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Surya Bali

डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” (Dr. Surya Bali “Suraj Dhurve”)

“हे सन वेक अप“
कानों में डैडी की आवाज़ गूंजी
मुँह से अपने आप निकला- गुड मार्निंग डैड, गुड मार्निंग मॉम!
यही है मेरा सनातनी सेवा जोहार
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!

आज संडे है सुबह से ही घर में हलचल है
सब लोग जल्दी में हैं, तैयार हो रहे हैं
क्यूँकि जाना है चर्च और करना है संडे की प्रेयर
यही तो मेरा पेनठाना है और यही मेरा गोंगो
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!

आज मैंने पहनी है नई शर्ट पैंट और टाई
शूज पहनकर चर्च के अंदर बेंच पर बैठा हूँ भाई
अब मुझे दकियानूसी और पुरानी लगती है
अपने पुरखों द्वारा पहनी गयी धोती, कुर्ता और पगड़ी
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!

अब मुझे अच्छी लगती है बाइबिल, क्रॉस और चर्च
फादर बिशप और पोप सब हैं मेरे हमदर्द
पेन पट्टा, सजोरपेन और सरना भूल गए हैं हम
अब तो याद भी नही कौन हैं भुमका मुठवा मुकड़दम
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!

सूट बूट में सजकर मैंने कन्वेंट में शिक्षा पाया
इंग्लिश को ही मैंने अपनी मातृभाषा बनाया
अपनी बोली भाषा से मिट चुका है अपना नाता
अब मुझे नहीं आती संथाली, मुंडारी, गोंडी भाषा
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!

नाम है मेरा डेविड पर मैं लगता नहीं ईसाई
जैकब, कोर्टनी, ऐलेक्स, जैक बन गए मेरे भाई
अपने को मरकाम, परस्ते, पेंद्राम, इनवाती कहता हूँ
लेकिन अब मैं मार्को, पोर्तो, पेंड्रो, इब्ने लिखता हूँ
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!

शादी में भी मैंने अपना नया अन्दाज़ दिखाया
ग़ैर जाति की मारिया से चर्च में जाके वेडिंग कराया
नही पता है मुझे कि क्या है मंड़ा मड्मिंग भाँवर
अब मुझे हंसी आती है उनपर जो पहनते है सिग्मोहर
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!

मरने पर मेरे प्रीस्ट को बुलाया, होली वाटर से नहलाया
मुझे लिटाकर कॉफिन में, होली बाइबिल भी पढ़वाया
ग्रेवयार्ड में दफ़नाकर, कब्र पे, होली क्रास लगाया
न चोको न नेंग सायना न ही पगपंधन करवाया
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!

जन्म से लेकर मृत्यु तलक, मैंने किया छलावा
अंदर अंदर और रहा, बाहर कुछ और दिखाया
अगर छोड़ता आदिवासी की पहचान
तो कैसे करता आरक्षण का रसपान
फिर तो मेरा ईसाईयत का पेड़ मुरझा जाता
और मैं ईसाई बनकर भी, कुछ नहीं कर पाता
करता हूँ हर कार्य ईसाई का
जीता हूँ जीवन भी ईसाई का
लेकिन कभी मैं अपने को ईसाई नही कहता
क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ !!

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डॉ सूर्या बाली ‘सूरज धुर्वे’ पेशे से शहर भोपाल स्थित ‘एम्स’ में एक प्रोफेसर हैं. साथ ही, वह अंतराष्ट्रीय कोया पुनेमी चिंतनकार एवं जनजातीय मामलों के विशेषज्ञ हैं.

10 thoughts on “क्यूँकि मैं आदिवासी हूँ!”

  1. सर जी आपके द्वारा बहुत ही उम्दा कविता लिखी गई है जो मौजूदा आदिवासी समाज को सही दिशा देगा।आज भी बहुत से आदिवासी भाई पढ़ लिखकर बड़े पोस्ट में आ जाते हैं तो अपनी संस्कृति,संस्कार, भाषा व पहनावा को भी भूल रहे हैं। आदिवासी समाज का एकजुट होना व अपनी संस्कृति को बचाएं रखना अत्यावश्यक है।
    जय सेवा सेवा जोहार

  2. 🙏सर सेवा सेवा सेवा जोहार 🙏
    आप के इस कविता से हमारे युवाओ को अपने समाज को एक नई दिशा मिलेगा

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद और सेवा जोहार जयपाल सिंह जी

  3. बहुत-बहुत धन्यवाद और सेवा जोहार पंद्रे जी

  4. कविता ठीक है लेकिन उतनी ठीक नही जितना भूख व् वदहाली और कोई दोष मढ़ कर मर जाना। परिस्थितियां ऐसी निर्मित हुईं की कविता का सृजन हुआ वरना आज भी हम उनके साथ नही है और शिलशिला भी वही जारी है। रोक लें उस भूख और दोष को जो सरकारें आज भी मढ़ रही हैं बचे खुचे लोगों पर।
    जीवन को सेभ किया है भूख से, जिल्लत से और बेवजह दोषारोपि मरने से। यदि संस्कृति जिन्दा हुई तो फिर आयेंगें लौट कर क्योंकि हम तुमसे दूर नहीं।

    अजीत कुमार 9425600197

  5. आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और सेवा जोहार एक कविता जिस बिंदु पर फोकस की गई है उस पर विचार कीजिए कविता का विषय भूख और बदहाली नहीं है

  6. जय सेवा जय जोहार आपने बहुत अच्छी कविता लिखिए हर आदिवासी को इस बात को जानना चाहिए

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