लेनिन मौदूदी (Lenin Maududi)

किताब: साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस
लेखक: विभूति नारायण राय
प्रकाशक: राधाकृष्ण पेपरबकैस
तीसरा संस्करण: 2016, पेज: 165
मूल्य: 150₹

इस बात को साफ़-साफ़ समझ लें ‘दंगे’ साम्प्रदायिकता परिणाम होते हैं, साम्प्रदायिक मानसिकता का अंतिम फल होते हैं. सब से पहले आपके विचार हिंसक होते हैं फिर वह हिंसा आप के व्यवहार में आती है. यही ‘सही’ है, यही अंतिम ‘सत्य’ है, मैं जो कह रहा हूँ उससे अलग जो बोल रहा है वह ‘झूठ’ है, जैसी बात मानसिक हिंसा को बढ़ावा देती है. 

दिल्ली में जो हुआ उसकी पृष्टभूमि तो 7 सालों से बन रही है. ‘फेक न्यूज़’ ने आप के Whatsapp, Facebook, Tweeter को भर दिया है. उसी न्यूज़ के अनुसार आपने अपनी समझ भी बना ली है. अब जो भी न्यूज़ आपके पूर्वाग्रह को सत्यापित करती है. आप फौरन उस न्यूज़ को दूसरे लोगों तक पहुंचाते हैं ताकि आप उनसे और खुद से यह कह सकें कि, “देखा! मैं न कहता था, वह ऐसे ही होते हैं”. अगर कोई आपसे प्रश्न कर दे कि साहब यह न्यूज़ सही नहीं है या इस न्यूज़ के दूसरे भी आयाम हैं, तो आप उसे देशद्रोही, कम्युनिस्ट, भक्त आदि कहने लगते हैं. आप यह मानना ही नहीं चाहते कि आपसे अलग कुछ ‘सही’ हो सकता है. Social Media पर नफऱत वाली पोस्टों को मिलने वाले Like देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि घरों को जलाने वाली, मासूमों को मारने वाली यह हिंसक भीड़ कहाँ से आ रही है? सिर्फ बेरोज़गार-आवारा लड़के ही इस भीड़ का हिस्सा नहीं हैं बल्कि किन्तु-परंतु के साथ हिंसा का विरोध करने वाले भी इसी भीड़ में शामिल हैं और हिंसा में साझेदार हैं.

दिल्ली दंगों पर विभूति नारायण राय कहते हैं ‘क्या कारण है कि एक के बाद एक साम्प्रदायिक दंगों जैसी स्थिति में भारतीय पुलिस असफल हो जाती है? कोई तो वजह होगी कि हर बार देश के अल्पसंख्यकों के मन में कसक रह जाती है कि दंगों को नियंत्रित करते समय पुलिस ने उनके जान-माल की हिफ़ाज़त के लिए वो सब नहीं किया जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है या कई बार तो इसने वो सब भी कर डाला जो भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के ही ख़िलाफ़ था.’ 

लोकतंत्र में आमतौर से यह मान कर चला जाता है कि प्रशासन का काम सेफ्टी वॉल्व का होता है. जब समाज मे असंतोष फैलता है तो प्रशासन नियंत्रीय तरीके से उस असन्तोष को लोकतांत्रिक तरीके से व्यक्त करने व् उसे निकालने का काम करवाती है. जैसे प्रेशर कुकर में लगा सेफ्टी वॉल्व करता है. अगर यह सेफ्टी वॉल्व काम करना बंद कर दे तो क्या होगा? कुछ ऐसी ही स्थिति आज भारत मे नज़र आ रही है. आज प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि यह सेफ्टी वॉल्व काम नहीं कर रहा बल्कि स्थिति यह है कि यह सेफ्टी वॉल्व कुछ जातियों और समूहों के प्रति शत्रुता का भाव रखता है.

ऐसा क्यों है? 

