आज अंतर्राष्ट्रीय इंडीजेनस दिवस पर विशेष

 डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” 

इंडीजेनस लोग विशिष्ट संस्कृति वाले ऐसे मानव समूह हैं जो पृथ्वी के सबसे पहले ज्ञात निवासियों में से हैं. पूरी दुनिया में इंडीजेनस समूह अपनी आरंभिक जीवन शैली, प्राचीन परंपरा और संस्कृति को अपनाए रहते हैं और किसी दिए गए विशेष क्षेत्र से जुड़े होते हैं. समान्यतया इंडीजेनस लोगों को मुख्यधारा की आबादी से अलग-थलग रखा जाता है. इंडीजेनस लोगों के अपने रीति-रिवाज, व्यवहार, संस्कृति, भाषा और संस्कार होते हैं (Oisika Chakrabarti United Nations, 2021) .

दुनिया भर के 90 देशों में रहने वाले 476 मिलियन (47.6 करोड़) से अधिक इंडीजेनस लोग हैं, जो वैश्विक आबादी का 6.2 प्रतिशत है. 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में इंडीजेनस (शैडयूल्ड ट्राइब्स) की कुल जनसंख्या 84,326,240 है जो देश की कुल जनसंख्या का 8.2 है. शैडयूल्ड ट्राइब्स की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और उनकी आबादी देश की कुल ग्रामीण आबादी का 10.4% है. भारत में लगभग 10.46 करोड़ (भारत की कुल जनसंख्या का 8.6% इंडीजेनस लोग थे [(Census 2011). जनगणना 2011 के अनुसार, महापंजीयक का कार्यालय, भारत) जबकि अगर हम नवीनतम डेटा देखें तो भारत में हर 10वां व्यक्ति (लगभग 10%) आज इंडीजेनस है.

संयुक्त राष्ट्र इंडीजेनस लोगों की वैश्विक चिंताओं में बराबर हस्तक्षेप करता रहता है और उनके मुद्दों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाता रहता है जिससे विश्व की सरकारों और संगठनों को आगाह किया जा सके और सारी दुनिया के इंडीजेनस लोगों के हितों की रक्षा के लिए जागरूक किया जा सके. साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि उनके देश के केंद्र/राज्य सरकारों द्वारा उनके अधिकारों को सुरक्षित किया जा सके. संयुक्त राष्ट्र के अथक प्रयासों के बावजूद कई देश और राज्य इंडीजेनस लोगों के अधिकारों के संरक्षण के बारे में ज्यादा गंभीर नहीं दिख रहे हैं.

भारत जैसे विकासशील देश भी अपने यहाँ के इंडीजेनस लोगों के जीवन से जुड़े अहम मुद्दों के प्रति लापरवाहीपूर्ण रवैया अपनाते आ रहे है. दुखद बात तो ये हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ के लाख प्रयासों के बावजूद भारत सरकार स्वीकार ही नहीं करती कि भारत में कोइतूर या इंडीजेनस लोग रहते हैं और मानते हैं कि भारत के सभी लोग इंडिजेनस हैं. जब सरकारें अपने ही देश के इंडीजेनस लोगों यानि कोइतूरों की उपस्थिति को स्वीकार नहीं करती है तो उनके मुद्दों पर काम करना तो बहुत दूर की बात होगी. इतनी अंतर्राष्ट्रीय और सामाजिक चिंताओं के बावजूद इंडीजेनस लोगों के शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, जीवन की गरिमा और अस्मिता से जुड़े मुद्दों की अनदेखी हो रही है.

दुनिया भर के 90 देशों में 476 मिलियन(47.6 करोड़) से अधिक इंडीजेनस लोग रहते हैं, जो विश्व की कुल आबादी का 6.2 प्रतिशत है. इंडीजेनस लोग अनूठी संस्कृतियों, परंपराओं, भाषाओं और ज्ञान प्रणालियों की एक विशाल विविधता के धारक हैं. उनका अपनी जल, जंगल और ज़मीन के साथ घनिष्ठ संबंध है और वे अपने स्वयं के विश्वदृष्टि और प्राथमिकताओं के आधार पर विकास की विविध अवधारणाएं रखते हैं(United Nations, 2021).

