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सवर्ण मुसलमानों के लिए फिक्रमंद सर सयेद अहमद ख़ाँ

Nurun N Zia Momin

 

एड0 नुरुल ऐन ज़िया मोमिन (Nurulain Zia Momin)

Nurun N Zia Mominइस लेख को लिखने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि सर सैयद अहमद ख़ाँ साहब को लेकर भारतीय समाज विशेषकर मुस्लिम समाज में बड़ी ही गलत मान्यता स्थापित है. उन्हें मुस्लिम क़ौम का हमदर्द और न जाने किन-किन अलकाबो से नवाजा गया है जबकि जहाँ तक मैंने जाना है हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखी. सर सैयद को जितना मैंने पढ़ा है उस बुनियाद पर अगर उनकी शख्सियत के लिए कोई एक लफ्ज़ मैं इस्तेमाल करूंगा तो वह लफ्ज़ “इबलीसवादी” से बेहतर कोई लफ्ज़ नही होगा, हालाँकि लफ़्ज़े-इब्लीसवादी से बहुत लोगों को गम्भीर आपत्ति भी हो सकती है लेकिन मुझे यकीन है कि वह लोग भी जब सर सैयद की हकीकत जानेंगे और ईमानदारी से फैसला करेंगे तो उनका ऐतराज़ खत्म हो जायेगा, यहाँ पर बहुत विस्तार से चर्चा मुमकिन नही है इसलिये सर सैयद के सम्बन्ध में अपनी फ़िक्र के पक्ष में कुछ अहम बाते मैं आपसे शेयर करता हूँ।

मैंने सर सैयद अहमद ख़ाँ साहब के लिए इबलीसवादी लफ्ज़ का इस्तेमाल क्यों किया और इस लफ्ज़ को मैं किस भावना में इस्तेमाल कर रहा हूँ, सबसे पहले इसी पर बहस करता हूँ- “जब अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने हजरत आदम अलैहि0 का पुतला बनाकर सजदे का हुक्म दिया तो सब ने सजदा किया एक अजाजील(इबलीस) को छोड़कर और उसने आदम अलैहि0का सजदा करने से इनकार कर दिया. जब अल्लाह रब्बुलइज़्ज़्त ने अजाजील से इन्कार की वजह पूँछी तो उसने कहा कि- “मैं आग से बना हूँ और ये(आदम) मिट्टी से इस तरह मैं इससे अफजल(श्रेष्ठ) हूँ।”

इस से साफ़ हो जाता है कि जन्म/वंश के आधार पर श्रेष्ठता के सिद्धांत का जनक अजाजील/इबलीस है किसी को जन्म/वंश के आधार पर अशरफ़(श्रेष्ठ, शरीफ) और किसी को कमतर (कमीन, रज़ील) समझना इबलीस की विचारधारा को मानना है जो भी इस विचारधारा का पैरोकार है वह निःसन्देह इबलीस का पैरोकार है अर्थात इबलीसवादी है।

आइये इस तथाकथित मुस्लिम रहनुमा, मोहसिन, हमदर्द, की कुछ तकरीरों और इबारतों पर गौर करें और खुद फैसला करें कि क्या सर सैयद के लिए इबलीसवादी लफ्ज़ का इस्तेमाल दुरुस्त है या नही?

1857 के गदर के समबन्ध में अपनी किताब “असबाबे बगावते-हिन्द” में सर सैयद अहमद ख़ाँ साहब अपनी अंग्रेज भक्ति साबित करने के उद्देश्य से लिखते हैं कि- “जुलाहों का तार तो बिल्कुल ही टूट गया था जो बदज़ात सबसे ज़्यादा इस हंगामे (1857 के गदर) में गरम जोश थे।” सर सैय्यद की इसी किताब (असबाबे बगावते हिन्द) के बारे जनाब अली अनवर अन्सारी साहब अपनी किताब “मसावात की जंग” में लिखते हैं कि- “काबिले गौर बात ये है कि इस किताब (असबाबे बगावते हिन्द) का अंग्रेजी में तर्जुमा “सर आकलैण्ड कोल्बिन” और “G.F.I.ग्राहम” ने किया. ये किताब “The causes of Indian revolt” के नाम से 1873 में इसलिए प्रकाशित की गई कि अंग्रेज हुक्मरान, मुस्लिम तबका अशराफ/ शोरफा (सवर्ण मुस्लिम) की वफादारी और जुलाहों की गद्दारी और बग़ावत से वाकिफ हो सके…..सर सैय्यद अहमद खाँ अंग्रेजों को ये समझाने में कामयाब भी हो गये कि भारत की बड़ी ज़ातों के मुसलमान बरतानिया हुकूमत के तरफदार हैं। स्ट्रेच ने सरकारी तौर पर कहा है कि 1894 तक उत्तर भारत की बड़ी (अशराफ/ शोरफा/ सवर्ण मुस्लिम) ज़ातों के मुसलमान अंग्रेज़ी हुकूमत की ताकत के सर चशमा (श्रोत) हैं।”

