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एक कोइतूर बच्चे ने कहा- मुझे डॉक्टर बनना है

sanjay Shraman Jothe

एक संकल्प, एक सपने और एक वादे की दास्तान डॉ.सूर्या बाली

संजय श्रमण जोठे (Sanjay Shraman Jothe)

इस प्रेरणादायी कहानी में आपका स्वागत है। यह कहानी ट्राइबल (कोइतूर) समाज से आने वाले एक ऐसे व्यक्ति के बारे में है जिसने ग़रीबी और जातिगत घृणा के बीच जन्म लिया, जीवन भर ग़रीबी और जातिवादी नफ़रत और हिंसा का सामना किया। इस व्यक्ति ने जीवन के हर मोड़ पर अपनी मेहनत, जज़्बे और दृढ़ निश्चय के साथ हर चुनौती का सामना किया। यह व्यक्ति उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव से शुरुआत करते हुए अंततः अमेरिका स्थित फ़्लोरिडा यूनिवर्सिटी मे पढ़ने पहुँचा। यह कहानी हमें सिखाती है कि भारत जैसे अविकसित, जातिवादी और असभ्य समाज में एक ट्राइबल परिवार में जन्म लेना और शिक्षा सफलता और आत्मसम्मान प्राप्त करने की यात्रा कितनी कठिन होती है। साथ ही यह कहानी हमें यह भी बताती है कि तमाम मुश्किलों के बावजूद अगर आपके अंदर जोश है, लगन है और आपके दिल में कोई एक उद्देश्य है तो आपका रास्ता कोई नहीं रोक सकता। यह कहानी डॉ.सूर्या बाली की कहानी है जिन्होंने ग़रीबी और जातीय नफ़रत के वातावरण में रहते हुए ना केवल मेडिकल डॉक्टर बने बल्कि अमेरिका में उच्च अध्ययन करके आजकल आल ‘इंडिया इन्स्टिटूट आफ मेडिकल साइंस में अध्यापन’ कर रहे हैं।

डॉ. सूर्य बाली

इस देश मे गरीब और छोटी जाति का होना एक बहुत बड़ा अभिशाप है। डॉ.बाली को बचपन में ही बार-बार यह एहसास दिलाया जाता था कि वे तथाकथित ऊंची जाति के कथित सभ्य लोगों से अलग हैं। उन्हें बार-बार बताया जाता था कि जीवन में आगे बढ़ने का या खुशियां पाने का या फिर एक सम्मानजनक जीवन जीने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। भारत के प्राचीनतम एवं पहले धर्म “कोया पुनेम” की शिक्षाओं में पले-बढ़े डॉ बाली को बचपन में यह समझ ही नहीं आता था कि एक सभ्य समाज में कोई इंसान दूसरे इंसान से उसकी जाति की वजह से नफ़रत कैसे कर सकता है? महान कोइतूर संस्कृति एवं कोया पुनेम धर्म में जाति और वर्ण जैसी मनुष्यता विरोधी धारणा नहीं होती है, इसीलिए एक कोया-पुनेमी बालक को जातिवादी समाज में जीना सीखने में बहुत तकलीफ़ों से गुज़रना पड़ा।

इस सबके बावजूद डॉ.बाली बचपन से ही अपने दिल में एक बड़े सपने को लेकर आगे बढ़ते रहे और उन्होंने अपने जीवन में बड़ी-बड़ी सफलताएं हासिल कीं। इन सबसे गुजरते हुए डॉ.बाली ने जीवन, समाज, सभ्यता और धर्म के बारे में जो सीखा उसका वे एक नए ढंग से नयी भाषा में प्रचार भी कर रहे हैं। वे आजकल सभी को यह बता रहे हैं कि जीवन में मनुष्य का संकल्प और नजरिया ही सब कुछ है, महान कोया पुनेमी धर्मगुरु परम पावन लिंगो बाबा ने “निंगा” अर्थात दृष्टि को ही सृष्टि माना है। परम पावन लिंगो बाबा कहते हैं कि जैसी दृष्टि होगी वैसी ही सृष्टि होगी। इसलिए जीवन मे आने वाली चुनौतियों को और संघर्ष को आप किस तरह देखते हैं इसी से आपकी सफलता और असफलता तय होती है। अगर आपके पास एक सपना और लगन है तो आप अपना भाग्य खुद लिख सकते हैं।

