Mohammad Javed

मोहम्मद जावेद अलिग (Mohammad Javed Alig)

देश में कोरोनावायरस की दस्तक देने से लेकर आजतक गोदी मीडिया महामारी का मुकाबला मीडिया मैनेजमेंट करने की कोशिश में जी-जान से जुटा हुआ है. आखिर जुटे भी क्यों न क्योंकि यही मौके होते हैं गोदी पत्रकारों के अपने नंबर बढ़ाने के. भारत का गोदी मीडिया इस जानलेवा महामारी का मुकाबला मीडिया मैनेजमेंट से करते करते खुद तो महामारी की चपेट में आया ही है साथ ही आर्थिक संकट का भी दंश झेल रहा है. गोदी मीडिया के कई पत्रकारों की नौकरियाँ गईं है लेकिन फिर भी वह महामारी से न लड़कर कभी पाकिस्तान के टिड्डी दल तो कभी पाकिस्तानी जासूस कबूतर से लड़ता दिखाई दे रहा है. इसके अलावा वह चीन और नेपाल से भी नेशनल टीवी पर लड़ता देखा जा सकता है.

गोदी मीडिया को चीन द्वारा भारत मे फैलाया गया कोरोना वायरस और पाकिस्तान द्वारा भेजा गया जासूस कबूतर और टिड्डी दल तो दिखाई दे रहा है लेकिन उसके ही देश के गुजरात मे हुए नमस्ते ट्रम्प प्रोग्राम का घातक परिणाम उसे अभी भी नज़र नही आ रहा है जहाँ के सिविल अस्पताल में हर घंटे एक मौत हो रही है. गुजरात के सिविल अस्पताल में कोरोना से अबतक 576 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि पूरे गुजरात में लगभग 1000 के आसपास लोग कोरोना से मर चुके हैं.

गुजरात हाई कोर्ट इन दिनों बेबाकी से गुजरात के स्वास्थ्य ढाँचे की पोल खोलकर जनता के समक्ष रख रहा है. गुजरात हाई कोर्ट ने वहाँ के सिविल अस्पताल की खस्ताहाली के बारे में बताते हुए कहा कि यहाँ के सिविल अस्पताल की हालत किसी बदबूदार तहख़ाने सी हो चुकी है. इसी गुजरात की तुलना अगर देश की राजधानी दिल्ली से की जाए तो मामलों की संख्या लगभग बराबर है. मगर मौत के आंकड़ों में बहुत बड़ा अंतर है.

गुजरात में कोरोना से 15934 लोग संक्रमित हैं. अब तक 980 लोगों की जान गई है जबकि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या शनिवार सुबह 17386 पहुंच गई. इसमें से 9142 सक्रिय मरीज हैं और 7846 लोग ठीक हुए. मरने वालों की संख्या 400 के करीब पहुँच चुकी है. यानी कोरोना की वजह से गुजरात में मौत का औसत 6.10 फीसदी है, तो दिल्ली में यह सिर्फ 1.92 फीसदी है. डॉक्टरों का कहना है कि दोनों राज्यों में संक्रमण बराबर होने के बाद भी दिल्ली में मौत कम होना यहां के लोगों में जागरूकता, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और ऑक्सिजन की उपलब्धता हो सकती है.

स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश में कोरोना वायरस मरीजों की संख्या 173763 हो गई है. शुक्रवार सुबह यह संख्या 1,65,799 थी. अभी तक 4971 लोगों की जान गई है. सभी राज्यों में सबसे अधिक महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के पॉजिटिव केस मिले हैं.

महाराष्ट्र में अब तक 62228 कोरोना केस सामने आ चुके हैं. इसमें से 33133 सक्रिय मामले हैं और 26997 लोग ठीक हो चुके हैं. वहीं, 2098 लोगों की जान गई है.

लचर स्वास्थ्य ढाँचे पर मूकदर्शक बने मीडिया प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम संदेश को चीख चीख कर अपने चैनलों पर प्रस्तुत किया, ढेरों प्राइम टाइम भी किये यहाँ तक कि लोकडाउन को मोदी का मास्टरस्ट्रोक बता दिया. प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्र के नाम संदेश में दिए गए भाषण में बोला था कि महाभारत का रण 18 दिनों में जीता और कोरोना से युद्ध 21 दिनों में जीत लेंगे. फिर नीति आयोग की ओर से एक ग्राफ जारी कर कहा गया कि 16 मई तक कोरोना के मामले शून्य हो जाएंगे, फिलहाल ऐसा नहीं हुआ.

सस्ती और जाली पीपीई किट, सवास्थ्य उपकरणों की कमी, अंतरराज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय लोगों को वापस लाना तथा प्रवासी मजदूरों के लगातार पलायन के चलते मामलों की संख्या दुगनी तेजी से बढ़ती रही. इस प्रकार प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा बिना प्लानिंग दिये गए वक्तव्य पर न किसी गोदी मीडिया एंकर और न ही किसी गोदी पत्रकार ने ये पूछा कि किस आधार पर ये बोला गया था या ऐसे ही जो समझ में आया बस बोल दिया. किसी आधार पर ही तो ग्राफ बनाकर तैयार किया होगा. और अगर वो रणनीति फेल हुई तो क्यों? और वो महाभारत वाला उदाहरण ऐसे ही देने के लिए दिया? अच्छा लगा था बोलते वक़्त इसलिए! शायद प्रधानमंत्री को भी पता है- बोल दो जो बोलना है, बोलने में क्या जाता है… अपने को कौनसा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जनता और पत्रकारों को जवाब देना है. शायद प्रधानमंत्री जी ये भी जानते हैं कि- मुझसे आखिर सवाल करने की हिम्मत करेगा कौन?

दुनियाभर में हर देश का मुखिया अपनी मीडिया के सामने आकर पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे हैं. अपनी रणनीति बता रहे हैं लेकिन यहां तो ऐसा कुछ होना नहीं है. इसलिए जो आकाशवाणी करनी है कर दो. बस बोलते वक़्त थोड़ा ‘जमना’ चाहिए. शब्दों में थोड़ा वजन मालूम होना चाहिए. फिलहाल सरकार का गंदा चेहरा छुपाने के लिए गोदी मीडिया लगातार मेहनत कर रहा है. शायद गोदी पत्रकार इस बात को अच्छी तरह समझ नहीं पा रहे हैं कि महामारी का मुकाबला मीडिया मैनेजमेंट से नहीं किया जा सकता वल्कि महामारी मैनेजमेंट से ही किया जा सकता है.

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मोहम्मद जावेद अलिग एक शौधार्थी व् सवतंत्र पत्रकार हैं.

One thought on “मीडिया मैनेजमेंट बनाम महामारी मैनेजमेंट- कौन किस पर भारी”

  1. सकारात्मक पतरकारिता
    सरकार अपनी नाकामी छिपाने में लगी है

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