Akash Kumar Rawat
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आकाश कुमार रावत (Akash Kumar Rawat)

एक विचार अथवा वैचारिक राजनीति तब ज्यादा कमज़ोर हो जाती है, जब उस विचार को जन्म देने वाले और पोषित करने वाली शक्तियाँ ही उस पर अपना विश्वास छोड़ देती हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो किसी भी व्यक्ति को अपने विचार का प्रचार प्रसार करने और दूसरों से भी यह उम्मीद करना कि वह भी वैसा ही करे, उसके लिए सर्वप्रथम उस व्यक्ति को खुद मजबूती से विचारों के साथ अडिग रहना पड़ता है. प्रस्तुत लेख उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश में समाजवादी राजनीति के अंतर्द्वंद को समझने का एक प्रयास है. एक राजनीतिक पार्टी के रूप में समाजवादी पार्टी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1992 में स्थापना के पश्चात मुलायम सिंह यादव की नेतृत्व में प्रारम्भ किया. हालाँकि अब पार्टी का नेत्रत्व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथो में है. जैसा कि प्रत्येक पार्टी का अपना कुछ मूलभूत उदेश्य होता है, उसी प्रकार समाजवादी पार्टी का मूलभूत उदेश्य लोकतांत्रिक समाजवाद को स्थापित करना था. लोकतांत्रिक समाजवाद से आशय है राजनीतिक लोकतंत्र के साथ साथ उत्पादन के साधनों के सामाजिक स्वामित्व की वकालत करना. परंतु जब समाजवादी पार्टी का राजनीतिक इतिहास देखा जाए तो स्थापना के पश्चात इसकी राजनीतिक सफर में ज़मीन और आसमान का फर्क नज़र आता है. 

अगर राजनीति को एक खेल के रूप में समझने का प्रयास करें तो इसमें खिलाड़ियों के महत्व को भी नहीं नकारा जा सकता. एक समझदार खिलाड़ी उसे माना जाता है जो अपने विरोधीयों को ऐसा खेल खेलने को मजबूर करें जिसमें वह खुद महारथ हासिल किया हो. अपने पसंद के हिसाब से खेल खेलने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसमें अपने प्रतिद्वंदी को हराने के लिए ज्यादा कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता है. हालाँकि खेल में हारने की सम्भावना भी होती है लेकिन पसंदीदा खेल में जीतने की संभावना कहीं ज्यादा होती है. 

उत्तर प्रदेश की राजनीति मैदान में एक तरफ भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व की राजनीतिक खेल खेलने में व्यस्त है तो वहीँ दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी इसमें उलझती नजर आ रही है. 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी हिंदुत्व के रास्ते पर चलते हुए बीजेपी को हिन्दू विरोधी पार्टी सिद्ध करने का असफल प्रयास भी कर चुकी है. इसलिए 2019 के चुनाव में महागठबंधन में होने के बावजूद भी चुनाव हार गए. एक तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अजय सिंह विष्ट उर्फ योगी आदित्य नाथ इस खेल के बेहतरीन खिलाड़ी हैं तो वहीँ दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अभी नयें है. सपा और भाजपा के लिए हिंदुत्व की राजनीति को अगर अखाड़ा माना जाये तो इसमें बाज़ी मारने की ज्यादा सम्भावना बीजेपी की ही होगी. दोनों दलों की वैचारिकता अलग ज़रुर है लेकिन इसमें कुछ हद तक समानता भी है. इसके आलावा समाजवादी पार्टी के अन्दर कुछ विरोधाभासी तत्वों का मिश्रण भी देखने को मिलता है. 

आइए, कुछ उदाहरणों के तौर पर इसको समझने का प्रयास करते है. सत्ता में रहने के दौरान समाजवादी पार्टी ने अम्बेडकर जयंती को कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया और नाही कभी भी बाबासाहेब के विचारों को समाजवादी पार्टी से जोड़ने का प्रयास किया. यह बात तो माननी ही पड़ेगी कि सपा कुछ मायनों में बीजेपी को भी पीछे छोड़ चुकी है, जैसे कि परशुराम जयंती को मनाना और उनके आदर्शों पर चलने की सलाह देना. हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार ब्राह्मणों के वर्चस्व को बनाये रखने के लिए परशुराम ने 21 बार धरती पर अवतार लिया और क्षत्रियों का नरसंहार किया. पिता के आदेसानुसार अपनी ही माता का सर काटकर पितृसत्ता को मजबूत किया. कहने का मतलब किसी खास जाति/लिंग विशेष के वर्चस्व को स्थापित करने के लिए किसी खास जाति विशेष का भयंकर नर-संहार! 