अपने महान कोया पुनेमी धर्म का पालन करने वाले और गाँव में ‘सूरज’ के नाम से पुकारे जाने वाले एक ग़रीब बच्चे के ‘डॉ.सूर्या बाली’ बनने की कहानी इस देश के अन्य डॉक्टर्स की कहानी से बिलकुल अलग है। डॉ.बाली की यह कहानी एक मां और बेटे के बीच घटित हुए एक अटूट प्रेम की कहानी है। यह कहानी उस बेटे की कहानी है जो अपनी मां की पीड़ा और तकलीफ को हमेशा अपने दिल में महसूस करता रहा है। यह कहानी एक मां से एक बेटे के वादे की कहानी है। एक ऐसा वादा जिसके साथ एक बहुत बड़ा सपना, कठोर मेहनत, अदम्य साहस, लगन और चुनौतियों से टकराने का जोश और जुनून जुड़ा हुआ है। असल में यह कहानी गरीबी और अभावों से लड़ते हुए अपने जीवन मे कुछ असामान्य हासिल कर लेने की कहानी है। यह कहानी कोया मूरी दीप रूपी एक माँ से एक कोयावंशी सपूत के वादे की कहानी है। यह कोयावंशी बेटा अपनी मातृभूमि की गोद में दम तोड़ चुके कोयामूरी दीप के महान वैभव को फिर से ज़िन्दा करने का एक संकल्प, एक सपना और एक वादा लिए हुए आज भी आगे बढ़ रहा है।

डॉ.सूर्या बाली का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक ऐसे गांव में हुआ था जहां तक पहुंचना भी बहुत मुश्किल हुआ करता था। एक ग़रीब और पिछड़े गाँव में एक गोंड कोइतूर परिवार में जन्म लेने के बाद उनका संघर्ष आरंभ होता है। वे सिर्फ दस साल के थे जबकि उनकी आँखों के सामने उन्होंने अपने छोटे भाई को अपनी माँ की गोद में दम तोड़ते देखा था। उस समय माँ को पता नहीं था कि उनके घर के इस नन्हें राजकुमार को क्या हुआ है? वे लोग समझ नहीं पा रहे थे कि हमारे साथ यह भयानक घटना क्यों घट रही है? उस महान पीड़ा और निराशा की घड़ी में डॉ.सूर्या बाली ने अपनी माँ के आँसू पोछते हुए माँ से एक बहुत बड़ा वादा किया था कि ‘मैं एक दिन बड़ा होकर डॉक्टर बनूँगा।’

डॉ.सूर्या बाली जब अपनी माँ की गोद में तड़पते हुए अपने भाई को देख रहे थे तब वे यह भी देख रहे थे कि एक ऊँची जाति का डॉक्टर उनके भाई का इलाज नहीं कर रहा है। उस समय डॉ.सूर्या बाली का बालक-मन अपनी मासूम-सी ज़ुबान में अपनी रोती हुई मां को बार-बार दिलासा देते रहे कि ‘मां तुम चिंता मत करो मैं एक दिन बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा और सब का इलाज करूंगा’। डॉ.सूर्या बाली उस समय प्राइमरी स्कूल में पढ़ रहे थे। उस समय ख़ुद डॉ.सूर्या बाली को या उनके परिवार के किसी सदस्य या दूर के रिश्तेदार को भी यह नहीं मालूम था कि डॉक्टर किस तरह बना जाता है या फिर डॉक्टर बनने के लिए किस तरह की पढ़ाई की जाती है। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने तय कर लिया था कि मुझे डॉक्टर ही बनना है, चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े।

उस समय उनका परिवार बहुत ग़रीबी से गुज़र रहा था, उनके परिवार में घर का ख़र्च चलाने के लिए कड़ा संघर्ष करना होता था। उनकी माताजी उस समय गांव के ऊंची कही जाने वाली जाति के लोगों के घरों में काम करती थी। उस समय उनके परिवार में दो वक्त की रोटी जुटाना भी एक बहुत बड़ी बात हुआ करती थी। डॉ.बाली ख़ुद अपनी उस छोटी सी उम्र में भी घर का ख़र्च चलाने के लिए मेहनत मज़दूरी करते थे। वे अपने पिताजी की साइकिल रिपेयरिंग की छोटी सी दुकान में काम किया करता थे,इसके अलावा वे चाय की दुकान में कप और प्लेट भी साफ किया करते थे।

