लेनिन मौदूदी (Lenin Maududi)

जामिया से मैंने समाजशास्त्र में अपना स्नातक किया है. यहाँ कई विचारकों को पढ़ने का मौका मिला पर इन विचारकों में बाबा साहब अम्बेडकर हमारे सिलेबस (syllabus) में शामिल नहीं थे. उस वक़्त मुझे ये बात समझ में नहीं आई कि ऐसा क्यों है कि बाबा साहब आंबेडकर जैसे विचारक को, जिन्होंने जातिय व्यवस्था पर इतना गहन शोध किया है, हमारे सिलेबस (syllabus) में जगह नहीं दी गई है? पर  आज मैं समझ पाता हूँ कि कैसे भारत के समाजशास्त्री भी अपनी जातिय सर्वोच्चता के खोल से बाहर नहीं निकल पाए हैं. इनके लिए पसमांदा/दलित/बहुजन सिर्फ एक फील्ड (कार्यक्षेत्र) है, एक नई फील्ड जिसपर अभी तक काम नहीं हुआ है. जिसपर ये काम करके अकादमिक जगत (academic world)  में अपना नाम बनाना चाहते हैं जैसे इम्तेयाज़ अहमद साहब ने मुस्लिम जाति व्यवस्था के बारे में अपना शोध करके किया था. 

आप कह सकते हैं कि मैं कुछ ज़्यादा ही उम्मीद कर रहा हूँ. ये समाजशास्त्रीय हैं कोई एक्टिविस्ट नहीं हैं. आप ये भी कह सकते हैं कि हमें अहसानमंद होना चाहिए कि इन समाजशास्त्रियों ने इन समाजों की आवाज़ को उठा कर पसमांदा-दलित समाज पर अहसान किया है. ये सच है कि भारत मे पहली बार जाति पर शोध ब्राह्मणों ने किया था फिर शायद अशराफों ने किया है. पर ये भी क्या उतना ही सच है कि शिक्षा-ज्ञान पर हमेशा से एकाधिकार इन्हीं अशराफ-सवर्णों का रहा है. इस बात के ऐतिहासिक दस्तावेज़ मौजूद हैं कि कैसे अशराफ-सवर्णों ने बहुजन समाज को अशिक्षित रखने की हर सम्भव कोशिश की है. हमें ये समझने की ज़रूरत है कि जातिय विमर्श पर जब डॉक्टर अम्बेडकर लिखते हैं तो उसके पीछे क्या उद्देश्य था और जब इसी विषय पर एम.एन.श्रीनिवास लिखते हैं तो उनकी मंशा क्या थी? हमें जातिय शोधों को गौर से देखना होगा कि कौन सा शोध पसमांदा-बहुजन प्रतिरोध (assertion) को बढ़ा रहा है और कौन सा शोध इस प्रतिरोध (assertion) को घटा रहा है, या फिर पसमांदा-बहुजन मुद्दों को सवर्ण अशराफ मुद्दों के साथ आत्मसात करा रहा है! जिस अलीगढ़ में सर सैयद ने पसमांदा समाज को घुसने नहीं दिया, आज वहाँ हज़ारों पसमांदा पढ़ रहे हैं. भारत का कच्चा माल ढो कर इग्लैंड भेजने के लिए अंग्रेजों की बनाई रेल में करोड़ों भारतीय सवारी कर रहे हैं. पर मूल प्रश्न है कि अंग्रेज़, सर सैयद, एम.एन. श्रीनिवास आदि की मंशा क्या थी? किस मकसद से रेल बनाई गई? अलीगढ़ का निर्माण हुआ या जाति पर शोध (research) किया गया? 