28 दिसम्बर 1887 को मोहम्डन एजूकेशनल कांग्रेस (कांफ्रेंस) लखनऊ के दूसरे अधिवेशन में भाषण देते हुए सर सैय्यद ने लेजिसलेटिव कौंसिल में चुने सदस्यों को भेजनेsirsyedahmadkhan का विरोध इसलिए किया कि चुने हुए सदस्य आम लोगों के बीच से आएंगे जो वायसराय से मुखातिब होने या अशराफ (बड़ी/ सवर्ण जातियों) के साथ एक टेबल पर बैठने के काबिल न होंगे उनका कहना था कि बड़ी/ अशराफ ज़ात/ ऊँची खानदान में पैदा हुए लोग ही वायसराय की कौंसिल में बैठने के योग्य हैं, इस सम्बन्ध में सर सैय्यद ने लिखा कि- “सरकार भारतीय रईसों में जिनको वह इस कुर्सी पर बैठने के काबिल और बाऐतबार इज्जत के मुनासिब समझती है, उनको ही बुलाती है। शायद इस बात पर लोगो को शक होगा कि बाऐतबार इज्जत के क्यों बुलाती है, बाऐतबार लियाकत (योग्यता) के क्यों नहीं बुलाती?”…इसकी वजह बयान करते हुए सर सैय्यद आगे लिखते है- “वायसराय के साथ कौंसिल में बैठने के लिए आवश्यक मानक  में से है कि एक सम्मानित व्यक्ति जो देश के सम्मानित व्यक्तियों  मे से हो। क्या हमारे देश का अभिजात्य वर्ग इसको पसन्द करेंगे कि नीच श्रेणी का आदमी चाहे उसने बी०ए० की डिग्री ली हो या एम०ए० की और साथ में वह योग्य भी हो, उन पर बैठकर हुकूमत करे, उनके माल, जायदादऔर इज्जत पर हाकिम हो? कभी नही. कोई एक भी व्यक्ति पसन्द नही करेगा. सरकार की कौंसिल की कुर्सी अत्यधिक सम्मानित है। सरकार मजबूर है कि सिवाए अभिजात्य वर्ग के किसी को नही बिठा सकती और न वायसराय उसको “माई कलीग” माई ऑनरेबल कलीग” यानि “बरादर” या” आदरणीय” कह सकता है न शाहाना डिनरों (रात का खाना) में और न शहंशाही जलसों में जहाँ ड्यूक और अर्ल और बड़े-बड़े अभिजात्य लोग शामिल होते हैं, बुलाया जा सकता है. गरज कि ब्रिटिश सरकार पर ये इल्ज़ाम किसी तरह  नही लगाया जा सकता कि वो अभिजात्य लोगो को ही  क्यों चुनती है।”—(खुतबाते सर सैय्यद) 

सर सैय्यद की जातिवादी जे़हनियत को गौर से देखें. वह इंगलैण्ड और भारत में सिविल सर्विस के एक जैसी परीक्षा का विरोध करते हुए लिखते है- “ब्रिटेन में प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वो ऊंच हो या नीच, ड्यूक हो या अर्ल या किसी शरीफ(उच्च) खानदान का बेटा हो या एक दर्जी या किसी नीच श्रेणी के खानदान का बेटा बराबर इम्तेहान दे सकता है। जो यूरोपियन ब्रिटेन से कम्पटीशन का इम्तेहान देकर आते हैं, उनमें नीच खानदान के भी होते हैं और उच्व खानदान के भी होते हैं। मैं कहता हूँ कि आप सब ये यकीन करते होंगे कि जो नीच खानदान के लोग हैं वह मुल्क या गवर्नमेण्ट के लिए मुफीद नही हैं। लेकिन इंगलैण्ड से जो आते हैं वह हमारी आँख से  इतनी दूर हैं कि हम नही जानते कि वह लार्ड के बेटे हैं या ड्यूक के या एक दर्ज सर सैय्यद की जातिवादी जे़हनियत को गौर से देखे सर सैय्यद ने इंगलैण्ड और भारत में सिविल सर्विस के एक जैसी परीक्षा का विरोध करते हुए लिखते है- “ब्रिटेन में प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वो ऊँच हो या नीच, ड्यूक हो या अर्ल या किसी शरीफ(उच्व) खानदान का बेटा हो या एक दर्जी या किसी नीच श्रेणी के खानदान का बेटा बराबर इम्तेहान दे सकता है। जो यूरोपियन ब्रिटेन से कम्पटीशन का इम्तेहान देकर आते हैं,उनमें नीच खानदान के भी होते हैं और उच्व खानदान के भी होते हैं। मैं कहता हूँ कि आप सब ये यकीन करते होंगे कि जो नीच खानदान के लोग हैं वह मुल्क या गवर्नमेण्ट के लिए मुफीद नही हैं। लेकिन इंगलैण्ड से जो आते हैं वह हमारी आँख से  इतनी दूर हैं कि हम नही जानते कि वह लार्ड के बेटे हैं या ड्यूक के या एक दर्जी के, और इस कारण ये हकीकत कि हम पर एक तुच्छ आदमी हुकूमत करता है, हमारी आँख से छुपा हुआ रहता है। लेकिन भारत में ये ख्याल नहीं है। हिन्दुस्तान की शरीफ (अशराफ/ बड़ी ज़ातें) कौमें भारत के अदना दर्जे के व्यक्ति को, जिसकी जड़ बुनियाद से वह परिचित है अपनी जान व माल पर हाकिम होना पसन्द नही करेंगे। (खुतबाते सर सैय्यद)

