लेनिन मौदूदी (Lenin Maududi)

मेरा भाई अल्तमश मुझे आज कल बहुत से नए शायरों से रूबरू करा रहा है. ये शायर इतने प्रगतिशील और क्रांतिकारी हैं कि ये “खुदा की ज़ात” पे भी शेर लिखने से नहीं डरते. पर इनमें से किसी का भी शेर “जाति व्यवस्था’ के खिलाफ़ नहीं पढ़ा है मैंने. ऐसा कैसे मुमकिन है कि वे दुनियां जहाँ के विषयों पे लिख रहे हैं पर उन्हें “जाति” नज़र नहीं आती? ये शायर और कवि अपने जीवन के इस पहलु पर वैसे ही प्रगतिशील क्यों नहीं है?

शायरों, कवियों को संवेदनशील माना जाता है. कहा जाता है कि जो काम समाजशात्री अपने सिद्धांत दे कर या अर्थशात्री अपने आकड़े दे कर नहीं कर सकता. वह काम लेखक-शायर अपने गीतों और कहनियों से कर जाते हैं. हम कभी कोई आकड़ें पढ़ कर नहीं रटते बल्कि कोई संवेदशील कविता-ग़ज़ल या कहनी पढ़ कर रो देते हैं.

अगर वाकई ये शायर-लेखक संवेदनशील हैं तो ऐसा कैसे है कि गुजरात में दलितों को पीटा जाता है और ये महबूब की कमर पे शेर लिख रहे हैं. कुरैशी समाज पर उत्तरप्रदेश सरकार ज़ुल्म करती है उनके रोज़गार को समप्त किया जा रहा है और ये शायर पारलौकिकता पे शेर लिख रहे हैं. जुलाहों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और ये मोहब्बत के इज़हार और इनकार पे शेर लिख रहे हैं. ऐसे में ये सवाल उठता है कि ऐसा क्यों है? 

दरसल  ये अशराफ शायर जिस समाज से आते हैं उस समाज की समस्या, पसमांदा समाज की समस्या से बिलकुल अलग है. ये अशराफ शायर वो धूर्त लोग हैं जो सब कुछ जानते हुए भी चुप हैं क्योंकि इन लोगों के पास संसाधन हैं. इसलिए ये तैय करने की स्थिति में हैं कि ग़ज़ल के टॉपिक क्या हों? यही वजह है कि पसमांदा समाज से आने वाले शायर भी उन्हीं मुद्दों पर शेर कहते हैं जिन पर अशराफ शायर अपनी ग़ज़लें कह रहे हैं. एक पसमांदा शायर अपने लूम, अपनी साड़ी, कपड़े, बानी, अपने समाज की परेशानी आदि पर शेर न लिख कर अशराफो की तरह औरतों की कमर उनकी ज़ुल्फों पर शायरी करता नजर आ जाएगा. आज कल इन अशराफों ने एक नया ट्रेंड चलाया है- आध्यात्मिकता का संक्षेप में मतलब ये है कि अशराफों ने तैय कर रखा है कि पसमांदा शायरों को उनके समाज की वास्तविक समस्याओं पर बात नहीं करने देंगे. उन्हें परलोक, स्वर्ग-नर्क, ईश्वर आदि में उलझाए रखेंगे. ये ‘बेवकूफ’ पसमांदा शायर और लेखक इसे ही अपनी कामयाबी मानेंगे कि ये भी अपने आकाओं की तरह उनके मुद्दों पर शायरी कर रहे हैं.

यही हाल हिंदी फिल्मों का भी रहा है. हिंदी फिल्मों में मुस्लिम पहचान दरसल अशराफ मुसलमानों की पहचान है. महबूब की मेंहदी, पाकीज़ा, उमराव जान, डेढ़ इश्क़िया जैसी फिल्में इस श्रेणी में रख सकते हैं जिसका पसमांदा मुसलमानों से कोई ताल्लुक नहीं है. इसमें अशराफ जातियों के तौर-तरीके और भाषा को “मुस्लिम संस्कृति” के रूप में दिखाया गया हैं. इन फिल्मों में  जिस भाषा और शान-ओ-शौकत को दिखाया गया है वे वास्तव में 85% पसमांदा समाज के लिए एलियन थी. दरसल इन फिल्मों ने पसमंदा समाज की रोटी-रोज़ी की समस्या को सिरे से खारिज कर दिया है. आप हिंदी फिल्मों में मुस्लिम पहचान के किरदारों के नाम ही देख लें कि कितने प्रतिशत किरदार अंसारी, राईन, मंसूरी, धोबी आदि नाम के हैं और कितने खान, मिर्ज़ा, शेख नाम से हैं.. अशराफों ने जो ट्रेंड सेट किया उसी पर आज भी हमारे पसमांदा लेखक और शायर अपनी कहानियां और गज़लें लिखते हैं. अगर किसी अशराफ शायर- लेखक  ने पसमांदा समस्या पर लिखा भी है तो उसने उस समस्या को रोमांटिसाइज़ कर दिया है.

