जातियों के झुण्ड

निकल चुके हैं
जातियों के झुण्ड
अपनी पीठ पर उठाये
वर्णाश्रम का बोझ
जो उठाये जा रहे सदियों से

बोझ जो सदियों से
थोपे गये
ब्राह्मणों के द्वारा
खेत की पगडंडियों से लेकर
गांव की गलियों तक
सड़कों से लेकर
हाईवे के सन्नाटों तक
ये चले जा रहे।

इन जातियों के झुंडों ने
बनाई है इमारतें
उगाई हैं फसलें, भरे हैं पेट परजीवियों के
सहे हैं मार, और एवज में
खाये हैं गालियों के अथाह द्वेष।

ये जातियों के झुंड
चले जा रहे, आँख दिखाते
इन परजीवियों को
जिन्होंने मजबूर किया है
छोड़ने को, इन्ही के बनाये शहरों से,
नहीं आएंगे लौटकर, अब रहेंगे
अपनी बस्तियों में,
जातीय झुंड बनकर
कहीं चमार, कहीं खटिक कहीं अछूत
कहीं मल्लाह, कहीं डोम बनकर

खाते रहेंगे गालियाँ
मरते रहेंगे जातीय हिंसाओं में
ये जातियों के झुंड जो चले जा रहे।


हिन्दू सभ्यता की ऊँची इमारत

हिन्दू सभ्यताओं के मुहाने पर
हर ओर लिखी है
दलितों के चिताओं की कहानी,
जिनके ढेर पर बनी है
हिन्दुओं की सभ्यताओं की ऊँची इमारत

जहाँ गायों के नाम पर काटे जाते हैं
मुसलमानों के सर
जहाँ रौंद दिया जाता है
दलितों को खेतों की हरवाही में
जहाँ टूट पड़ते है
जिस्मों पर हवसी भेड़िये
लेकिन
कर दिए जाते हैं बरी
पंडितो ठाकुरों की
अदालतों में

और छोड़ दिया जाता है
दलित महिला को फिर से
उन्हीं चिताओं पर
जलने को
नोचें जाते है जिस्म गलियों, मोहल्लों
और खरीहानों में
ताकि बन सके
फिर हिन्दू सभ्यता की ऊँची इमारत।

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प्रणवीर भारती, जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी (दिल्ली) के सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज़ विभाग से पीएचडी कर रहे हैं. उनसे pranv5898@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

तस्वीर साभार: The Guardian

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