” उन्होंने यह भी लिखा कि महाराजा ने चिंतित होते हुए सावित्रीबाई के हाल-चाल के बारे में पूछा| खैर, यह स्मारक कभी वास्तव में आकर नहीं ले पाया|

ज्योतिबा फुले की मृत्यु के वक्त सावित्रीबाई उनके साथ ही थीं| अपनी बसीयत में ज्योतिबाफुले ने यह इच्छा व्यक्त की थी कि मृत्यु के बाद चिता पर जलाने के बजाय उन्हें नमक से ढँक कर दफनाया जाय| लेकिन चूँकि नगरपालिका के अधिकारियों ने आवासीय भूमि पर दफ़नाने की अनुमति नहीं दी और कोई दूसरा विकल्प भी न था,  अतः ऐसी स्थिति में उनके मृत शरीर को आग की ज्वालाओं के हवाले कर दिया गया| वहां एक परंपरा थी| जो कोई भी अंतिम यात्रा में तित्वे (मिटटी का लोटा, जिसमे मृतक के दहन से पहले उसके चारों तरफ छिडकने के लिए जल रखा जाता है) को थाम कर चलता है,  उसी को मृतक का उत्तराधिकारी माना जाता है और वही मृतक की संपत्ति पाता है| यही सोचकर ज्योतिराव का भतीजा आगे आया और यशवंत के तित्वा थामने के अधिकार पर विवाद करने लगा| इस समय, सावित्रीबाई साहसपूर्वक आगे आयीं और उन्होंने ‘तित्वे’ को स्वयं थाम लिया| वे ‘तित्वे’ को थामकर शवयात्रा के आगे-आगे चलीं और स्वयं उन्होंने अपने पति को मुखाग्नि दी| भारत के इतिहास के एक हजार वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी महिला ने अंतिम संस्कार किया| 30 नवम्बर को उनकी अस्थियाँ घर लायी गयीं और औपचारिक तरीके से उनकी अस्थियों को उस स्थान पर दफ़न कर दिया गया जिसे ज्योतिबा फुले ने इस उद्देश्य के लिए तैयार किया था| सावित्रीबाई ने वहां पर एक ‘तुलसी वृन्दावन’ का निर्माण किया| यह आज भी देखा जा सकता है| पत्थर की सादा पादुकाएं इसके नीचे रखी हुई हैं| सावित्रीबाई ने ज्योतिबाफुले की स्मृतियों को अमर बनाने के लिए इस प्रकार अपने घर के पिछले हिस्से में एक मेमोरियल तैयार कर दिया|

ज्योतिबाफुले की मृत्यु के बाद ‘सत्यशोधक आन्दोलन’ का नेतृत्व अपने जीवन के अंत तक सावित्री बाई ने किया| चिकित्साशास्त्र की शिक्षा पूरी करने के बाद यशवंत ने सेना में नौकरी कर ली| अपने कार्य के सिलसिले में यशवंत कई देशों की यात्रा किये| एक बार जब 1895 में वे ऐसी ही एक यात्रा पर थे, उनकी पत्नी राधा(लक्ष्मी) गुजर गयी| अब सावित्रीबाई घर पर अकेली रह गयीं|

1893 में सास्वाड़ में आयोजित सत्यशोधक सम्मेलन की अध्यक्षता सावित्रीबाई फुले ने की थी| 1896 के अकाल में उन्होंने बहुत काम किया| अगले साल 1897 में प्लेग की भयंकर महामारी फ़ैल गयी| पुणे क्षेत्र में प्रतिदिन सैकड़ों लोग इस प्रकोप से मर रहे थे| गवर्नमेंट ने इस महामारी पर नियंत्रण पाने की जिम्मेदारी रांड नामके अधिकारी को सौंपी| सावित्रीबाई ने यशवंत को छुट्टी लेकर आने को कहा और यशवंत के लौटने पर उनकी मदद से उन्होंने सासने परिवार के खेतों में एक हॉस्पिटल खुलवाया| वे बीमार लोगों के पास जातीं और खुद ही उनको हॉस्पिटल तक लेकर आतीं थीं| हालांकि वो जानती थीं कि ये एक संक्रामक बीमारी है फिर भी उन्होंने बीमार लोगों की सेवा और देख-भाल करना जारी रखा|

