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दीपक कुमार (Deepak Kumar), ज्योति दिवाकर (Jyoti Diwakar)

वर्तमान में भारत समेत, विश्व के 195 देश कोविड– 19 (कोरोना वायरस) से प्रभावित है. इस महामारी में लोग सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक रूप से प्रभावित हो रहे हैं. इसके साथ ही भारत की शिक्षा-व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है. इस महामारी वजह से सरकार नई शिक्षा नीति– 2019 के तहत ऑनलाईन शिक्षा-व्यवस्था को लागू करना चाहती है. लेकिन इस व्यवस्था से समाज का बहुत बड़ा तबका जो अध्ययन और अध्यापन के कार्यों से जुड़ा हुआ हैं और इनके सामने कई सारी चुनौतियाँ है जिसकी वजह से इनका हाशियाकरण हो रहा है.

तकनीकि संसाधन की अनुपलब्धता और उपयुक्त वातावरण के न होने का कारण ऑनलाईन शिक्षण-व्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले और दलित वर्ग के छात्र शिक्षा से वंचित होने के कगार पर आ गये है. वर्तमान परिस्थित में बहुत सारे बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करना असंभव हो जाएगा. शिक्षा से वंचित होने का तात्पर्य है कि ये न सिर्फ परिवार व समाज बल्कि देश के प्रगति में भी बाधक सिद्ध होगा. ऑनलाईन व्यवस्था में कई सारी चुनौतिया है जिसे तीन स्तर पर विभाजित कर देख सकते है.

तकनीकि चुनौतियाँ

ऑनलाईन शिक्षण-व्यवस्था में छात्रों एवं शिक्षकों के सामने सबसे प्रमुख समस्या तकनीकि संसाधन और उसे प्रयोगक करने की जानकारी को लेकर आती है. ऑनलाईन शिक्षण-व्यवस्था में तकनीकि यंत्र के रूप में मोबाइल और कम्प्यूटर (लैपटॉप एवं डेस्कटॉप) की आवश्यकता होती है. इसे यंत्र के प्रयोग के लिए आवश्यक है कि बिजली की उपलब्धता बनी रहे तथा हाईस्पीड इन्टरनेट की जरूरत पड़ती है जिससे की अध्ययन और अध्यापन में किसी प्रकार की बाधा न हो. इसके साथ ही ऑनलाईन शिक्षण-व्यवस्था में पर्युक्त होने वाले सॉफ्टवेयर को कैसे संचालित किया जाता है, इसकी जानकारी न तो शिक्षक और न ही छात्रों को पूर्ण रूप से है. ग्रामीण क्षेत्र के लोग आज भी इन सुविधाओं से वंचित है, जिनके लिए ऑनलाईन कक्षा में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना एक सपने जैसा है. 

व्यावहारिक चुनौतियां

इस प्रणाली में तकनीकि चुनौतियों के अलावा व्यवहारि समस्या देखने को मिलती है. जिसमें प्रमुख रूप से छात्र और शिक्षक के मध्य पारस्परिक विचार– विमर्श का आभाव हो जाता है. जहां पारंपरिक तौर पर प्रयोग होने वाली शिक्षण की प्रणाली में शिक्षक की यह कोशिश होती है कि कक्षा में वह प्रत्येक छात्र से विषय– वस्तु को लेकर चर्चा करे. साथ ही वह छात्रों के मनोभाव को पहचान कर उसकी समस्या का निवारण करने की कोशिश करता है. कई बार छात्रों के अन्दर आत्मविश्वास की कमी होती है जिसके कारण ये न तो सवाल पूछ पाते है और न ही जबाव देने में खुद को सक्षम महसूस करते है. ऐसी स्थिति में शिक्षक की भूमिका अहम् होती है. इसके अलावा ऑनलाईन कक्षा में छात्रों की भागीदारी का आभाव भी होता है. कुछ ऑनलाईन तकनीकि सुविधा होने के बावजूद भी पठन–पाठन के कार्य में छात्रों की भागीदारी पूर्णरूप से नहीं हो पाती है. खास तौर पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के छात्र और छात्राओं के साथ यह समस्या देखने को मिलती है. क्योंकि घर में रहने के कारण बहुत सारे छात्र एवं छात्राएं घर के कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं, जिसके कारण वे ऑनलाईन कक्षा में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाते. वही इस व्यवस्था में शिक्षकों की भूमिका में वृद्धि भी हो जाती है. जिसकी वजह से शिक्षकों के उपर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाती है, जिसके कारण शिक्षण-कार्यों पर इसका प्रभाव अवश्य ही पड़ता है. शिक्षक को अपनी भूमिका के साथ-साथ 1) तकनीकि जानकार एवं प्रशासक की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है. क्योंकि सभी छात्र एवं छात्राएं तकनीकि रूप से प्रशिक्षित नहीं होते हैं, जिसकी वजह से शिक्षक को मदद करनी पड़ती है. वहीं 2) प्रशासकीय भूमिका भी निभानी पड़ती है. जैसेः– परीक्षा कब आयोजित होगी? परीक्षा शुल्क क्या होगा? कब शुल्क भरा जायेगा? और कब तक परिणाम घोषित किये जायेगें? इत्यादि, जो कि सामान्यतः संस्थान के प्रशासकीय विभाग की जिम्मेदारी होती है.