डॉ.सूर्या बाली के बचपन में उनकी ग़रीबी और छोटी जाति को देखकर ऊंची जाति के लोगों ने उन्हें गांव के मिडिल स्कूल में दाखिला नहीं लेने दिया। इस कारण डॉ.बाली को अपने गांव से ग्यारह किलोमीटर दूर दूसरे स्कूल में पढ़ाई के लिए जाना पड़ा। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए वे रोज ग्यारह किलोमीटर आते और जाते थे। उस गांव में इन सारी समस्याओं के बीच बड़े होते हुए डॉ.बाली ने अनुभव किया कि शिक्षा ही एकमात्र वह चीज है जो उनका जीवन बदल सकती है। इसके बाद डॉ.बाली ने बड़ी मुश्किलों से बहुत सारे जतन करते हुए अपने गांव में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की, उन्हें अपने गांव में और उस स्कूल में हमेशा छोटी जाति और गरीबी के कारण परेशान किया जाता था, हर मोड़ पर हर बात में उनका अपमान किया जाता था। गांव के लोग हों, या उनके क्लास के अन्य ऊँची जाति के बच्चे हों, या उनके स्कूल के टीचर हों, वे सब किसी ना किसी तरीके से डॉ.बाली की गरीबी और छोटी जाति का मजाक उड़ाते थे। उन लोगों का मजाक सुनकर और अपमान सहकर डॉ.बाली का संकल्प और मजबूत होता था,और वे उन लोगों से बार-बार कहते थे “एक दिन मैं जरूर डॉक्टर बनकर दिखाऊंगा”, डॉ.बाली के इसी संकल्प ने उन्हें और उनकी शिक्षा के प्रति लगन को जिंदा रखा। उन्होंने ठान लिया था कि उन्होंने अपनी माँ से बचपन में जो वादा किया है वह वादा वे जरूर पूरा करेंगे।

 डॉ.बाली के जीवन में टर्निंग प्वाइंट तब आया जब कि उन्होंने कक्षा बारहवीं में पूरे स्कूल में टॉप किया। इस सफलता से उनका और उनके परिवार का उत्साह बहुत बढ़ गया था और सबको लगने लगा था कि अब सफलता बहुत नज़दीक है। इस सफलता और उत्साह के बीच भी हालांकि उन्हें मालूम नहीं था कि डॉ.बनने के लिए आगे क्या करना है। डॉ.बाली ख़ुद यह सोचते रहते थे कि अब मैं किसी मेडिकल कॉलेज में जाऊंगा और वहां पढ़ाई करना शुरू कर दूंगा। उस समय उन्हें कुछ भी पता नहीं था कि डॉक्टर बनने के लिए उन्हें क्या करना होगा किस तरह की पढ़ाई करनी होगी और किन संस्थाओं में जाना होगा। बदकिस्मती से उस समय उन्हें रास्ता दिखाने वाला या समझाने वाला कोई नहीं था।