संयुक्त राष्ट्र ने पूरे विश्व के इंडीजेनस लोगों के प्रति अन्य लोगों में संवेदना और सदभावना विकसित करने की जरूरतों पर बल दिया है. अंतर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर पूरी दुनिया के इंडीजेनस लोगों को एक साथ एक मंच पर आकर अपनी बात रखने का अवसर मिलता है. इस दिवस ने पूरी दुनिया में एक नए युग का सूत्रपात किया है और दुनिया भर के कोइतूरों में एक अनोखी चेतना विकसित की है. दुनिया में इससे बड़े किसी भी आयोजन की मिसाल अन्यत्र कहीं नहीं मिलती है.

भारत में इंडीजेनस लोगों को सामूहिक रूप से कोइतूर या कोयतूर के नाम से जाना जाता है. कई लेखकों, इतिहासकारों, मानवविज्ञानियों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस विशेष मानव समूह के लिए अलग-अलग नामों का इस्तेमाल करते हैं. इन कोइतूर समूहों के बीच बहुत से आपसी मतभेद होने के बावजूद वे एक ही धागे की डोर से बंधे है जो उन्हें वैश्विक स्तर पर एक विशेष समुदाय बनाता है.

इंडीजेनस या कोइतूर लोग ऐसी प्राचीन या मूल आबादी के वंशज हैं जो किसी विजय, उपनिवेश या वर्तमान राज्य की सीमाओं की स्थापना के पहले से ही उस भौगोलिक क्षेत्र में रहते आए हैं. वे आज भी अपनी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संस्थाओं को बनाए रखना चाहते हैं चाहे उनकी कानूनी स्थिति कुछ भी हो.(International Labour Organization 2021)

सभी कोइतूर लोग प्रकृति के करीब हैं और प्रकृति के नियम का पालन करते हैं. उन्हें धरती पर प्रथम नागरिक (First peoples), स्वदेशी या देशी लोग (Native peoples), प्रथम राष्ट्र (First Nations), प्राचीन नागरिक (Aboriginal peoples) या स्थानिक नागरिक (autochthonous), जीववादी (Animist), प्रथम नागरिक (aboriginals), आदिवासी(Primitive), गिरिजन या वनवासी (Hill Dwellers) देशज या आदिम इत्यादि के रूप में भी जाना जाता है. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इन विशेष मानव समूहों को सामूहिक रूप से इंडीजेनस कहा और माना जाता है(Shashwat Bali, 2020).

भारत के इंडीजेनस लोगों के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपरोक्त सभी शब्दों में कोयतूर या कोइतूर शब्द सबसे उचित और सबसे सटीक है और यह इंडीजेनस शब्द को सबसे करीबी अर्थ देता है. कोयतूर या कोइतूर शब्द प्राचीन भारत के गोंडी भाषा (द्रविड़ भाषा समूह) का शब्द है जिसका अर्थ बिल्कुल वही होता है जो इंडीजेनस शब्द का होता है. कोयतूर (कोया+ नत्तूर) शब्द दो अन्य शब्दों से मिलकर बना है जिसमें से पहले शब्द है “कोया” (कोया मूरी द्वीप यानि प्राचीन भारत की भूमि पर पैदा हुए सर्व प्रथम मानव) और दूसरा शब्द है नत्तूर जिसका अर्थ होता है खून, वंश या औलाद. यानि भारत में कोइतूर या कोयतूर का सीधा सीधा अर्थ वही है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंडीजेनस शब्द का है. भारत में कोइतूर का सम्पूर्ण अर्थ होता है भारत की प्राचीन धरती पर (आर्यों, मुगलों और अंग्रेजों के आगमन से पूर्व) जन्म लेने वाले प्रथम मानव के वंशज. इसीलिए भारत में इंडीजेनस शब्द का सबसे उचित समानार्थी और बेहतर प्रतिनिधित्व करने वाला शब्द कोइतूर या कोयतूर है. ठीक इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में अबोरीजिनल्स, अमेरिका में नेटिव अमेरिकन (रेड इंडियन), कनाडा में फ़र्स्ट नेशन (प्रथम नागरिक) कहते हैं(सूर्या बाली, 2021).

