जूपाका सुभद्रा (Joopaka Subadra)

जूपाका सुभद्रा की बातचीत का यह दूसरा भाग है जो उन्होंने भारत नास्तिका समाजम और साइंटिफिक स्टूडेंट्स फेडरेशन द्वारा आयोजित एक बातचीत में रखा था.

सवर्ण महिलाओं का कहना है कि वे अपने घरों में अपने बच्चों की गंदगी साफ करती हैं. फिर इन महिलाओं के बारे में क्या जो अपने घरों के बाहर सभी की गंदगी साफ करती हैं? वे इन महिलाओं के बारे में बात क्यों नहीं करतीं?

यदि, जैसा कि आप कहती हो कि, सभी महिलाएँ समान हैं, तो आपको सभी महिलाओं के बारे में बात करनी होगी, ऊपर से नीचे तक, पाताल तक. ठीक है?

आपको जाति व्यवस्था की सभी पायदानों पर उतरना होगा, सामाजिक व्यवस्था की हर पायदान पर रहती महिलाओं की समस्याओं के बारे में बात करनी होगी – ब्राह्मण पायदान पर रहती ब्राह्मण महिलाओं की क्या समस्याएं हैं, शूद्र पायदान पर रहती शूद्र महिलाओं की समस्याएं क्या हैं, दलित पायदान पर रहती महिलाओं की क्या समस्याएं हैं, आदिवासी पायदान पर रहती आदिवासी महिलाओं की क्या समस्याएं हैं? वे इन सभी महिलाओं के बारे में बात क्यों नहीं करती हैं? वे इन सभी समस्याओं को क्यों ओझल कर रही हैं?

उनके (असवर्ण) इतिहास, उनके अनुभव, उनकी भाषाएं, उनकी आवाज़-आप उन्हें बाहर क्यों नहीं आने देते हो? यहां तक कि अगर वे बाहर आते हैं, उन्हें क्या बात करनी चाहिए (आप तय करते हैं).. उन्हें केवल पितृसत्ता की सीमा तक बात करनी चाहिए. उन्हें केवल आपके द्वारा निर्देशित, संगठित, निर्मित चौखटे के भीतर ही बात करनी चाहिए. हमें केवल आपके ढांचे द्वारा निर्धारित पितृसत्ता के बारे में बात करनी चाहिए.

लेकिन हमारी जातियों में पितृसत्ता घर तक ही सीमित है. वे संरचनाओं (structures) और संस्थानों पर कब्ज़ा करने वाली ताक़त को पितृसत्ता कहते हैं, वे उस ताक़त जो केवल घर तक ही सीमित है उसे भी पितृसत्ता कहते हैं. कितना अन्यायपूर्ण है ये! कोई इस और ध्यान नहीं देता है. वे इतिहास को पुरुषों के इतिहास के रूप में देखते हैं. कौन से पुरुषों का इतिहास? वे साहित्य को पुरुषों के साहित्य के रूप में देखते हैं. कौन से पुरुषों का साहित्य? वे इस बारे में बात नहीं करते हैं.

वे (दरअसल) ब्राह्मण पुरुषों का साहित्य और इतिहास हैं, क्षत्रिय पुरुषों का इतिहास हैं, प्रभावी (dominant) जातियों के पुरुषों का इतिहास हैं. हमारी जातियों के पुरुषों और महिलाओं के बारे में क्या? नहीं, वहां उनके बारे में कुछ नहीं मिलेगा. तुम्हारे अपने अनुभवों से अर्जित किया ज्ञान, तुम्हारे इतिहास को देखने के तरीके, तुम्हारी कार्यप्रणाली, और तुम्हारे साहित्यिक मानदंड, तुम्हारी राजनीतिक विचारधारा – यह सब तुम्हारी अपनी सोच-समझ के दायरे में है. आप उससे आगे नहीं बढ़े हैं, समाज के नीचे तक नहीं आये हैं.

हमारी तथाकथित पितृसत्ताएँ, यदि आप एक गाँव को एक इकाई के रूप में लेते हैं: हमारी पितृसत्ता गाँव में सभी के लिए चप्पलें प्रदान करती है. यह गाँव के सभी लोगों-पुरुषों, महिलाओं, बच्चों के लिए कपड़े धोती है. यह गाँव में सभी के बाल काटती है. यह उनके घावों और मवाद से भरे घावों को धोती है. यह सब पितृसत्ता है? कृषि के सभी उपकरण और औजार- हमारी पितृसत्ताएँ सभी का उत्पादन करती हैं.

हमें बताएं कि आपकी पितृसत्ता क्या करती है? आपकी पितृसत्ताओं ने समाज, सामाजिक संस्थाओं, पुरुषों और महिलाओं पर नियंत्रण किया है, जिनमें उनकी अपनी महिलाएं भी शामिल हैं, और उनकी शक्ति को संस्थागत रूप दिया है. आपकी पितृसत्ता कहती है अगर मैं (यानि पति) मर जाऊं तो पत्नी को जीने का कोई अधिकार नहीं है. उसे मेरे साथ जलाया जाना चाहिए. आपकी पितृसत्ता कहती है, अगर मैं मर गया, तो आपको (महिलाओं) पुनर्विवाह करने का कोई अधिकार नहीं है. आपको (जब तक मैं जीवित हूं) तलाक देने तक का कोई अधिकार नहीं है.

उससे लड़ने के लिए आपने कई संघर्ष किये, राष्ट्रीय संघर्ष किए. और आप उस सबसे मुक्त हो गए, सती (प्रथा) से मुक्त हो गए.