इसलिए एक रात डॉ. बाली दो जोड़ी कपड़े और ढाई सौ रुपए इकट्ठे करके परिवार को सोता हुआ छोड़कर चुपचाप अपने घर से निकल गये। उस दिन वे एक मेडिकल कॉलेज देखना चाहते थे जहाँ पर डॉ.बनने की पढ़ाई करवाई जाती थी। उस दिन सुबह-सुबह सुल्तानपुर रेलवे स्टेशन पहुंचकर उन्होंने वहां प्लेटफार्म पर टहल रहे एक आदमी से पूछा कि डॉक्टर बनाने वाला कॉलेज कहां है? उस आदमी ने कहा कि डॉक्टरी की पढ़ाई करवाने वाले कॉलेज लखनऊ और इलाहाबाद में होते हैं। यह बात सुनकर डॉ.बाली उसी दिन लखनऊ की ट्रेन पकड़कर निकल पड़े। उन्होंने बचपन में अपने दादाजी से परम पावन लिंगो बाबा की कहानियाँ सुनीं थीं। वे कहानियाँ बताती हैं कि जंगल में भले ही अँधेरा हो लेकिन दिल में अगर संकल्प की रोशनी है तो फिर कितना भी घना जंगल हो, उसमें से रास्ता निकल ही आता है। लिंगो बाबा की इस सीख पर भरोसा रखते हुए डॉ.बाली ने चारबाग रेलवे स्टेशन पर उतरकर उन्होंने मेडिकल कॉलेज का पता पूछा और पैदल ही किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज की तरफ निकल पड़े। उन्हें याद था कि डॉक्टर लोग एक लंबा और सफेद चोगा पहनते हैं। वे वहाँ सफेद चोगा पहने किसी डॉक्टर से मिलना चाहते थे जो उन्हें समझा सके कि वे भी कैसे डॉक्टर बन सकते हैं।

डॉ. बाली ने बचपन से ही एक कठिन जीवन और चुनौतियों का सामना किया है। छोटे से गाँव में जहाँ सब लोग एक दूसरे से जाति के आधार पर नफ़रत करते थे, वहाँ समय पर मार्गदर्शन देने वाले लोग नहीं मिलते। इसके विपरीत अपमान करने वाले और उत्साह कम करने वाले लोग क़दम क़दम पर मिलते थे। डॉ. बाली ने अनुभव किया कि जीवन में हम सबको ऐसे लोग मिलते हैं जो हमें अयोग्य और कमतर समझते हैं, लेकिन इसी के साथ हमे कुछ ऐसे लोग भी मिलते हैं जो हमारा उत्साह बढ़ाते हैं, ऐसे लोग हमारे भीतर छुपी प्रतिभा और ताकत को पहचानते हैं।

डॉ. बाली जब लखनऊ मेडिकल कॉलेज पहुँचे तो उन्होंने वहां के लोगों से पूछा ‘मुझे बताइए डॉक्टर कैसे बनते हैं’। उनका यह सवाल सुनते ही वहाँ खड़े लोगों ने उन्हें सिर से लेकर पैर तक बार-बार देखा और उनके गंदे और फटे कपड़े देखकर हंसने लगे। उनकी हंसी देखकर डॉ. बाली उदास हो गये और वहीं खड़े खड़े रोने लगे। उसी वक्त एक अन्य मेडिकल स्टूडेंट वहां से गुजर रहा था उसने यह सब जब अपनी आँखों के सामने देखा तो उसने आकर कुछ सम्मान और सहानुभूति से बात की और डॉ.बाली को जानकारी दी ‘डॉक्टर बनना इतना आसान नहीं होता उसके लिए कोचिंग करनी पड़ती है बहुत तैयारी करनी पड़ती है, मेडिकल कालेज मे प्रवेश की परीक्षा पास करनी होती है इसके बाद मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेकर पाँच साल तक डॉक्टरी की पढ़ाई करनी होती है।’ इतनी सी जानकारी जुटाने की यह पूरी घटना बहुत ही अपमानजनक थी लेकिन इससे गुजरते हुए डॉ. बाली को अपने काम की चीज मिल गई थी।

लखनऊ में इस तरह तीन दिन बिताने के बाद डॉ.बाली इलाहाबाद के मेडिकल कॉलेज पहुँचे। इस दौरान जितने भी दिन वे घर से बाहर रहे वे रात में प्लेटफार्म पर भूखे ही सोते थे। उस समय उनकी स्थिति इतनी ख़राब थी कि वे दिन में एक बार ही खाना खा सकते थे। फिर 6 दिन के भीतर ही सारे पैसे ख़त्म हो गये और उन्हें वापस लौटकर अपने घर जाना पड़ा। उस समय उनके बड़े भैया परिवार की मदद कर रहे थे। बड़े भैया मुंबई में टैक्सी ड्राइवर थे और हर महीने अपना पेट काटकर थोड़ा सा पैसा गाँव में अपने परिवार के घर खर्च और डॉ.बाली की पढ़ाई के लिए भेजते रहते थे। इस तरह अपने बड़े भैया की मदद से डॉ.बाली ने स्कूल और मेडिकल कालेज की पढ़ाई की।