कोइतूर एक संज्ञा है जो भारत के देशज लोगों के वास्तविक नाम, उनकी पहचान, उनकी अस्मिता और भारत की धरती पर उनकी प्राचीन गरिमामयी उपस्थिति की व्याख्या करती है जैसे किसी का खूबसूरत नाम उसकी पहचान को निरूपित करता है लेकिन आदिवासी, वनबासी, गिरिजन, जंगली, पहाड़ी, इत्यादि विशेषण हैं जो कोइतूरों की विशेषता बतलाते हैं न कि उनकी वास्तविक पहचान. जैसे किसी को उसके वास्तविक नाम से न बुलाकर उसे नाटे, मोटे, छोटे, कल्लू, इत्यादि नाम से बुलाया जाये तो कैसा लगेगा? इस बात पर आप खुद विचार कर के देखिये. इसी तरह जब भारत के कोइतूरों को आदिवासी बनवासी कहकर संबोधित किया जाता है तो उन्हे भी बुरा लगता है (सूर्या बाली 2021).

दुर्भाग्य देखिये कि अंग्रेजों के साथ साथ भारत के ज़्यादातर लेखक और साहित्यकार कोइतूर शब्द को सीमित अर्थों में प्रयोग करते हुए उसकी गरिमा और उसके विस्तृत अर्थ को सीमित कर देते हैं और कोइतूर शब्द को भारत की एक विशेष इंडीजेनस समूह “गोंड” से जोड़ दिये और बता दिये कि कोयतूर या कोइतूर का मतलब गोंड होता है जबकि कोइतूर इंडीजेनस शब्द की तरह एक विस्तृत आयाम वाला शब्द है जिसका सीमित अर्थों में प्रयोग किया जाना एक सोची समझी साजिश है.

ट्राइब या जनजाति, नृविज्ञान में, छोटे समूहों (बैंड के रूप में जाना जाता है) के एक समूह के आधार पर मानव समाजिक संगठन का एक काल्पनिक रूप है, जिसमें अस्थायी या स्थायी राजनीतिक एकीकरण होता है, और सामान्य वंश, भाषा, संस्कृति और विचारधारा की परंपराओं द्वारा परिभाषित किया जाता है. यह शब्द भी कोइतूरों के वास्तविक पहचान को प्रदर्शित नहीं करता लेकिन बड़े अर्थों में स्वीकार्य है. इसे भारत सरकार का संवैधानिक आधार मिला हुआ है और अनुसूची के रूप में ट्राइब्स को एकत्रित करता है. लेकिन भारत सरकार के कई महकमें इस शब्द को भी छोडकर गैर-संविधानिक शब्दों जैसे आदिवासी, आदिम, और बनवासी शब्दों का प्रयोग करते हुए देखे जा सकते हैं.

भारत सरकार ने 2007 में “इंडीजेनस लोगों के अधिकारों की संयुक्त राष्ट्र घोषणा” पर हस्ताक्षर किए, लेकिन इस प्रावधान/सटीकता के साथ कि भारत के सभी निवासियों को यूरोपीय उपनिवेशवादियों के विपरीत इंडीजेनस माना जाना चाहिए यानि कि इसका मतलब हुआ कि सभी भारतीय इंडीजेनस हैं(रफेल रसेल, 2013). जबकि भारत के कोइतूरों की सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक, राजनीतिक, भाषाई और अन्य रहन-सहन बाहर से आई आबादी से पूर्णतया भिन्न है.

