तेजस्विनी ताभाने

पिछले महीने मैंने एक लेख हम में से कुछ को तमाम उम्र लड़ना होगा: अनूप कुमार राउंड टेबल इंडिया (अंग्रेजी) पर पढ़ा था, जहां अनूप सर ने बताया कि कैसे हमारे समाज के हाशिए वाले वर्गों के छात्रों को उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पहचान को लेकर कई असहज सवाल पूछे जाते हैं, और यह कि अगर आप एक अंबेडकरवादी परिवार में पले-बढे हूँ तो कैसे अपने जातिये पहचान के संकट से निपटने में मदद मिल सकती है। क्यूंकि मैं नागपुर (महाराष्ट्र) के एक अंबेडकरवादी परिवार से आती हूँ और इस प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रही हूं, सो इस विषय से मैं खुद को जोड़कर देख सकती हूँ. यह लेख मेरे व्यक्तिगत अनुभवों और विचारों को साझा करने का एक छोटा सा प्रयास है।

आप में से कुछ पूछेंगे कि मैं एक लेख के बारे में अब क्यों लिख रही हूं जिसे प्रकाशित हुए महीने से ज्यादा हो गया है. आज, मेरे साथ कुछ हुआ. मेरे मन में जो कई विचार पैदा हुए और मेरे कानों में एकमात्र जो शब्द गूँजे, वह उस लेख से थे जिसे अनूप सर ने लिखा. मैंने अपने कॉलेज द्वारा आयोजित ‘भारत में सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव’ पर एक संगोष्ठी में भाग लिया। जब आप सामाजिक बहिष्कार पर चर्चा करते हैं, तो सकारात्मक कार्रवाई या आरक्षण का मुद्दा अंदर आता है और ऐसा होने पर हमेशा एक गर्म बहस शुरू हो जाती है। यहां भी, बहस किसी भी अन्य स्थान से अलग नहीं थी, जिसमें दर्शकों द्वारा आरक्षण के खिलाफ बहुत सारे तर्क दिए गए जो आश्चर्यचकित नहीं कर रहे थे. मैं उन सभी को चुपचाप सुन रही था. मैं अन्यथा एक बहुत अंतर्मुखी और शर्मीली छात्रा हूं. अपनी कक्षा में भी नहीं बोलती।. और वैसे भी आरक्षण का नाम हमें अधिक असुविधाजनक महसूस करवाने के लिए पर्याप्त है.

ऐसी स्थिति में, हम अपनी पहचान को छुपाने की कोशिश करते हैं और आरक्षण के खिलाफ किसी भी तर्क का विरोध नहीं करते हैं, वह चाहे कितना भी निराधार क्यूँ न हो. अपने ही साथ एक लंबी लड़ाई के बाद, आखिरकार मैं पैनल से सवाल पूछने के लिए आश्वस्त हो गई. एक ‘आरक्षित श्रेणी’ की छात्रा ने आरक्षण पर सवाल पूछा! यकीन मानिए, यह साहसपूर्ण काम है. मैंने यह किया. पैनल ने बहुत अच्छी तरह से जवाब दिया. जबकि मैं यह साहस कर पाने के लिए स्वयं की प्रशंसा कर रही थी. किसी ने या सीधे कहूँ कि कॉलेज के एक प्रोफेसर ने प्रश्न पूछा कि ‘आर्थिक आधार’ पर आरक्षण क्यों नहीं होना चाहिए और इस तर्क को ‘उच्चतम दलित आरक्षण का दुरूपयोग करते हैं’ का तर्क दिया गया. जब पैनल प्रश्न का जवाब दे रहा था, फिर मैंने खड़ी होने और बोलने की हिम्मत की. मैंने इन तर्कों का मुकाबला करने की कोशिश की. मैंने जो कुछ कहा था, वो सब यहाँ लिखना इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है. चर्चा समाप्त हो गई और मुझे एहसास हुआ कि एक लड़की जो अपनी कक्षा में कभी बात नहीं करती, अपने सहपाठियों के सामने उसने आज विभिन्न विभागों के कई प्रोफेसरों और छात्रों के साथ एक मंच पर खड़ा होने की हिम्मत की और आरक्षण जैसे सबसे असहज विषय पर बात की। मुझे ऐसा करने से एहसास हुआ कि मैं अप्रत्यक्ष रूप से और अनजाने में अपनी पहचान जोरदार रूप से और जोर देकर रख रही थी. सवर्ण वर्ग के वर्चस्व में यह एक सामान्य बात नहीं है, जहां हम में से ज्यादातर हमारी पहचान छिपाने की कोशिश करते हैं. मैं यह जानने का प्रयास कर रही थी कि मुझे ऐसा करने के लिए आत्मविश्वास कहाँ से मिला और मैंने अनूप सर के शब्दों को याद किया. आंबेडकरवादी परिवार में पलने के कारण यह आत्मविश्वास मुझमें आया था. हाँ!

