रजत कुमार सोनकर (Rajat Kumar Sonkar)

हमारे दलित बहुजन समाज में बहुत से समाज सुधारक और जाति-विरोधी आंदोलनकारी हुए जिनके संघर्ष और विजय की अनगिनत कहानियाँ हम जानते है। इन सघर्षो की सबसे रोचक बात यह रही है कि इसमें बहुजन महिलाओं और पुरुषों दोनों ने ही कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया है। ये एक गर्व का विषय है. लेकिन आज भी हमारे समाज में ऐसे भी लोग हैं जो इस बात से अनजान हैं या उन्हें इस बात की गंभीरता का अंदाज़ा नहीं है. आज हम इसी समाज की एक ऐसी महिला के बारे में बात करेंगे। वो महिला जिसने दमन के सामने झुकने से इनकार कर दिया. यह महिला है फूलन मल्लाह.

फूलन मल्लाह की ज़िन्दगी हमारे समाज की हरेक महिला के लिए प्रेरणा का स्रोत है. उनके बारे में बहुजन समाज के सभी जनों को न केवल पता होना चाहिए बल्कि उससे शक्ति हासिल करने के मुकाम तक पहुंचना चाहिए.

फूलन का जन्म 10 अगस्त 1963 में गोरः का पुरवा नाम के एक छोटे से गांव में हुआ जो कानपूर उत्तर प्रदेश के जालौन ज़िले में पड़ता है। माता मूला और पिता देवी दीं मल्लाह की सबसे छोटी बेटी थी फूलन। चार बच्चों में सिर्फ फूलन और उनकी एक बहन ही जीवित रह पाई।

बचपन से ही फूलन में एक विद्रोही प्रवृति थी। यह प्रवृति उन्हें सही बात के पक्ष में मुखरता से बोलने में मदद करती थी। ग्यारह साल की उम्र में रिश्तेदारों से एक ज़मीनी विवाद में फूलन ने अगुआई करते हुए जब धरना दिया तब सबके होश उड़ गए। फूलन तब तक नहीं हटी जब तक फूलन पर हमला करके उसे बेहोश नहीं कर दिया गया।

ये लड़ाई फूलन पे शुरू होने वाली तमाम अत्याचारों और दुराचारो की सिर्फ एक झलक थी। ग्यारह साल की उम्र में ही उनकी शादी अपने से तिगुने बड़े आदमी से कर दी गयी। उनके पति ने उनके साथ हर तरह की बसलूकी करते हुए शारीरिक और मानसिक रूप से शोषित किया। फूलन ने कई बार घर छोड़कर भागने की कोशिश की पर अलग अलग वजहों से उन्हें सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। इन्हीं निराशाओ के बीच फूलन बुंदेलखंड के डाकुओ से रूबरू हुई। इस बारे में खुद फूलन का कहना है की -‘किस्मत को यही मंज़ूर था.’

डाकुओ के गैंग में शामिल होने के बाद भी फूलन पे होने वाले ज़ुल्म कम नहीं हुए। तथाकथित उच्च जाति वाले उस गैंग के मुखिया बाबू गुज्जर ने फूलन के साथ मार पीट कर उनका शारीरिक शोषण किया। उसी गैंग के एक विक्रम मल्लाह नामक डाकू से जब ये अपराध देखा नहीं गया तब उसने बाबू गुज्जर को मार फूलन को छुड़ाया और खुद उस गैंग का नया मुखिया बन गया. इसी कड़ी में उसी गैंग के दो राजपूत भाइयो को जब ये बात पता लगी तो जेल से निकलते ही वे फूलन और विक्रम के पास पहुंचे। उन दोनों ने फूलन पे इसका दोष डालने की कोशिश की, जिसके फलस्वरूप फूलन ने उन्हें कड़े शब्दों में डटकर जवाब दिया। विक्रम मल्लाह ने भी फूलन का समर्थन किया। ये बात उन दोनों राजपूत भाइयो को चुभने लगी कि ‘नीच’ जाति के फूलन और विक्रम उनसे आँख में आँख मिलाकर लड़ रहे है। इस जातिगत विवाद के कारण दोनों पक्षों में खूंखार लड़ाई हुई जिसमे विक्रम मल्लाह मारा गया। परिणाम स्वरुप फूलन को बंदी बना लिया गया। उन्हें बेहमई गांव लाया गया जहाँ तीन हफ्तों तक राजपूतो ने उनके साथ बलात्कार किया. मानवता को अभी और अधिक तार तार होना था. शोषण यहीं समाप्त नहीं हुआ. फूलन को पुरे गाँव में बिना कपड़ों के घुमाया गया।