भारत में इंडीजेनस और कोइतूर दोनों शब्दों को दरकिनार करते हुए आदिवासी और बनवासी शब्दों की बाइनरी (द्वय) खड़ी की जा रही है जिससे यहाँ का कोइतूर समुदाय आदिवासी और बनवासी के झगड़े में उलझ जाएँ और इंडीजेनस या कोइतूर शब्द को मुख्य धारा से दूर किया जा सके. संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व के इंडीजेनस लोगों के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस की संकल्पना देकर इस दबे हुए मुद्दे को फिर से उभार दिया है जिससे भारत में खलबली होना लाज़मी है. अब कुछ राजनैतिक दल और सरकारें इंडीजेनस मुद्दे को दबाने के लिए(संयुक्त राष्ट्र के मंशा के विपरीत) आदिवासी सम्मान दिवस, आदिवासी दिवस, वनवासी अधिकार दिवस आदि का आयोजन कर और करवा रही हैं और इस देश के युवा इन्ही आयोजनों का हिस्सा बनकर संयुक्त राष्ट्र के अभियान को नष्ट करने के प्रयास में न चाह कर भी शामिल हो रहे हैं और अपने ही पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हैं.

भारत सरकार के अलावा भी कई दक्षिण एशियाई देशों ने इंडीजेनस शब्द को अपने संविधान और राजनैतिक प्रपत्रों में जगह नहीं दी है और इन समूहों को अन्य कई नामों से जानते पहचानते हैं. जैसे भारत में अनुसूचित जनजाति(Scheduled Tribes), लंका में वेद्दा (Vedda), नेपाल में खस (Khas), बांग्लादेश में चकमा (Chakma) के नाम से जानते हैं वास्तव में ये सभी कोइतूर ही हैं.

भारत में ग़ज़ब का खेल हो रहा है. एक पूरी लाबी है जो अरबों रुपये लगाकर पत्र-पत्रिकाएँ, जर्नल, किताबें, प्रकाशन, साहित्य और मीडिया द्वारा एक खास शब्द “आदिवासी” का प्रचार प्रसार करते रहते हैं. आपको अखबारों और टीवी में हमेशा आदिवासी शब्द का जाप करते रहते हैं. भारत देश की भोली भाली कोइतूर जनता मात्र 100-125 वर्षों में ही अपनी प्राचीन और गौरवशाली पहचान कोइतूर को भूल गयी और मात्र पाँच पीढ़ियों के बाद आदिवासी और बनवासी जैसे नए शब्दों के जाल में फंस गयी है.

भारत में प्रति वर्ष इंडीजेनस दिवस के प्रति बढ़ते रुझान और युवा पीढ़ी के बढ़ चढ़ कर भाग लेने से बहुत सारे लोगों के कान खड़े हो गए हैं. वे येन-केन-प्रकारेण इस आयोजन में जहर घोलना चाहते हैं और संयुक्त राष्ट्र के मानक आयोजन को विकृत करना चाहते हैं. विगत कुछ वर्षों में 9 अगस्त अंतर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर ऐसे आयोजनों की भरमार होती जा रही है जो विश्व के कोइतूरों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस की मूल भावना और विषय से इतर होते हैं जिनका कोइतूर लोगों के जनजीवन और मुद्दों से कोई लेना देना नहीं होता है. आपको पता होना चाहिए ऐसे आयोजन अकारण नहीं हो रहे हैं बल्कि उसके पीछे कुछ पार्टियों, संगठनों और व्यक्तियों की सोची समझी चाल है जो कोइतूर और इंडीजेनस के मुद्दों को भारत की आम जनता की दृष्टि से ओझल रखना चाहते हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ के अथक प्रयासों से पूरे विश्व के इंडीजेनस लोग एक मंच पर आ रहे हैं और इंडीजेनस लोगों के मुद्दों पर वैश्विक समझ विकसित हो रही है. सभी के सम्मिलित प्रयासों से इंडीजेनस समुदाय के पिछड़ेपन, अशिक्षा, बेरोजगारी, आर्थिक विपन्नता, खराब स्वास्थ्य, अस्मिता और पहचान जैसे मुद्दे दुनिया के सामने आ रहे हैं और दुनिया की कई सरकारों पर प्रतक्ष्य या परोक्ष से दबाव बन रहा है.