लोकसभा चुनाव के पूर्व अखिलेश यादव ने भाजपा के राम मंदिर का तोड़ विष्णु मंदिर से निकाला. उनका कहना था कि अगर समाजवादी सत्ता में आते हैं तो भगवान विष्णु का लगभग 2000 एकड़ की ज़मीन पर मंदिर बनवाया जायेगा. दुनिया के, लगभग सारे वो देश, जहाँ दक्षिणपंथियों का उभार देखने को मिला वहाँ पूंजीवाद और धर्म का आतंरिक सम्बन्ध रहा है. बेनिटो मुसोलिनी के नेतृत्व में इटली में फासीवादी ताक़तों और जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में नाज़ीवादी ताक़तों को विश्व देख चुका है. भारत में फासीवादी ताक़तों का लक्षण पश्चिमी देशों से कई मायनों में अलग रहा है. भारत में फासीवादी का चरित्र दो तरह से समझा जा सकता है. एक, साम्प्रदायिकता के रूप में, और दूजे- जातिवाद के रूप में. 

सत्ता में आने के पश्चात् राजनीतिक दलों द्वारा नाम बदलने को भी हम वैचारिकता से समझने का प्रयास करते हैं. जैसे भारतीय जनता पार्टी द्वारा इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज, फैज़ाबाद का अयोध्या, मुगलसराय का पंडित दीनदयाल उपाध्याय करना. यह सभी नाम हिन्दू धर्म के पौराणिक कथाओं से सम्बंधित हैं और बीजेपी ने तमाम ऐसे ही जिलों और योजनाओं का नाम बदलकर हिन्दू धर्म के अनुसार करने का प्रस्ताव रखा है जिससे कि हिंदुत्वा की विचारधारा को बढ़ाया जा सके. समाजवादी पार्टी और उनके समर्थकों द्वारा नाम बदलने की विरोधी प्रवृति उस समय बहुत ही ज़ोरों पर देखने को मिली जब सपा के कार्यकाल में बनाए गए लखनऊ स्थित “इकाना स्टेडियम” का नाम भाजपा ने भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी के नाम पर “भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेयी अन्तराष्ट्रीय स्टेडियम” रख दिया. इस स्टेडियम के नाम बदलने पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ को हिन्दू विरोधी तक बता डाला. उनके अनुसार इसका मुख्य कारण है कि इकाना हिन्दू धर्म के भगवान विष्णु का नाम है. 

उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के समय भी नाम बदलने का राजनीतिक दौर रहा है. बसपा ने जहाँ सामाजिक न्याय के लिए कार्य कर चुके महानायकों और महानायिकाओं के नाम पर संस्थानों का नामकरण किया और तमाम सरकारी योजनायें चलाईं, वहीँ सपा सत्ता में आने के पश्चात् इन सभी नामों और योजनाओं को बदलती रही. बहुजन समाज पार्टी के सत्ता में आने के पश्चात् लखनऊ स्थित “किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी” (KGMU) का नामकरण आरक्षण के जनक शाहूजी महाराज के नाम पर करती रही तो और दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी सत्ता में आने के पश्चात् इसका नाम बदलकर KGMU ही कर देती थी. बीजेपी को भी सपा की ही तरह KGMU के नाम से कभी भी कोई समस्या नहीं रही है. 19वीं शताब्दी में, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महिलाओ को पढ़ने लिखने का अधिकार नहीं था. लेकिन सावित्रीबाई फुले ने इस मिथक को ना सिर्फ तोड़ा बल्कि ऐसा कार्य भी किया जो महिलाओं के उत्थान में मील का पत्थर साबित हुआ. सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका थी जिन्होंने अपने पति महात्मा फूले के साथ मिलकर शिक्षा और सामाजिक कार्यों के माध्यम से समाज के सबसे उपेक्षित और शोषित वर्गों के लिए कार्य किया. बसपा ने अपने कार्यकाल के दौरान एक ऐसी ही योजना बालिकाओं के शैक्षिणक विकास के लिए लागू किया था. वह थी, “सावित्रीबाई फूले बालिका मदद योजना”, इसके तहत किसी भी जाति या सम्प्रदाय से आने वाली वो लडकियाँ जो 12 वीं पास कर स्नातक में नामांकन करा चुकी होती थीं, को एक साइकिल और 25,000 रूपये मिलते थे. सपा सरकार 2012 में पहली बार पूर्ण बहुमत में आने के पश्चात् इस योजना को खत्म करने का कार्य किया. 