लेकिन हमारी जातियों में ऐसी सख्ती नहीं है. यदि पुरुष मर जाता है, तो महिला को जीने का अधिकार है. यहां लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं हैं. आप इस बारे में बात नहीं करोगे! अगर मुझे तलाक की आवश्यकता है, अगर मैं कहती हूं, कि मुझे ये (पुरुष) पसंद नहीं तो हम अलग हो सकते हैं और अपने अपने रास्तों पर जा सकते हैं.

आपको उन अधिकारों को देने के लिए, अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल लाकर एक बड़ी लड़ाई छेड़ दी. क्या यह आप नहीं थे – सरोजिनी नायडू और अन्य बड़ी हस्तियां, जिन्होंने इसका विरोध किया और सुनिश्चित किया कि बिल पास न हो? आपकी सोच थी कि एक एस.सी. पुरुष, एक अछूत आदमी को आपके पक्ष में बिल का प्रस्ताव नहीं लाना चाहिए. क्योंकि आपके अपने पुरुष पहचान खो देंगे, उनका सम्मान कम हो जायेगा.

आपको पुनर्विवाह का कोई अधिकार नहीं था. हमारी जातियों में, यदि पति की मृत्यु हो जाती है, तो पत्नी पुनर्विवाह कर सकती है. यदि कोई तलाक होता है, तो आप पुनर्विवाह कर सकते हैं. पुनर्विवाह हमारे बीच बहुत आम हैं.

आपके पितृसत्तावाद ने आपको इस तरह के अन्यायों, इस तरह के रीति-रिवाजों के अधीन किया. यही है पितृसत्ता. और जो घर की दहलीज़ भी नहीं लांघता, जिसकी घर के बाहर कोई पूछ नहीं है, तो वहां वर्चस्व के रूप में क्या बचता है, घर के भीतर नियंत्रण- क्या हमें अब इसे भी पितृसत्ता कहना चाहिए? यह सवाल बहुत गंभीरता से पूछा जाना चाहिए.

हम कह रहे हैं कि ये पितृसत्ताएँ नहीं हैं. यहाँ नारीवाद एक नई चीज़ ले आया है, दलित नारीवाद. यहां तक कि ये भी उन्हीं द्वारा तय किया गया था. महाराष्ट्र की शर्मिला रेगे के द्वारा.

यहाँ MBC (मोस्ट बैकवर्ड कास्ट्स) महिलाएँ हैं, क्या उन्हें (सवर्ण नारीवादियों द्वारा) MBC नारीवाद में लाया गया है? यहाँ आदिवासी महिलाएं हैं, क्या उन्हें आदिवासी नारीवाद में लाया गया है? यह इसलिए है क्योंकि हम (दलित महिलाएं) बात कर रहे हैं क्योंकि हमारी आवाज मजबूत है, वे दलित नारीवाद (हमें स्लॉट करने के लिए) ले लाए हैं. हमें ये पसंद नहीं है. हमें ‘दलित नारीवाद’ कहना पसंद नहीं. हम ‘नारीवाद’ शब्द को पसंद नहीं करते.

आप ये ‘नारीवाद’ शब्द कहां से लाये? पश्चिमी देशों से, वहाँ के प्रभावी (श्वेत) समूहों से. आप इसे यहां लाकर अपना वर्चस्व किन वर्गों पर थोपेंगे? हम अपनी डिग्री प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालयों, शिक्षा के केंद्रों में जाते हैं. वहां, (वे जानना नहीं चाहते हैं) हमारा मूल क्या है, हमारा इतिहास क्या हैं, हम कहाँ से आए हैं, हम किस मिट्टी से आए हैं, किस अस्पृश्यता से हम आए हैं, हम कैसे कैसे अपमान सह कर आयें हैं .. हम इसे ढूँढने की कोशिश करते हैं कि क्या हमें इन स्थानों पर उन सवालों के कोई जवाब मिल सकते हैं! यह देखने के लिए कि क्या हम यहां कोई सांत्वना पा सकते हैं!!

लेकिन हमें तो विश्वविद्यालय में नारीवादी बनना पड़ेगा. भारत के सभी विश्वविद्यालयों को देखें, आप वहाँ महिलाओं के अध्ययन केंद्र पाएंगे. अगर एक-दो को छोड़ दें, ये सभी सवर्ण-महिलाओं के नियंत्रण में हैं. आप उन सभी को देख लीजिये. मुझे उस पितृसत्ता के बारे में जानने की जरूरत है जो मेरी है ही नहीं. और पितृसत्ता पुरुषों के खिलाफ एक युद्ध है.

हमारे सामने जातिगत युद्ध हैं, हमारी तत्काल रोजमर्रा की चिंता है. मुझे वह छोड़नी होगी और अपने आदमियों के खिलाफ युद्ध छेड़ना होगा, जो खुद गुलाम हैं? घर को छोड़कर, उसके पास बाहर कहीं भी कोई शक्ति नहीं है. आप इसे भी पितृसत्ता कैसे कह सकते हैं…?

~~~

जूपाका सुभद्रा एक कवि, लेखक, आलोचक और तेलुगु साहित्य और जाति-विरोधी संघर्षों में संघर्षरत एक महत्वपूर्ण महिला हैं.

~

अंग्रेजी भाषा से हिंदी में अनुवाद गुरिंदर आज़ाद द्वारा

मूल तेलुगु से अंग्रेजी में अनुवाद कुफिर द्वारा

अंग्रेजी भाषा में आप इस बातचीत को Savari (www.dalitweb.org)  पर पढ़ सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *