Mudassir Ali Lone

मुदासिर अली लोन (Mudasir Ali Lone)

जब भी कोई कश्मीर में जातिवाद की बात करता है तो हम अक्सर “नही” में अपना सिर हिलाते हैं। अगर आप डरावनी कहानियाँ सुनने के मूड में हैं तो आप कश्मीर में ग्रिस्त (खेती बाड़ी करने वाले) जाति के लोगों से मिलें और उनसे पूछें कि मल्ला/पीर/सैयद (उच्व जाति) उनके साथ कैसा बर्ताव करतें थें? अगर आप को लगता है कि वो कुछ खास भयानक नहीं है तो फिर आप नानगार (भूमिहीन) जातियों के लोगों के पास जाईये और पूछिये कि दूसरी जाति के लोग उनके साथ कैसा बर्ताव करते थें और आज भी करतें हैं? और अगर आप और भी भयानक कहानियाँ सुनना चाहते है तो वातल (चमार, इन्हें शेख भी कहा जाता है) जाति के लोगों के पास जाईये और उनसे पूछिये कि कैसे समाज ने सदैव उनको खुद से अलग रखा?

उन्हें समाज से इस तरह बहिष्कृत किया गया है कि वातल/ चमार शब्द उपहास का पर्याय बन गया है, और दूसरे समुदाय के लोगों को गाली देने के लिए प्रयोग किया जाता है। हान्ज़ (मछुवारा) जाति के लोगों को हमेशा जातिवाद के क्रोध का सामना करना पड़ा है। मैं हान्ज़ जाति के किसी भी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, लेकिन मैंने बचपन से हान्ज़ शब्द को एक तिरस्कार/व्यंग के रूप में सुना है और अपने गाँव में लगभग हर एक व्यक्ति को उनको और उनके नाम को अपमानित करते देखा है। जब आप यह सब देख लेंगें तो आप यह कहने की हिम्मत कैसे करेंगें कि कश्मीर में जातिवाद नहीं है। 

मल्ला/पीर जाति खुद को सबसे ऊँचा समझते हैं, इसके बाद ग्रिस्त (खेतीबाड़ी करने वाले) आते हैं और इसके बाद नानगार (भूमिहीन)। इस जाति व्यवस्था में सबसे नीचे वातल (चमार) और हान्ज़ (मछुवारा) जाति के लोग आते हैं। मल्ला जाति ने धोखा, फरेब और झूठ से अन्य सभी का शोषण किया है। कश्मीर में एक कहावत है, “मल्ला डीशिथ गौस पूरन इस्तिग़फार” [मल्ला को देखकर इस्तिग़फ़ार (पाप से बचने की प्रार्थना)] पढ़ना चाहिए)।

मैं अपने एक दोस्त से कश्मीर में जातिवाद पर बात कर रहा था, तो उसने कहा कि वातल/ चमार/ शेख और हान्ज़ हमेंशा अलग बस्तियों में ही रहते आये हैं और उनके साथ हमेंशा से बुरा व्यवहार किया जाता रहा है। फिर उसने अपने गाँव की एक कहानी सुनाई, उसने कहा कि, “एक दिन शेख जाति (चमार/ वातल) के एक आदमी को वहाँ के मल्ला के साथ खाना खाने के लिए बुलाया गया, और जब उसको पता चला कि इस समारोह में मल्ला भी है तो वह वहाँ से यह कह कर भाग गया कि “अगर वह मल्ला (इमाम) के साथ एक ही बर्तन में खाना खायेगा तो वह जहन्नम (नरक) में जायेगा।” धर्म का प्रयोग कर अपने व्यक्तिगत लाभ और दूसरे का शोषण करने के लिए मल्ला/ पीर कुख्यात हैं। अपने स्तिथि/स्थान को उच्च बनाये रखने के लिए वो हमेंशा धर्म का प्रयोग एक साधन के रूप में करतें हैं। मेंरा दोस्त आगे कहता है कि, “वह (चमार/वातल/शेख) एक दुर्बल वृद्ध था, वह अपने परिवार और कुछ तीन चार मोची परिवारों के साथ गाँव के किनारे पर रहता था। 

एक घटना मुझे अब भी याद है जब मैं रेल में दो लोगों के साथ यात्रा कर रहा था, उनमें से एक कराल (कुम्हार) था, उन दोनों के बीच में कुछ झगड़ा हुआ और वो बहस करने लगे जिसके बीच में दूसरे व्यक्ति ने पहले वाले से कहा, “कराल छुख ना हावख ना कराला खसलत”(कुम्हार हो कुम्हारों वाला रंग दिखा रहे हो), यह सुन कर मैं हैरान नहीं हुआ क्योंकि ऐसी बातें करना कश्मीर में आम बात है। खुद मेंरे गाँव में चमार/शेख जाति के लोगों को एक हद तक अलग कर दिया गया है, हमारे गाँव के सभी चमार/शेख एक छोटे से मुहल्ले में रहते हैं, उनके घर छोटे हैं जिस के आस पास बहुत ही कम खाली जगह है।