उपरोक्त चुनौतियों के अलावा भाषागत समस्या भी देखने को मिलती है. क्योंकि इस प्रक्रिया में प्रयोग होने वाले सॉफ्टवेयर मुख्यतः अंग्रेजी भाषा के द्वारा संचालित होती है. जिसकी वजह से क्षेत्रीय भाषाओं से पढ़कर आने वाले छात्रों को अंग्रेजी माध्यम के द्वारा अध्ययन करना मुश्किल हो जाता है, जिसका निदान शिक्षक कहीं न कहीं पारम्परिक कक्षा में कर पाते थे. साथ ही साथ पठन–पाठन में प्रयोग होने वाली पाठ्य-सामग्री भी ऑनलाईन के माध्यम से ज्यादातर अंग्रेजी माध्यम में ही उपलब्ध होती है. जिसके कारण ये एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है. इसके साथ ही छात्रों के द्वारा पहचान को छुपाना को छुपाने जैसी समस्या भी शिक्षकों के सामने आती है. इस व्यवस्था के माध्यम से पढाते समय दूसरी तरफ छात्र कई बार किसी और नाम से उपस्थित होते हैं, जिसकी वजह से शिक्षक अपने छात्रों को नहीं पहचान पाते हैं. यहाँ यह संभव होता है की छात्र की जगह कोई और कक्षा ले रहा होता है. इस तरह की कक्षा में कई बार शिक्षकों के साथ नाम परिवर्तित कर छात्रों या उनके आसपास रहने वाले लोगों के माध्यम से अनैतिक व्यवहार भी किये जाते है, जिसके उपर कारवाई करना मुश्किल हो जाता है. साथ ही छात्र विषय को गंभीरता के साथ सुन रहा है या नहीं, सभी छात्र विषय को समझ पा रहे है या नहीं, किससे सवाल पूछा जाए और कौन जबाव दे सकता है. ये सारी समस्याएं ऑनलाईन कक्षा में आती है.

मनोवैज्ञानिक चुनौतियाँ

ऑनलाईन प्रक्रिया में शिक्षकों एवं छात्रों के उपर मानसिक रूप से दबाव भी बना रहता है. कई ऐसे विषय होते है, जिसे पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है. जिसे ऑनलाईन व्यवस्था में पढ़ा पाना या पढ़ना अपने आप में बहुत बड़ी चुनौति है. उदाहरणस्वरूप, समाज में व्याप्त अनेक प्रकार के असमानता जैसेः- लैंगिक भेदभाव, जातिगत भेदभाव और वर्गीय भेदभाव इत्यादि. इन विषयों पर बात करते समय परिवार के अन्य सदस्यों के द्वारा इसे नकारात्मक रूप में ले लिया जाता है. जिसके कारण माता-पिता अपने बच्चों पर ऐसी कक्षाओं में उपस्थित होने से वंचित करने की कोशिश करते है. ग्रामीण इलाकों में आर्थिक रूप से कमजोर, एवं दलित वर्ग से आने वाले छात्र एवं छात्राओं के पास अत्याधुनिक मोबाइल व कम्प्यूटर के साथ-साथ इन्टरनेट की सुविधा नही होने के कारण डिजिटल कक्षा में उपस्थित नही हो पाते है. कुछ परिवार ऐसे है जिसमे एक ही मोबईल पर दो बच्चों को अलग-अलग कक्षा लेने होते है, तो जाहिर है की किसी एक को अपनी कक्षा से वंचित रहना पड़ेगा. कक्षा नही ले पाने के कारण इसका नकारात्मक प्रभाव छात्र के उपर पड़ता है. इसी मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण केरल में एक छात्रा नें आत्महत्या कर ली. ये छात्रा ऑनलाईन कक्षा उपयुक्ति यंत्र के न होने के कारण नही ले पा रही थी, जिसके कारण उसे ये कदम मानिसक दबाव में आकर लेना पड़ा. 