विश्व के इंडीजेनस लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस जैसे महत्त्वपूर्ण और गौरवशाली दिन को भी स्थानीय मुद्दों में लपेटकर खत्म कर दिया जा रहा है जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बन रही सहमति और अंतराष्ट्रीय स्तर बन रही एकता को आकार न लेने दिया जाये. आज इसी दिन की ही देन है जिसके कारण विश्व के 90 से ज्यादा देश इस मुहिम का हिस्सा बन चुके हैं और भारत जैसी सरकारों पर एक अंतराष्ट्रीय दबाव बनाने में सफल होते दिखाई दे रहे हैं. भारत में यह दबाव न बन सके और लोग किन्हीं दूसरे मुद्दों में उलझ जाएँ इसलिए इस तरह के षणयंत्र सामने आते रहते हैं.

प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी संयुक्त राष्ट्र ने एक और महत्त्वपूर्ण मुद्दे को चिन्हित किया है और उसे इस अंतर्राष्ट्रीय दिवस की थीम के रूप में प्रस्तुत किया है. इस वर्ष का विषय है – “किसी को पीछे नहीं छोड़ना: इंडीजेनस लोग और नए सामाजिक अनुबंधों का आह्वान”.

आईये इस थीम के बारे में थोड़ा विस्तार से समझते हैं. संयुक्त राष्ट्र की मंशा है कि इंडीजेनस लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के दिन(9 अगस्त 2021) पर हमें सभी के लिए सामाजिक और आर्थिक लाभ के साथ संविधान में कोइतूर लोगों (Indigenous Peoples) लोगों के समावेश, भागीदारी और अनुमोदन की मांग करनी चाहिए. यही कारण है कि 2021 की थीम “किसी को पीछे नहीं छोड़ना: इंडीजेनस लोग और एक नए सामाजिक अनुबंध के लिए आह्वान” है.

एक सामाजिक अनुबंध एक अलिखित समझौता है जो लोगों द्वारा आपसी सामाजिक और आर्थिक लाभ के लिए सहयोग करने के लिए किया जाता है. सदियों से ऐसे समझौते होते आए हैं जो कभी सहमति से तो कभी दवाब, भय या मजबूरी के कारण बनते हैं. ज़्यादातर मौकों पर सामाजिक समझौते या सामाजिक अनुवंध एक तरफा होते हैं और देश की बहुसंख्यक आबादी द्वारा लिए जाते हैं और ऐसे अनुबंधों में वहाँ के इंडीजेनस लोगों को शामिल नहीं किया जाता है. सामाजिक अनुबंधों में इंडीजेनस लोगों की भूमिका नगण्य होने के पीछे उनके आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण होते हैं(United Nations, 2021).

इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने नए सिरे से सामाजिक अनुबंधों को तय करने पर ज़ोर दिया है और लोगों और सरकारों से नए सामाजिक अनुबंधों के लिए आह्वान किया है जिसमें इंडीजेनस लोगों की भूमिका को बढ़ाया जा सके. ऐसा करने के पीछे संयुक्त राष्ट्र बहुसंख्यक और प्रमुख आबादी द्वारा बनाए गए पुराने अनुबंधों को खारिज करना चाहता है और नए अनुबंधों में वहाँ के इंडीजेनस लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहता है.

