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जाति, और भारतीय कानूनी व्यवस्था की विफलता

रचना गौतम (Rachna Gautam)

प्रत्येक सभ्य समाज में समाज के समुचित शासन के लिए कानून की अनिवार्य आवश्यकता होती है. मनुष्य होने के कारण लोग तर्कसंगत होते हैं और उस दिशा में आगे बढ़ते हैं जो उनके हित को सर्वोत्तम रूप से पूरा कर सके, और विभिन्न रुचियों वाले कई लोगों की एक साथ उपस्थिति के कारण हो सकता है उनके रास्ते या हित टकरा भी जाएँ.  

अपनी उत्पत्ति के समय से ही मनुष्य ने अपने अस्तित्व, प्रतिष्ठा, इच्छाओं की पूर्ति और सत्ता हासिल करने और संसाधनों पर नियंत्रण हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा करना, संघर्ष करना और लड़ना सीखा है. जैसा कि किसी ने कहा है, इंसान सबसे खतरनाक जानवर है. इस प्रकार, वह अधिक उन्नत इच्छाओं को प्राप्त करता रहता है और उन्हें प्राप्त करने के लिए जोरदार साधन विकसित करता रहता है. कामनाओं की प्राप्ति करने के रास्ते में उन्होंने कुछ भी अप्रभावित नहीं छोड़ा और बहुत कुछ नष्ट कर दिया, फिर वो चाहे पर्यावरण हो, वन्य जीवन हो, पृथ्वी हो, वायु या साथी मनुष्य ही क्यूँ न हो. पूरी की पूरी मानव जाति इतिहास, पैदा होने की जगह, स्थान, भूगोल, विश्वास, विचारधारा, स्वाद, पसंद जैसे विभिन्न समूहों में वर्गीकृत हो गई है: ऐसा प्रत्येक समूह दूसरों पर श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करने का प्रयास करता है. वर्तमान परिदृश्य में ऐसा ही एक अंतर भारत में विभिन्न संघर्षों के प्रमुख कारणों में से एक है, और वह है जाति.

जाति एक अत्यधिक जटिल सामाजिक-मनोवैज्ञानिक रचना है. जाति शब्द की उत्पत्ति स्पेनिश शब्द “कास्टा” (Casta) से हुई है जिसका अर्थ है वंश या नस्ल. “जाति” शब्द को परिभाषित करना अपने आप में जितना सोचा जाता है उससे कहीं अधिक कठिन है. जाति व्यवस्था एक सामाजिक संरचना है जो अन्य श्रेणियों के लोगों के साथ विभिन्न सामाजिक श्रेणियों से संबंधित लोगों की बातचीत के अवसरों, प्रतिबंधों और प्रकृति को निर्धारित करती है. अधिक विशेष रूप से, इसे सामाजिक स्तरीकरण की “बंद प्रणाली” के रूप में समझा जा सकता है जिसमें सामाजिक समूह, अक्सर अपने व्यवसायों के आधार पर विभाजित होते हैं, शादी और रिश्तेदारी गठबंधनों के संबंध में परंपरा द्वारा निर्धारित व्यवहार के एक कोड का सख्ती से पालन करते हैं. मनोविज्ञान जाति को विरासत में मिली सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर समाज की एक स्तरीकृत प्रणाली के रूप में समझता है. जाति हमेशा से सबसे मजबूत सामाजिक संस्थाओं में से एक रही है, जिसमें किसी के जीवन को सभी आयामों में प्रभावित करने की शक्ति है, चाहे वह राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, यौन आदि हो. जाति व्यवस्था 1) अस्पृश्यता और अलगाव की प्रथा को कायम रखने की ओर ले जाती है जिससे समाज में समानता और न्याय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. इस प्रकार यह सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा है, 2) जाति के आधार पर समाज के विभाजन से विभिन्न समूहों के सदस्यों के बीच संघर्ष और तनाव पैदा होता है जो बदले में राष्ट्र के विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, 3) जाति विभाजन, विशेष रूप से निम्न जाति समूहों में हीनता और अभाव की भावना को प्रेरित करता है. इससे विभिन्न समूहों के बीच तनाव और संघर्ष बढ़ता है.

