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भारत सरकार को चाहिए कि एक लाख एससी-एसटी युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजे

अंशुल कुमार (Anshul Kumar)

महल के शिखर पर बैठे पुरुष

“तो , मैं एक दिन लिनलिथगो के पास गया और शिक्षा पर होने वाले खर्च के बारे में कहा, “यदि आप क्रोधित न हों तो मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। मैं पचास [हाई स्कूल] स्नातकों के बराबर हूँ, है ना?” उसे (लिनलिथगो को) इसके लिए राजी होना पड़ा। फिर मैंने पूछा, “क्या कारण है?” उन्होंने कहा, “मुझे इसका कारण नहीं पता।” मैंने कहा, “मेरी शिक्षा इतनी महान है कि मैं महल के शिखर पर बैठ सकता हूँ। मुझे ऐसे पुरुष चाहिए। क्योंकि— कोई भी, ऊपर से, हर चीज़ का सर्वेक्षण कर सकता है। अगर हमारे लोगों की रक्षा की जानी है, तो ऐसी तेज-तर्रार आँखों वाले और सक्षम पुरुषों का निर्माण किया जाना चाहिए। एक मात्र क्लर्क क्या कर सकता है?” मेरे शब्दों ने तुरंत लिनलिथगो को आश्वस्त किया, और उस वर्ष सोलह छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया था। अगर उन सोलह में से कुछ कच्चे निकले और कुछ परिपक्व, जैसे कि कुछ पानी के घड़े आधे पके हुए हैं और कुछ न भी पके हों… परिणामों को छोड़ देते हैं. बाद में राजगोपालाचार्य ने उच्च शिक्षा के लिए इस योजना को रद्द कर दिया।” ~ बाबासाहेब डॉ. बीआर अम्बेडकर

प्रबुद्ध भारत, 27 अक्टूबर 1956, पीपी 5-12, 18 से. रेखा दामले और एलेनोर जेलियट द्वारा मराठी से अनुवादित, अगस्त-सितंबर 1964।

बाबासाहेब को कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में शिक्षित होने का मौका मिला क्योंकि वे इतने भाग्यशाली थे कि बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ द्वारा प्रदान की गई छात्रवृत्ति हासिल कर पाए. वह एक विद्वान, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, मानवविज्ञानी और ब्रिटिश भारत के सबसे बड़े ज़मीनी बुद्धिजीवी थे। वह शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह से जानते थे और इस लिए उन्होंने ‘शिक्षित बनो, आंदोलन करो, संगठित रहो’ का नारा भारत के लोगों को दिया था। चूंकि वह पश्चिम में शिक्षित थे, इसलिए उन्हें पता था कि हमारे युवाओं की क्षमता का दोहन करने के लिए पश्चिम की आधुनिक शिक्षा तक पहुँच बनाना और दूसरा, जाति की बेड़ियों को तोड़ना बहुत ज़रूरी है। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो की मदद से, कई एससी-एसटी छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा। दुख की बात है कि अछूत विरोधी कांग्रेस और भारत सरकार ने इस छात्रवृत्ति को बंद कर दिया।

नेहरू का भटका हुआ समाजवाद, जिसने बहुजनों की प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं किया और आईआईटी में निवेश किया, इसलिए उच्च शिक्षा में ब्राह्मणों और संबंधित जातियों का एकाधिकार हो गया। क्योंकि प्राथमिक शिक्षा जर्जर स्थिति में थी, इसलिए बहुजन, जिनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे, प्राथमिक स्तर पर भी शिक्षा में प्रवेश करने में असमर्थ थे। यह बहुजन जनता की विशुद्ध अनदेखी थी। आरक्षण नीति अभी शुरू ही हुई थी और इसके फल अभी काफी हद तक देखे जाने बाकी थे। इसी बीच बहुजन युवाओं को सरकार की ओर से उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजा जाना ज़रूरी हो गया. लेकिन कांग्रेस कभी भी बहुजनों की पार्टी तो रही नहीं. उसने तो खुद को इस रूप में साबित किया कि वह ‘ब्राह्मणों और बनियों’ का एक ऐसा गिरोह है जो बहुजनों के द्वारा अधिशेष श्रम (surplus labour) के चलते पैदा हुए एक-एक पैसे पर अपना एकाधिकार करना चाहता है.

बाद में, मान्यवर कांशीराम और बहन मायावती के नेतृत्व में बहुजनों की सफल लामबंदी के बाद, जागरूक बहुजनों का एक नया उदय हुआ, जिन्होंने ब्राह्मण बनिया बहुल भारतीय राज्य में बहुजन हितों को बनाए रखने के लिए एक दबाव समूह के रूप में काम किया। इस प्रकार, बहुजन राजनीति के दबाव में, जो तीन दशकों से एससी-एसटी आरक्षण का लाभ उठाने वाले सरकारी कर्मचारियों से प्राप्त लाभांश पर बनी थी, मंडल आयोग पारित किया गया और ओबीसी आरक्षण की शुरुआत की गई। यह आरक्षण के अफर्मेटिव एक्शन नीति की जीत थी। प्रतिनिधित्व जो आरक्षण से सुनिश्चित किया गया था, ने बहुजनों के एक जागरूक जन को अपने अधिकारों के लिए उभरने और आंदोलन करने और राज्य के साथ बातचीत करने के लिए संभव बना दिया।

