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कुफिर (Kuffir)

क्या ब्राह्मण अपनी गाड़ी से किसी को उड़ा कर वहाँ से भाग जाते हैं? मतलब: क्या ब्राह्मण मोटर दुर्घटना का कारण बनते हैं और भाग जाते हैं?

हालिया की दो घटनाएं कहती हैं कि वे ऐसा करते हैं। पहली घटना एक फिल्म की है, जो कि एक कल्पना की दुनिया वाला काम है; दूसरी है एक वास्तविक घटना जो कल्पना से कहीं ज्यादा अजीब है। यही कारण है कि दुर्घटनाओं को लेकर मेरे मन में ऐसे विचार कौंधे।

पहला नेरेटिव कुछ सप्ताह पहले एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई फिल्म ‘जलसा’ से जुड़ा हुआ है।[1] फिल्म का मुख्य पात्र एक मेनन है, जो लगभग एक ब्राह्मण है, जो अपनी बड़ी कार से एक पैदल यात्री को टक्कर मारती है, और मौके से भाग जाती है। मेनन को एक समाचार चैनल में एक ‘शक्तिशाली’ पत्रकार के रूप में दिखाया गया है, जो कि कठिन प्रश्न पूछता है। किसी भी ‘राष्ट्रीय’ चैनल पर अपने शो में ऐसा कोई ब्राह्मण न्यूज एंकर कर सकता है, है न?

और वह पंक्ति जो पॉल कोएल्हो (Paul Coelho) ने शायद एक हिंदी फिल्म के लिए लिखी थी, ‘कि जब आप कुछ चाहते हैं, तो सारा ब्रह्मांड आपको इसे हासिल करने में मदद करने के लिए तारें भिड़ाने में लग जाता है’ और ये बात इस ब्राह्मण स्टार पत्रकार को बचाने के लिए सच साबित होती है कि कहीं उसे किसी भी तरह के दंड का सामना न करना पड़ जाए। मामले की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी, घटनास्थल पर मौजूद एक चश्मदीद, उसका ड्राइवर, उसकी नौकरानी, ​​उसका बॉस और आखिर में वो रिपोर्टर जो मामले को आगे बढ़ा रहा है – वे सभी कारण ढूंढते हैं, बहाने ढूंढते हैं कि ब्राह्मण पत्रकार कहीं फंस न जाए।

दूसरी घटना वास्तविक जीवन की है, नायक इस बार एक असली ब्राह्मण है। एक केंद्रीय मंत्री के पुत्र, इस ब्राह्मण ने 3 अक्टूबर, 2021 को अपनी कार में अपने काफिले के साथ आते हुए विरोध कर रहे किसानों के एक समूह पर गोली चला दी और उन्हें कार से कुचल डाला। इस घटना में आठ लोग मारे गए थे, और न तो पुलिस और न ही अदालतें आपको बता सकती हैं कि पूरी तरह से सार्वजनिक तौर पर घटने वाले इस घिनोने काण्ड का जिम्मेदार कौन था। अभियुक्तों को गिरफ्तार करने में एक लंबी देरी के बाद, [2] और सत्ताधारी प्रतिष्ठान यानि रूलिंग एस्टाब्लिश्मेंट के इधर-इधर के खेल के बाद न्याय के पहिये बहुत धीमी गति और मन मार के आगे बढ़े। और अभियुक्त फरवरी में जमानत पर छूट गया। और फिर वह वापस जेल चला गया और अब फिर से जमानत मांग रहा है। [3] [4] [5] [6] अब वह अलग अलग शीर्ष पदों पर बैठे अपने साथी सदस्यों के खिलाफ एक मामूली सा युद्ध छेड़े हुए है, और जैसा कि हम लंबे अनुभव से जानते हैं, निश्चित रूप से वो बरी हो जायेगा। अंततः, क्योंकि सारा ब्रह्मांड (राजनीतिक, सामाजिक, न्याय और मीडिया संस्थान आदि) जादुई रूप से उसकी मदद करने की जद्दोजेहद में लग जाएगा।

और लखीमपुर खीरी के कुछ प्रदर्शनकारी किसान अभी भी जेल में हैं.[7]