संयुक्त राष्ट्र की पहल से पूरे विश्व में इंडीजेनस लोगों के हितों और अधिकारों पर ध्यान देने का वातावरण तैयार हुआ है उनके लिए नए अवसरों के दरवाजे खुले हैं. संयुक्त राष्ट्र चाहता है कि जिन देशों ने वहाँ के इंडीजेनस आबादी का शोषण किया है उनके हितों का हनन किया है वे उनसे माफी मांग कर उनके भविष्य के मुद्दों पर विचार-विमर्श की शुरुवात करें और एक बेहतर वातावरण बनाएँ जहां इंडीजेनस लोगों को समानता, न्याय, स्वतंत्रता, विकास के समान अवसर, सम्मान और अधिकार मिल सके.

कोविड 19 की महामारी के दौरान इन समूहों को भारी असमानताओं का सामना करना पड़ रहा है. साधन मौजूद हैं लेकिन इंडीजेनस लोगों के लिए उनका समुचित उपयोग नहीं किया जा रहा है जिससे वे लोग शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ रहे हैं और समाज में ऊंच-नीच और असमानता की खाईं और भी गहरी होती जा रही है(The world Bank 2021).

विकास की सामूहिक यात्रा में अगर इंडीजेनस लोग पीछे रह जाते हैं तो विकास की यह सामूहिक यात्रा अधूरी मानी जाएगी और विकास पूर्ण नहीं माना जा सकेगा. इसलिए इस अवसर पर समाज, सरकार और संगठनों को चाहिए कि इंडीजेनस लोगों के हितों की अनदेखी न की जाये. स्थानीय, राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग इंडीजेनस लोगों के विकास के लिए सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

इसलिए आज के दिन मानवता और प्रकृति के लिए सामाजिक हितों को सुनिश्चित करते हुए एक नए सामाजिक अनुबंध के निर्माण और पुन: डिजाइन की आवश्यकता है. यह प्रस्तावित नया सामाजिक अनुबंध सभी लोगों की वास्तविक भागीदारी और साझेदारी पर आधारित होना चाहिए जो सभी को विकास के समान अवसर प्रदान करे. इंडीजेनस लोगों के अधिकारों, उनकी गरिमा और उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए ही सामूहिक विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है.

अगर सुख शांति और समृद्धि सुनिश्चित करनी है तो इंडीजेनस(कोइतूर) लोगों के हितों और अधिकारों को इस नए सामाजिक अनुबंध में प्राथमिकता देनी ही होगी वरना यह एक तरफा विकास देश और राज्य को भयंकर तबाही और विनाश की तरफ ले जाएगा.

किसी भी देश के विकास की योजनाओं के निर्णय में वहाँ के इंडीजेनस लोगों को शामिल किया जाना चाहिए और इस तरह से ही किसी भी देश या राज्य के बीच सुलह सुनिश्चित की जा सकती है. इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र ने लोगों और सरकारों से सबको साथ लेकर चलने की अपील की है और किसी को पीछे नहीं छोड़ने का संकल्प लिया और नए सामाजिक अनुबंधों के महत्त्व को उजागर किया है.

भारत में कोइतूरों के ‘जल जंगल और जमीन’ के मुद्दों के साथ उनकी गरिमा, सम्मान और अस्मिता के मुद्दों को भी उठाना जरूरी है. अगर कोइतूरों की अपनी विशेष पहचान, संस्कृति, परंपरा, भाषा ही नहीं बचेगी तो विकास लेकर क्या करेंगें? इसलिए कोइतूर संस्कृति की जड़ों को सींचते हुए उनके चहुमुखी विकास के लिए 9 अगस्त का दिन महत्त्वपूर्ण हो जाता है. विश्व के इंडीजेनस लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस को भारत में विश्व के कोइतूर लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाना चाहिए न कि आदिवासी सम्मान, आदिवासी दिवस, आदिवासी अधिकार दिवस इत्यादि के रूप में.