जब डॉ.बाली को समझ में आया कि स्कूल के बाद मेडिकल कालेज में एडमिशन लेने के लिए प्रवेश परीक्षा देनी होती है तब उन्होंने उस परीक्षा की तैयारी की। फिर अगले साल नियत समय पर वह परीक्षा दी और इलाहाबाद मेडिकल कालेज में उन्हें एमबीबीएस मे प्रवेश मिला। मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेना और वहां पढ़ाई करना उनके लिए आसान नहीं था. वे बचपन से ही सरकारी हिंदी मिडियम स्कूल में पढ़े थे और उन्हें इंग्लिश नहीं आती थी। वे एक मज़दूर और गरीब परिवार में पैदा हुए थे इसलिए भयानक ग़रीबी के कारण उनके पास उस समय अच्छे कपड़े भी नहीं थे। इस कारण मेडिकल कॉलेज में उनकी भाषा सुनकर और उनके कपड़े देखकर ऊँची जाति के हिंदू लड़के-लड़कियाँ और प्रोफ़ेसर्स उनका अपमान करते थे और उनका मज़ाक़ उड़ाते थे।

उस समय मेडिकल कालेज की पढ़ाई हालाँकि बहुत सस्ती थी लेकिन फिर भी पढ़ाई सहित होस्टल और भोजन का ख़र्चा उठाना भी डॉ.बाली के लिए एक कठिन चुनौती थी। उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए अन्य बच्चों के घर जाकर ट्यूशन पढ़ाई, ऑल इंडिया रेडियो के लिए प्रोग्राम किए, अख़बारों में आर्टिकल लिखे और इस तरह से बड़ी मुश्किल से पढ़ाई जारी रखी। कई बार अपनी गरीबी और लोगों द्वारा अपमान किए जाने के कारण वे हिम्मत हार जाते थे और सोचते थे कि उन्हें मेडिकल कालेज की पढ़ाई छोड़ देनी चाहिए। ऐसा विचार आते ही अचानक डॉ.बाली के मन में अपनी माँ की गोद में मरते हुए भाई की तस्वीर बिजली की तरह कौंध जाती थी। उन्हें अपनी माँ से किया गया वादा याद आता था कि उन्हें बड़े होकर डॉ.बनना है। उसी वादे ने उन्हें बार-बार हौसला दिया और उन्होंने हजारों कठिनाइयों के बावजूद मेडिकल कॉलेज में अपनी पढ़ाई जारी रखी।

एक ग़रीब और छोटी जाति के परिवार के बच्चे के लिए एमबीबीएस में एडमिशन मिलना बहुत बड़ी बात थी। एडमिशन लेने के बाद डॉ.बाली अपनी मां से मिलने गए। गाँव जाकर डॉक्टरों वाला सफेद चोगा पहन कर उन्होंने अपनी माँ के पैर छुए और उन्हें कहा कि मैं अब जल्द ही डॉ.बनने वाला हूं। यह सब देख-सुनकर उनकी माँ का खुशियों का ठिकाना नहीं रहा और वह खुशी के मारे फिर से रो पड़ीं। डॉ.बाली ने अपनी मां से जो वादा किया वह पूरा होने वाला था। इसी वादे के अनुसार अब उन्हें अपने ही जैसे गरीब लोगों का इलाज करना था ताकि कोई ग़रीब बच्चा अपनी माँ की गोद में इलाज के अभाव में न मर जाए। इसके लिए डॉ.बाली ने इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज के आसपास झुग्गी-बस्तियों में लोगों की सेहत से जुड़ी समस्याओं पर काम करना शुरू कर दिया। डॉ.बाली ने उस समय ‘ग्लोबल हेल्थ डेवलपमेंट मिशन’ नाम के एक एनजीओ के माध्यम से गरीब लोगों की मदद करना जारी रखा।