निष्कर्ष

समाजवादी पार्टी की वैचारिक राजनीति उस दिशा में मुड़ चुकी है जिस तरफ दक्षिणपंथी मोड़ना चाहते है. हो सकता है इस तरह के राजनीति से कुछ समय के लिए सपा को कुछ क्षणिक फायदा हो लेकिन इससे सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को ही होगा. दूसरे शब्दों में कहें तो समाजवादी पार्टी बीजेपी से उस पिच पर लड़ने की कोशिश कर रही जिस पिच की मास्टर ही बीजेपी है. अर्थात समाजवादी पार्टी को चाहिए कि वह बीजेपी को अपने पाले मे लाकर पटखनी दे, बजाय उसके पाले में गए. इस प्रकार की राजनीति की जड़ें सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं और मूल्यों में है. अतः जो सामाजिक और सांस्कृतिक पूंजी बीजेपी के पास है वो समाजवादी पार्टी के पास नहीं है. जिसका खामियाजा सपा सत्ता से बाहर होकर चुकाना पड़ा जबकि उत्तर प्रदेश में विकास के लिए उन्होंने काफी कुछ किया था. इस परिस्थिति में समाजवादी राजनीति को वापस अपने खुद की राजनीति पर विश्वास करना होगा. अन्यथा इसी अंतर्द्वंद मे पिसते रहना होगा. सपा को हिंदुत्वा की दलदल वाली राजनीति से बचने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि कीचड़ को कभी भी कीचड़ से साफ नहीं किया जा सकता है. हालांकि सत्ता से बाहर होने के पश्चात समाजवादियों को थोड़ी बहुत सामाजिक न्याय की तरफ रुचि बढ़ी है लेकिन वह कितने समय के लिए स्थायी है यह कह पाना अभी मुश्किल है. समाजवादी पार्टी को सामाजिक न्याय और सामाजिक मुद्दों की समझ रखने वाले बुद्धजीवियों के मार्गदर्शन से अपनी वैचारिक राजनीति को एक नयी दिशा देने का प्रयास करना चाहिए. भारतीय समाज को समतावादी तभी बनाया जा सकता है जब जाति व्यवस्था का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया जाए क्योकि जाति व्यवस्था के रहते भारत में सही मायने में कभी भी समाजवाद नहीं आ सकता. 

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आकाश कुमार रावत गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के गांधी विचार और शांति अध्यन केंद्र में शोधार्थी है. 

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One thought on “अंतर्द्वंद से जूझती उत्तर भारत की समाजवादी राजनीति

  1. आदरणीय लेखक महोदय, उत्तर प्रदेश में सपा के हार का कारण, केवल बीजेपी के पिच पर लड़ना ही नहीं था ,बल्कि और भी बहुत से कारण थे जैसे कि एक लम्बे समय से उत्तर प्रदेश में केवल सपा और बसपा का शासन ही चलता आ रहा था जिससे की यहाँ की जनता इनके विचारधारा (समय- समय पे बदलते) से ऊब चुकी थी. और इनकी पार्टियों के बीच भी आपसी मतभेद अपने चरम पे था, जिससे की यहाँ की जनता को कोई शसक्त नेतृत्व नहीं मिल पा रहा था. साथ ही इन दोनों पार्टियों से किसी ऐसे नेता का नाम सामने नहीं आ रहा था जो की उत्तर प्रदेश की 24 करोड़ के जनता का कुशल नेतृत्व कर सके

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