भारत भर में बहुजनों के संघर्ष को बढ़ाने के लिए, हमें अपने युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने के बाबासाहेब के दृष्टिकोण को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता है। जबकि वर्तमान में ओबीसी उम्मीदवारों के लिए कोई विदेशी छात्रवृत्ति नहीं है, इस तरह की छात्रवृत्ति को स्थापित करने की निरंतर मांग की जानी चाहिए। अब चूंकि केंद्रीय बजट के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए एक विशेष उप योजना अनिवार्य तौर पर है, हमें सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष रूप से उनके लिए बनाई गई नीतियों पर खर्च करने के लिए मजबूर करना चाहिए और ऐसी ही एक नीति अनुसूचित जाति के लिए राष्ट्रीय प्रवासी छात्रवृत्ति है जिसके तहत एससी और एसटी युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजा जाता है. पूर्व यूजीसी अध्यक्ष और प्रसिद्ध शिक्षाविद सुखदेव थोराट समिति ने सिफारिश की है कि सालाना विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की कुल संख्या में से 22.5 प्रतिशत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को सरकारी वित्त पोषण पर विदेश भेजा जाना चाहिए।

विदेश मंत्रालय के पास उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019-20 में करीब पांच लाख भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए। यानी पांच लाख में से कम से कम 22.5 फीसदी यानी करीब एक लाख एससी और एसटी छात्रों को सरकारी फंडिंग पर उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजा जाए. चूंकि यह एससी और एसटी समुदायों के प्रतिनिधित्व का मामला है, इसलिए इसे भारत सरकार द्वारा गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

अब, कई आलोचक या मुझे कहना चाहिए कि निंदक सवाल कर सकते हैं: इतनी बड़ी संख्या में छात्रों के लिए फंड कहां से आएगा। तो मेरे साथ बने रहिये और धैर्य बनाए रखे और जवाब सुने.

वर्ष 2019-20 में एनओएस (NOS) के तहत सौ एससी-एसटी युवाओं को विदेश भेजने के लिए बीस करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। एनसीडीएचआर की वार्षिक रिपोर्ट 2019-20 के अनुसार:

एससी उप योजना के तहत 83,257 करोड़ रुपये आवंटित किए गए

अनुसूचित जनजाति उपयोजना के तहत 53,653 करोड़ रुपये आवंटित किए गए

हालांकि, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए लक्षित योजनाओं के लिए आवंटन का वास्तविक अनुपात एससी के लिए केवल 16,174 करोड़ रुपये और एसटी के लिए 19,428 करोड़ रुपये रहा. दरअसल एससी और एसटी के लिए लक्षित नीतियों के लिए धन को चुरा कर सामान्य योजनाओं के लिए डायवर्ट किया गया था और यह एससी और एसटी के लिए भेदभावपूर्ण है। तो, अब यह तर्क कि सरकार के पास सीमित धन है, इसका क्या आधार बचता है भला! अब, जैसा कि उपरोक्त आंकड़ों से अनुमान लगाया जा सकता है, केवल एक वर्ष यानि 2019-20 में ही एससी और एसटी के लिए कुल बजटीय आवंटन से 1,01,308 करोड़ रुपये डायवर्ट किये गए हैं.  

सौ छात्रों को विदेश भेजने में 2019-20 में सरकार के बीस करोड़ खर्च हुए. इसका मतलब है कि एक लाख छात्रों को विदेश भेजने के लिए 20000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी और जैसा कि कोई देख सकता है, एससी/एसटी के ऊपर खर्च करने के लिए सरकार के पास उपलब्ध 1,00,000 करोड़ रुपये अकेले 2019-20 में ही डायवर्ट कर दिए गए। वर्ष 2020-21 में (और आने वाले वर्षों में) डायवर्ट की गई धनराशि तो और अधिक होगी। इन डायवर्टेड धन का पांचवां हिस्सा (20,000 करोड़) भर भी एससी-एसटी छात्रों को विदेश भेजने के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता है?

इसलिए, भारत सरकार को हर साल एक लाख एससी-एसटी छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजना चाहिए।

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संदर्भ

 1. http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/txt_ambedkar_conversion.html

2. https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/document-reports/SCSP-TSPReport_1.pdf

3. https://timesofindia.indiatimes.com/home/education/after-55-dip-in-2020-71k-students-went-abroad-this-year-already/articleshow/81738863.cms

4. http://socialjustice.nic.in/writereaddata/UploadFile/ANNUA_REPORT_201920E.pdf

social justice report

5. http://www.ncdhr.org.in/wp-content/uploads/2021/05/Annual_Report_2019-20.pdf

budget research

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अंशुल कुमार वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जेएनयू से समाजशास्त्र में एमए कर रहे हैं।

अनुवाद: गुरिंदर आज़ाद

यह आलेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में है जिसे अंग्रेजी भाषी Round Table India पर यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.

 

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