इसी दौरान डॉ. बाली के एक ब्राह्मण सहपाठी ने उन्हें चुनौती दी कि तुम पोस्ट ग्रेजुएशन की परीक्षा पास करके बड़े और अमीर डॉ. नहीं बन सकते, इसीलिए तुम इन गरीब लोगों के बीच में बैठे रहते हो। डॉ.बाली ने उस ब्राह्मण की यह चुनौती स्वीकार की और उसके सामने फिर कसम खाई कि ‘मैं तुम्हें मेडिसिन में पोस्ट ग्रेजुएट’ होकर भी दिखाऊंगा। उसके सामने यह वादा करके डॉ.बाली ने पोस्ट ग्रेजुएशन की तैयारी के लिए पढ़ाई शुरू कर दी। इस परीक्षा में भी वे आसानी से पास हो गये इस तरह उन्हें उसी मेडिकल कॉलेज में एमडी मे एडमिशन मिल गया। इसके बाद वे वहीं पर एक जूनियर रेजिडेंट की तरह काम करने लगे. अब उन्हें एक सम्माजनक तनख्वाह भी मिलने लगी। इस दौरान भी डॉ.बाली उन सभी लोगों से मिलते रहे जो उन्हें उनकी गरीबी और जाति के कारण कमतर समझते थे। इन लोगों से मिलकर वे उनकी संस्कृति और धर्म में छुपी नफ़रत और अनैतिकता का अध्ययन करते थे और अपने पूर्वजों के महान कोया-पूनेम धर्म को समझने का भी प्रयास करते थे।

surya bali 2उस समय मेडिकल कॉलेज में एक ब्राह्मण प्रोफेसर थी जो डॉ.बाली की ग़रीबी और उनकी जाति से बहुत नफरत करती थी। वह सबके सामने उनके बारे में एक गंदी और जातिवादी कहावत कहती थी “अधम जाति में विद्या पाए, भयहु यथा अहि दूध पिलाए”। इस कहावत का मतलब यह होता है कि ‘एक नीची जाति के व्यक्ति को शिक्षा देने का मतलब है जहरीले सांप को दूध पिलाना।’ वह ब्राह्मण प्रोफेसर बहुत ही बदतमीजी से सबके सामने उनका अपमान किया करती थी। लेकिन डॉ.बाली भी बहुत जिद्दी इंसान रहे हैं, विशेष रूप से जब भी उनका अपमान होता है तब उनके अंदर का संकल्प और अधिक मज़बूत होने लगता है। उनकी एमडी की पढ़ाई के तीन सालों के दौरान इस ब्राह्मण महिला प्रोफ़ेसर ने उनका बहुत अपमान किया। हर बार अपमान होने पर वे सोचते थे कि वे भी एक दिन इसी महिला प्रोफेसर की तरह खुद मेडिकल प्रोफेसर बन के किसी बड़े मेडिकल कॉलेज में अध्यापन करेंगे। कुछ सालों बाद ऐसा ही हुआ और डॉ.बाली जल्द ही असिस्टेंट प्रोफेसर बन गये और इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज में उसी ब्राह्मण महिला प्रोफ़ेसर के साथ असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में उसी डिपार्टमेंट में पढ़ाने लगे।

लेकिन डॉ.बाली के सपने यहीं तक सीमित नहीं थे। उनके दिल में अपने जीवन में अपने लिए ही नहीं बल्कि अपने कोइतूर भाई बहनों के लिए बहुत कुछ करने का संकल्प बचपन से ही जन्म ले चुका था। वे चाहते थे कि पब्लिक हेल्थ के क्षेत्र में पॉलिसी लेवल पर कुछ बड़े हस्तक्षेप किए जाएँ जिनके ज़रिए एक अस्पताल के मरीज़ों को नहीं बल्कि पूरे देश के मरीज़ों और नागरिकों की मदद की जा सके। एक अच्छी बात यह हुई कि इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज में अध्यापन करते समय उन्हें ‘फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फैलोशिप प्रोग्राम’ के बारे में पता चला। उन्होंने इस फ़ेलोशिप के लिए अप्लाई किया और सिलेक्शन की कठिन प्रक्रिया के सभी चरणों से गुजरते हुए वे फेलोशिप पाने में सफल रहे। इस फेलोशिप के जरिए उन्होंने अमेरिका में ‘मास्टर्स इन हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन’ की डिग्री की पढ़ाई करने का मौका मिला। यह एक बहुत ही कठिन और महंगी डिग्री है जो भारत में बहुत कम लोगों के पास होती है।