लेकिन दुर्घटनाएं ‘अनियोजित’ या ‘अप्रत्याशित घटनाएं’ होती हैं, जैसा कि विभिन्न शब्दकोश कहते हैं। वे किसी भी जगह पर घट सकती हैं: घर, कार्यस्थल, सड़क पर। वर्तमान चर्चा के लिए प्रासंगिक क्या है, कार, ट्रक, मोटरबाइक आदि जैसे मोटर वाहनों से होने वाली दुर्घटनाएँ। यदि ये घटनाएँ अप्रत्याशित या अनियोजित हैं, तो मनुष्य द्वारा दुर्घटनाएँ कैसे हो सकती हैं? और ये घटनाएँ अपने होने के लिए ब्राह्मणों को ही क्यों चुनती हैं?

हम दुर्घटनाओं के एक सबसेट को देख रहे हैं: वे जो सड़कों पर होती हैं, मोटर वाहनों से। मोटर वाहनों की विभिन्न किस्में और ब्रांडों के सभी विज्ञापन किसी न किसी रूप में एक शक्ति की बात करते हैं। उन वाहनों के मालिक वास्तव में ऐसी ही शक्ति के मालिक बन जाते हैं, क्योंकि वाहन स्वयं ड्राइव नहीं करते हैं। लेकिन केवल वस्तुओं का मतलब लोगों के लिए शक्ति कैसे हो सकता है? बंदूकों का क्या मतलब है? असेंबली लाइन्स का क्या मतलब है? क्या उन सभी का मतलब उन लोगों के लिए सत्ता नहीं है जो उनके मालिक हैं या उसे अपने काबू में रखते हैं?

इस नोट का तर्क है कि भारत में राज्य सत्ता यानि ‘स्टेट पॉवर’ को जाति शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। सड़क पर सत्ताधारी जातियों की शक्ति शक्तिशाली मोटर कारों में बदल जाती है। इसकी व्याख्या ‘जीवन लेने या जीने दो’ की शक्ति के रूप में की जानी चाहिए। या संप्रभु शक्ति यानि sovereign power, जैसा कि फौकॉल्ट फरमाएंगे।

ये सत्ताधारी कौन हैं? भारतीय सड़कों पर कौन हावी है? कुछ लोग ट्रक के आकार के कारण कह सकते हैं कि ट्रक हावी है। लेकिन ट्रकों की आवाजाही कई शहरों में, कई अलग-अलग तरीकों से प्रतिबंधित है। उन्हें शहर की कई सड़कों पर कुछ घंटों के दौरान चलने की अनुमति नहीं है। मोटर चालित तिपहिया वाहनों पर भी इसी तरह के नियम लागू होते हैं। लेकिन सड़कों पर कारों को किसी भी समय प्रतिबंधित नहीं किया जाता है। ऐसा लगता है कारें सड़कों की राजा हैं, देश में किसी भी स्थान पर, कभी भी अप्रतिबंधित पहुँच के लिए लाइसेंस प्राप्त है। इसके अलावा, अन्य सभी वाहनों (कैब के रूप में कार्य करने वाली कारों सहित) को कई मायनों में ‘सामाजिक परिवहन’ माना जा सकता है, क्योंकि वे उत्पादन प्रक्रियाओं में लगे लोगों और सामानों को स्थानांतरित करते हैं जो अर्थव्यवस्था को चालू रखते हैं: वे एक तरह से अलग अलग तरीके के कौशल या विभिन्न प्रकार के श्रमिकों या उसी रैंक की तरह ही हैं, जो किसी भी कारखाने, दुकान में काम करते हैं। और अधिकांश ड्राइवर बहुजन हैं, जो सामाजिक स्तर के निचले पायदान से हैं, जबकि मालिक उच्च जाति या उच्च जाति के द्वारा नियंत्रित व्यवसाय हैं।

अब बचीं मोटरसाइकिलें। दुनिया भर में, कई अध्ययनों में कहा गया है, मोटरसाइकिल चालक अन्य प्रकार के वाहनों के साथ किसी भी मुठभेड़ में खुद को दूसरों की तुलना में अधिक नुकसान पहुँचा बैठते हैं। वे उतनी शक्ति नहीं बघार सकते जितनी कि कारें, ऐसी शक्ति जिससे किसी को सबक सिखाया जाये, दण्डित किया जाये या जान ही ले ली जाये। राज्य की शक्ति का प्रयोग जाति शक्ति के माध्यम से किया जाता है।