“ब्रिटेन में प्रत्येक व्यक्तिचाहे वो ऊँच हो या नीचड्यूक हो या अर्ल या किसी शरीफ(उच्व) खानदान का बेटा हो या एक दर्जी या किसी नीच श्रेणी के खानदान का बेटा बराबर इम्तेहान दे सकता है। जो यूरोपियन ब्रिटेन से कम्पटीशन का इम्तेहान देकर आते हैं,उनमें नीच खानदान के भी होते हैं और उच्व खानदान के भी होते हैं। मैं कहता हूँ कि आप सब ये यकीन करते होंगे कि जो नीच खानदान के लोग हैं वह मुल्क या गवर्नमेण्ट के लिए मुफीद नही हैं। लेकिन इंगलैण्ड से जो आते हैं वह हमारी आँख से  इतनी दूर हैं कि हम नही जानते कि वह लार्ड के बेटे हैं या ड्यूक के या एक दर्जी केऔर इस कारण ये हकीकत कि हम पर एक तुच्छ आदमी हुकूमत करता हैहमारी आँख से छुपा हुआ रहता है। लेकिन भारत में ये ख्याल नहीं है। हिन्दुस्तान की शरीफ (अशराफ/ बड़ी ज़ातें) कौमें भारत के अदना दर्जे के व्यक्ति को, जिसकी जड़ बुनियाद से वह परिचित है अपनी जान व माल पर हाकिम होना पसन्द नही करेंगे।

मोहम्डन ऐंगलो ओरिएण्टल कालेज (मौजूदा AMU) कायम करने के पीछे सर सैय्यद के मकसद को स्पष्ट करते हुए मिस्टर अबू खालिद बिन सादी ने “हिन्दुस्तानी माशरे में मुसलमानों के मसायल” नामक अपने एक लेख में ज़ात-पात के गैर इस्लामी नज़रिए की आलोचना करते हुए लिखते हैं- “सर सैय्यद की अक्सर तहरीर से जाहिर है कि वह मुसलमानों के अशराफ वर्ग (बड़ी जातियों) ही के लिए ही सब कुछ कर रहे थे, यही कारण था कि अलीगढ़ से फारिग होने वालों के कैरियर सर्टीफिकेट में ये जुमला 1947 तक बराबर लिखा जाता रहा कि “ये (सायल) अपने जिले के शरीफ (अशराफ/ बड़ी जाति) खानदान से समबन्ध रखता है।” ये अलग बात है कि तारीखी अमल ने इस यूनिवर्सिटी को आज हिनदुस्तानी मुसलमानों की उच्च शिक्षा की इकलौती उम्मीदगाह बना दिया।”

अब्दुर्रहमान आबिद ने अपने एक मज़मून में ज़ात-पात को गैर इस्लामी बताया है और ये मुसलमानों में किस तरह आई, उस पर बहस की है,  इससे जो ओलमा प्रभावित हुए उनको बयान करते हुए रोज़नामा कौमी आवाज़ (उर्दू) नई दिल्ली के 27 नवम्बर 1994 के संस्करण में लिखते हैं कि- सर सैय्यद की अलीगढ़ तहरीक, अशराफ (सवर्ण मुस्लिमो) के लिए थी, अशराफ ही के लिए उन्होंने अलीगढ़ कालेज की बुनियाद डाली।”