जैसे ही उनको पता चला कि मुंधवा गाँव के बाहर महारों की बस्ती में पांडुरंग बाबाजी गायकबाड़ का पुत्र प्लेग से पीड़ित हो गया है,  वो वहां गयीं और बीमार बच्चे को पीठ पर लादकर हॉस्पिटल लेकर दौड़ीं| इस प्रक्रिया में यह महामारी उनको भी लग गयी और 10 मार्च,  1897 को रात को 9 बजे आखिरकर उनकी साँसे हमेशा के लिए थम गयीं| ‘दीनबंधु’ ने उनकी मृत्यु की खबर को बड़े ही दुख के साथ प्रकाशित किया| जो लोग पीठ पर अपने पुत्र को बाँधकर दुश्मन से लड़ती हुई लक्ष्मीबाई की बहादुरी का गुणगान करते हैं,  उन्होंने इस महिला की बहादुरी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है जिसने अपनी पीठ पर लादकर कर एक बीमार बच्चे को बचाया|

1848 से लेकर 1897 तक, पचास वर्षों के इस काल में सावित्रीबाई ने लोगों के लिए अथक कार्य किया| उन्होंने सेवा और करुणा का एक असाधारण उदाहारण स्थापित किया|

उनकी मृत्यु के बाद अकेले पड़ गए डॉ. यशवं बहुत ही परेशान हो गए| 1903 में उन्होंने चंद्रभागाबाई से शादी कर ली और उनके एक पुत्री पैदा हुई जिसका नाम उन्होंने सोनी उर्फ़  लक्ष्मी रखा| डॉ यशवंत भी 1906 में गुजर गए| अब उनकी पत्नी बचीं| ऐसे में,  अकेलेपन और अनाथपन की भावना उनकी पत्नी चंद्रभागाबाई और बेटी सोनी पर हावी होती गयी| पहले तो उन्होंने ज्योतिबा फुले की सभी किताबों को एक कबाड़ी के हाथ बेच दिया और फिर गहर के बर्तनों को बेचकर गुजारा किया और 28 अक्तूबर 1910 को उन्होंने ज्योतिबराव और सावित्रीबाई के ऐतिहासिक घर को ही चंद सौ रुपयों में मारुति कृष्णजी देदगे को बेच दिया|

फुले दम्पति की पुत्रबधू अब बेघर हो चुकी थीं| आखिरकर 1930 में लम्बे समय तक अभावों की जिन्दगी जीते हुए रामेश्वर मंदिर में उनकी भी मृत्यु हो गई| चंद्रभागा का अंतिम संस्कार नगरपालिका द्वारा किया गया|  बाद में उनकी पुत्री की शादी बाबुरावगंगाराम होले से हो गई| सोनी उर्फ़ लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया| लक्ष्मीबाई की मृत्यु 1938 में हुई उनके पुत्र दत्तात्रेय बाबुराव होले इस समय दत्तावाड़ी,  पुणे में रहते हैं और पुत्री मुन्धवा में रहती थीं|

इस प्रकार एक क्रांतिकारी परिवार को ह्रदयविदारक अभावों और विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा| बिडम्बना देखिये कि जिस फुले दम्पति ने सैकड़ों विधवाओं के जीवन में चिराग जलाया,  उन्हीं की विधवा पुत्रबधू अभावग्रस्त होकर मंदिर की सीढ़ियों पर मृत पायी गईं| अगर ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने अपनी मेहनत की कमाई का निवेश सामाजिक सुधार के कामों में न किया होता तो यक़ीनन उनकी पुत्रवधू और पोती को अभावों का सामना नहीं करना पड़ता| ज्योतिबा फुले लकवाग्रस्त होकर इलाज के अभाव में ही चल बसे थे| सावित्रीबाई लोगों को प्लेग से मुक्ति दिलाते हुए स्वयं ही मुक्ति पा गयीं| उनके पुत्र यशवंत भी लोगों की सेवा करते हुए गुजर गए| अभावों के चलते उनकी पोती को एक विधुर से विवाह करना पड़ा| लेकिन उन्होंने हमेशा सामाजिक समता को प्राथमिकता दी | इस ट्रेजडी(दुखांत) के बारे में कोई क्या कह सकता है?  इस असीम बलिदान का कोई कैसे वर्णन कर सकता है?

सावित्रीबाई ने कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण लेखन कार्य भी किया है| उनका साहित्यिक योगदान निम्नवत है-

काव्यफुले – कविता संग्रह, 1854

ज्योतिराव के भाषण – सम्पादन, सावित्रीबाई फुले 25 दिसंबर 1856 |

सावित्रीबाई के ज्योतिराव को लिखे गए पत्र|

मातोश्री सावित्रीबाई के भाषण, 1892

बावनकाशी सुबोध रत्नाकर, 1892 |

यह सम्पूर्ण लेखन 194 पेजों में डॉ M. G Mali  द्वारा संपादित ‘सावित्रीबाई फुले समग्र वांग्मय’  में संकलित किया गया है| समस्त संग्रह का परिचय सम्मानित विचारक और दार्शनिक डॉ. सुरेन्द्र बर्लिंगे द्वारा लिखा गया है |