आप को एक उदाहरण देता हूँ, जब 2001 में नस्लवाद के विरुद्ध विश्व सम्मेलन में, दलितों ने जाति का मुद्दा उठाने का प्रयास किया तो सवर्णों ने कहा कि ये हमारा आंतरिक मामला है. सवर्णों ने जाने माने सवर्ण समाजशास्त्रियों के शोध को तर्क के रूप में पेश किया कि जाति का चलन नस्ली भेदभाव जैसा नहीं है तथा जाति, नस्ल से भिन्न है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के पूर्व प्रोफ़ेसर दीपांकर गुप्ता जो कि 2007 में सरकारी भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे, उन्होंने उस दलित गुट का विरोध किया जिसकी मांग थी कि जातिय भेदभाव को नस्लीय भेदभाव के समान माना जाए. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के विश्वस्तरीय समाजशास्त्री अपने विश्वविद्यालय में ही अनुसचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं कर पाए. अध्यापन संकाय के केवल 3.29% ही दलित हैं और 1.44 % ही आदिवासी हैं जबकि कोटा क्रमशः15% और 7.5% है। यह स्थिति तब है जबकि यह माना जाता है कि यहाँ पिछले 27% वर्षों से आरक्षण नीति लागू है.

बहुजन-पसमांदा प्रतिरोध (assertion) को बढ़ावा देने वाले लेखकों को सवर्ण-अशराफ़ लेखक-बुद्धिजीवी हमेशा दोयम दर्जे का मानते हैं. इन बुद्धिजीवियों kanchaका कहना होता है कि इन बहुजन-पसमांदा लेखकों के लेखन में भावनाएं ज्यादा होती हैं इसलिए इनके शोध का स्तर अकादमिक स्तर का नहीं है. अरे भाई, जिन्होंने तुम्हारी गालियाँ सुनी हैं, अपमान सहा है, उनकी लेखनी में “आप-जनाब” कहाँ से आएगा? ये अपने अनुभव को सिद्धांत से जोड़ने के लिए उसी भाषा का प्रयोग करेंगे जो ये सदियों से सुनते आ रहे हैं. पर इस बात से सवर्ण-अशराफों को कहाँ फर्क पड़ता है. अभी सवर्ण-अशराफों की अकादमिक जगत (academic world) में  आधिपत्य (hegemony) है. इसलिए वहाँ वही होगा जो ये चाहेंगे. ये जाति की सवर्णवादी व्याख्या करते रहेंगे, जिसे स्कूलों-विश्वविद्यालयों में निष्पक्ष, सार्वभौमिक सिद्धांत के रूप में पढ़ाया जाता रहेगा. एक उदाहरण देता हूँ कि कैसे ये जाति की सवर्णवादी व्याख्या करते आ रहे हैं; कांचा इल्लैया अपने लेख ‘Caste, corruption and romanticism’ [The Hindu, MARCH22, 2013] में लिखते हैं- “एम.एन.श्रीनिवास भारतीय जातिय व्यवस्था का अध्यन कर के इस नतीजे पर पहुँचे कि अगर छोटी जातियाँ जाति-व्यवस्था में ऊपर उठना चाहती हैं तो वह उच्च जातियों के रहन-सहन, खान-पान खासकर मासाहारी आहार (vegetarian food items) की नकल करती हैं अर्थात अपनाती हैं, इस प्रक्रिया को श्रीनिवास “संस्कृतिकरण” कहते हैं. श्रीनिवास शब्दों का चयन बहुत सोच समझ कर करते हैं. संस्कृतिकरण शब्द ब्राह्मणों की भाषा संस्कृत का शब्द है. ये भाषा भारत में अपनी मृत्युशय्या पर है फिर भी इसी शब्द का प्रयोग किया जाता है.