इसी तरह पूर्व सांसद व ए०एम०यू० के पूर्व रीडर डा० सैय्यद मो० हाशिम किदवई ने रोजनामा राष्ट्रीय सहारा (उर्दू), नई दिल्ली में 30 दिसम्बर 2001 में लिखा- “बदकिस्मती से अशराफ बनाम अजलाफ का फितना पिछली सदी में शुरू हुआ और अफसोस कि सर सैय्यद अहमद खाँ साहब ने भी इस फितने का मुकाबला नही किया, बल्कि अपने मैदान में उन्होंनें इसके खिलाफ हथियार डाल दिया और उन्होंने पश्चिमी या अंग्रेजी शिक्षा को सिर्फ अशराफ तक महदूद रखने को कहा।”

मिस्टर Gaborieau  साहब “Pakistan-Nationalism without a nation?”  में लिखते हैं कि- “सर सैय्यद अहमद खाँ का संबंध अशराफ तबके से था और वह तबक-ए-अशराफ ही की भलाई के लिए काम करते थे। वह कहा करते थे कि अलीगढ़ कालेज जुलाहों के लिए नही है।”

सर सैय्यद ने 20 अप्रैल 1894 को जालंधर (पंजाब प्रान्त का एक जिला) में लड़कियों की शिक्षा पर बोलते हुए कहा- “मैं निहायत ज़ोर देकर कहता हूँ कि अशराफ लोग जमा होकर अपनी लड़कियो की शिक्षा का ऐसा बन्दाबस्त करें जो एक उदाहरण हो पिछली शिक्षा की जो किसी ज़माने में होती थी।” यहाँ पर ये ध्यान दे कि सर सैय्यद ने सीधे-सीधे शब्द “अशराफ लोग” का प्रयोग किया है। इसी तरह बरेली के “मदरसा अन्जुमन इस्लामिया” की इमारत की बुनियाद रखने के लिए उनको बुलाया गया था जहाँ मुसलमानों के निचले तबके (अजलाफ, अरजाल/ पसमांदा) के बच्चे पढ़ते थे, इस मौके पर उनको जो एड्रेस पेश किया गया था उसका जवाब देते हुए सर सैय्यद ने बोलते हुए कहा- “आपने अपने एड्रेस में कहा है कि हमको दूसरी कौमों के उलूम (शिक्षा) पढ़ाने में भी उज्र नही है शायद इशारा अंग्रजी पढ़ाने की तरफ है, मगर मैं कहता हूँ कि ऐसे मदरसे में अंग्रेजी पढ़ाने का ख्याल एक बहुत बड़ी गलती है। इसमें कुछ शक नही कि हमारी कौम में अंग्रेजी जुबान और अंग्रेजी शिक्षा की सख्त जरूरत है। हमारी कौम के सरदारों और शरीफों (बड़े लोगों) को लाज़िम है कि अपनी औलाद को अंग्रेजी उलूम की आला दरजे की तालीम दें। मुझसे ज्यादा कोई न निकलेगा जो मुसलमानों में अंग्रेजी तालीम व उलूम को तरक्की देने का पक्षधर और ख्वाहिशमंद हो। मगर हर काम के लिए एक मौका होता है। मुनासिब हाल ये है कि आप ऐसी कोशिश करे कि इन लड़कों को कुछ लिखना-पढ़ना और जरूरी हिसाब किताब आ जाये और ऐसे छोटे-छोटे रिसाले इनको पढ़ा दिया जावे जिनसे नमाज़ रोज़े के जरूरी मसायल जो रोज़मर्रा पेश आते हैं और मुसलमानी मज़हब के सीधे-साधे अकाएद (अकाएद मतलब आस्थाएं) इनको मालूम हो जाये।”

गौर करने का मामला ये है कि अंग्रेजी इल्म के सर सैय्यद बहुत बड़े समर्थक है लेकिन सिर्फ अशराफ ही हासिल करे, छोटी ज़ात अर्थात पसमांदा (अजलाफ, अरजाल) को बस नमाज, रोजा, और रोजमर्रा में काम आने वाली चीज़ों तक का ही इल्म दिया जाये और वह इतना ही इल्म हासिल करें। अब आप खुद फैसला करे कि सर सैयद अहमद ख़ाँ साहब-

1- मुस्लिम परस्त थे या मात्र अशराफ परस्त?

2- रसूले अक़दस मोहम्मद(स०अ०) के पैरो थे या इबलीस के?

3-तकवा और परहेजगारी को अफजलियत(बड़प्पन) और शराफत(उच्चवता) का आधार मानते थे या इबलीस की तरह जाती व नस्ल को?

4- मुस्लिम समाज को इसलामी नियमो दूसरे लफ़्ज़ों में मसावात के नियमों के आधार पर कायम करना चाहते थे या इबलीस के जन्म आधारित ऊँच-नीच के नियमो पर?

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नुरुल ऐन ज़िया मोमिन ‘आल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ ‘ (उत्तर प्रदेश) केराष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. उनसे दूरभाष नंबर 94515574517905660050 पर संपर्क किया जा सकता है.

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