भारतीय शिक्षा और सिविल सोसाइटी में अपने ख्वाबों के जहान में रहने वाले वे लोग, जो ‘ब्राह्मण’ शब्द को जरा जोर से बोलने से भी नफरत करते हैं, वे इस बात से सहमत नहीं होंगे कि यह जाति शक्ति है, और वे शायद फिर से फौकॉल्ट और ऐसे अन्य विचारकों के पास वापस जाएंगे और कहेंगे कि राज्य सत्ता बहुसंकेतक माध्यमों यानि बहुत सी व्याख्याओं से संचालित होती है. रिकॉर्डिंग (recording), मापन (measuring), वर्गीकरण classifying), मूल्यांकन (evaluating), कंडीशनिंग (conditioning) से संबंधित टेक्नोलॉजी के विशाल विस्तार के ज़रिये इस विशाल आबादी को मैनेज किया जाता है।

फौकॉल्ट फ्रांस से हैं, जहाँ 90% से अधिक आबादी लंबे समय से कारों की मालिक है। अब यह संख्या थोड़ी कम हो गई है क्योंकि कई लोग कारों में रुचि खो रहे हैं क्योंकि वे पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक हो गए हैं। [8] जबकि भारत में, केवल 2.2% आबादी के ही पास कारें (7-8% घर) हैं। [9] क्या हम एक ही ग्रह पर रहते हैं? भारतीय शिक्षाविदों को तो ऐसा ही प्रतीत होता है; वे शायद फ्रांस और अन्य फैंसी जगहों में रहते हैं और उनका शोध ज्यादातर यही दर्शाता है।

भारत के जाति-विहीन ‘गणराज्य’ ने अब तक सभी राज्य संस्थानों और राजनीतिक क्षेत्र में ब्राह्मणों और उच्च जातियों की भारी ताकत को कम करने के लिए सभी प्रकार के उपायों का इस्तेमाल किया है। क्या भारत में 90% से अधिक कार मालिक एक ही वर्ग के नहीं हैं? और उनमें भी आधे से ज्यादा ब्राह्मण? क्या यह सब भारत की ज़मीनी हकीक़त से मेल नहीं खाता, जैसे कि भूमि के संबंध में: दो से तीन जातियाँ या इससे कुछ अधिक के पास भारत के प्रत्येक राज्य में कृषि भूमि और शहरी संपत्ति का 70-85% हिस्सा है। [10] [11] [12] सामूहिक रूप से, क्या वे भारत में जीवन के हर क्षेत्र में वैसे ही सामान अधिकार नहीं रख रहे जैसे कि पुराने दौर में पूर्ण कुलीन वर्ग रखते थे?

उन सभी आंकड़ों (डेटा) को विवादित या आसानी से अस्वीकृत किया जा सकता है, जाति जनगणना आयोजित करके (अगर जातीय जनगणना संभव हो)। लेकिन ओबीसी जाति की जनगणना नहीं, क्योंकि शासक वर्ग के शिक्षाविदों (academics) ने इस प्रोजेक्ट को घुमा दिया दिया है। यदि भारतीय बुद्धिजीवी भारतीय समाज का अध्ययन करने में ईमानदार होते, तो वे लंबे समय से जातीय जनगणना की मांग कर रहे होते। 1951 से ही। ऐसा न होने पर उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया होता और अपने पुरस्कार आदि वापस कर दिए होते, जैसा कि उन्होंने कई अन्य अवसरों पर किया। लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं।

तब तक के लिए भारत में जातीय व्यवस्था को पूरी हद तक समझने के लिए जिस चीज़ की ज़रुरत है वह छोटा सा एकमात्र तथ्य है। भारत में कारों का मालिक कौन है? केवल 2.2% भारतीयों के पास कारें हैं।