विभूति नारायण राय इसी सवाल का जवाब अपनी किताब ‘साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’ में खोजते हैं. वह हाशिमपुरा नरसंहार से इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करते हैं. हाशिमपुरा मेरठ शहर के मध्य में बसा एक मुस्लिम बहुल इलाक़ा है, जिसमें काफी संख्या में करघों पर काम करने वाले बुनकर रहते हैं. इन बुनकरों (अंसारी/जुलाहों) में भी एक अच्छी संख्या रोज़गार की तलाश में आये बिहारी बुनकरों की है. तलाशी के दौरान मुसलामानों को उनके घरों से निकालकर बाहर बैठा लिया गया और फिर उनमें से छाँट-छाँट कर नौजवानों को एक किनारे इकठ्ठा किया गया. इन नौजवानों को पी.ए.सी. के ट्रक में हाशिमपुरा से सीधे गाज़ियाबाद की तरफ ले जाया गया. मेरठ गाज़ियाबाद के लगभग मध्य में स्थित मुरादनगर क़स्बे की शुरुआत के पहले पड़ने वाली गंगनहर पर मुख्य सड़क से हटकर, नहर की पट्टी पर कुछ किलोमीटर अन्दर ले जाकर, पी.ए.सी. के जवानों ने ट्रक में चढ़े हुए लोगों को उतरने का हुक्म दिया. कुछ के नीचे उतरते ही उन्होंने अपनी थ्री-नॉट-थ्री की राइफ़लों से भूनकर नहर में फेंकना शुरू कर दिया. विभूति नारायण राय उस समय ग़ाज़ियाबाद के एसपी थे. वह लिखते हैं ‘1987 में मेरठ में तैनात अधिकांश पुलिसकर्मियों का यह मानना था कि दंगा मुसलमानों की शरारत से हो रहा है. वह यह भी सोचते थे कि मुसलमानों का दिमाग चढ़ जाने से मेरठ ‘मिनी-पाकिस्तान’ बन गया है और यहाँ स्थायी शांति कायम करने के लिए मुसलमानों को सबक सिखाना आवश्यक है. वह अफवाहों से भी बुरी तरह प्रभावित थे, जिनके अनुसार मेरठ के हिन्दू पूरी तरह से असुरक्षित थे और मुसलमान उन्हें चैन से रहने नहीं दे रहे थे. हिन्दू स्त्रियों के स्तन काट लिए जाने या मुसलमानों द्वारा बच्चों को ज़िंदा आग में झोंक दिए जाने की अफवाह ज़ोर-शोर से फैली हुई थी. मेरठ में नियुक्त पुलिसकर्मी भी इन अफवाहों से बुरी तरह प्रभावित थे. हाशिमपुरा वस्तुतः सबक सिखाने की इसी प्रक्रिया का एक अंग था”.

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विभूति नारायण राय सांप्रदायिक दंगों का ‘मनोविज्ञान’ को समझाते हुए लिखते हैं ‘हर समुदाय एक पूर्वाग्रह पाल लेता है. अपने को अहिंसक, उदार, सहिष्णु या धर्मभीरु मानना और दूसरे समुदाय को स्वभावतः क्रूर, धूर्त, कट्टर और अविश्वसनीय रूप में देखना-ऐसे पूर्वाग्रह हैं, जिन्हें आमतौर से सभी समुदाय अपनी सोच के अभिन्न अंग के रूप में बनाए रखना चाहते हैं और इन पर किसी भी बहस से परहेज करते हैं. ‘बल-प्रयोग, निरोधात्मक गिरफ़्तारियों, कर्फ़्यू लागू करने, पुलिस थानों में व्यक्तियों के साथ व्यवहार, तथ्यों की रिपोर्टिंग तथा दंगे के दौरान दर्ज मुक़दमों की तफ़्तीश और पैरवी में पुलिस के आचरण में स्पष्ट भेदभाव दिखाई देता है. इन सारे प्रसंगों में मुसलमान ही ज़्यादती के शिकार होते हैं. उर्दू अखबारों ने आम मुसलमानों तक इस भेदभाव और अत्याचार की बातें पहुंचाई है. आम मुसलमान भी इस सच्चाई को जानता है. अगर अब आप यह मानते हैं कि मुसलमान हिन्दू-मुस्लिम दंगे शुरु करते हैं तो यह मानना पड़ेगा कि आम मुसलमान में सामुहिक आत्महत्या का चलन पाया जाता है या फिर वह आम तौर से पागल होते हैं क्योंकि कोई भी अपने नुकसान को जानने के बाद ऐसी हरकत नहीं करेगा.

यह किताब साम्प्रदायिकता का इतिहास भी खोजने का प्रयास करती है. विभूति नारायण राय यह बताते हैं कि भारत मे 1857 के बाद ‘फूट डालों और राज करो‘ की नीति अंग्रेजों ने शुरू की. पहले अंग्रेज़ों ने हिन्दू राजा और मुस्लिम राजा को आपस मे लड़वाया करते थे. फिर बाद में लोकतंत्र में ब्रिटिश राज्य की नीतियों की वजह से दोनों सम्प्रदाय आपस मे लड़ने लगे. लोकतंत्र ने धार्मिक पहचानों को बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा की. धार्मिक धुर्वीकरण सत्ता में आने का आसन तरीका बन गया.