1854 में प्रकाशित ‘काव्यफुले’ सावित्रीबाई फुले की कविताओं का पहला संग्रह है| इसमें कुल 41 कवितायेँ संकलित हैं| प्रकृति और सामाजिक समस्याएं इन कविताओं का विषय हैं| कुछ कवितायेँ उपदेशात्मक भी हैं और कुछ ऐतिहासिक कवितायेँ भी हैं|

ज्योतिबराव के भाषण का सम्पादन सावित्रीबाई द्वारा किया गया है जिसका प्रतिलेखन चार्ल्स जोशी ने किया है | यह किताब 25 दिसंबर 1856 में प्रकाशित हुई है जिसमें ज्योतिबराव के चार भाषण सम्मिलित हैं |

ज्योतिबराव को सावित्रीबाई द्वारा लिखे गए पात्र में तीन पात्र हैं जो नैगावं और ओतूर से लिखे गए थे |

‘मातोश्री के भाषण’ में सावित्रीबाई द्वारा विभिन्न विषयों जैसे उद्यम, शिक्षा, सदाचरण, व्यसन और कर्ज इत्यादि पर दिए गए भाषण संकलित हैं| जिसका सम्पादन शास्त्री नरो बाबाजी महाद्हत पंसारे पाटिल द्वारा किया गया है और प्रकाशन वत्सल प्रेस, बरौदा द्वारा 1892 में किया गया|

‘बावनकाशी सुबोध रत्नाकर’ कविताओं का संग्रह है| ये कवितायेँ भारत के इतिहास और ज्योतिबा फुले के गद्यलेखन को काव्य की भाषा में वर्णित करती हैं| इस संग्रह में 52 रचनाएं हैं| ये कवितायेँ 1891 में ज्योतिबा फुले की मृत्यु के बाद लिखी गयीं और 1892 में किताब के रूप में प्रकाशित हुईं |

सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिबा फुले को जीवन भर जो सहयोग,  सहारा और साहचर्य प्रदान किया,  वह असाधारण और अतुलनीय है|  स्त्री-पुरुष के बीच समानता और शांतिपूर्ण साहचर्य का जो आदर्श उन्होंने स्थापित किया,  वह देश-काल से परे है

| शिक्षा, सामाजिक न्याय, और पुरोहिती के उन्मूलन के क्षेत्र में जो कार्य उन्होंने किया, वो केवल हमारे अतीत को ही नहीं अपितु वर्तमान को भी रौशन कर रहा है| यह ऐसा योगदान है जिसका वर्तमान में कोई जोड़ नहीं है| माता सावित्रीबाई की यह विरासत हमारे जीवन को हमेशा के लिए समृद्ध करती रहेगी|

माता सावित्रीबाई फुले की कुछ कविताओं का हिंदी अनुवाद.

 

जाओ, जाकर शिक्षा पाओ,

बनो परिश्रमी और स्वनिर्भर

काम करो और धन कमाओ,

बुद्धि का तुम करो विकास

ज्ञान बिना सब कुछ खो जावे,

बुद्धि बिना हम पशु हो जावें

अपना वक्त न करो बर्बाद

जाओ, जाकर शिक्षा पाओ|

विवश और उत्पीडित हैं जो

उनकी पीड़ा तुम दूर करो|

सीखने का है ये सुअवसर

धर्मशास्त्रों को दो त्याग!

जाओ, तोड़ो जाति की बेड़ी

जाओ, जाकर शिक्षा पाओ

पाओ ज्ञान

शिक्षा न हो, ज्ञान न हो यदि

पाने की भी चाह न हो,

बुद्धि यदि हो पास आपके

पर पड़ी हुई बेकार हो,

खुद को मानव कहलाओगे कैसे

तुम मुझको ये बतलाओ?

पशु-पक्षी, बन्दर और मानव

जीते हैं सब मरते हैं

पर इस अटल सत्य का तुमने

पाया यदि कुछ ज्ञान न हो,

खुद को मानव कहलाओगे कैसे

तुम मुझको ये बतलाओ?

 

 

 

अंग्रेजी सीखो

खुद के पांव खड़े हो जाओ

ज्ञान ही धन है, इसे कमाओ

ज्ञान बिना पशु होते गूंगे

तुम न रुको! बस शिक्षा पाओ.

ये मौका है, सुनो शूद्रों!

सब कष्टों से मुक्ति के लिए

अब तो तुम अंग्रेजी सीखो

अंग्रेजी को सीखकर,

मत मानो ब्राह्मण की बात,

अंग्रेजी को सीखकर

जाति का बंधन तोड़ दो|

 

माता सावित्रीबाई फुले, 1854 में प्रकाशित ‘काव्यफुले’ मे संकलित|

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हिन्दी अनुवादक : सुधीर अम्बेडकर

 

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