लेकिन एक छोटी जाति के सफल इंसान के लिए भारत जैसे समाज में सम्मानित होना इतना आसान नहीं है। डॉ.बाली की इन सफलताओं के बावजूद, उनके आस-पास कुछ लोग ऐसे थे जो कि हमेशा उनसे नफरत ही करते थे। आज का भारत महान कोया-पुनेमी धर्म को भूल चुका है इसीलिए आज भारत के नागरिक जाति और वर्ण के झगड़ों में फँस गये हैं। ऐसे नफ़रती-लोग किसी ना किसी तरह से डॉ.बाली को परेशान करने और नुकसान पहुंचाने की कोशिश किया करते थे। लेकिन डॉ.बाली ने हर मोड़ पर सफलता से इन चुनौतियों का सामना किया और परम पावन लिंगो बाबा की शिक्षा को एकबार फिर से सही सिद्ध करके दिखा दिया। हमारे पूज्य लिंगो बाबा कहते हैं कि जैसे नर्मदा नदी की तेज़ धार को कोई पहाड़ नहीं रोक सकता उसी तरह अगर हमारा इरादा अटल है और हमारा लक्ष्य साफ है तो हमें कोई इंसानी साज़िश नहीं रोक सकती। डॉ.बाली की उस ब्राह्मण प्रोफ़ेसर ने पूरी कोशिश की कि वे अमेरिका पढ़ने न जा सकें, लेकिन अपनी लगन और साहस के बल पर वे अमेरिका जाकर अपनी डिग्री कंप्लीट कर सके।

डॉ.बाली ने अपने जीवन के दो साल अमेरिका में गुजारे और वहां के अकादमिक जीवन और सामाजिक जीवन को गहराई से देखते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की। यह एक ऐसी पढ़ाई थी जिसके बारे में एक सामान्य डॉ.कल्पना भी नहीं कर सकता है। गांव का एक गरीब लड़का जिसे इंग्लिश बोलनी भी नहीं आती थी, जिसके कपड़ों और जाति को देखकर लोग हँसते थे, जिसे चाय की दुकान मे मजदूरी करते देखकर लोग उसका मजाक उड़ाते थे, वह लड़का आखिरकार अमेरिका की सुप्रसिद्ध फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित पब्लिक हेल्थ कॉलेज में पहुंचकर ‘मास्टर्स इन हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन’ की डिग्री हासिल करता है। डॉ.बाली की सफलता की इस कहानी के माध्यम से हम आपको यह बताना चाहते हैं कि अगर डॉ.बाली ऐसा कर सकते हैं तो भारत के ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति के सभी कोइतूर बच्चे भी ऐसा कर सकते हैं।

डॉ.बाली के मन में एक सपना था, एक संकल्प था और अपनी माँ से किया हुआ एक वादा था जिसे किसी भी सूरत में पूरा करके दिखाना था। ठीक एसा ही संकल्प, सपना और वादा आपके मन में है तो आपको सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। डॉ.बाली आज ‘ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, भोपाल’ में एडिशनल प्रोफेसर के पद पर अध्यापन एवं रिसर्च सहित भारत के ग़रीब मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं। डॉ.बाली ने अपनी इस नौकरी के दौरान बहुत सारे प्रोजेक्ट्स में बहुत सारे शोध कार्य भी किए हैं। उन्होंने  राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत सारे रिसर्च पेपर लिखे हैं। गरीब लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े हुए एवं पब्लिक हेल्थ के मुद्दों पर बहुत सारे रिसर्च रिपोर्ट एवं आर्टिकल्स लिखे हैं। डॉ.बाली आज न केवल एक सफल डॉक्टर, प्रोफ़ेसर और शायर हैं बल्कि वे अपनी पूर्वजों की महान विरासत को सामने लाकर भारत के करोड़ों ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों को अपनी मूल भारतीय संस्कृति से जोड़ने का काम भी कर रहे हैं। एक मेडिकल प्रोफ़ेसर की तरह अध्यापन करते हुए वे भविष्य के डाक्टर्स भी तैयार कर रहे हैं।