महाराष्ट्र और विशेष रूप से नागपुर के दलित परिवारों का परिदृश्य देश के बाकी हिस्सों से पूरी तरह अलग है। बहुत शुरुआत से, मुझे बताया गया कि हम ‘हिंदू’ नहीं हैं बल्कि ‘आंबेडकरवादी बौद्ध’ हैं. अब, यह क्यों मायने रखता है? यह हमें सकारात्मक पहचान बनाने में मदद करता है. आपके दूसरे साथी कथित ‘ऊँची’ जाति के विद्यार्थियों के लिए ‘निचले’ होने की नकारात्मक पहचान को स्वीकार नहीं करते क्योंकि आप अपने आप से पूरी तरह अलग हैं. ‘जय भीम’ कुछ शब्दों में से हैं जो मैं ‘आई और बाबा’ (माँ और पिताजी) के साथ बोलना सीख लिया था. मैं बाबासाहेब, सावित्री माई, ज्योतिबा फुले, शाहू महाराज और अन्य दलित बहुजन नेताओं और सामाजिक सुधारकों के बारे में सीखकर बड़ी हुई. दूसरे शब्दों में, मेरे परिवार ने मुझे अपने इतिहास के बारे में बताया. उन्होंने मुझे बहुत कम उम्र में जाति आधारित भेदभाव और बहिष्कार के बारे में बताया। इससे मुझे किसी भी तरह के भेदभाव से निपटने के लिए तैयार किया गया, जो कि उन दलित छात्रों के विपरीत है, जिनके माता-पिता ने अपने बच्चों को ‘जाति अवधारणा’ के बारे में नहीं बताया हो और अंततः उन्हें खुल के सामने आने में असमर्थ बना दिया. जब आपके पास कक्षा में ऐसे छात्र होते हैं जिन्हें अपने इतिहास पर गर्व होता है, जैसा कि आप जानते हैं कि पूरा भारतीय इतिहास ऊंची कही जाने वाली जातियों का इतिहास है, एक दलित छात्र अपने आपको कमतर महसूस कर सकता है, अगर उन्हें अपने इतिहास की जानकारी नहीं है. यहीं पर मेरा परिवार मेरे लिए या फर्क डाल देता है. जब कोई अपने ‘ठाकुरपन’, ‘ब्राह्मणपन’ या ‘राजपूतपन’ पर गर्व करता है, तो मुझे पता है कि मुझे मेरे ‘आम्बेडकरवादी पन’ पर कैसे गर्व महसूस करना है. ये बातें आपको इस बहिष्कार, अलगाव की जगहों में जीवित रहने में मदद करती हैं. वे आपको एकाकी होने से बचाती है. आपके पक्ष में बाबासाहेब का साथ हो, आप अपनी पहचान पर उठाए गए किसी भी सवाल से डरते नहीं हैं. ‘गैर-मेधावी’ और ‘अयोग्य’ होने के टैग आपको परेशान नहीं करते क्योंकि आप ‘मेरिट’ के खोखलेपन की इस अवधारणा को समझते हैं. 

इस देश के किसी भी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ रहे प्रिय दलित और आदिवासी छात्रों, यदि आप मुझे सुन सकते हैं और आपके माता-पिता ने आपको यह सब बताया नहीं है जो मुझे बताया गया था तो अब और इंतजार न करें और बाबासाहेब को पढ़ें. अपने जीवन और संघर्ष के बारे में जानें. अभी इतनी देर नहीं हुई है. यह हमारे अपने लाभ के लिए है. आपको इस ब्राह्मणवादी अपवर्जनात्मक स्थानों में जीवित रहने और उत्कृष्टता प्राप्त करने की आवश्यकता है. और बाबासाहेब के अलावा कोई भी आपकी सहायता नहीं कर सकता है. बाबासाहेब को जानने का मतलब है आप पर लाद दी गईं अपमानजनक और कटाक्ष वाली पहचानों से मुक्त करना. यह आपको यह समझने में मदद करेगा कि आपका इतिहास दमन का है न कि शर्म का. बाबासाहेब वह हथियार है जो आपको इन संस्थानों में नकारात्मक होने और खुद पर संदेह करने से बचाएगा. शिक्षा को हासिल करने का यह अवसर जाने न दें, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने तमाम उम्र संघर्ष किया. मुझे अनुमति दें कि मैं आपके लिए सावित्री माई की एक कविता का उद्धरण पेश कर सकूँ.

‘जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती

काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो

ज्ञान के बिना सब खो जाता है

ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है

इसलिए, खाली ना बैठो

जाओ, जाकर शिक्षा लो

दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो

तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है

इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो

ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो’

जब तक मैंने अपना शहर छोड़ एक अलग दुनिया में प्रवेश नहीं किया तब तक मुझे मेरे परिवार द्वारा दिए गए अम्बेडकरवादी मूल्यों के महत्व का उतना एहसास नहीं हुआ. ‘जय भीम’ की सलामी, जो मेरे घर और समाज में मेरे बड़ों को बधाई देने के लिए अनिवार्य थी, अब मैं अपने परिसर में लगातार सुनना चाहती हूँ. मेरे फोन में मेस्सी का वॉलपेपर था जिसके बदले अब सावित्री माई और जोतिबा फुले की एक सुंदर तस्वीर है जो मुझे सीखने, और अधिक सीखने, और अधिक जानने के लिए प्रेरणा देती है. ये छोटी चीजें मुझे यहाँ बने रहने और संघर्ष करने में मदद करती हैं. आप भी आपको प्रेरित बनाए रखने के अपने तरीके खोज लेंगे. अंत तक लड़िये. हथियार मत डालिए क्योंकि आप हारने का जोखिम नहीं उठा सकते.

जय भीम!

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तेजस्विनी ताभाने एक अंबेडकरवादी हैं एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में बी.ए. ओनर्स कर रही हैं. यह आलेख उनके राउंड टेबल इंडिया (अंग्रेजी) पर छपे आलेख  The Importance Of Having An Ambedkarite Family का अनुवाद है.

विनय शेंडे इस लेख के अनुवादक हैं. वह एक समर्पित अंबेडकरवादी हैं और कॉर्पोरेट जगत में काम करते हैं.

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