श्रीनिवास के इस सिद्धांत पर कांचा इल्लैया सवाल करते हैं कि अगर उच्च जातियाँ छोटी जातियों के रहन-सहन, खान-पान खासकर मासाहारी आहार (nonvegetarian food items) का नकल करे तो क्या उसके लिए “दलितीकरण” शब्द गढ़ा जा सकता है? क्या उच्च जातियाँ बिल्कुल भी ऐसा कोई व्यवहार नहीं करतीं जो दलित समाज द्वारा किया जाता है? उसके लिए श्रीनिवास साहब कोई शब्द क्यों नही गढ़ते? वजह साफ है एम.एन.श्रीनिवास ये सोच ही नहीं पाए कि ऐसा संभव है कि उच्च जातियाँ विशेषतः ब्राहमण, दलित जातियों का अनुकरण कर सकती हैं. उसी तरह कांचा इल्लैया अपने लेख में एक और भारतीय समाजशात्रीय आंद्रे बेतिले (Andre Beteille) के बारे में लिखते हैं तलाक, बहुविवाह, अलगाव आदि दलित समाज में अधिक पाया जाता है। दलित समाज तलाक को संस्कृतिकरण के कारण बुरा मानने लगा है [Divorce, separation, polygamy etc. were common among the Dalits. The fact  that they consider divorce bad is the impact of Sanskritization.] इसपर कांचा इल्लैया लिखते हैं कि समाजशास्त्री Andre Beteille भी पूर्ण रूप से सवर्ण मानसिकता से ग्रसित व्यक्ति हैं, जिनका  मानना है कि हर दलित एक से ज्यादा शादी कर रहा है. यहाँ हर घर में तलाक हो रहा है लेकिन वह  उच्च जातियों विशेषतः ब्राह्मण में तलाक दर के बढ़ने को अनुमानित (theorise) नहीं करते. वह भी अपनी जाति के खोल से बाहर नहीं निकलते। वहीं आशीष नंदी साहब ने तो हद कर दी.  आशीष नंदी ने तो यह साबित करने की कोशिश कर दी कि भारत में भ्रष्टाचार का मूल कारण दलित, आदिवासी समाज से आने वाले लोग हैं.  कांचा इल्लैया सवाल करते हैं कि यहाँ पर श्रीनिवास कि थ्योरी कहाँ गई जो कहती है कि “छोटी जातियाँ उच्च जातियों का अनुकरण करती हैं.” [lower castes imitate the higher castes.]

देखा जाए तो भारत में एक सवर्ण समाजशास्त्री दलित, स्त्री, पर्यावरण, राजनीति यहाँ तक कि कुत्ते-बिल्लियों का भी विशेषज्ञ होता है इसीलिए उसे टी.वी बहस (debate) सहित समाचार के सभी माध्यमों में बुलाया जाता है जबकि एक दलित समाजशास्त्री को तो समाजशास्त्री ही नहीं समझा जाता है. उसे सिर्फ दलित चिंतक के रूप में पेश किया जाता है. कभी कभार किसी टी.वी डिबेट में जातिय विमर्श में उसे बुला भी लिया जाता है तो उसके साथ ही किसी सवर्ण समाजशास्त्री को भी बुलाया जाता है ताकि वह “दलित चिंतक” की बातों की अपने हिसाब से व्याख्या कर सके. इससे भी बुरी स्थिति पसमांदा लेखकों और समाजशास्त्रियों की है. पहले तो पसमांदा के वजूद को ही नकार दिया जाता है. अगर तारिक फतह जैसे किसी फ़तवेबाज़ के फतवे वाले शो में ये मुद्दा उठाया भी जाता है तो उस विषय पर बोलने वाले वक्ता अशराफ ही होते हैं। (25 मार्च 2017, https://www।youtube।com/watch?v=x5kby9_qsvA) जैसे-जैसे पसमांदा आंदोलन मज़बूत हो रहा है वैसे-वैसे अशराफ इस आंदोलन की व्याख्या करने के लिए आगे आ रहे हैं.  इस स्थिति को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है. जैसे मैलकॉम एक्स ने लिया था :-

एक बार मैलकॉम एक्स से एक व्हाइट लड़की मिली. उसने कहा “Mr. X मैंने आपके कुछ भाषण सुने हैं,  मैं उनमें कही गई ज़्यादातर बातों को इमानदारी से सच मानती हूँ। भले ही मै श्वेत हूँ परन्तु मै दिल से बहुत अच्छी और ईमानदार इंसान हूँ। मेरे जैसे उन तमाम श्वेत लोगों के बारे में आप क्या कहेंगे जो नस्लवादी नहीं हैं, जो पूर्वधारणा से ग्रसित नहीं हैं, हम कैसे आप के आंदोलन की मदद कर सकते हैं?[Mr. X, I’ve read some of your speeches and I honestly believe a lot of what you say has truth to it. I have a good heart. I’m a good person despite my whiteness. What can the good white people like myself, who are not prejudiced, or racist, what can we do to help the cause?]

Malcolm X: किसी भी तरह नहीं [Nothing]

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लेनिन मौदूदी लेखक हैं एवं  DEMOcracy विडियो चैनल के संचालक हैं, लेखक हैं और अपने पसमांदा नज़रिये से समाज को देखते-समझते-परखते हैं.

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