अपनी पढ़ाई एवं प्रोजेक्ट की सफलताओं के बाद उन्होंने बहुत सारे पुरस्कार हासिल किए हैं। देश विदेश में अनेक मंचों से उन्हें बहुत सारे सम्मान पत्र मिले हैं। साइंस और टेक्नोलॉजी की दुनिया में दुनिया में कौन क्या है से संबंधित किताब में उनका नाम है, उन्हें “अनस्टॉपेबल इंडियन” का खिताब मिला है, राष्ट्रीय स्तर का कालू राम मेमोरियल अवार्ड और रितु सिंह मेमोरियल अवॉर्ड मिला, इसके अलावा गोंडवाना गौरव पुरस्कार भी उन्हें प्राप्त हुआ है। यह सब उनके रिसर्च एवं अध्यापन के काम के लिए उन्हें हासिल हुआ है।

डॉ. बाली की यह छोटी-सी लेकिन बहुत प्रेरणादायी कहानी जानने के बाद आप सब समझ सकते हैं कि जब आप अपने सपनों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ते हैं तो आपको बहुत तकलीफ़ों से गुजारना होता है। जितने बड़े आपके सपने होते हैं उन्हें पूरा करने के लिए उतनी ही ज्यादा तकलीफ आपको उठानी होगी। लेकिन इसके बावजूद जिंदगी में कुछ भी नामुमकिन नहीं है। अगर आपके मन में एक ठोस सपना है, आपके दिल में कुछ कर गुजरने का जज़्बा है तो हजारों तकलीफों के बावजूद जिंदगी में आपके लिए रास्ते खुलने लगेंगे। आपको बस दो ही काम करने होते हैं। अपना लक्ष्य ठीक से तय करना और ईमानदारी से उसके लिए मेहनत करना।

भारत की कोया पुनेमी संस्कृति के महान धर्म गुरु,परम पावन बाबा पारी पहांदी कुपार लिंगो के शब्दों में कहें तो एक बीज को पेड़ बनकर आसमान की ऊँची तक पहुँचने में बहुत संघर्ष करना होता है। परम पावन लिंगो बाबा कहते हैं कि एक छोटा सा बीज मिट्टी की गहराई के अंधकार से, पानी के बहाव से, सूरज की तपिश से और हवा के ज़ोर से बहुत डरता है। लेकिन वही बीज जब अपना संकल्प मज़बूत करके पहला अंकुर पैदा कर लेता है तो वही मिट्टी, पानी, धूप और हवा उसे पोषण देकर आसमान की ऊँचाई तक ले जाते हैं। डॉ.बाली का जीवन हमें बताता है कि परम पावन लिंगो बाबा की शिक्षा आज भी धरती पर मनुष्य जीवन के लिए सर्वाधिक उपयोगी शिक्षा है। अब समय आ गया है कि इस शिक्षा को पूरे भारत को फिर से अपनाना चाहिए।

इस कहानी के अंत में डॉ.बाली के लिखे हुए एक शेर पर ग़ौर करना चाहिए।

“अगर हो हौसला दिल में तो मंजिल मिल ही जाती है!
जो मौजें सर पटकती हैं किनारे टूट जाते हैं !!”

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संजय श्रमण जोठे एक स्वतन्त्र लेखक एवं शोधकर्ता हैं। मूलतः ये मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं। इंग्लैंड की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन मे स्नातकोत्तर करने के बाद ये भारत के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे हैं। बीते 15 वर्षों मे विभिन्न शासकीय, गैर शासकीय संस्थाओं, विश्वविद्यालयों एवं कंसल्टेंसी एजेंसियों के माध्यम से सामाजिक विकास के मुद्दों पर कार्य करते रहे हैं। इसी के साथ भारत मे ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातियों के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक अधिकार के मुद्दों पर रिसर्च आधारित लेखन मे सक्रिय हैं। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब वर्ष 2015 मे प्रकाशित हुई है और आजकल विभिन्न पत्र पत्रिकाओं मे नवयान बौद्ध धर्म सहित बहुजन समाज की मुक्ति से जुड़े अन्य मुद्दों पर निरंतर लिख रहे हैं।  

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