मुझे याद है कि जब बाहर से कोई नया शेख/ चमार /वातल हमारे गाँव में रहने आता था तो वो भी उसी मुहल्ले में रहने के लिए चला जाता था जबकि वहाँ जगह बहुत कम है। इस मोहल्ले का नाम शेखुपुरा है जो एक स्कूल और सड़क के बीच में बसा है। इस मुहल्ले के उलट हमारे गाँव के दूसरे मोहल्लों के घरों में पर्याप्त खाली जगह रहती है। इस से हमें इस बात का अनुमान लगता है कि शेख/चमार और हान्ज़ को हमारा समाज किस हद तक अपना मानता है। अगर हम बाकी नानगार (भूमिहीन) जातियों की बात करें तो शेख/चमार की अपेक्षा उनपर जातिवाद की मुसीबत कुछ कम देखने को मिलती है क्योंकि हमारा समाज उनपर दैनिक आवश्यकताओं के लिए ज़्यादा निर्भर है। नानगार जाति में हुनरमंद (कौशल युक्त) काम करने वाले लोग जैसे बढ़ई, राजमिस्त्री, नाई, लोहार, कुम्हार, नानबाई आदि आतें हैं। चूंकि मैं ग्रिस्त (खेती बाड़ी करने वाले) जाति से हूँ, मैं अच्छी तरह से जनता हूँ कि वो नानगारों को कैसी नीची नज़र से देखते हैं. वे उनका सम्मान नहीं करते और हमेंशा उनको अपने पैरों तले दबा कर रखना चाहतें हैं। 

मल्ला/पीर का दूसरी जाति में विवाह तो लगभग असंभव है ही, कश्मीर में ऐसे कई सारे प्रसंग हैं जब मल्ला/पीर ने अपनी जाति की उच्चता/ बड़प्पन को लेकर अपने बच्चों को दूसरी जातियों में विवाह करने से बलपूर्वक रोका है। ग्रिस्त (खेतीबाड़ी करने वाले) और नानगार (भूमिहीन) में अगर शादी हो तो बहुत सी नज़रें उठ जाती हैं और उसका विरोध भी होता है। शेख/चमार और हान्ज़ को तो बिल्कुल ही अलग किया गया है और मुझे अभी तक ऐसी कोई शादी का पता नहीं है जहाँ किसी दूसरी जाति के लोगों ने उनके साथ शादी बियाह किया हो।

मेरी एक दोस्त (जो ग्रिस्त जाति से है) ने मुझसे बताया कि वो नानगार जाति के एक लड़के से शादी करना चाहती है। उसने मुझसे पूछा कि क्या उसके घर वाले इसकी आज्ञा देंगें?, तो मैंने कहा, क्यों नहीं! जबकि मैं अंदर ही अंदर यह बात जानता था कि उसके घर वाले इस बात के लिए उसका विरोध ज़रूर करेंगें। उसने मुझ से कहा कि उस लड़के का एक रिश्तेदार (जो लड़की के घर वालों का पारिवारिक दोस्त भी है) उससे यह कह रहा था कि उसे इस रिश्ते के बारे में भूल जाना चाहिए, क्योंकि इससे उनके परिवारों के बीच में तनाव पैदा होगा। यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि उस लड़की के घर वालों का दोस्त भी एक नानगार है और वह लड़की उसी के परिवार के द्वारा उससे मिली थी। और अब अगर वो अपने घर वालों के सामने अपनी इच्छा व्यक्त करती है तो सब से पहले प्रलय उनके पारिवारिक दोस्त पर आएगी और उसके बाद लड़के वालों पर, क्योकि एक नानगार लड़के ने कैसे यह दुस्साहस किया कि वह एक ग्रिस्त लड़की को चुरा ले जायेगा।

ऐसे बहुत सारे प्रसंग हुए हैं जब परिवारों के बीच इन्ही चीज़ों पर लड़ाई हुई है और दोस्ती खत्म हुई है। एक ग्रिस्त परिवार एक नानगार परिवार का दोस्त तो हो सकता है पर इनके बीच में शादी की बात हो तो प्रबल विरोध होता है। मैं नानगार और ग्रिस्त के बीच एक शादी के बारे में जानता हूँ, जो कि घर वालों की मर्ज़ी से ही हुई थी। जब उनकी शादी हुई तो मैंने ग्रिस्त जाति के कई लोगों से बातें सुनी कि, “यमाव कियाज़िह कोर्र नानगाराँन हिन्द?” (उन्होंने नानगारों के यहाँ शादी क्यो की?)। उस औरत को कई बार नानगार होने के ताने दिए जाते थे। उसके पति के घर वालों के धार्मिक सोच के कारण उस लड़की के साथ कोई अत्यचार तो नहीं हुआ पर व्यंग और ताने तो सुनने ही पड़े, क्योंकि यही तो हमारी सभ्यता है।

