Maulikraj Shrimali
मौलिकराज श्रीमाली (Maulikraj Shrimali)
 
नीली आग की लपटें
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तुम्हारे आंसू गैस के गोलों से हमारी आँखे जल रही है
Maulikraj Shrimali
और जल रहे है जाति-धर्म के हिंसा में हमारे घर
 
भूख से जल रहा है वो पेट जो इक्कीस दिन के बाद… 
चल के अपने घर को पहुंचा है
 
और जल रहा है मेरी बहन का नंगा बदन
जो हमें तीन दिन बाद तुम्हारे खेतों की झाड़ियों से मिला है
 
जल रहा है मेरे मजदुर बाप का मन
उन बंद पड़ी हुई मिल की चिमनीयों को देख कर
और जल कर लाल हो गया है मेरा बचपन
इन भट्टीओं में ईंटो को सेक कर
 
खेत का सारा अनाज पानी की तलाश में खुद को जला रहा है
और मेरा भाई क़र्ज़ को जलाने
खुद को माचिस की तीली बना रहा है
 
गीली लकड़ियों को फूंकते-फूंकते
मेरी माँ के फेफड़े 
खुद चूल्हा बन गए हैं
और उसकी बेवा-सी बहु
मज़दूर पति के इंतज़ार में
अपनी जवानी जला रही है

 
मेरी बस्ती के हर मर्द की छाती
बीड़ी से निकले धुएं की फैक्टरी बन गई है
और हर युवा लड़के की डिग्री
देसी दारू की भट्टी में जल रही हे
 
जहाँ तुम घर पे बैठे रामायण देख रहे हो
वहां मेरा चाचा, मामा और फूफा
मेरी चाची, मामी और फूफी के साथ
महामारी के डर से, नंगे पाँव वनवास से लौट रहा है
 
और तभी एक दिन, तुम टीवी पे आते हो
और दिया जलाने का आह्वान करते हो    
 
तुम्हारे शब्द ऐसे गिरते है मेरे कानों में
जैसे हमारे पूर्वजों के कान में गिरता था गरम शीशा
मेरा खून ऐसे दौड़ने लगा
जैसे आग लगते ही भागने लगते है 
जंगल के जानवर 
 
ऐसे में मैंने तय किया कि  
5 अप्रैल 2020 की रात को नौ बजे
मैं दिया नहीं जलाऊंगा 
मैं खुद दिया बन जाऊंगा
जैसे बुद्ध ने कहा था-
“अप्प दीपो भव”
 
शिक्षित और संगठित बनके संघर्ष की आग को ज़िंदा रखूंगा
जो बाबा साहेब ने जलाई थी
बनाऊंगा खुद को मशाल
जैसे बिरसा ने बनाया था
 
एक झोंपड़ी में फानस जलाके पढूंगा- ‘गुलामगिरी’
पेरियार की तरह उगाऊँगा स्वाभिमान का चाँद
अपने आँगन में
 
नीले रंग के कपड़े से
कांशीराम की लगाई बहुजन आंदोलन की आग को हवा दूँगा  
 
मैं बन जाऊंगा रोहित और हो जाऊंगा सुरज की पहली किरण
 
पांच अप्रैल 2020 की रात को नौ बजे
में उतरूंगा गटर में
उसमें से निकलते मीथेन वायु को इक्कठा करूँगा  
तुम्हें पता न हो तो बता दूँ
इस वायु की आग नीले रंग की होती है
और इस नीली आग की लपटों में
मैं जलाऊंगा ‘मनुस्मृति’
मैं जलाऊंगा उन सभी शास्त्रों को

जिसने मुझे हमेशा एक सामाजिक दुरी पर रखा है
मेरे अस्तित्व को एक मानसिक लघुता में उलझा रखा है
मेरे नाम के आखिर में चिपका
इक ख़ौफनाक-सा डर दिया है
 
सो, आज रात, मैं
इस जाति के डर को जलाऊंगा
ठीक वैसे ही
जैसे आप जलाते हैं- होलिका।
 
पांच अप्रैल 2020 की रात को नौ बजे
मैं जलाऊंगा नीली आग की हवा
जब वो नीली आग की लपटें नीले आसमान को छू जायेंगी
तुम्हारे दियों को जलने के लिए ऑक्सीजन कम पड़ जाएगी
~~~
 
 
 
मौलिकराज श्रीमाली, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ गुजरात में एम्.फिल स्कॉलर हैं व् व्हिसल ब्लोअर थिएटर ग्रुप (Whistle blower Theatre Group) के संस्थापक व् निर्देशक हैं.

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