कितना ख़तरनाक होता है. समस्याओं को रोमांटिसाइज करना. सब कुछ अच्छा-अच्छा दिखाइए. गरीब होने को महिमामंडित करिए जैसे बॉलीवुड करता आया है.  ऐसा कर के आप न सिर्फ असल मुद्दों को दबाते हैं बल्कि उस जाति में पनपने वाले विद्रोह को भी दबा देते हैं जैसे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा “भंगी का काम करने से आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है”[कर्मयोगी, पेज 101] पर मोदी जी खुद इस आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति नही करना चाहेंगे. वहीं गांधीजी भी वर्ण-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कहते हैं कि “भंगी का काम पुण्य का काम है. इससे अगला जन्म सुधरता है”. गांधी मान कर चल रहे थे कि उनका पुण्य काफ़ी है अगला जन्म सुधारने के लिए तभी तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से भंगी का काम नहीं किया. वहीं  गुलज़ार साहब लिखते हैं कि “मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे”. गुलज़ार साहब अगर जुलाहा का पेशा अपनाना चाहते हैं तो उसमें क्या दिक्कत है. उनको बीएस घर-जायदाद दान कर के घर मे हैण्ड लूम लगवाना है फिर सारी तरक़ीब समझ मे आ जाएगी. पसमांदा समाज की समस्याओं को रोमांटिसाईज़ कर के बेचा तो जा सकता है पर गुलज़ार साहब जुलाहा नहीं बनेगे.

आज जुलाहों के हालत किसी से छुपी नही है. मियां-बीवी औसत 3 बच्चे, दो कमरे का घर. उसमें से एक कमरे में पॉवर लूम लगा हुआ रहता है. जो तब तक चलता है जब तक लाइट रहती है. इस पॉवर लूम को घर के सभी सदस्य मिल के चलाते हैं. उत्तर प्रदेश में लाइट का हाल आप को पता ही है. पूरे दिन में मुश्किल से 12-14 घंटे रहती है, तो उस हिसाब से 24 घंटे में 2-3 साड़ी मुश्किल से बन पाती है. एक साड़ी पर औसत 120 रुपये मिलते हैं अर्थात 120×3×30= 10,800 रूपये मासिक अधिक्तम की कमाई हो पाती है. इतनी ही कमाई में घर परिवार चलाना है, बच्चों को पढ़ाना है और स्वास्थ्य संबंधी खर्च भी करना है. ये हाल है दूसरों का तन ढंकने के लिए कपड़ा बुनने वाले बुनकर का जो खुद नंगे बदन काम करते हुए दो जून की रोटी को तरस रहे हैं. गंदगी और बीमारियों के साथ तालेमल बिठाते हुए काम कर रहे इन लोगों ने शायद यह मान लिया है कि उनके हिस्से में इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं. ना तो न्यूनतम मज़दूरी मिलती है और ना ही ‘लोककल्याणकारी राज्य’ की सुविधाएँ. हर रोज़ रोज़ी-रोटी में हाडतोड़ मेहनत करने में ये सोच ही कहाँ पनपती है कि बच्चा स्कूल जाए. अगर स्कूल भेजें भी तो बस वहीं तक जहाँ तक सरकारी स्कूल है. बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब मिलकर काम करते हैं तो मुश्किल से गुज़र हो पाता है. घर में किसी के बीमार होने या बेटी की शादी आदि कुछ भी बड़ी समस्या आई कि नहीं इनकी सारी बचत एक झटके में हवा हो जाती है और फिर वह उसी दरिद्रता में चले जाते हैं जहाँ से बड़ी मुश्किल से निकले होते हैं.

पर इन सब बातों से गुलज़ार साहब को कोई दिक्कत नहीं है. वह जुलाहों की इन समस्याओं पर कभी ग़ज़ल नही लिखेंगे. इस बात को समझना होगा कि कौन क्या बोल रहा है? और कब बोल रहा है? उनके बोलने के पीछे का मकसद क्या है? पसमांदा समाज से आने वाले युवाओं को अपने समाज की समस्याओं के बारे में लिखना होगा. ये ज़रूरी काम भाड़े के शायर या लेखक के बूते का नहीं. वे तुम्हारी समस्याओं को वह जुबां नहीं दे पाएंगे जो खुद एक दर्दमंद भुक्तभोगी दे सकता है. अगर “साहित्य (कविता/ग़ज़ल/लेख/कहानी) समाज का दर्पण होता है” तो ये कैसा दर्पण है जिसमें तुम अपनी ही समाज को नहीं देख पा रहे हो. ग़ज़लों को सिर्फ मनोरंजन का साधन मत बनाओ जैसाकि अदम गोंडवी कहते हैं 

भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो
जो ग़ज़ल माशूक के जल्वों से वाक़िफ़ हो गयी
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो
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लेनिन मौदूदी लेखक हैं एवं  DEMOcracy विडियो चैनल के संचालक हैं, लेखक हैं और अपने पसमांदा नज़रिये से समाज को देखते-समझते-परखते हैं.

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