निष्कर्ष

वर्तमान आपात स्थिति में भारत जैसे विकासशील देशों में जहां पर पहले कभी ऑनलाईन कक्षा का प्रचलन नहीं रहा है, वहां अकस्मात ही इस तरह की शिक्षण-प्रणाली को अपनाना न सिर्फ शिक्षकों के लिए बल्कि छात्रों एवं उनके अविभावक के लिए एक चुनौती बन गई है. यद्य़पि महामारी के इस कठिन दौर में पारम्परिक शिक्षण-प्रणाली की व्यवस्था मुश्किल है, किन्तु सरकार को इसके लिए आवश्यक ससांधन जैसे तकनीकि उपकरण, बिजली की व्यवस्था, हाईस्पीड इन्टरनेट व वाई-फाई इत्यादि की सुविधा शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक अध्ययनरत छात्रों तक सुनिश्चित होनी चाहिए. ऐसे तंत्र को लेकर आना चाहिए जिससे छात्रों की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित हो एवं शिक्षको या छात्र-छात्राओं के साथ होने वाली अनैतिक व्यवहार के विरूद्ध कारवाई की भी व्यवस्था सुनिश्चत होनी चाहिए. साथ ही सरकार को शिक्षको एव छात्रों के मनोवैज्ञानिक दशा पर पड़ने वाले नकारात्म प्रभाव से निपटने के लिए आवश्यक तंत्र की व्यवस्था भी सुनिश्चित होना चाहिए. हालांकि पारम्परिक शिक्षा-व्यवस्था से श्रेष्ठ प्रणाली और कोई नहीं हो सकती है. किन्तु आपदा के दौर से निपटने के लिए उपरोक्त कमियों पर सरकार को कार्य करने की आवश्यकता है.

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संदर्भः-

Herald, UoH. “Proposal for Online Classes Elicits Mixed Responses from UoH Students: Survey.” Proposal for online classes elicits mixed responses from UoH students: Survey |, April 19, 2020. http://herald.uohyd.ac.in/proposal-for-online-classes-elicits-mixed-responses-from-uoh-students-survey/.

John, Rachel, and Tuhin A. Sinha. “Indian Educational Institutes Should Break Norms in Covid Times, Not Conduct Online Exams.” The Print, April 26, 2020. https://theprint.in/opinion/pov/indian-educational-institutes-should-break-norms-in-covid-times-not-conduct-online-exams/408660/.

Mehra, Anurag. “Opinion: After Weeks Of Online Classes At IIT, Here’s The Truth.” NDTV.com, May 30, 2020. https://www.ndtv.com/opinion/online-classes-sound-cute-on-paper-heres-the-reality-2237464?pfrom=home-opinion&fbclid=IwAR2Nj61k5WbMh8tupUvErYg8hByAs8dPxc6VqW_vL7t5C9BaLkbLLfUfd3I.

Punit, Itika Sharma. “For Many of India’s Teachers, Online Classes amid Lockdown Have Been an Awful Experience.” Scroll.in. Scroll.in, May 13, 2020. https://scroll.in/article/961738/for-many-of-indias-teachers-online-classes-amid-lockdown-have-been-an-awful-experience.

Verma, Prachi, and Anjali Venugopalan. “Covid-19 Fallout: Online Classes Elude Many Due to Lack to Laptops, Tablets.” The Economic Times. Economic Times, April 8, 2020. https://economictimes.indiatimes.com/small-biz/startups/newsbuzz/covid-19-fallout-online-classes-elude-many-due-to-lack-to-laptops-tablets/articleshow/75042060.cms?from=mdr.

अनिंद्यबनर्जी\रोहितकुमारसिंह [Edited by: दिनेशअग्रहरि] . “सभीगांवोंतकबिजलीपहुंचानेकेदावोंमेंकितनीहैसच्चाई, देखिएआजतककीग्राउंडरिपोर्ट.”aajtak.intoday.in, April 30, 2018. https://aajtak.intoday.in/story/government-claim-power-all-villages-aajtak-ground-report-dat-1-999782.html.

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दीपक कुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ पोलिटिकल साइंस में पी.एच.डी  स्कॉलर हैं। ज्योति दिवाकर, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी (पीएचडी.) हैं.