विभूति नारायण लिखते हैं कि ऐसा नहीं है कि पहले साम्प्रदायिक झगड़े नहीं हुए हैं, पर राजा आमतौर से इन झगड़ों को शांत कराने के पक्ष में रहता था. आज़ाद भारत मे हिंदुत्ववादी शक्तियां लगातर यह बात उठाती रहती हैं कि मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्यधारा में आना चाहिए. अब यह मुख्यधारा कौन सी है? और इसमें कौन-कौन नहीं आते? इसे पहले समझ लेते हैं. महिलाएं, दलित, आदिवासी, OBC इस मुख्यधारा में आमतौर से नहीं माने जाते जो भारत के 95% हिस्सेदारी रखते हैं. तब यह मुख्यधारा है किसकी? यह मुख्यधारा दरसल ब्राह्मण पुरुषों की मुख्यधारा है. हिंदुत्ववादी शक्तियों का यह नारा है कि ‘जो हिन्दू-हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा’ पर यह हिन्दू हित है क्या? इससे किसको लाभ हो रहा है? इस प्रश्न को अनुत्तरित रखा जाता है और आम हिंदुओं को इसी के आधार पर वोट करने को कहा जाता है. ठीक उसी तरह ‘मुस्लिम हित’ भी सारे मुसलमानों के हित नही हैं. मुस्लिम हो कर वोट करने की बात से अशराफ़ मुसलमानों का भला होता है. आप मुस्लिम सांसदों की जातियां उठा कर देख लें, बातें स्पष्ट हो जाएगी.

यह किताब दंगों के जातीय चरित्र पर बात न कर के उसकी जगह दंगों के ‘वर्गीय’ चरित्र बल देती है. यह सच है कि दंगों का आर्थिक चरित्र होता है. मुस्लिम व्यापारियों की दुकानों को चुन कर जलाने की घटना भी सामने आती है. पर भारत मे आमतौर से व्यापार जातियों से जुड़ा होता है. पसमांदा आंदोलन का मानना है कि जबकि कौमी दंगे भारत के सवर्ण-पूंजीवादी तंत्र और उस से उपजे अंतर्विरोधों को दबाने का सदाबहार देसी आला है. पुलिस सिर्फ धर्म के साथ नहीं जातीय हिंसा के साथ भी इसी तरह व्यवहार करती है. साम्प्रदायिक दंगों में अगर पुलिस का धार्मिक रूप नज़र आता है तो आम दिनों में पुलिस का जातीय रूप भी नज़र आता है. दलित हिंसा और भारतीय पुलिस के व्यवहार को समझना भी ज़्यादा मुश्किल न होगा. किताब में इस बात के आंकड़ें नहीं दिए गए हैं कि दंगों में मरने वाले किस जाति के होते हैं और जो गिरफ़्तार हो रहे हैं उनमें सवर्ण कितने हैं? अगर ऐसे आकड़ें होते तो बातें और भी स्पष्ट हो जातीं कि कैसे बहुजन समाज सवर्ण समाज के सैनिक के रूप में काम करता है. साम्प्रदायिकता का पूरा खेल यही है कि समाज का धुर्वीकरण करें, जिसका राजनीतिक लाभ सवर्ण समाज उठा सके. नफ़रत की राजनीति दोनों समाजों के सवर्ण-अशराफों की राजनीतिक महत्वकांक्षओं को साधने का माध्यम है. 

यहाँ एक बात और समझने की है कि भारत में ‘सेक्युलरिज़्म’ का अर्थ ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ के रूप में किया जाता है. भाजपा आसानी से ये बात हिंदू मतदाताओं को समझा पा रही है. बड़ी बात ये है कि हिन्दू मतदाता इस अर्थ को खारिज नहीं कर रहे. अगर भाजपा के हिंदू बहुसंख्यकवाद से अन्य पार्टियों का अल्पसंख्यक सेक्युलरवाद टकराएगा, तो इस मुकाबले में जीतने वाले का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. पसमांदा आंदोलन का मानना है कि ‘अब ज़रूरत इस बात की है कि सेक्युलरिज़्म की नई व्याख्या जाति/वर्ग की एकता के आधार पर हो जहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकवाद का कोई स्थान न बचे. एक ओर हिन्दू-मुस्लिम दलित-पिछड़ों तो दूसरी ओर हिन्दू-मुस्लिम अगड़ों की सियासत एकता भारत में एक नई राजनीति का आगाज़ करेगा. पसमांदा आन्दोलन इस ठोस हकीक़त पर टिका हुआ है कि जाति भारत की सामाजिक बनावट की बुनियाद है. इसलिए सामाजिक-राजनीतिक विमर्श जाति को केन्द्र में रखकर ही किया जा सकता है. हम मानते हैं कि किसी एक जाति की इतनी संख्या नहीं है कि वह अपने आप को बहुसंख्यक कह सके. जब कोई बहुसंख्यक ही नहीं तो फिर अल्पसंख्यक का कोई मायने नहीं रह जाता. जातियों/वर्गों के बीच एकता ही एक मात्र उपाय है भारतीय समाज के हिन्दुकरण या इस्लामीकरण को रोकने का.’

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लेनिन मौदूदी लेखक हैं एवं  DEMOcracy विडियो चैनल के संचालक हैं, लेखक हैं और अपने पसमांदा नज़रिये से समाज को देखते-समझते-परखते हैं.

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