तो जाति जनगणना, जो न तो केंद्र सरकार और न ही कल्पनाओं में जीने वाली सिविल सोसाइटी (दोनों ब्राह्मणों, उच्च जातियों द्वारा संचालित) वास्तव में चाहते हैं, तो फिर कार-मालिकों की प्रोफ़ाइल को क्यों न देख लिया जाए? इसमें तो आंकड़े इकट्ठा करना और उनका मिलान करना भी बहुत आसान है। और इसपर किसी भी दोहरे जाति सर्वेक्षण (जनगणना नहीं), जिसकी कुछ राज्य योजना बना रहे हैं, के मुकाबले एक लाखवां हिस्सा खर्च होगा। लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा क्योंकि इससे भारत की स्थापना के काले रहस्य का खुलासा हो जाएगा: कि इसका तो मकसद हमेशा से ही ब्राह्मणों और इसकी सहायक उच्च जातियों की सेवा करना रहा है, हर राज्य में।

अंत में फिर वही प्रश्न: क्या ब्राह्मण हिट-एंड-रन यानि अपनी गाड़ी से किसी राहगीर को उड़ाकर मौके से भाग लेते हैं? हाँ, वे ज्यादातर ऐसा ही करते हैं। क्योंकि केवल वे ही हैं जो ऐसा कर सकते हैं, अक्सर।

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संदर्भ

  1. ‘Jalsa’, IMDB. https://www.imdb.com/title/tt15361028/
  2. ‘Lakhimpur: SC pulls up UP police over delay in arrests’, Hindustan Times, October 9, 2021. https://www.hindustantimes.com/india-news/lakhimpur-sc-pulls-up-up-police-over-delay-in-arrests-101633742171847.html
  3. ‘Lakhimpur Incident: FIR Filed Against Ashish Misra, Oppn Stopped From Visiting Violence-Hit Area | Key Points’, ABP News,October 4, 2021. https://news.abplive.com/news/india/lakhimpur-incident-fir-filed-against-ashish-misra-oppn-stopped-from-visiting-violence-hit-area-key-points-1485803
  4. ‘Lakhimpur: Ashish Mishra mowed down farmers, opened fire at at them, says FIR’ Times of India, October 5, 2021.  https://timesofindia.indiatimes.com/india/lakhimpur-ashish-mishra-mowed-down-farmers-opened-fire-at-them-says-fir/articleshow/86788194.cms
  5. ‘Minister’s Son, Accused Of Running Over Farmers In UP, Released From Jail’, NDTV, February 15, 2022.  https://www.ndtv.com/india-news/ministers-son-accused-of-running-over-farmers-in-up-released-from-jail-2769794
  6. ‘Lakhimpur Kheri case: Family of farmers moves SC against Ashish Mishra’s bail’ Indian Express, February 22, 2022. https://indianexpress.com/article/india/lakhimpur-kheri-case-family-of-farmers-moves-sc-against-ashish-mishras-bail-7784519/
  7. ‘Farmers begin 75-hour strike in Lakhimpur Kheri, call for minister’s sacking’, Hindustan Times, August 18, 2022. https://www.hindustantimes.com/india-news/farmers-begin-75-hour-stir-in-lakhimpur-kheri-want-union-minister-sacked-101660804049679-amp.html
  8. ‘France falls out of love with the car’, The Guardian, November 9, 2014. https://www.theguardian.com/world/2014/nov/09/france-car-ownership-sales-downturn
  9. ‘India has 22 cars per 1,000 individuals: Amitabh Kant’, The Economic Times, December 12, 2018.
    https://auto.economictimes.indiatimes.com/news/passenger-vehicle/cars/india-has-22-cars-per-1000-individuals-amitabh-kant/67059021
  10. ‘Brahmanism: Colonization of Words and Land’, Round Table India, August 13, 2015. https://www.roundtableindia.co.in/colonization-of-knowledge-produces-colonization-of-land-and-life/
  11. ‘The cashlessness of the Bahujan’, Round Table India, December 14, 2016. https://www.roundtableindia.co.in/the-cashlessness-of-the-bahujan/
  12. ‘Bahujans and Brahmins: Why their realities shall always collide, not converge’, Round Table India, August 16, 2017. https://www.roundtableindia.co.in/bahujans-and-progressive-brahmins-adversaries-not-allies/

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कुफिर राउंड टेबल इंडिया के संस्थापक सदस्य हैं व् संपादक सदस्य हैं.

अनुवादक : गुरिंदर आज़ाद

लखीमपुर खीरी के शहीदों को सम्मानित करते प्रदर्शनकारियों की तस्वीर: Sabrang

अंग्रेजी भाषा में इस आलेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

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