 

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4 thoughts on “ऑनलाईन शिक्षण-प्रणालीः वर्तमान चुनौतियाँ और ग्रामीण एवं दलित छात्रों का हाशियाकरण

  1. Sir your blog is good and upto marks, but it is somehow lacking of statistics. If you provide the data then it will be more helpful. Although this is good.

    1. Thank you so much Rakhi for you valuable comments and suggestions. Yes, I am agree with you that statics is good for any research article but, sometimes, we need to express the challenges or problems which will affect the larger population of the society in the coming days.

  2. सही लिखा है। पाठ्यसामग्री के अधिकतर अंग्रेजी में होने के लिए प्राध्यापको भर्ती तथा चयन का दोषपूर्ण होना है। चयन समितियों द्वारा अंग्रेजी भाषा के धाराप्रवाह ज्ञान को संबंधित विषय के बेहतर ज्ञान के मिथ को हकीकत मान कर चयन हो रहा है। खेद का विषय तो यह है कि जिन विश्वविद्यालयों के महाविद्यालयों में अध्यापन का औपचारिक माध्यम हिन्दी है, वे भी इस मिथ दोष से प्रभावित हो रहे हैं और वहां दबे पांव अंग्रेजी माध्यम को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कारण, नव चयनित प्राध्यापकों को स्वयं अपने विषय की हिन्दी शब्दावली का ज्ञान नहीं है। वास्तव में मानव संसाधन प्रबंधन की दृष्टि से देखें तो उनका चयन कार्य अपेक्षा और कार्य विशिष्टता के आधार पर होने की बजाए पूर्व परीक्षाओं में में प्राप्त उच्चांक के आधार पर निर्मित योग्यता सूची और अंग्रेजी में धाराप्रवाह सम्प्रेषण के निहित दोष (हेलो इफ्कैट) के कारण हुआ है। मुझे तो पीछे एक आश्चर्य मिश्रित कटु अनुभव तब हुआ, जब ऐसी नवयुवा प्राध्यापिका को कामर्स के लिए प्रचलित हिन्दी शब्द वाणिज्य से अनभिज्ञ पाया। मजेदार बात यह थी कि अंग्रेजी माध्यम से वाणिज्य निष्णांत वह प्राध्यापिका स्वयं वाणिज्य प्राध्यापिका के पद पर नियुक्त हुईं हैं। तकरीबन अगले 25 वर्ष तक हिन्दी माध्यम से अध्यापन वाले महाविद्यालय में वह अंग्रेजी माध्यम का प्रसार करती रहेंगी। वह हिंदी में पाठ्यसामग्री कत‌ई तैयार नहीं करेंगी क्योंकि वह इस में अपनी अज्ञानतावश असमर्थ हैं। हां, उन्होंने अंग्रेजी में कुछ ई-कंटेंट बनाने भी शुरू कर दिए हैं। ऐसे माध्यम का रूपांतरण होता जाएगा। विद्यार्थियों का लक्षित समूह और व और वंचित होता जाएगा।

  3. राजीव चन्द्र शर्मा जी,
    आपके सुझाव और आपने जो अनुभव को साझा किया है उसके लिए आपका धन्यवाद! इसमें कतई संदेह नही है कि वर्तमान युग में शिक्षण -व्यवस्था में ही नहीं अपितु, हर क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग वैश्विकरण के प्रभाव के कारण धाराप्रवाह किया जाने लगा है। इससे न सिर्फ हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोग बल्कि भारत के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोग भी भाषाई भेदभाव व भाषाई उपनिवेशवाद के शिकार हो रहें है। क्षेत्रीय भाषा से अध्ययन करने वाले छात्र जब उच्च शिक्षण संस्थान में प्रवेश लेते हैं तो उन्हें लगता है कि सब अच्छा होगा, किन्तु असली परीक्षा यही से प्रारंभ होती है। सब कुछ अंग्रेजी में ही मिलेगा, जिसका उल्लेख आपने किया भी है।
    हमें अंग्रेजी से नफरत नही करना चाहिए किन्तु इसे अपनी देशी भाषाओं के उपर प्रभावी होने से बचाना ही होगा। क्योंकि समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला इसलिए भी नही लेता है., क्योंकि उन्हें लगता है कि विश्वविद्यालयी स्तर अंग्रेजी भाषा का ही प्रयोग किया जाता है।

    धन्यवाद

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