यह लेख मुख्य रूप से संविधान के प्रारूपण के दौरान जातिवाद को संबोधित करने में डॉ बी आर अंबेडकर के साहसिक प्रयास पर केंद्रित है. एक स्वतंत्र भारत के उदय होने के साथ ही, हर कोण से सामाजिक भेदभाव को दबाने के लिए कई प्रयास किए गए क्योंकि भारतीय संविधान के निर्माता स्वयं इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि सत्ता, वर्चस्व और अधीनता के संबंध धर्म, जाति, सेक्स, या फिर निजी क्षेत्र के भीतर संचालित होते हैं. उन्होंने जान लिया था कि कम से कम इसपर मुखरता से बात करने के प्रयास के बिना स्वतंत्रता और समानता अधूरी रहेगी. इस प्रकार अनुच्छेद 14- कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण; अनुच्छेद 15- जाति, धर्म, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध; या अनुच्छेद 16- सार्वजनिक क्षेत्र में अवसरों की समानता; और अनुच्छेद 16, अनुच्छेद 16(4) को वास्तविक प्रभाव देने के प्रयास के साथ – सार्वजनिक रोजगार में पिछड़े वर्गों को आरक्षण; और अनुच्छेद-338 के तहत गठित राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को संविधान में शामिल किया गया. नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और नियम, 1977 और कहीं अधिक विस्तृत कानून 1989 में पारित किया गया था; अत्याचार निवारण अधिनियम, जो जाति-आधारित अत्याचारों के विस्तृत दायरे को प्रतिबंधित करता है और इसे एक अपराध घोषित करता है (इस अधिनियम को कमजोर करने के लिए कई प्रयास किए गए लेकिन रेडिकल राजनीतिक दबाव इसे बरकरार रखने में सफल रहे). लेकिन ये अधिनियम टुकड़े-टुकड़े संशोधन और नवीन व्याख्याएं हैं जिन्होंने कानून और कानूनी प्रणाली में कोई संरचनात्मक परिवर्तन लाए बिना समानता की धारणा पेश की.

मनोविज्ञान अपराध के कृत्यों को, सोच की प्रक्रियाओं में मौजूद, व्यक्तिगत अंतर के साथ जोड़ता है. कई मनोवैज्ञानिक सिद्धांत हैं, लेकिन वे सभी इस विश्वास में निहित हैं कि कार्य व्यक्तियों के विचारों और भावनाओं से निर्धारित होते हैं. ऐसे में अगर सोच में ही समस्याएं होंगी तो वह आपराधिक व्यवहार को जन्म दे सकती हैं. जातिवाद की अवधारणा किसी के मन में स्वतः ही यह पैदा कर देती है कि वह दूसरे से श्रेष्ठ है (चाहे वह स्पष्ट रूप से इसके बारे में दावा करे या न करे) और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य और उदाहरण (हाथरस बलात्कार का मामला ऐसा ही एक उदाहरण है) इन विश्वासों को विश्वसनीयता देने में मदद करते हैं. दूसरी ओर, तथाकथित निचली जाति के लोगों के बीच, गरिमा के साथ जीवित रहने के साधनों तक अपर्याप्त पहुंच और सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रूप से मजबूर निम्न जीवन स्तर स्थिति को और अधिक कठोर बनाता है.

देखते-विचरते हुए जो इन्सान सीखता है, उस सिद्धांत के अनुसार, चारों ओर मिलने वाले ऐसे व्यवहारों वाले बड़े माहौल से लोग आक्रामक और हिंसक व्यवहार सीखते हैं. बहुत कम उम्र से ही प्रताड़ित घरों के बच्चों को, साधारण से अवलोकन के ज़रिये, आक्रामक व्यवहार सीखना पड़ता है. कुल मिलाकर, यह धारणा है कि इस तरह से व्यवहार करना सामान्य है और इससे होता यह है कि ऐसे विचलित व्यवहार को अपना लेने की सुविधा मिल जाती है. इसी तरह, जो बच्चे जातिगत भेदभाव और हाशिए के लोगों को अपमानित करने के लिए इस तरह के माहौल को अत्यधिक देखते हैं, उन्हें हाशिये के लोगों का शोषण करना एक सामान्य व्यवहार लगता है. (अपराध की एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार / अनुसूचित जातियों (एससी) के खिलाफ अत्याचार-2017-2019, एससी (2019) के खिलाफ अपराध की दर 22.8% है), जेलों में अभियुक्तों की अनुपातिक संख्या से अधिक (एनसीआरबी के “जेल स्टैटिस्टिक्स इंडिया” 2018 के तहत विचाराधीन कैदियों के आंकड़े- 33.49% ओबीसी , 20.68 फीसदी अनुसूचित जाति, 11.56 फीसदी अनुसूचित जनजाति, 18.81 फीसदी मुस्लिम) और जघन्य अपराधों की कई कहानियां जिनके पास कुछ आवाज उठाने और रिपोर्ट करने का मौका नहीं था, जिससे निम्न समझी जाने वाली जातियों के लोगों की अभी भी इतनी हाशिए पर पड़ी स्थिति से समझा जा सकता है. जघन्य अपराधों की कई ऐसी कहानियां हैं जिनकी आवाज़ को सुने जाने के और रिपोर्ट किए जाने का मौका नहीं था.