किसी तरह फूलन वहाँ से भागने में सफल रही। इतना सब सहने के बावजूद फूलन ने हार मानने से इंकार कर दिया और एक नयी शुरुआत करने का निर्णय लिया। उन्होंने एक बार फिर अपने बल पर एक डाकू गैंग खड़ा किया और फरवरी 14, 1981 को वो काम किया जिसने सबकुछ बदल कर रख दिया। उस शाम वो अपने गैंग के साथ बेहमई पहुँची जहाँ फूलन देवी ने बाईस राजपूत आदमियों को एक कतार में खड़ा कर मौत के घाट उतार दिया। ये फूलन देवी का समाज में पनपने वाले जाति के गुमान में बर्बर हो चुके अत्याचारियों को एक सन्देश था। इस घटना के बाद फूलन ने राष्ट्रीय और अंतराष्टीय स्तर चर्चा में आ गई.

जब ऐसी घटनाएँ घटती हैं तब जातीय समाज में लकीर खिंच जाती है या यूं कहें कि पहले से ही बनी लकीरें और गाढ़ी हो जाती हैं. सवर्ण समाज को ऐसे में कानून हाथ में लेने की असभ्यता नज़र आती है जबकि फूलन देवी को यह बेलगाम जातिवाद और दमन के खिलाफ आखिरी रास्ता लगा. सवर्ण जुर्म करते हुए या देखते हुए कानून और संविधान के आईने में नहीं देखते. बहुजनों के लिए बेहमई काण्ड एक न्याय है, खासतौर पर उस कोण से जब न्याय की सारी व्यवस्थाएं बहुजनों के लिए काम करने से इनकारी हो जाएँ.

इसके पश्चात् उनको पकड़ने के लिए पूरा तंत्र सक्रिय हो गया. बहुत कम लोग जानते हैं कि कांशी राम जी ने फूलन देवी के आगे के जीवन को प्लान किया. आत्मसमर्पण के लिए माहौल बनाया और फिर राजनीति में प्रवेश करवाया. साहेब जानते थे कि फूलन को जिंदा नहीं छोड़ा जायेगा. फूलन देवी की उम्र उस वक़्त बीस साल थी जब उन्होंने अपने साथियो के समेत आत्मसमर्पण किया. फूलन देवी ग्यारह साल जेल में अंडर ट्रायल रही। 1994 में समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके ऊपर लगे सभी मामलों से उन्हें बरी कर दिया। फूलन अंतराष्ट्रीय स्तर पर जानी और पहचानी जाने लगी और इसी सन्दर्भ में अलग अलग मंचो और स्थानों से उन्होंने बहुजनों और अल्पसंख्यकों की एकता की बात के महत्त्व पर ज़ोर दिया.

फरवरी 15, 1995 को फूलन देवी ने अपने पति सहित ऐतिहासिक दीक्षाभूमि में बौद्ध धर्म अपनाया। नारी सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय और जाति उन्मूलन के सदर्भ में फूलन देवी का एहम और गंभीर योगदान रहा है। उन्होंने आगे चलकर बारह साल की एक मुस्लिम लड़की को गोद लिया. फूलन ने ‘एकलव्य समाज’ की स्थापना कर मल्लाह समाज (जिन्हे निषाद के नाम से भी जाना जाता है ) की बेहतरी का बीड़ा उठाया था।

26 जुलाई, 2001 को फूलन देवी की उनके घर के बाहर एक कथित राजपूत आदमी ने हत्या कर दी। हत्यारे का ये कहना था कि उसने बेहमई के अपने राजपूत भाईयों की मौत का बदला लिया है।

जाति और जातिगत हिंसा ने हमारे समाज का दम हमेशा से घोंटा है. सवर्ण मानसिकता न्याय और मानवीय कसौटी को नहीं देखती. राजपूत समाज की महिलाओं ने भी फूलन देवी की शहादत पर जश्न मनाया. आज जहाँ आये दिन दमन के चक्र हर तरफ पसरे हुए हैं. आवाजों पर पहरे लग रहे हैं. ऐसे दौर में वीरांगना फूलन देवी का जीवन और उनका साहस रौशनी का स्रोत है. ऐसी बहुजन वीरांगना को उनकी सत्तावनवीं वर्षगांठ पर श्रद्धांजलि और बहुजन समाज को ढेरों बधाईयाँ!!

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रजत कुमार सोनकर, लॉ कॉलेज दिल्ली से वकालत की पढ़ाई कर रहे हैं.

One thought on “वीरांगना फूलन देवी का स्मरण प्रतिदिन करना चाहिए”

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