संयुक्त राष्ट्र के प्रयाशों को समर्थन और प्रोत्साहन देकर हम भारत के कोइतूरों के लिए विकास के रास्ते खोल सकते हैं और उन्हें उनका वाजिब हक और अधिकार दिला सकते हैं. भारत में इस दिन को मनाने के सही मायने तभी सफल माने जाएंगे जब कोइतूरों को उनके संसाधनों पर उचित हिस्सा मिल सकेगा. इसलिए भारत के कोइतूरों को चाहिए कि वे सरकार और राज्यों के साथ नए सामाजिक अनुबंधों पर चर्चा करने की शुरुवात करें और देश और समाज के विकास में बहुसंख्यक आबादी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलें. यह दिवस तभी सार्थक बन सकेगा जब देश की प्रमुख बहुसंखक आबादी भारत के कोइतूरों के प्रति नकारात्मक और पारंपरिक सामंतवादी सोच को त्यागकर उन्हें सम्मान और बराबरी का दर्जा दे.

आशा करते हैं कि आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र के ये प्रयास बेहतर परिणाम दे सकेंगे और पूरी दुनिया में सुख, शांति, भाईचारा और सौहार्द के साथ खुशहाली ला सकेंगे. आईये 9 अगस्त 2021 के दिन हम सभी को विश्व के इंडीजेनस लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस की बधाई दें और भारत के कोइतूरों के बेहतर भविष्य की कामना करें.

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संदर्भ:

  1. Office of the Registrar General and Census Commissioner, Inisa, Government of India (Census India 2011, 2001) https://censusindia.gov.in/DigitalLibrary/reports.aspx
  2. Ministry of Tribal affairs, Government of India https://tribal.nic.in/
  1. International Labour Organization (ILO 2021)-Who are the indigenous and tribal peoples? https://www.ilo.org/global/topics/indigenous-tribal/WCMS_503321/lang–en/index.htm
  1. Raphel Rousseleau. Claiming Indigenousness in India. 7 February 2021. Available at https://booksandideas.net/Claiming-Indigenousness-in-India.html#nb2
  2. United Nations: International Day of the World’s Indigenous Peoples, 9 August,  https://www.un.org/en/observances/indigenous-day
  1. शाश्वत बाली : कोइतूर लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण को सुनिश्चित करना ; कोइतूर विशेषांक, युवा काफिला वर्ष 5, अंक 11, पृष्ठ संख्या 72
  2. The World Bank: Indigenous Peoples: Mar 19, 2021 https://www.worldbank.org/en/topic/indigenouspeoples
  3. United Nations – Oisika Chakrabarti: Who are Indigenous peoples? Indigenous Peoples and Indigenous Voices, Fact Sheet, Department of Public Information. https://www.un.org/esa/socdev/unpfii/documents/5session_factsheet1.pdf
  4. सूर्या बाली : भारत में “विश्व के इंडीजेनस लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस” को विफल करने का षणयंत्र. गोंडवाना समय डेलि न्यूज़ , अगस्त 2021 https://www.gondwanasamay.com/2021/08/blog-post_html

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डॉ. सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” पेशे से एक डॉक्टर हैं और अंतर्राष्ट्रीय कोया पुनेमी विचारक और चिंतनकार हैं.

2 thoughts on “भारत में “विश्व के इंडीजेनस लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ को आयोजित करने और मनाने के सही मायने”

  1. Aapne bahut hi satik tarike se samjhaya hai sir
    Sabhi Koya Punemi logo ko ese sensitive mudde ko uthaane samne aana hi chahiye…
    Tabhi hum log aane vale generation ko ek manch mein lane me kamyaab honge…

    Apko Mera bahut sara
    Punal Koya Punemi Sewa Sewa Sewa Johar
    🙏🙇🙏

    1. Dear Lalit Ji,
      Sadar Sewa Johar !
      I am happy that you liked the concept of this article . We are bringing the truth of Indian indigenous history, culture and narratives which was never brought by anyone before .
      Worlds should know that who are Koitoor and what is their religion, art, culture, language, traditions , myths and belief….
      Thanks a again

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