एक व्यक्ति को एफआईआर भरने के बाद ही कानूनी व्यवस्था में प्रवेश मिलता है जो अपने आप में एक कठिन काम है. समाज के कई हाशिए के वर्ग जिन्हें मानव के रूप में नहीं माना जाता है: जैसे एलजीबीटीक्यू +, सेक्स वर्कर, बार डांसर, मैला ढोने वाले कर्मचारी, इन सबके के साथ लगातार होता भेदभाव और उनकी पीड़ा का सामान्यीकरण और व्यापक अर्थों में दलित (क्योंकि इनमें से अधिकतर काम ज्यादातर निचली जातियों के लोगों द्वारा किए जाते हैं) उनके लिए अपनी पीड़ा के प्रति सचेत और संवेदनशील लोगों हासिल करना कठिन बना देते हैं. राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताकत से लैस प्रभावशाली जातियों के लोग पुलिस थाने तक पहुंच करके कानून को प्रभावित और प्रतिबंधित कर सकते हैं. प्राथमिकी यानि ऍफ़.आई.आर एक पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज की जाती है और वह भी एक व्यक्ति ही तो है जिसकी एक जाति भी होगी ही. हो सकता है वह व्यक्ति सहानुभूतिपूर्ण हो और हो सकता है न भी हो. और यह भी हो सकता है कि वह जातिवाद और इसके चलते समाज के विभाजन और होने वाले प्रभावों से अनजान हो! इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि पूरी न्याय प्रणाली में पुलिस अधिकारियों से लेकर जांच अधिकारियों, अदालतों के न्यायाधीशों तक, प्रमुख जातियों के लोगों का वर्चस्व है. यहां तक ​​कि सर्वोच्च न्यायालय में भी प्रभावशाली जातियों के न्यायाधीशों की संख्या उनके अनुपातिक संख्या से कहीं अधिक है (2014 के बाद से, इन 35 न्यायाधीशों में से, केवल 3 महिला न्यायाधीश हैं, और यह आंकड़ा अब तक का सबसे अधिक वाला आंकड़ा है. 1 मुस्लिम, 1 ईसाई, 1 पारसी और 1 अनुसूचित जाति के न्यायाधीश ही नियुक्त किए गए हैं, और बाकी सभी प्रभावी जातियों के न्यायाधीश हैं). और यह सामाजिक पूंजी एक उच्च जाति के बच्चे के दिमाग में यह जोड़ देती है कि उनके लिए न्यायिक व्यवस्था की एजेंसियों को अपने अनुसार ढालना आसान काम है (इसे एनसीआरबी की 2013 की रिपोर्ट से समझा जा सकता है जिसके अनुसार अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों के लिए 70.6% गिरफ्तार किए गए, पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की जिनमे सज़ा दर 22% रही. जबकि अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ किए गए अपराध में आरोप पत्र दाखिल करने का प्रतिशत 81.3 है जबकि सजा दर 17.4%) इस प्रकार भारतीय न्यायिक प्रणाली के चेहरे को तब तक नहीं सुधारा जा सकता जब तक कि संरचनात्मक परिवर्तन करने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है. और न्याय व्यवस्था में समावेशिता को नहीं लाया जाता है ताकि विश्वास स्थापित किया जा सके और जातिवाद का अंत हो.

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रचना गौतम एक छात्रा हैं. उन्होंने लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर विमेन से गणित की पढ़ाई की और वर्तमान में सी.सी.एस.यू से एलएलबी कर रही हैं.

अनुवाद: गुरिंदर आज़ाद

यह आलेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में है जिसे अंग्रेजी भाषी Round Table India पर यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.

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