कश्मीर के साहित्यकार और बुद्धिजीवी कश्मीर के बाहर जातिवाद पर बात तो करते हैं लेकिन कश्मीर में इस महामारी को देख नहीं पातें। मैंने खुद आजतक इसपर कश्मीर में सही अंदाज़ और विस्तार में बात होते नहीं देखी है, यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी इसकी बात नहीं होती। मैं ऐसे कई सारे लोगों को जानता हूँ जो कश्मीर से बाहर अन्य भारतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले जातिवाद पर अफसोस करते हैं और उसके विरोध में आवाज़ उठाते हैं पर अफसोस खुद यही लोग कश्मीर में आकर जाति के आधार पर प्रयोग होने वाले व्यंगात्मक/तिरस्कारी शब्दों का प्रयोग करतें हैं। यही लोग फिर कश्मीर में आकर हान्ज़ और वातल जैसे शब्दों का उपयोग एक दूसरे का निरादर और मज़ाक़ उड़ाने के लिए करते हैं। और जब उन्हें इस बात पर टोका जाता है तो हैरानी का इज़हार (आश्चर्य प्रकट करना) करते हैं। इस बात का संज्ञान रहे कि यह वही लोग होते हैं जो कहते है कि वह जातिवाद की समस्या को समझते हैं व् स्वयं को जातिवाद के विरुद्ध लड़ने वालों में समझते हैं। अगर जातिवाद को समझने वालों का यह हाल है तो आप समझ सकते हैं कि आमजन का क्या हाल होगा? कश्मीर में किसी के साथ भी जातिवाद के बारे में बात करो तो वह अन्य भारतीय क्षेत्र की बात करने लगता है। वह अन्य भारतीय क्षेत्र के दलितों और बहुजनों की बात तो करेंगें, लेकिन मुझे अभी तक ऐसे लोग नहीं मिले जो कश्मीर में जातिवाद की मौजूदगी को स्वीकार करें। हमें तो धोखे में जीना अच्छा लगता है।

कश्मीर में जातिवाद की समस्या पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है. यह एक बड़ी बुराई है जो हमारे दिलों में रहती है। मुझे कोई बड़ा कारण नहीं दिखाई देता कि मैं कश्मीर के सभ्यता और संस्कृति पर गर्व महसूस करूँ जबकि उसने जातिवाद जैसी बुराई को भी पैदा किया है। मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कश्मीरी सभ्यता ने और क्या क्या चीजें पैदा की हैं। अगर उसने जातिवाद जैसी वाहयात चीज़ पैदा की है तो यह मेंरे लिए काफी है कि मैं उससे नफरत करूँ। हमारा समाज एक जातिपूजक समाज है और मैं इस बात से लज्जित हूँ, बल्कि हम सब को होना चाहिए। और मुझे सामूहिक गर्व का विचार बिल्कुल समझ में नहीं आता अलावा इसके कि जब यह अत्यचार और अत्याचारी के विरोध में प्रयोग किया जाए।

नोट:- चूंकि मैंने यहाँ पर जो कुछ भी लिखा है वह मेंरे व्यक्तिगत अनुभव और अवलोकन पर आधारित है, तो इसमें त्रुटियाँ भी हो सकती हैं और ऐसा भी हो सकता है कि किसी जगह पर किसी जाति से सम्बंधित कोई बात ग़लत तरीके से प्रस्तुत हुई हो, अगर कहीं पर आप को ऐसा कुछ दिखाई दे तो इसके बारे में मुझे ज़रूर सूचित करें। और मल्ला/पीर/सैयद जाति के लोगों के लिए एक विशेष बात ..अगर आप इस विषय पर बात करना चाहते हैं तो पहले इस बात को स्वीकार करें कि आप के जाति के लोगों ने  कश्मीर में अन्य सभी जातियों के लोगों का सदियों से शोषण किया है, और आप इस बात से बहुत लज्जित हैं। अगर आप ऐसा नहीं कर सकते तो मेंहरबानी करके इस विषय पर आप बात न ही करें तो अच्छा।

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मुदासिर अली लोन मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद से बी.टेक कर रहे हैं और उनसे aleemudasir@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

अंग्रेजी भाषा में यह आर्टिकल राउंड टेबल इंडिया (अंग्रेजी) में यहाँ छपा था.

फ़ैयाज़ अहमद फ़ैज़ी ने इस आलेख का अनुवाद किया है. फ़ैयाज़ खुद एक लेखक और अनुवादक हैं एवं AYUSH मंत्रालय में रिसर्च एसोसिएट के पद पर कार्यरत हैं. 

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