Arvind Shesh New

अरविंद शेष (Arvind Shesh)

Arvind Shesh Newसन 2015 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि ‘आरक्षण की समीक्षा का वक्त आ गया है’, तब राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद ने इसके जवाब में चुनौती पेश किया था कि ‘किसी ने मां का दूध पिया है तो आरक्षण को खत्म करके दिखाए’! इसके बाद उसी साल हुए बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान लालू प्रसाद हाथ में गोलवलकर की किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ लेकर दुनिया को बता रहे थे कि इस किताब में कैसे ब्राह्मणों के वर्चस्व और निचली कही जाने वाली जातियों के खिलाफ जहर से भरी बातें लिखी हैं और कैसे यह किताब और इसका लेखक आरएसएस-भाजपा का आदर्श रहा है. इसके बाद आरक्षण का सवाल सबसे अहम मुद्दा बना और उसमें भाजपा और उसके सहयोगियों को इसका बड़ा खमियाजा उठाना पड़ा. 

अब पिछले कुछ सालों के दौरान केंद्र सरकार की ओर से जिस तरह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दलित-पिछड़ी जातियों और आदिवासियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की गई है, उसके मद्देनजर तेजस्वी यादव ने साफ शब्दों में कहा है कि- 

‘आरक्षण को हाथ लगाने वाला जिंदा जल जाएगा… दलित-पिछड़ों की पुरजोर पुकार, नब्बे प्रतिशत आरक्षण हमारा अधिकार’!

कायदे से होना यह चाहिए कि जिस दौर में वास्तविक मुद्दों की हत्या करके एक भ्रमजाल रचा जा रहा हो, उसमें सत्ता के विपक्ष में खड़े राजनीतिक दलों को जनता के हक के मुद्दों की पहचान करके उसके लिए आंदोलन खड़ा करने, उसे दिशा देने और सत्ता के बरक्स एक ठोस प्रतिपक्ष रचने की पहलकदमी खुद करनी चाहिए. लेकिन हमारे यहां मुश्किल यह है कि ज्यादातर पार्टियां जनता के बीच असंतोष का पैमाना ऊंचा होने या चरम पर पहुंचने का इंतजार करती हैं. जब लोगों के बीच खुद ही उबाल एक खास तापमान तक पहुंच जाता है, तब वे उसके नेतृत्व को हथियाने या फिर अपना अस्तित्व बचाने के लिए जनता के साथ होने का दावा करती हैं. लेकिन ठीक इसी समय देखा जा सकता है कि तेजस्वी यादव उन सारे सवालों के साथ खड़े हैं, उसके लिए सड़क से लेकर हर मोर्चे पर एक स्पष्ट लड़ाई लड़ रहे हैं, जिन्हें दबाने के लिए हर रोज सत्ता अपने हर तरह के संसाधनों का आक्रामक इस्तेमाल कर रही है.

पिछले कुछ सालों से लगातार दलित-पिछड़ी जातियों और आदिवासियों के लिए उच्च शिक्षा और नौकरियों में तय किए गए आरक्षण को व्यवहार में बेअसर tejashwi yadav screenshotकरने की मंशा से जिस तरह की कवायदें चल रही हैं, उसमें जनता के हक और मुद्दों की राजनीति करने का दावा करने वाले दलों की जिम्मेदारी बनती थी कि वे इस मसले पर एक सशक्त प्रतिरोध खड़ा करें. लेकिन ऐसा लगता है कि ज्यादातर राजनीतिक दलों ने आरक्षण को खत्म करने की ओर बढ़ते कदमों के सामने समर्पण कर दिया है और उस पर बोलना तक जरूरी नहीं समझ रहे हैं. हालत यह है कि उच्च कही जाने वाली जातियों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में अमूमन सभी पार्टियां एकजुट दिखीं, जिसकी जरूरत का कोई आधार नहीं है.

ऐसे में तेजस्वी यादव ने चौंकाया. उन्होंने अपनी राजनीति और मुद्दों को लेकर कोई धुंधलका नहीं रखा है. कोई चाहे तो इसे उनके सरोकार से जोड़ कर न भी देखे. मगर इतना साफ है कि वे एक कुशल राजनीतिक की तरह न केवल अपने सामने पेश चुनौतियों का सामना करते हैं, बल्कि बिना डरे आक्रामक रवैया भी अख्तियार करते हैं. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने इस बात की भी पहचान की है कि उनकी राजनीतिक जमीन क्या है और उसकी जरूरत के मुद्दे क्या हैं. यह बेवजह नहीं है कि जो नरेंद्र मोदी बाकी दलों पर अपनी आक्रामकता की वजह से हावी दिखते हैं, तेजस्वी यादव के सामने खुद को लाचार पाते हैं. 

बहरहाल, आज समाज में राजनीति और वोट के मुद्दे को तय करने के रूप में सवालों के घेरे में आए सवर्णों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण के खिलाफ या उसे कठघरे में खड़ा करने में अगर किसी का सबसे स्पष्ट रुख सामने आया तो वे तेजस्वी यादव ही हैं. इसके बाद कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर के पदों पर बहाली में तेरह पॉइंट रोस्टर के सिरे से दलित-पिछड़ी जातियों और आदिवासियों के लिए आरक्षण लगभग खत्म करने का मुद्दा उठा तो सबसे मुखर होकर तेजस्वी ने इसे आवाज दी. बाद में दूसरे दल और उनके नेताओं ने अपनी औपचारिक उपस्थिति दर्ज की, लेकिन किसी आंदोलन का एक स्वाभाविक नेतृत्व विकसित होता है तो उसके पीछे साफगोई और बिना लाग-लपेट के किसी भी पक्ष में खड़ा होना एक सबसे बड़ा कारक होता है. 

यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ समय से लगातार जो भी मुद्दे सतह पर दिख रहे हैं और जो कथित मुख्यधारा की बहसों के केंद्र में हैं, उनका अकेला मकसद उन सवालों को चर्चा में आने से रोकना है, जो समाज के कमजोर तबकों की हकमारी को संबोधित हैं. शिक्षा, रोजगार के साथ आरक्षण को हर हाल में सुर्खियों में आने से रोकने के लिए ऐसे रास्ते अपनाए जा रहे हैं, जिस पर नजर डालने से पहली नजर में ही शक होता है. शिक्षा के ढांचे को खोखला करना, दस प्रतिशत सवर्ण आरक्षण, सरकारी नौकरियों में भारी कटौती, नोटबंदी के साथ-साथ दूसरी तमाम वजहों से बेरोजगारी में भारी बढ़ोतरी, सब कुछ प्राइवेट करने को लेकर उतावलापन- ये सब दरअसल दलितों-पिछड़ों और आदिवासियों के हक मार कर एक बार फिर उन्हें मनु-स्मृतीय व्यवस्था के जाल में झोंकने की तरह है. खासतौर पर कई जगहों पर नौकरियों के लिए जैसे विज्ञापन आ रहे हैं, उससे साफ है कि दलित-पिछड़ी जातियों और आदिवासियों के लिए आरक्षण को व्यवहार में खत्म या कमजोर करके बेअसर कर देने की कवायदें चल रही हैं और मौजूदा सत्ता की मंशा क्या है. 

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इससे पहले पिछले कुछ सालों से लगातार इस तरह की बहसें थोपी जा रही थीं कि आरक्षण ‘जरूरतमंदों’ और ‘आर्थिक रूप से कमजोर लोगों’ को यानी गरीबों को मिलना चाहिए. हमारे समाज में ज्यादातर लोगों की जैसी ट्रेनिंग मिलती है, वे उसी मुताबिक किसी प्रचारित बात या संदर्भ के बारे में अपनी धारणा बनाते हैं. तो दलित-पिछड़ी जातियों की पृष्ठभूमि वाले कुछ लोगों ने भी आरक्षण की सवर्ण परिभाषा पर गौर करना शुरू कर दिया था. जबकि इस सच को समझना बहुत आसान था कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन या कम करने की योजना नहीं है. यह शिक्षा और सरकारी नौकरियों के रास्ते सत्ता के तंत्र में दलित-वंचित जातियों-तबकों को पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित करने का संवैधानिक उपाय है. इन सभी मसलों पर तेजस्वी यादव ने मुखर राय सामने रखी है.

मीडिया और खासतौर पर टीवी चैनल आज इस हैसियत में हैं कि वे साधारण जनता से संवाद का एक सबसे बड़ा जरिया बन चुके हैं. लेकिन सच यह है कि मुख्यधारा कहा जाने वाला मीडिया एक तरह भाजपा का प्रोपेगेंडा मशीन बन चुका है और उसमें विपक्ष के विचारों-प्रतिरोधों के लिए कोई जगह नहीं है. तेजस्वी ने इस हकीकत को स्वीकार किया है कि कथित मुख्यधारा का मीडिया उनके लिए नहीं है. इसी वजह से उन्होंने यहां तक हिम्मत दिखाई कि लोगों से ‘मोदी-मीडिया’ का बहिष्कार करने की अपील जारी कर दी. नतीजा साफ दिखा है कि आज मीडिया मजबूरन या तेजस्वी के ट्वीट से खबर या विजुअल बना कर लोगों के सामने पेश कर रहा है.

बहरहाल, मीडिया को खारिज करने की अपील के बाद सवाल है कि फिर जनता से संवाद का वे कौन-सा रास्ता अख्तियार कर रहे हैं. वे ट्विटर और फेसबुक के अलावा लोगों से सीधा संवाद करने को तरजीह दे रहे हैं. यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि वे लोगों को संबोधित करते हुए वे उनसे शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील करते हैं और कहते हैं कि वे तलवार बांटते हैं, हम कलम की बात करते हैं. मुद्दों के साथ-साथ सरोकारों की पहचान एक नेता की खासियत होती है और उसकी स्वीकार्यता की कसौटी भी.

लालू प्रसाद के जेल में रखे जाने का संदर्भ अब आम लोगों को भी समझ में आने लगा है. पिछले काफी चुनावों के बाद यह चुनाव ऐसा है जिसमें लालू खुद नहीं हैं. उन्हें जेल से जमानत नहीं दी गई, और उन्हीं आधारों पर दूसरे मामलों में अभियुक्तों को जमानत या रिहाई दी गई. तेजस्वी तक से मिलने पर रोक लगाई गई, इसके बावजूद बिहार की राजनीति का मैदान अब खुद तेजस्वी ने संभाल लिया है.

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अरविन्द शेष जाने माने पत्रकार हैं. उनसे arvindshesh@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

 

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